From Fatimid Decline to Salahuddin’s Glory.
Fall of Fatimid Rule & Rise of Salahuddin Ayyubi.
Fatimid Caliphate decline.
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Crusades and Salahuddin.
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| ज़वाल से उरूज तक: फ़ातिमी से अय्यूबी का सफ़र. |
फ़ातिमी हुकूमत का ज़वाल और सलाहुद्दीन अय्यूबी का उरूज: तारीख़ का एक नया मोड़
फ़ातिमी हुकूमत , जो कभी शुमाली अफ़्रीक़ा (North Africa), मिस्र और शाम (Syria) पर अपनी शान-ओ-शौकत का सिक्का जमाए हुए थी, आख़िरकार 1171 ईसवी में अपने अंजाम को पहुंची यह एक अज़ीम-उश-शान शिया सल्तनत थी, लेकिन वक्त की गर्दिश और सियासी कमज़ोरियों ने इसकी बुनियादों को खोखला कर दिया था। इसके ज़वाल के पीछे तवील अरसे से जारी अंदरूनी साज़िशें, फ़ौजी कमज़ोरियां और सलीबी जंगों (Crusades) का बढ़ता हुआ दबाव कारफ़रमा था.
फ़ातिमी सल्तनत के बिखरने के असबाब
फ़ातिमी हुकूमत का खात्मा रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह एक तवील सिलसिले का नतीजा था। जब सलीबी ताक़तें बैत-उल-मुक़द्दस की तरफ बढ़ रही थीं, उस वक्त काहिरा के तख्त पर वो मज़बूती नहीं रही थी जो कभी अल-मुइज़्ज़ या अल-अज़ीज़ के दौर में हुआ करती थी।
1. यरुशलम का सुकूत और दिफ़ाई नाकामी
1099 ईसवी में जब पहली सलीबी जंग अपने उरूज पर थी, फ़ातिमी हुकूमत यरुशलम (Jerusalem) का मुअस्सिर दिफ़ा करने में नाकाम रही। यह एक बहुत बड़ा धक्का था, जिसके नतीजे में न सिर्फ़ यरुशलम, बल्कि फ़िलिस्तीन और शाम के कई साहिली इलाक़े सलीबियों के क़ब्ज़े में चले गए. यह वाक़या फ़ातिमी ताक़त के बिखरने की एक वाज़ेह अलामत बन गया था।
2. सियासी बोहरान और अंदरूनी इख़्तिलाफ़
बारहवीं सदी के वस्त तक आते-आते फ़ातिमी हुक्मरान महज़ कठपुतली बनकर रह गए थे, और असल ताक़त उनके वज़ीरों के हाथ में आ चुकी थी। अंदरूनी साज़िशों ने रियासत को इतना कमज़ोर कर दिया था कि कभी यह बग़दाद की अब्बासी ख़िलाफ़त के लिए ख़तरा थी, लेकिन अब खुद अपने वजूद के लिए जूझ रही थी।
सलाहुद्दीन अय्यूबी की आमद और नया सियासी मंज़रनामा
इस नाज़ुक दौर में, जब मिस्र सियासी तौर पर कमजोर था, वहां एक नई क़ियादत का ज़हूर हुआ। यह दौर था नुरुद्दीन ज़ंगी का, जो शाम से सलीबियों के ख़िलाफ़ जिहाद का परचम बुलंद किए हुए थे। उनका मक़सद मिस्र को सलीबी असर से बचाना और दोबारा इस्लमिक दायरे में लाना था।
शेरकोह और सलाहुद्दीन का किरदार
नुरुद्दीन ज़ंगी ने अपने क़ाबिल सिपहसालार शेरकोह और उनके भतीजे सलाहुद्दीन अय्यूबी को मिस्र भेजा। इन दोनों का मक़सद मिस्र के वज़ीरों की आपसी रंजिशों का फ़ायदा उठाकर वहां इस्लामी इत्तेहाद क़ायम करना था। शेरकोह की वफ़ात के बाद, सलाहुद्दीन को वज़ारत का ओहदा मिला। यह वो मौक़ा था जहां से तारीख़ ने एक नया मोड़ लिया।
फ़ातिमी हुकुमत का ख़ात्मा और ख़ुत्बे की तब्दीली
सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपनी हिकमत-ए-अमली और सियासी बसीरत से धीरे-धीरे मिस्र में अपनी पकड़ मज़बूत की।
-आख़िरी हुकमरान का इंतक़ाल: 1171 ईसवी में जब आख़िरी फ़ातिमी हुकमरा अल-आज़िद (Al-Adid) का इंतक़ाल हुआ, तो यह फ़ातिमी दौर का रस्मी तौर पर ख़ात्मा साबित हुआ।
अब्बासी ख़ुत्बे की बहाली: सलाहुद्दीन ने इंतेहाई होशियारी से काम लेते हुए मिस्र की मस्जिदों में जुमे के ख़ुत्बे में फ़ातिमी हुकुमत के बजाय बग़दाद के अब्बासी हुकमरान का नाम शामिल करवा दिया। यह इस बात का ऐलान था कि मिस्र अब मज़हबी तौर पर दोबारा बग़दाद और सियासी तौर पर नुरुद्दीन ज़ंगी की रियासत के ज़ेरे-असर आ चुका है.
अय्यूबी सल्तनत का क़याम: एक नई ताक़त का जहूर
नुरुद्दीन ज़ंगी के इंतक़ाल के बाद हालात ने फिर करवट ली। सलाहुद्दीन, जो अब तक ज़ंगी सल्तनत के वफ़ादार थे, ने महसूस किया कि सलीबियों का मुक़ाबला करने के लिए मिस्र और शाम का एक मज़बूत मरकज़ पर मुत्तहिद होना ज़रूरी है।
1. इत्तेहाद की कामयाबी
सलाहुद्दीन ने बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक झंडे तले जमा किया। उन्होंने दमिश्क़, हलब और मिस्र को मिलाकर एक ऐसी ताक़तवर अय्यूबी सल्तनत (Ayyubi Empire) की बुनियाद रखी, जिसने सलीबी रियासतों के गिर्द घेरा तंग कर दिया।
2. सलीबियों के लिए नई चुनौती
अय्यूबी सल्तनत के क़याम ने सलीबियों के लिए एक नई और दुश्वारगुज़ार रुकावट खड़ी कर दी। वो ताक़त जो पहले मिस्र और शाम के दरमियान बँटी हुई थी, अब एक मुट्ठी बनकर उभरी। इसी इत्तेहाद का नतीजा था कि आगे चलकर हत्तीन की जंग में मुसलमानों को अज़ीम फ़तह नसीब हुई।
मुख़्तसर जायज़ा (Conclusion)
फ़ातिमी ख़िलाफ़त का ज़वाल और सलाहुद्दीन का उरूज महज़ एक हुकूमत का बदलना नहीं था, बल्कि यह मशरिक़-ए-वुस्ता (Middle East) के सियासी और मज़हबी नक़्शे की अज़-सरे-नौ तश्कील थी। इस तब्दीली ने सलीबी जंगों का रुख़ पूरी तरह मोड़ दिया। जिस मिस्र को सलीबी एक आसान निवाला समझ रहे थे, वही उनके ख़िलाफ़ इस्लामी मुक़ामात (Resistance) का सबसे मज़बूत क़िला बन गया। सलाहुद्दीन की क़ियादत ने उम्मत को यह पैग़ाम दिया कि इत्तेहाद और मज़बूत इरादों से ही तारीख़ का रुख बदला जा सकता है.
फ़ातिमी हुकूमत का ज़वाल, सबक़ देता है कि ताक़त हमेशा के लिये नहीं होती।
सलाहुद्दीन अय्यूबी के मशहूर ज़ेरे-अक़वाल जो हमे तारिकि मे रौशनि दिखाता है.
"मुल्कों को तलवार से नहीं, इंसाफ़ से फ़तह किया जाता है।"
"हक़ की राह में सब्र सबसे बड़ी जंग है।"
"इंसान की असली जीत उसके अख़लाक़ और रहमदिल दिल में है।"
"जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए कोई ताक़त रुकावट नहीं बन सकती।"







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