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Deeni Taleem vs Duniyawi Ilm: Ummat Ki Asal Zarurat Kya Hai?

Higher Education ya Education Maafiyaa.

 Religious Education or Worldly Knowledge: What Does the Ummah Truly Need?
स्कूल या लूट का बाज़ार? हमारी नस्लों का मुस्तक़बिल (भविष्य) दाँव पर है।
 डिग्रियाँ हाथों में होंगी, लेकिन दिलों में ईमान और अख़लाक़ नहीं। क्या यही है तरक़्क़ी?
 आज की अधूरी तालीम, कल की खोखली नस्लें। इस साज़िश को समझिए।
आज के स्कूल हमारे बच्चों को डिग्रियों से लदे रोबोट बना रहे हैं,जिनके पास दुनिया का इल्म तो है, मगर दीन और अख़लाक़ की दौलत नहीं। यह एक ख़तरनाक साज़िश है जो हमारी आने वाली नस्लों को अंदर से खोखला कर रही है।
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दीनी तालीम या दुनियावी इल्म: उम्मत की असल ज़रूरत क्या है?
"मुसलमानो को आलिम, मुफ्ती, मौलाना, इमाम की नही बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और प्रोफेसर की जरूरत है"
यह कहने वाले लोग किस बीमारी के मरीज है?
क्या आपको भी महसूस होता है कि आज के स्कूल तालीम के नाम पर सिर्फ़ एक कारोबार चला रहे हैं? एक ऐसा निज़ाम, जो हमारे बच्चों को दुनियावी दौड़ में सबसे आगे रखने का वादा तो करता है, लेकिन उनसे उनकी मासूमियत, उनका अख़लाक़ और उनकी रूहानी तरबियत छीन लेता है। यह तहरीर हर उस बाप की आवाज़ है जो 'एजुकेशन माफ़िया' के हाथों बेबस है, और हर उस माँ की फ़िक्र है जो अपनी आँखों के सामने अपनी नस्लों को खोखला होते देख रही है। आइए, इस अधूरी तालीम और इससे परवान चढ़ने वाली नस्लों की हक़ीक़त पर एक नज़र डालें।

दीनी तालीम या दुनियावी इल्म: उम्मत की असल ज़रूरत क्या है?

आजकल दुनियावी तालीम की जो हद से ज़्यादा इज़्ज़त की जाती है, यह ग़ालिब क़ौमों का मग़लूब (हारी हुई) क़ौमों पर असर का नतीजा है। जब ईमान कमज़ोर और यक़ीन डगमगाया हुआ हो, तो ऐसी ही बातें और ख़्यालात पैदा होते हैं।

 आज का बेढंगा स्कूली निज़ाम
इस ग़लत सोच को जड़ से मज़बूत करने में आज के बेढंगे स्कूली निज़ाम का सबसे बड़ा हाथ है। यह निज़ाम बच्चों को सिर्फ़ एक मशीन बनाने पर तुला है, जिसका मक़सद दुनियावी डिग्रियाँ हासिल करना, बड़ी नौकरियाँ पाना और पैसा कमाना रह गया है। इस निज़ाम में दीन और अख़लाक़ की तालीम को जान-बूझकर नज़रअंदाज़ किया जाता है, ताकि ऐसी नस्ल तैयार हो जो दुनिया के पीछे भागे और अपने रब और अपनी आख़िरत को भूल जाए। यह निज़ाम हमारे ज़हीन बच्चों के दिलों में यह बात बिठा देता है कि कामयाबी सिर्फ़ डॉक्टर या इंजीनियर बनने में है, जबकि दीनी तालीम को एक फ़ालतू और कमतर चीज़ समझ लिया जाता है।

 एक ख़तरनाक ग़लतफ़हमी
यह सोच इतनी आम हो गई है कि कुछ लोग ज़हीन और क़ाबिल स्टूडेंट्स को शरई उलूम से हटाकर डॉक्टर, इंजीनियरिंग, जियोलॉजी जैसी दुनियावी तालीम की तरफ़ मोड़ देते हैं। वे यह कहकर धोखा देते हैं कि "उम्मत" को अब शेख़, ख़तीब या इमाम की नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और साइंटिस्ट की ज़रूरत है!"

यह दलील देने वाले भूल जाते हैं कि अगर यही बात सही है, तो फिर उम्मत को कूड़ा-कचरा उठाने वालों और सफ़ाई करने वालों की भी ज़रूरत है। तो क्या हमें अपने सबसे ज़हीन और क़ाबिल बच्चों को इन कामों पर भी लगा देना चाहिए? यक़ीनन नहीं!

 शैतान के मददगार

यह कहना किउम्मत को आलिम, इमाम या मुफ़्ती की ज़रूरत नहीं, यह सिर्फ़ उनके अपने ज़हन की उपज और एक ख़ुराफ़ात है, जिसकी कोई शरई दलील नहीं है। ये लोग दुनिया के धोके में पड़े हुए हैं। इमाम इब्न अल-जौज़ी और इमाम इब्न अल-क़य्यिम (रहमतुल्लाह अलैहिमा) ने फ़रमाया है कि जो लोग अवाम को दीनी इल्म से हटाकर दूसरे कामों की तरफ़ मोड़ते हैं, वे असल में इब्लीस (शैतान) के नायब यानी मददगार हैं।

 उम्मत की असल ज़रूरत

हक़ीक़त यह है कि उम्मत को एक आलिम, मुफ़्ती, क़ाज़ी, इमाम और ख़तीब की ज़रूरत, एक डॉक्टर, इंजीनियर या जियोलॉजिस्ट से कहीं ज़्यादा और अहम है। किसी के लिए भी यह जायज़ नहीं है कि वह उम्मत के सबसे क़ाबिल बच्चों को शरई उलूम से हटाकर दुनियावी तालीम में लगा दे। क़ौम को अपने बेहतरीन और ज़हीन दिमाग़ों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत दीन के इल्म में है, न कि मेडिसिन, इंजीनियरिंग या एस्ट्रोनॉमी में।

 क़ाबिलियतों का नुक़सान

बड़े अफ़सोस की बात है कि इसी ग़लत सोच की वजह से क़ौम की बेशुमार क़ाबिलियतें ज़ाया हो गई हैं। वे ज़हीन लोग जो दीनी तालीम हासिल करके उम्मत के लिए बहुत नफ़ा बख़्श साबित हो सकते थे, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, जियोलॉजी जैसे मैदानों में जाकर अपनी क़ीमती सलाहियतों को बर्बाद कर बैठे।

याद रखें, उम्मत को शरई इल्म की ज़रूरत खाने-पीने से भी ज़्यादा है। जैसा कि इमाम अहमद बिन हंबल (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं: "लोगों को इल्म की ज़रूरत खाने और पीने से भी ज़्यादा है।"

 एजुकेशन माफ़िया: क्या आप भी इस लूट का शिकार हैं?
आजकल के वालिदैन (माता-पिता) की ज़िंदगी एक अजीब कशमकश में गुज़र रही है। 
स्कूल, जो कभी तालीम और तरबियत का मरकज़ हुआ करते थे, अब एक माफ़िया की शक्ल ले चुके हैं, और हम सब बेबस शिकार हैं। रोज़ सुबह एक नई फ़रमाइश का फ़ोन आता है:
"पापा, आज 'ब्लू कलर डे' है, नीली शर्ट चाहिए।
""पापा, कल 'आर्मी डे' है, फ़ौजी यूनिफॉर्म दिला दो।
""पापा, टीचर मारती है।
""पापा, टीचर मेरा लंच खा जाती है।
""पापा, मुझे स्कूल नहीं जाना, टीचर मुझे 'गैंडे जैसा मोटा' कहकर मेरा मज़ाक़ उड़ाती है।
""पापा, आज टीचर ने मेरे बाज़ू में पेंसिल की नोक चुभो दी।

 सबसे बड़ी मुसीबत, स्कूल की स्टेशनरी! जो बाहर कहीं मिलती नहीं, और अगर बच्चे के पास न हो तो टीचर उसे सज़ा देती है। जब आप शिकायत करने जाते हैं जब हिम्मत करके आप स्कूल मैनेजमेंट से बात करने जाते हैं, तो सामने से बीस साल की एक मैट्रिक पास टीचर आपको लेक्चर देने बैठ जाती है। वो आपको समझाती है कि बच्चों की नफ़्सियात (मनोविज्ञान) क्या होती है, उनकी तरबियत कैसे करनी चाहिए, और हम जैसे वालिदैन को तो किसी पेरेंटिंग सेशन में दाख़िला लेना चाहिए।
अब कोई उस मोहतरमा को कैसे समझाए कि, जिस बाप को आप सिखा रही हैं, उसने इसी सब्जेक्ट में डॉक्टरेट (PhD) कर रखी है। जिस माँ ने रातों को जाग-जागकर इन बच्चों को पाला है, उसे अब आप तरबियत सिखाएँगी? हद है, और बेहद है!

अधूरा इल्म, खोखली नस्लें: स्कूलों के इस निज़ाम से हम क्या बना रहे हैं?

एक तरफ़ "ब्लू डे" और "आर्मी डे" की फ़रमाइशें, दूसरी तरफ़ टीचर का बच्चों को ज़लील करना, उनका लंच खा जाना और बाज़ू में पेंसिल चुभो देना। 
जब कोई बाप इस नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने स्कूल जाता है, तो एक कम उम्र टीचर उसे ही तरबियत और नफ़्सियात का लेक्चर देने लगती है। यह ग़ुस्सा, यह बेबसी और यह लाचारी आज हर दूसरे वालिद की कहानी है, जो 'एजुकेशन माफ़िया' के हाथों अपनी मेहनत की कमाई और अपने बच्चों का सुकून, दोनों लुटा रहा है।

मगर क्या हमने कभी सोचा है कि यह सिर्फ़ पैसों की लूट या वक़्ती परेशानी नहीं है? 
यह उस बड़ी और गहरी ग़लती का नतीजा है, जहाँ हमने दीनी और अख़लाक़ी तालीम को दुनियावी डिग्रियों के क़दमों में क़ुर्बान कर दिया। यह ग़ालिब क़ौमों की उस अंधी नक़ल का नतीजा है, जहाँ डॉक्टर या इंजीनियर बनाना कामयाबी की सबसे बड़ी दलील मान लिया गया, और एक आलिम, एक नेक और बा-अख़लाक़ इंसान बनाने को पिछड़ापन और फ़िज़ूल समझ लिया गया।

अब सवाल यह उठता है कि जब हमारे बच्चे इन स्कूलों से निकलेंगे, तो कैसी नस्ल परवान चढ़ेगी?

जवाब कड़वा है, लेकिन साफ़ है। हम डिग्रियों से लदे हुए ऐसे ज़हीन रोबोट तैयार कर रहे हैं, जिन्हें केमिस्ट्री और जियोलॉजी का तो पता होगा, लेकिन अपने रब और अपनी हक़ीक़त का इल्म नहीं होगा। वे अच्छी तनख़्वाह तो कमाएँगे, लेकिन उनके अंदर से रहम, इज़्ज़त और अख़लाक़ का जनाज़ा निकल चुका होगा। वे दुनिया जीतने के फ़ॉर्मूले तो जानेंगे, लेकिन बड़ों की इज़्ज़त करना और छोटों से शफ़क़त करना भूल जाएँगे।

हम एक ऐसी नस्ल तैयार कर रहे हैं जो दुनिया में तो शायद कामयाब हो जाए, लेकिन अपनी पहचान, अपनी तहज़ीब, और सबसे बढ़कर अपनी आख़िरत हार जाएगी। तो सोचिए, जब हमारे बच्चे इन स्कूलों से निकलेंगे, तो क्या वे सिर्फ़ कमाऊ पूत होंगे या एक नेक इंसान भी? 
फ़ैसला हमारे हाथ में है कि हम इस माफ़िया के आगे सर झुका दें या अपनी नस्लों के ईमान और अख़लाक़ को बचाने के लिए आज ही कोई क़दम उठाएँ।
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