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Sir Syed Ahmad Khan: 1857 Freedom Struggle and His Makalat-e-Sir Syed.

Sir Syed Ahemad Khan Aur 1857 ka Hurriyat. Syed Ahemad and Makalat-E-Sir Syed.

Sir Syed Ahmad Khan and the Revolt of 1857 – Insights from Makalat-e-Sir Syed.
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"1857 की जंग-ए-आज़ादी और सर सैयद अहमद खान की भूमिका: मक़ालात-ए-सैयद के आईने में इतिहास की सच्चाई"

सर सैयद अहमद खान हमारे मुल्क के बहुत से लोगों के लिए इंतिहाई मोहतरम हैं, जबकि कुछ के नज़दीक वह दुनिया की एक मख़सूस "बिरादरी" के मुतहर्रिक फ़र्द थे। हमारे सामने स्कूलों, कॉलेजों में सर सैयद अहमद खान को एक अज़ीम क़ाएद के तौर पर पेश किया गया। आज भी उनकी तस्वीर हर स्कूल, कॉलेज में लगी होती है, जिसे हमारे क़ौम का हर बच्चा आते-जाते देखता है और सुबह-शाम उनकी अज़मत का क़ायल होता जाता है।
उन पर कुछ लिखने का इरादा इसलिए पुख़्ता होता गया कि एक मुतनाज़ा शख़्सियत के मुतअल्लिक़ फ़ैसला करना आम तौर पर काफ़ी मुश्किल होता है, लेकिन यहाँ उनकी अपनी तहरीर जो बदस्त-ए-ख़ुद ब-क़लम-ए-ख़ुद थी, हाथ आ गई थी। आइए देखते हैं ख़ुद वह अपनी तहरीरों के बैन-उस-सुतूर में अपना तआरुफ़ किस अंदाज़ में करवाते हैं। जनाब की तहरीर कर्दा किताब "मक़ालात-ए-सर सैयद" पर बारीकी से रौशनी डालते है। 

1857 की जंगे-आज़ादी मुसलमानान-ए-बर्र-ए-सग़ीर की तरफ़ से फ़िरंगी सामराज के ख़िलाफ़ जिहाद की शानदार तारीख़ है। मुसलमानान-ए-बर्र-ए-सग़ीर इस पर जितना फ़ख़्र करें कम है कि उन्होंने गुलामी के आलम में दुनिया के सबसे मज़बूत तरीन और ज़ालिम तरीन हुकूमत मल्लिका विक्टोरिया से टक्कर ली और उसे हिला कर रख दिया। ऐसी क़ुर्बानियों के सिलसिले से ही हमने आज़ादी हासिल की, लेकिन सर सैयद साहब इस जद्द-ओ-जहद पर ख़ासे नाराज़ और गुस्सा होते दिखाई देते हैं। फ़रमाते हैं:

"जिन मुसलमानों ने हमारी सरकार की नमक-हरामी और बद-ख़्वाही की, मैं उनका तरफ़दार नहीं। मैं उनसे बहुत ज्यादा नाराज़ हूँ और हद से ज़ियादा बुरा जानता हूँ, क्योंकि यह हंगामा ऐसा था कि मुसलमानों को अपने मज़हब के अहले किताब यानी ईसाइयों के साथ रहना था, जो अहल-ए-किताब और हमारे मज़हबी भाई हैं, नबियों पर ईमान लाए हुए हैं, ख़ुदा के दिए हुए अहकाम और ख़ुदा की दी हुई किताब अपने पास रखते हैं, जिसका तस्दीक़ करना और जिस पर ईमान लाना हमारा ऐन ईमान है। फिर इस हंगामे में जहाँ ईसाइयों का ख़ून गिरता, वहीं मुसलमानों का ख़ून गिरना चाहिए था। फिर जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अलावा नमक-हरामी और गवर्नमेंट की ना-शुक्री जो कि हर एक रिआया पर वाजिब है की, अपने मज़हब के भी ख़िलाफ़ किया। फिर बिला-शुब्हा वह इस लायक़ हैं कि ज्यादा तर उनसे नाराज़ हुआ जाए।" (मक़ालात-ए-सर सैयद, सफ़्हा 41.

अंग्रेज़ सरकार के मुतअल्लिक़ सर सैयद साहब के दिली ख़्यालात ख़ुद उनकी ज़बानी सुनते हैं:

"मेरा इरादा था कि मैं अपना हाल इस किताब में कुछ न लिखूँ क्योंकि मैं अपनी नाचीज़ और मिस्कीन ख़िदमतों को इस लायक़ नहीं जानता कि उनको गवर्नमेंट (फ़िरंगी) की ख़ैर-ख़्वाही में पेश करूँ। अलावा इसके जो गवर्नमेंट ने मेरे साथ सुलूक किया वह दर-हक़ीक़त मेरी मिस्कीन ख़िदमत के मुक़ाबिल में बहुत ज़ियादा है और जब मैं अपनी गवर्नमेंट के इनाम-ओ-अकराम को देखता हूँ और फिर अपनी नाचीज़ ख़िदमतों पर ख़्याल करता हूँ तो निहायत शर्मिंदा होता हूँ और कहता हूँ कि हमारी गवर्नमेंट ने मुझ पर उससे ज्यादा एहसान किया है जिस लायक़ मैं था, मगर मजबूरी है कि इस किताब के मुसन्निफ़ को ज़रूर है कि अपना हाल और अपने ख़्यालात को लोगों पर ज़ाहिर करे, ताकि सब लोग जानें कि इस किताब के मुसन्निफ़ का क्या हाल है? और उसने इस हंगामे में किस तरह अपनी दिली मुहब्बत गवर्नमेंट (अंग्रेज़) की ख़ैर-ख़्वाही में सर्फ़ की है?"

इसके एवज़ में जनाब को क्या मिला, पढ़िए:

मिस्कीन ख़िदमत के मुक़ाबले में हद से ज़ियादा इनाम-ओ-इकराम के इक़रार की रूदाद तो आपने "ब-क़लम-ए-ख़ुद" सुन ली। इंग्लिश गवर्नमेंट से मुहब्बत व अयानत् और  रिफ़ाक़त व-ख़ैर-ख़्वाही का सिलसिला क़ायम करवाने के लिए ख़ां साहब उम्र भर कोशां रहे। 1857 का यादगार वाक़िआ रूनुमा हुआ जिसमें मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम मे फर्क किए बग़ैर तमाम मुहिब-ए-वतन हिंदुस्तानियों ने मिल्ली फ़रीज़ा समझ कर जोश-ओ-ख़रोश से हिस्सा लिया। इस मौक़े पर ख़ां साहब का रवैया लायक़-ए-मुताला है। इधर मुजाहिदीन (ईसाई) यानी अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ ज़िंदगी-मौत की जंग लड़ रहे थे और हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए सर-धड़ की बाज़ी लगाए थे, उधर हमारे मुसलिह-ए-क़ौम उसको "ग़दर" क़रार देते हुए क्या कारगुज़ारी सुनाते हैं। मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

"जब ग़दर हुआ, मैं बिजनौर में सदर अमीन था कि दफ़तर सरकशी-ए-मेरठ की ख़बर बिजनौर में पहुँची। अव्वल तो हमने झूट जाना, मगर यक़ीन हुआ तो उसी वक़्त से मैंने गवर्नमेंट की ख़ैर-ख़्वाही और सरकार की वफ़ादारी पर चुस्त कमर बांधी। हर हाल और हर अम्र में मिस्टर अलेक्ज़ेंडर शेक्सपियर कलेक्टर-ओ-मजिस्ट्रेट बिजनौर के शरीक रहा। यहाँ तक कि हमने अपने मकान पर रहना मौक़ूफ़ कर दिया।"

सुब्हान-अल्लाह! यह तो था जज़्बा-ए-जां-सिपारी। इससे भी आगे बढ़ कर हाल यह था कि ख़ां साहब अपनी जान को इतना मामूली और गोरी चमड़ी वाले फ़िरंगियों को इतना क़ीमती समझते थे कि ख़ुद को उन पर अपनी जान निछावर करने के लिए तैयार थे।  इसी से अंदाजा लगा सकते है के सैयद अहमद ने कितनी वफादारी की होगी वतन से और दूसरी तरफ फिरंगियों से, अपनी जान से ज्यादा उन्हे अंग्रेज़ी हुकुमत की फिक्र थी, उनके अफसर की जिंदगी के सामने खां साहेब की जान किसी कांच के खिलौने से भी कम थी। तभी तो आज उनके इस नज़रिए पर कायम रहने वाले, उनके नकश ए कदंम पर चलने वाले अपने आकाओ की नकल करते हुए उस आज़ादी और रौशन ख्याल बताते है। उनके लिए इतना ही काफी है के मगरिब्, उसके समान विचारधारा और फिरंगी एजेंटो से उसकी तस्दीक की हो। 

आगे इरशाद फ़रमाते हैं:

"जब दफ़तर 29 नंबर की कंपनी सहारनपुर से बिजनौर में आ गई। मैं उस वक़्त ममदूह के पास न था। दफ़र मे मैंने सुना कि बाग़ी फ़ौज आ गई और साहब के बंगले पर चढ़ गई। मैंने यक़ीन जान लिया कि सब साहबों का काम तमाम हो गया। मगर मैंने निहायत बुरी बात समझी कि मैं इस हादसे से अलग रहूँ। मैं हथियार संभाल कर रवाना हुआ और मेरे साथ जो लड़का था, मैंने अपने आदमी को वसीयत की: 'मैं तो मरने जाता हूँ, मगर जब तू मेरे मरने की ख़बर सुन ले तब इस लड़के को किसी अमन की जगह पहुँचा देना।' मगर हमारी ख़ुश-नसीबी और नेक-नीयती का यह फल हुआ कि इस आफ़त से हम भी और हमारे हुक्काम भी सब महफ़ूज़ रहे, मगर मुझको उनके साथ अपनी जान देने में कुछ अफसोस न था।"

अंग्रेज़ हुक्काम की तरफ़ से ख़ां साहब पर यह करम-नवाज़ियाँ महज़ वक़्ती न थीं, उन्हें बाक़ायदा पेंशन का मुस्तहिक़ समझा गया और यूँ वह रिटायर्ड होने के बाद भी ख़िदमत और ख़ैर-ख़्वाही का सिला दुश्मन-ए-मिल्लत से पाते रहे। सुबूत हाज़िर हैं: आज जिस तरह से यूरोप से लेकर हिंदुस्तान तक मे गोदी मीडिया चल रहा है उसी तरह से उस वक़्त भी कलम को खरीद लिया गया था। एक बिकाऊ कलमकार से बेहतर एक तवाएफ है। 

"दफ़ा पंचम रिपोर्ट में हम लिख चुके हैं कि अय्याम-ए-ग़दर में कारगुज़ारी सैयद अहमद खान साहब सदर अमीन की बहुत उम्दा हुई, लिहाज़ा हमने उनके वास्ते दो सौ रुपिया माहाना (पर महीने) की पेंशन की तजवीज़ की है। अगरचे यह रक़म उनकी निस्फ़ तनख़्वाह से ज़ियादा है, मगर हमारे नज़दीक इस क़दर रुपिया उनके इस्तिहक़ाक़ से ज्यादा नहीं है और हम चाहते हैं कि आप भी हमारी तजवीज़ को कायम रखें। इस वास्ते कि यह अफ़सर बहुत लायक़ और क़ाबिल-ए-नज़र-ए-इनायत है। दस्तख़त शेक्सपियर साहब, मजिस्ट्रेट कलेक्टर।" (मक़ालात-ए-सर सैयद, सफ़्हा 54)।

हमारी रौशन-ख़याल "बिरादरी" के हम-ख़याल अफ़राद की एक बड़ी अलामत जिहाद का इंकार है। क्योंकि जिहाद या उससे मुतअल्लिक़ कोई चीज़ अंग्रेज़ सरकार को किसी क़ीमत गवारा नहीं। खान साहब इसी मिशन पर इस फ़रीज़ा-ए-आदिला की तरदीद में अपने हम-अस्र कज़्ज़ाब-ए-अकबर मिर्ज़ा क़ादियानी को भी पीछे छोड़ गए। फ़रमाते हैं:

"एक बड़ा इल्ज़ाम जो इन लोगों ने मुसलमानों की तरफ़ निहायत बेजा लगाया, वह मसला-ए-जिहाद का है हालाँकि कुजा जिहाद और कुजा बग़ावत। मैं नहीं देखता कि इस तमाम हंगामे में कोई ख़ुदा-परस्त आदमी या कोई सच-मुच का मौलवी शरीक हुआ हो। बस एक शख़्स के। और मैं नहीं जानता कि उस पर क्या आफ़त पड़ी? शायद उसकी समझ में ग़लती पड़ी क्योंकि ख़ता होना इंसान से कुछ वईद नहीं। जिहाद का मसला मुसलमानों में दग़ा और बे-ईमानी और ग़दर और बे-रहमी नहीं है। जैसे कि इस हंगामे में हुआ। कोई शख़्स भी इस हंगाम-ए-मुफ़सिदी और बे-ईमानी और बे-रहमी और ख़ुदा के रसूल के अहकाम की ना-फ़रमानी को जिहाद नहीं कह सकता।" (मक़ालात-ए-सर सैयद, सफ़्हा 93, 94)

जिहाद और मुजाहिदीन के ख़िलाफ़ दिल की भड़ास निकालने, जिहाद-ए-आज़ादी में उलमा-ए-किराम और मुजाहिद अवाम की क़ुर्बानियों की नफ़ी करने और जिहाद के फ़लसफ़े को दाग़दार करने के बाद वह मुसलमान-ए-हिंद को अंग्रेज़ की वफ़ादारी का दम भरने की तलक़ीन करते हैं। फ़रमाते हैं:

"हमारी गवर्नमेंट इंग्लिशिया ने तमाम हिंदुस्तान पर दो तरह हुकूमत पाई। या यह सबब-ए-ग़लबा और फ़त्ह या बम, अहद-ओ-पैमान तमाम मुसलमान हिंदुस्तान  उनकी रिआया हुए। हमारी गवर्नमेंट ने उनको अमन दिया और तमाम मुसलमान हमारी गवर्नमेंट के अमन में आए। तमाम मुसलमान हमारी गवर्नमेंट से और हमारी गवर्नमेंट भी तमाम मुसलमानों से मुतमइन हुई कि वह हमारी रिआया और ताबेदार होकर रहते हैं। फिर किस तरह हिंदुस्तान के मुसलमान गवर्नमेंट इंग्लिशिया के साथ ग़दर और बग़ावत कर सकते थे क्योंकि शराइत-ए-जिहाद में से पहली ही शर्त है कि जिन लोगों पर जिहाद किया जाए उनमें और जिहाद करने वालों में अम्न और कोई अहद न हो।" (मक़ालात-ए-सर सैयद, सफ़्हा 94)

आहिस्ता-आहिस्ता वह अपनी रौ में बहते हुए इतने आगे चले जाते हैं कि मुफ़्ती और मुसलिह का मनसब संभाल लेते हैं। तमाम उलमा और मुजाहिदीन, तमाम मुहिब-ए-वतन हिंदुस्तानी अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ सर-धड़ की बाज़ी लगाए हुए थे, जान-माल लुटा रहे थे और खान साहब उन्हें मुबल्लिग़-ए-आज़म और मुसलिह-ए-वक़्त बन कर समझा रहे थे: ऐसा संमझे उन्हे अंग्रेजो के तरफ से मुसलमानो पर एक क़ाज़ी के तौर पर थोपा गया हो। वह अंग्रेजो की वफादारी और हिमायत मे किस क़दर अंधे हो गए के हिंदुस्तानियों को खास कर मुसलमानो को हिदायत दे रहे थे अंग्रेजो की हुकुमत तस्लिम करने के लिए, अंग्रेजो से मुसलमानो मे से ही एक एजेंट तैयार किया ताकि उनको ज़ेहनि और फिक्रि तौर पर ब्रिटिश सरकार को क़ुबूल कर ले, वह इसलिए भी क्योंके इस से पहले मुगल सलतनत थी तो अंग्रेजो ने मुसलमानो पर खास जोर लगाया क्योंके वही सबसे ज्यादा गुस्सा थे, इसलिये फिरंगियों ने फौजी ताक़त कर बदौलत कब्ज़ा तो कर लिया लेकिन अब हुकूमत बर्करार रखने के लिए फौज से ज्यादा जरूरी लोगो के अंदर गुस्से और आज़ादी के जज़्बे को खतम करना था, पहले उसने मीर जाफर,  मीर सादिक जैसो की तलवार खरीद ली, अब उस सैयद अहमद जैसे सफेद पोष और हिंदुस्तानियों शक्ल वाला चाहिए था जो लोगो के अंदर अपना विचार डाल सके और आज़ादी की भूख खतम कर दे, ताकि अंग्रेज़ी हुकुमत ज़ुल्म की इंतेहा जारी रख सके। 
 
यानी अंग्रेजो के ज़ुल्म, ज्यादती के बावजूद उससे बग़ावत जायज़ नहीं। मुसलमान अंग्रेज़ की वफ़ादारी-ओ-अताअत करें वरना अपना मुल्क छोड़ दें, अपने हक़ के लिए अंग्रेज़ से लड़ना हराम है। इससे मालूम हो सकता है कि जो तालीमी तहरीक उन्होंने बरपा की वह अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए बाबू पैदा करने की कोशिश थी या मुसलमान को दुनिया की दीगर अक़वाम के मुक़ाबले में खड़ा करने की "अज़ीम ख़िदमत" थी???

इसके बाद जंगे-आज़ादी के मुजाहिदीन और उलमा-ए-किराम पर नाम-निहाद वफ़ा और ख़ुद-साख़्ता अहद की पासदारी न करने का ग़ुस्सा निकालते हुए फ़रमाते हैं:

"इस हंगामे में बराबर गद्दारी होती रही। सिपाही नमक-हराम अहद कर-कर फिर गए। बदमाशों ने अहद कर-कर दग़ा से तोड़ डाला और फिर हमारे मेहरबान मुतकल्लिमीन और मुसन्निफ़ीन-ए-कुतुब-ए-बग़ावत फ़रमाते हैं कि मुसलमानों के मज़हब में यूँ ही था।" (मक़ालात-ए-सर सैयद, सफ़्हा 99)

खान साहब ने इस यादगार-नुमा किताब में और बहुत कुछ लिखा है कहाँ तक पेश किया जाए। इस डर से कि मज़मून की तवालत पढ़ने वाले बद-दिली पैदा करती है, आख़िरी पैराग्राफ़ पेश करते हैं, मुलाहिज़ा फ़रमाएँ सर सैयद मुसलमानों को तहज़ीब सिखला रहे हैं:

"और एक बात सुनो कि यह तमाम बग़ावत जो हुई वजह इसकी कारतूस था। कारतूस के काटने से मुसलमानों के मज़हब का क्या नुक़सान था? हमारे मज़हब में अहल-ए-किताब का खाना दुरुस्त है, उनका ज़बीहा हम पर हलाल है (चाहें सूअर खिला दें: राक़िम)। हम फ़र्ज़ करते हैं कि उसमें सूअर की चर्बी होगी। तो फिर भी हमारा क्या नुक़सान था। हमारे हाँ शरअ में साबित हो चुका है कि जिस चीज़ की हुरमत और नापाकी मालूम न हो, वह चीज़ हलाल और पाक का हुक्म रखती है (कारतूस में तो मालूम थी जनाब: राक़िम)। अगर यह भी फ़र्ज़ कर लें कि उसमें यक़ीनन सूअर की चर्बी थी तो उसके काटने से भी मुसलमानों का दीन नहीं जाता। सिर्फ़ इतनी बात थी कि गुनाह होता, सो वह गुनाह शरअन बहुत दर्जा कम था, उन गुनाहों से जो इस ग़दर में बद-ज़ात मुफ़सिदों ने किए।"

गोया सूअर जैसी नापाक चीज़ का इस्तेमाल इतना ज़ियादा गुनाह नहीं जितना अंग्रेज़ जैसे ग़म-ख़्वार हाकिम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना है। इस क़िस्म की तहरीरों से खान साहब की तालीमी तहरीकों का हदफ़ और इस्लाही तहरीरों का असल मिशन सामने आ जाता है और इसमें शक-ओ-शुब्हा नहीं रहता कि मुसलमान-ए-बर्र-ए-सग़ीर के दिलों से जज़्बा-ए-जिहाद ख़त्म करने का हदफ़ और उन्हें जदीद तालीम के नाम पर अंग्रेज़ की ला-मज़हब तहज़ीब में रंगने का मिशन उन्होंने किस लगन से अंजाम दिया। उनकी "तहरीक-ए-अलीगढ़" में साइंस-ओ-टेक्नोलॉजी के फ़रोग़ के नाम पर यूरोप के फ़र्सूदा और नाकारा नज़रियात हिंदुस्तान के आज़ादी-पसंदों को पढ़ाए जाते रहे। यही वजह है कि हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान दोनों मुमालिक के बाशिंदे आज तक तालीमी तरक़्क़ी के नाम पर यूरोप का तआक़ुब करते-करते निढाल हो चुके हैं, लेकिन तरक़्क़ी कभी हुई ही नही। यह तो बर्र-ए-सग़ीर के बाशिंदों की ज़ाती ज़हानत-ओ-क़ाबिलियत है कि उनमें से कुछ लोगों ने ग़ैर-मामूली कामयाबियाँ हासिल कर लीं वरना जदीद तालीम-याफ़्ता तो महज़ बाबू-गिरी सीख कर यूरोप की नक़्क़ाली तक महदूद रहे। इस जदीद तरक़्क़ी से हमें बस इतना हिस्सा मिला है कि हमारे ज़हीन दिमाग़ और क़ाबिल नौजवान अमेरिका-ओ-यूरोप की जामियात और तहक़ीक़ी इदारों से पढ़ कर मग़रिबी ज़िंदगी की चका-चौंध के सहर में ऐसे आए कि वहीं के हो के रह गए।

सर सैयद की तालीमी तहरीक के सैल-ए-रवां में ख़स-ओ-ख़ाशाक की तरह मशरिक़ के बासियों के बहने के बावजूद उनके हिस्से में वही पुराना मटका आया, बिलोरीं जाम तो उनकी पहुँच से दूर ही रहे। मग़रिबी मुह्क़्क़िक़ीन के लिए जो तालीम-ओ-तहक़ीक़ फ़र्सूदा हो जाती है तो वह डस्ट-बिन में फेंकने से बचाने के लिए हमारे हाँ भिजवा देते हैं और असल टेक्नोलॉजी और उसके हुसूल के ज़राए की हवा नहीं लगने देते, लिहाज़ा हमारे हाँ साइंस ने कभी रिवाज पाया न ही हमारे तालीमी इदारों में तहक़ीक़ का मिज़ाज बना। अलबत्ता हमारी नस्ल की नस्ल "हम्प्टी-डम्प्टी" टाइप के नीम-मशरिक़ी नीम-मग़रिबी हिंदुस्तानियों में तब्दील हो गई और बाबुओं की खेप की खेप पैदा होकर शक्ल-ओ-सूरत के हिंदुस्तानी और फ़िक्र-ओ-तर्ज़-ए-ज़िंदगी के लिहाज़ से इंग्लिस्तानी बनते गए। इस सारे कारनामे का क्रेडिट ख़ां साहब को जाता है जिनकी दिली ख़्वाहिश पूरी हुई उनके तालीमी इदारों ने अंग्रेज़ की हुकूमत के लिए वफ़ादार क्लर्क और बाबू तैयार कर-कर के फ़राहम किए, यह वफ़ादार मुलाज़िम अंग्रेज़ की ग़ुलामाना अताअत तो कर सकते थे, उससे टकराने का सोच भी नहीं सकते थे।

तालीम जो दी जाती है हमें वो क्या है, फ़क़त बाज़ारी है, 
जो अकल सिखाई जाती है वो क्या है, फ़क़त सरकारी है.

तहरीकात सियासी हों या तालीमी... उनको उन शख़्सियात के नज़रियात के तनाज़ुर में परखा जाता है जिन्होंने उन्हें बरपा किया और किसी शख़्सियत के नज़रियात (विचारधारा) की तर्जुमानी उसकी अपनी तहरीरात से ज़ियादा बेहतर कोई नहीं कर सकता। शायद कि बर्र ए सगीर  के अवाम हक़ीक़त और अफसाना का फ़र्क़ समझ ले, जदीद तालीम को जदीद तहज़ीब से अलग करके देखना शुरू कर दे और तरक़्क़ी की ख़्वाहिश में मग़रिब की ऐसी नक़्क़ाली न करे कि अपनी चाल भूल जाए।

  बर्र-ए-सगीर की तालीमी और सियासी तहरीकात में सर सैयद अहमद का नाम अक्सर इज़्ज़त से लिया जाता है, मगर क्या हमने कभी सोचा कि उनकी "मॉडर्न एजुकेशन" की दावत ने किस हद तक हमारी फ़िक्र को मग़रिब की गिरफ़्त में दे दिया? 

 नतीजा ये निकला कि हमारी नस्लों ने तालीम को तहज़ीब से अलग समझ लिया। आज हिंद का पढ़ा-लिखा तबक़ा इल्म रखता है मगर पहचान भूल चुका है। ये वही ज़हनी ग़ुलामी है जो मीर जाफ़र की सियासी ग़दारी से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है – क्योंकि ये ग़दारी कलम और नज़रिया दोनों से होती है। सर सैयद की तालीम ने हमें colony हुकमतो में क़ैद कर दिया, और मग़रिब की नक़ल में हमने अपनी सोच, अपनी ज़ुबान और अपनी असलियत खो दी। अगर वाक़ई तरक़्क़ी चाहिए, तो अब वक़्त है कि हम उस तालीम को फिर से परखें जो इंसान को "ज़िंदा लाश" बना रही है — सोचने से रोक रही है, और अपनी तहज़ीब से काट रही है। असल आज़ादी ज़हनी आज़ादी है; और जब तक हम अपनी फ़िक्र को फिर से इस्लामी तन्ज़र से नहीं जोड़ लेते, सैयद की तालीम का असर हमें हमेशा ग़ुलाम रखेगा।
  सर सैयद ने कहा — अंग्रेजो से वफादारी निभाओ ; अवाम ने किया — अपनी पहचान मिटाओ! 

अब हाल ये है कि इल्म का मतलब अंग्रेज़ी एक्सेंट, और तहज़ीब का मतलब कॉफी मग हो गया है। वफ़ादारी ऐसी कि ‘लॉयल मोहम्मडन्स’ लिखकर भी समझ न आया कि ज़ंजीर भले नज़र न आए, गर्दन झुकी हुई है! 
आज की जुबान मे इसे अंग्रेजो की चटुकारिटा कहेंगे, फिरंगियों की खुशामद इसलिए करते थे ताकि वाज़ीफ़े जारी रहे। 

यूँ क़त्ल से बचो के वो बदनाम न होता, 
अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की न सूझी.

जब तालीम से तरबियत गुम हो, फ़िरऔन की यूनिवर्सिटी खुलती है।” 
“डिग्री बहुत हैं, इंसान कहाँ? यही है ‘कॉलिज़ी क़त्ल’ की कहानी।” 
“इल्म नहीं, इज़्ज़त-ए-नफ़्स पढ़ाओ—वरना जालिम सिलसिलेवार निकलते हैं।” 
“किताबें बढ़ीं, किरदार घटा—इससे बड़ा इम्तेहान क्या?” 
“कैंपस तब रहमत है, जब दिल-दिमाग़ की तामीर करे; वरना वही फ़िरऔनी कारख़ाना।

 जब यही तालीम महज़ नोकरी-परस्ती बने, तो रूहानी-ज़हनी क़त्ल शुरू होता है। “कॉलिज” अगर इंसान बनाए तो नेमत है, मगर जब किरदार-साज़ी की जगह हुजूम-साज़ी करे, तो जालिम नई शक्ल में लौटता है। अस्ल इस्लाह यह है कि तालीम को तरबियत, तफ़क्कुर और समाजी ख़िदमत से बांधा जाए—वरना बाज़ारी डिग्रियाँ सरकारी अक़्ल के सिवा कुछ नहीं।

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