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Wah Aurat Jisne Nabi Hone Ka Dawa Kiya? Jhuthe Nabiyo Ki Shadi.

 Jhuthi Nabuwat Ka Dawa Karne walo ka Anjam.

जब हक़ मेहर में माँगी गईं दो नमाज़ें!
एक ख़ूबसूरत शायरा, एक मक्कार 'नबी' और एक फ़रेबी निकाह.
वो औरत जिसने नबी होने का दावा किया और 18000 लोग उसके पीछे चल पड़े.
नबुव्वत के झूठे दावेदार: मुसैलमा और सजाह की इबरतनाक दास्तान। 
जब दो झूठे नबियों ने की शादी: मुसैलमा और सजाह आपको हैरान कर देगी.
इस्लाम की तारीख़ का सबसे बड़ा फ़रेब: एक ख़ूबसूरत 'नबिया' और मक्कार 'नबी' का इबरतनाक अंजाम.
3 दिन का ऐश और हक़ मेहर में 2 नमाज़ें माफ़: झूठे नबियों की वो दास्तान जो आपने नहीं सुनी होगी. 
नबुव्वत का झूठा दावा, धोखे की शादी और एक भयानक अंजाम: मुसैलमा और सजाह की पूरी कहानी.
तारीख़ के पन्नों से एक हैरान कर देने वाली कहानी! एक ख़ूबसूरत झूठी नबिया और एक मक्कार झूठे नबी का इत्तिहाद, तीन दिन का ऐश और फिर वो सवाल जिसने सारा खेल पलट दिया। पूरी कहानी जानने के लिए ज़रूर पढ़ें। 
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Sahaba ke Daur Se Abtak Nabuwat Ke Bahut Dawedar Hue.
नबुव्वत का झूठा दावा, धोखे से शादी, और हक़ मेहर में अल्लाह के फ़र्ज़ की तौहीन! जानिए कैसे सजाह और मुसैलमा कज़्ज़ाब का अंजाम दुनिया के लिए एक इबरत का निशान बन गया।

क्या आप जानते हैं उस औरत के बारे में जिसने नबी होने का दावा किया और एक झूठे नबी से शादी कर ली? उनका हक़ मेहर था 'दो नमाज़ों की माफ़ी'। पढ़िए मुसैलमा और सजाह की पूरी और इबरतनाक कहानी। 
तारीख़ की सबसे अजीब शादी: जब दो झूठे नबियों का हुआ मिलन.

इस्लाम की तारीख़ उस दौर की गवाह है जब हुज़ूर-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वफ़ात के बाद कई फ़ित्नों ने सर उठाया। यह हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त का शुरुआती और नाज़ुक तरीन वक़्त था। इन्हीं फ़ित्नों में सबसे बड़ा फ़ित्ना झूठी नबुव्वत का था। कई लोगों ने अपनी शख़्सी शोहरत और सियासी मक़ासिद के लिए नबी होने का दावा कर दिया, जिनमें सबसे बड़ा नाम मुसैलमा कज़्ज़ाब का था। जब सहाबा के दौर मे ऐसा हुआ तो फिर आज के दौर मे कई इंजीनियर भी नबुवत् का दावा करके मुसलमानो के अंदर इख़्तेलफ़ात पैदा करना चाहते है, उनका मकसद जाती शोहरत और पेशवा बनने का है यह कज्जाब लोग लानत के मुस्ताहिक है। यह फितना परवर है,ये फ़ितने की जड़ है। 
 
मुसैलमा कज़्ज़ाब: एक मक्कार और चालाक शख़्स।
मुसैलमा यमामा के क़बीले बनू हनीफ़ा से ताल्लुक़ रखता था। वह बेहद चालाक, बातूनी और लोगों को अपनी बातों के जाल में फँसाने का माहिर था। उसने हुज़ूर (स.अ.व.) की ज़िंदगी में ही नबुव्वत का झूठा दावा किया था। उसके चेहरे पर चेचक के दाग़ थे, लेकिन उसकी बातों में ऐसा जादू था कि उसने लगभग 35,000 लोगों को गुमराह करके अपना पैरोकार बना लिया।

 सजाह बिन्त हारिस: एक ख़ूबसूरत और पुर-कशिश झूठी नबिया
उसी दौर में एक और शख़्सियत ने नबुव्वत का दावा किया, जो एक औरत थी। उसका नाम सजाह बिन्त हारिस था और वह बनू तग़लिब क़बीले की एक ईसाई औरत थी। वह बेहद ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ एक बेहतरीन शायरा और ज़बरदस्त मुक़र्रिर (भाषण देने वाली) थी। उसकी पुर-कशिश शख़्सियत और ज़ोरदार तक़रीरों से मुताशीर् होकर, हज़ारों लोग, जो दीनी इल्म से दूर और ख़्वाहिशात के ग़ुलाम थे, उसके गिर्द जमा हो गए। देखते ही देखते उसने भी 18,000 का एक बड़ा लश्कर तैयार कर लिया। ख्वाहिश ए नफ्स के पैरोकार ने इन झूठे नबियो पर इमान लाया था। ऐसे ठरकी किस्म के लोग तब भी थे आज भी है और हर दौर मे ऐसे हुस्न परस्त, नफ्स परस्त लोग आते रहेंगे। 

 दो झूठे नबियों का इत्तिहाद
जब मुसैलमा कज़्ज़ाब को सजाह की बढ़ती ताक़त का इल्म हुआ, तो उसने उसे अपने लिए ख़तरा समझने के बजाय एक मौक़े के तौर पर देखा। उसने सोचा कि अगर सजाह का लश्कर उसके साथ मिल जाए, तो मदीना पर हमला करना और मुसलमानों को शिकस्त देना आसान हो जाएगा। उसने सजाह को एक पैग़ाम भेजा जिसमें मुलाक़ात और दोनों ताक़तों को मिलाकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक मुत्तहिदा (संयुक्त) जंग लड़ने की पेशकश की। इसमे दोनो के मफआद् शामिल थे और दोनो के दुश्मन मुसलमान थे। 

सजाह भी सियासी तौर पर बहुत शातिर थी। उसने इस पेशकश में अपना फ़ायदा देखा और मुलाक़ात के लिए राज़ी हो गई। दोनों लश्करों ने एक खुले मैदान में आमने-सामने ख़ेमे गाड़ दिए। दोनों लश्करों के बीचों-बीच एक आलीशान शाही ख़ेमा सिर्फ़ इन दोनों झूठे "नबियों" की मुलाक़ात के लिए लगाया गया।

 फ़रेब और अय्याशी से भरी मुलाक़ात
मुक़र्ररा वक़्त पर दोनों उस ख़ेमे में दाख़िल हुए। मुसैलमा पूरी तैयारी के साथ आया था। उसने बेहतरीन ख़ुशबू लगा रखी थी और उसकी बातों में मक्कारी और मफाद परस्ती भरी हुई थी। उधर सजाह ने भी बेहतरीन खुशबु लगाकर उस मुलाक़ात मे तशरीफ लाई जो 3 दिन और 3 रात तक कायम रहा। 
जब दोनों बैठे, तो सजाह ने रौबदार अंदाज़ में कहा, "तुम पर जो वही नाज़िल होती है, उसमें से कुछ सुनाओ।"

मुसैलमा इसी लम्हे का इंतज़ार कर रहा था। उसने अरबी ज़बान में कुछ ऐसे शेर और जुमले पढ़े जो सुनने में तो बहुत शानदार और वज़नी लगते थे, लेकिन उनका मतलब बेहद फेहश और शहवानी जज़्बात को उभारने वाला था। सजाह, जो ख़ुद भी दुनियावी ऐश-ओ-इशरत की शौक़ीन थी, उसके कलाम और शख़्सियत से बहुत मुताशिर हुई। मौक़ा देखकर मुसैलमा ने अपनी असल चाल चली। उसने कहा, "क्यों न हम दोनों शादी कर लें? इससे हमारे दोनों लश्कर एक हो जाएँगे जिससे हमारी ताक़त मे और इजाफा होगा और हम मिलकर मुसलमानों को ख़त्म कर देंगे। मैं अरब का बादशाह बनूँगा और तुम मेरी मल्लिका होगी।" 

ताक़त और हुकूमत के लालच ने सजाह को अंधा कर दिया और वह इस शादी के लिए फ़ौरन राज़ी हो गई। इसके बाद तीन दिन और तीन रात तक दोनों उसी ख़ेमे में ऐश-ओ-इशरत और शबाब में डूबे रहे। बाहर उनके लश्कर इस लंबी मुलाक़ात पर हैरान और बेचैन थे। उनके फौज मे तरह तरह के ख्यालात और अफवाहे फैलने लगी। 

 हक़ मेहर का सवाल और साज़िश का पर्दाफ़ाश
तीन दिन बाद जब सजाह ख़ेमे से बाहर निकली और अपने लश्कर के पास पहुँची, तो उसके लोगों ने सवालों की फेहरिशत् तैयार कर दी। उन्होंने पूछा, "आख़िर तीन दिन तक इस ख़ेमे में क्या होता रहा?"

सजाह ने बड़े फ़ख़्र से जवाब दिया, "मैंने और नबी मुसैलमा ने शादी कर लिया है।"

यह सुनकर लश्कर में से किसी ने फ़ौरन सवाल किया, "अगर शादी हुआ है, तो तुम्हारा निकाह किसने पढ़ाया?"
सजाह ने अपनी झूठी नबुव्वत की शान दिखाते हुए कहा, "हमारा निकाह ख़ुद जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) ने पढ़ाया है।"
लश्कर में से एक और सवाल उठा, "तो फिर तुम्हारा हक़ मेहर क्या तय हुआ?"

इस सवाल पर सजाह लाजवाब हो गई। उसे कोई जवाब नहीं सूझा और वह शर्मिंदा होकर वापस मुसैलमा के पास गई और उसे सारी बात बताई।
 मुसैलमा ने अपनी मक्कारी का एक और सबूत देते हुए कहा, "जाओ और अपने लोगों से कहो कि अल्लाह ने तुम्हारे नबी के इस निकाह की बरकत से उम्मत पर से दो वक़्त की नमाज़ें (फ़ज्र और इशा) माफ़ कर दी हैं। यही तुम्हारा मेहर है।" अब 3 वक़्त की ही नमाज कायम की जायेगी। 

जब सजाह ने वापस आकर यह जवाब दिया, तो उसका लश्कर, जो पहले ही शक में था, भड़क उठा।
 उन्होंने कहा, "अल्लाह के सच्चे नबी हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने भी निकाह किए थे, लेकिन उनका मेहर दिरहम और दीनार में तय होता था, अल्लाह के फ़र्ज़ आमाल में कमी करके नहीं। तुम दोनों झूठे और ज़ानी हो!"
यह कहते ही सजाह के पूरे 18,000 के लश्कर ने उसे छोड़ दिया और अपने-अपने घरों को लौट गए।

 दोनों का इबरतनाक अंजाम
सजाह अकेली और बेसहारा रह गई। वह रोती हुई मुसैलमा के पास गई और कहा, "अब मेरा कोई नहीं, मुझे अपनी बीवी बनाकर रखो।" मुसैलमा ने ठहाका लगाया और कहा, "मुझे तुमसे नहीं, तुम्हारी फ़ौज से मतलब था। जब फ़ौज ही नहीं रही, तो तुम मेरे किस काम की?"

ज़लील और रुसवा होकर सजाह वहाँ से बसरा (इराक) चली गई। वहाँ उसने अपने गुनाहों से सच्ची तौबा की, इस्लाम क़बूल किया और अपनी बाक़ी ज़िंदगी गुमनामी और इबादत में गुज़ार दी।

दूसरी तरफ़, मुसैलमा कज़्ज़ाब का सामना हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजी अल्लाहु अनहु  के भेजे हुए लश्कर से "जंग-ए-यमामा" के मैदान में हुआ, जिसके सिपहसालार हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) थे। इस ख़ूंरेज़ जंग में मुसलमानों को फ़तह हासिल हुई और मुसैलमा कज़्ज़ाब, हज़रत वहशी इब्ने हर्ब (र.अ.) के हाथों क़त्ल हुआ। इस तरह नबुव्वत के इन दोनों झूठे दावेदारों का अंजाम दुनिया के लिए एक इबरत का निशान बन गया।
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