Toxic Mindset on Indian Social Media: Celebrating Tragedy of 40 Umrah Returnees.
Introduction: The Dark Side of Social Media in India.
Umrah Tragedy: Why 40 Deaths Became a Subject of Hate?
Need for Responsible Digital Discourse in India.
Saudi Umrah Bus Accident: Tragedy of Indian Pilgrims Sparks Debate on Safety and Faith.
A deadly Saudi Umrah accident claiming lives of Indian pilgrims raises urgent questions on travel safety, faith, and social media reactions.
 |
| Saudi Umrah Bus Accident: Tragedy of Indian Pilgrims Sparks Debate on Safety and Faith. |
भारत में सोशल मीडिया की जहरीली सोच: उमरा से लौटते 40 भारतीयों की मौत पर खुश होने वाला तबका कितना गिर चुका है.
भारत एक ऐसी सरज़मीं है जहाँ सदियों से मज़हब, तहज़ीब और इंसानियत एक ही नदी के तीन किनारे की तरह बहते आए हैं। मगर अफ़सोस, सोशल मीडिया के शोर में आज एक ऐसा छोटा-सा लेकिन ज़हरीला तबका पैदा हो चुका है जो इंसान की मौत पर भी जश्न मनाने लगा है।
सऊदी अरब में उमरा के लिए गए 40 भारतीय जब एक हादसे का निशाना बने, तो सारि दुनिया में दिलों पर उदासी और आँखों में नमक भरी बारिश उतर आई। हर घर, हर गली, हर इबादतगाह में दुआओँ की लहर उठी—क्योंकि दर्द मज़हब नहीं देखता, मौत किसी की भी हो, सीना चीरती है।
लेकिन इसी ग़मगीन माहौल में सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे कमेंट सामने आए जिन्होंने यह बता दिया कि नफ़रत का ज़हर इंसान को इंसान नहीं रहने देता।
कुछ चंद लोग—जो खुद को बहादुर समझते हैं—मौत पर हँसी के इमोजी फेंक रहे थे… सूअर वाले प्रतीक इस्तेमाल कर रहे थे… और मुसलमानो पर तंज कस रहे थे।
यह हादसा कोई तफ़सीली बहस नहीं, बल्कि एक आईना है, जिसमें हम देखते हैं कि
"मज़हबी नफ़रत इंसान के दिल को पहले पत्थर बनाती है, फिर राख में बदल देती है।"
मुसलमानों की मौत पर खुश होने वाला तबका: समाज का सबसे खतरनाक चेहरा
किसी भी इंसान की मौत पर मुस्कुराना सिर्फ़ नैतिक गिरावट नहीं, बल्कि रूह की तबाही है।
ऐसा ज़हरीला तबका दो वजहों से खतरनाक है:
पहली वजह: इंसानियत का खात्मा
जब कोई इंसान मौत पर तालियाँ बजाता है, वह सिर्फ़ दूसरे को नहीं, खुद को भी ख़ाली कर देता है।
जो मुसलमानों की मौत पर खुश है, वह कल किसी और की मौत को भी खेल समझ सकता है—क्योंकि दिल में जो रहम नहीं, वह सब पर बे-रहम होता है।
दूसरी वजह: समाज में ज़हर का फैलाव
सोशल मीडिया पर ऐसी हँसी, ऐसे अपमानजनक इशारे यह दिखाते हैं कि
"नफ़रत फैलाने वाले कम हैं, लेकिन उनकी आवाज़ ऊँची है।"
ये लोग न मज़हब समझते हैं, न इंसानियत; बस डिजिटल दुनिया पर अपनी जहालत उछालते हैं।
इस नफ़रती सोच का असल मसला
यह मसला मुसलमानों का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक इंसानियत का इम्तिहान है।
मौत को तमाशा बनाकर खुश होना बताता है कि:
-
दिलों में तालीम की कमी है
-
दिमाग़ में जहालत का धुआँ भरा है
-
और समाज में वह सलीका ग़ायब हो रहा है जिसकी बुनियाद इंसान होने से शुरू होती है
अगर मज़हब के नाम पर किसी की मौत पर खुश होना सही समझा जाने लगे, तो समाज की जड़ों में दीमक लग जाती है — और जब समाज की जड़ें खोखली हो जाएँ, तो कोई इमारत खड़ी नहीं रह सकती।
सऊदी में हुए इस हादसे ने हमें दो चेहरों से रूबरू कराया—
एक वह चेहरा जो ग़म बाँटता है, जो इंसानियत की लौ जलाए रखता है।
और दूसरा वह चेहरा…
जो मौत को चुटकुला समझता है, और इंसान को इमोजी में बदल देता है।
यह ज़हरीला तबका छोटा है, शोर उसका बड़ा है;
और दुनिया मे आज भी इंसानियत की धड़कन ज़िंदा है।
इत्तिला-ए-आम: एक ज़रूरी पैग़ाम.
मदीना शरीफ़ में दर्दनाक हादसा: भारतीय उमराह ज़ायरीन के लिए अहम जानकारी.
निहायत अफ़सोस के साथ तमाम अहले वतन को इत्तिला दी जाती है कि सऊदी अरब के मदीना मुनव्वरा में एक दर्दनाक बस हादसे में 42 भारतीय उमराह ज़ायरीन अपनी जान गंवा चुके हैं।
(إِنَّا لِلَّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ)
इस मुश्किल घड़ी में, जेद्दा में मौजूद भारतीय दूतावास (Indian Embassy) ने मुताशीरा ख़ानदानों की मदद और जानकारी के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। आप नीचे दिए गए टोल-फ्री नंबरों पर राब्ता करके अपने अज़ीज़ों की ख़ैरियत मालूम कर सकते हैं:
8002440003 (टोल फ्री)
0122614093
0126614276
+966 556122301 (व्हाट्सएप)
आपसे गुज़ारिश है कि इस पैग़ाम को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि हर ज़रूरतमंद तक यह अहम जानकारी पहुँच सके।
Urgent Announcement.
Tragic Accident in Medina: Important Information for Indian Umrah Pilgrims.
It is with deep sorrow that we inform you of a tragic bus accident in Medina, Saudi Arabia, which has resulted in the loss of 42 Indian Umrah pilgrims. Our thoughts and prayers are with the affected families during this difficult time.
The Indian Embassy in Jeddah has activated toll-free helpline numbers to provide support and information to the families of those involved. For any inquiries regarding your loved ones, please contact the following numbers:
8002440003 (Tollfree)
0122614093
0126614276
+966556122301 (WhatsApp)
We urge you to share this information widely to ensure it reaches all concerned individuals as quickly as possible.
 |
| नफ़रत फैलाने वाले कम हैं, लेकिन उनकी आवाज़ ऊँची है। |
भारत में मुस्लिम पहचान: मीडिया, सियासत और एक तारीखी कशमकश
इस मुल्क में मुसलमान होना — पहचान से ज़्यादा, इम्तेहान है"
जहाँ पहचान सवाल बन जाए, वहाँ सब्र ही जवाब होता है.
मुसलमान होना गुनाह नहीं — मगर इस मुल्क में ये सब्र की इम्तेहान बन गया है.
भारत में मुसलमान होना आज किसी तख़्त या ताज का दावा नहीं, बल्कि एक ऐसा सफ़र है जिसमें हर मोड़ पर शक़, तजस्सुस और तन्क़ीद की काँटेदार बाड़ लगी मिलती है। यह पहचान मानो कोई साधारण दस्तावेज़ न हो; यह तो एक साया है जो इंसान के साथ-साथ चलता भी है और हर वक़्त उस पर नज़र भी रखी जाती है।
मुसलमानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जो चुभन, जो खामोश घुटन और जो ग़ैर-महसूस दबाव मौजूद है, उसे अक्सर वही समझ सकता है जिसकी साँसें इस पहचान के साथ उठती-बैठती हैं। बाहर से लोकतंत्र की बुनियादें मजबूत दिखाई देती हैं, लेकिन अंदरूनी तहों में मौजूद दरारें बहुत कुछ बयां करती हैं।
तारीखी और सियासी जड़ें
इस माहौल की जड़ें सिर्फ़ आज के बयानबाज़ी में नहीं, बल्कि उन तारीख़ी खाइयों में भी हैं जिनपर कभी मरहम नहीं लगाया गया।
सियासत ने इन्हीं ज़ख़्मों को कई बार कुरेदकर, कई बार हवा देकर, और कई बार इस्तेमाल करके लोगों के दिमाग़ों में “दूसरापन” की परत गाढ़ी की है।
इसलिए मुसलमान होने का मतलब आज सिर्फ़ मज़हबी पहचान नहीं—बल्कि एक ऐसा तारीख़ी बोझ भी है जिसे बार-बार किसी न किसी बहाने उठा खड़ा किया जाता है।
आज मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो नफ़रत दिखाई देती है, उसकी जड़ें काफी गहरी हैं। 1947 में मुल्क की तक़सीम ने हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर एक ऐसा ज़ख़्म लगाया जो आज तक भरा नहीं है। इसके बाद, सियासी पार्टियों ने अक्सर मुसलमानों को सिर्फ़ एक "वोट बैंक" के तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन उनकी तालीमी और माशी तरक़्क़ी के लिए संजीदा कोशिशें नहीं कीं। पिछले कुछ दशकों में, हिंदुत्व की सियासत ने "तारीखी ग़लतियों" को सुधारने का नैरेटिव पेश किया, जिसके तहत मुस्लिम तारीख़ और विरसे, जैसे कि बाबरी मस्जिद, को निशाना बनाया गया। इस नैरेटिव में मुसलमानों को "बाहरी" या "हमलावर" के तौर पर पेश किया जाता है, न कि भारत के समाज का एक अटूट हिस्सा। यही तारीखी सियासत आज के दौर में नफ़रत को हवा दे रही है।
सियासत की साज़िशें और मज़हब का इस्तेमाल
मुसलमानों की तक़दीर से ज़्यादा सियासत को उनके वोट की परवाह है। हर चुनाव में, हर भाषण में, मुसलमान एक “मुद्दा” बनता है, इंसान नहीं। कभी “माइनॉरिटी कार्ड”, कभी “पॉपुलेशन बम”, कभी “कश्मीर”, कभी “क़ौम” — हर बार एक नया इल्ज़ाम, एक नया डर, एक नया झूठ।
सियासी पार्टियाँ जानती हैं कि मुसलमान का ज़िक्र करते ही भीड़ जाग उठती है। और ये भी जानती हैं कि भीड़ को डर पसंद है, मोहब्बत नहीं। इसलिए डर का कारोबार चल रहा है, और उस कारोबार का नुक़सान सिर्फ़ मुसलमान नहीं, पूरा मुल्क उठा रहा है। मोहब्बत की विरासत जो अब ख़ामोश है.
सोशल मीडिया: नफ़रत फैलाने का नया हथियार
जो नफ़रत पहले दबी-छुपी ज़बानों में थी, अब वह सोशल मीडिया के ज़रिए हर घर तक पहुंच गई है। फ़र्ज़ी ख़बरों, एडिट की हुई वीडियोज़ और नफ़रत भरे पोस्ट्स के ज़रिए मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक लगातार मुहिम चलाई जाती है। किसी भी घटना के बाद हज़ारों की तादाद में ट्रोल एक्टिव हो जाते हैं और मुसलमानों को निशाना बनाते हैं। यह एक ऑर्गेनाइज़्ड तरीक़े से होता है, जिसका मक़सद मुस्लिम समाज को मानसिक तौर पर परेशान करना और उन्हें ख़ौफ़ में रखना है।
डिजिटल दुनिया ने जैसे हर इंसान को आवाज़ दी है, वैसे ही कुछ दिमाग़ों को नफ़रत की खुली छूट भी दे दी है।
मुसलमान नाम देखते ही पोस्टों के नीचे उतरने वाले गलीज़ कमेंट्स, ताने, मीम्स — ये सब इस बात का सबूत हैं कि मुस्लिम पहचान आज एक ऐसी दीवार है जिसके सामने कई लोग अपनी नफ़रत का कूड़ा फेंककर लौट जाते हैं।
यह नफ़रत किसी एक इंसान के खिलाफ नहीं होती; यह उस सोच का नतीजा होती है जो इंसान को पहले “दूसरा” बनाती है, फिर “कमतर” और आख़िर में “ख़तरा” समझने लगती है।
इसीलिए सोशल मीडिया आज मज़हबी तंगदिली और अफ़वाहों का सबसे बड़ा कारख़ाना बन चुका है।
आज के दौर में सोशल मीडिया वो जगह बन गया है जहाँ इंसान अपनी सोच बयां करता है। लेकिन जब मुसलमान कुछ लिखता है — चाहे वो अमन की बात हो, इन्साफ़ की हो, या किसी तालीम की — तो कमेंट सेक्शन जहरीले लफ़्ज़ों से भर जाता है।
“पाकिस्तान जाओ”
“तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे”
“देशद्रोही”
ये जुमले अब अजनबी नहीं रहे, ये तो जैसे रोज़ की आदत बन गए हैं।
मेनस्ट्रीम मीडिया और सियासत: ज़हर में नमक मिलाने वाली ताक़तें
भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा लंबे अर्से से एक ख़ास क़िस्म का नैरेटिव गढ़ रहा है, जिसमें मुसलमानों को शक, संदेह और नफ़रत की नज़र से देखा जाता है। किसी भी आपराधिक या आतंकी घटना के बाद, जांच पूरी होने से पहले ही मीडिया एक मुस्लिम "एंगल" तलाश कर लेता है। ख़बरों को इस तरह पेश किया जाता है मानो हर दाढ़ी-टोपी वाला शख़्स एक मुमकिना दहशतगर्द हो। बहस और डिस्कशन के नाम पर टीवी स्टूडियो में ऐसी चिल्ला-चोट होती है, जहाँ एकतरफ़ा तौर पर मुसलमानों को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
जहाँ सोशल मीडिया ताने मारता है, वहीं मेनस्ट्रीम मीडिया कई बार उस ताने को “कथा” और “क़िस्सा” बनाकर बेचता है।
कुछ चैनलों की सुर्ख़ियों और कुछ सियासी बयानबाज़ियों ने देश में ऐसा माहौल पैदा किया है जहाँ मुसलमान के लिए सिर्फ़ बोलना नहीं, बल्कि चुप रहना भी एक सियासी मुद्दा बन जाता है।
यही हक़ीक़त है कि मीडिया का माइक्रोस्कोप मुसलमानों पर इस तरह टिका रहता है जैसे वह किसी “कौमी मुहिम” की निगरानी कर रहा हो।
ग़लती कोई भी करे, शक़ की निगाह अक्सर एक ही तरफ़ जाती है।
तबरेज़ अंसारी से दिल्ली ब्लास्ट तक: इंसाफ़ का इंतज़ार
झारखंड में तबरेज़ अंसारी को चोरी के शक में घंटों पीटा गया और "जय श्री राम" के नारे लगाने पर मजबूर किया गया। जब यह ख़बर सामने आई, तो मीडिया के एक हिस्से ने इसे मामूली चोरी की घटना बताकर लिंचिंग की संगीनी को कम करने की कोशिश की। हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके के बाद भी यही देखने को मिला। जांच एजेंसियां किसी नतीजे पर पहुंची भी नहीं थीं कि मीडिया चैनलों ने संदिग्धों के नाम और उनकी मुस्लिम पहचान को उछालना शुरू कर दिया। इस तरह के मीडिया ट्रायल से न सिर्फ़ बेगुनाहों की ज़िंदगी बर्बाद होती है, बल्कि पूरे मुस्लिम समाज को बदनामी का सामना करना पड़ता है।
यति नरसिंहानंद और नफ़रतअंगेज़ बयानबाज़ी
पिछले कुछ सालों में सियासी और मज़हबी लीडरों की तरफ से मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हरीली बयानबाज़ी आम हो गई है। यति नरसिंहानंद जैसे लोग खुल्लम-खुल्ला मुसलमानों के नरसंहार की बात करते हैं, इस्लाम और पैग़म्बर-ए-इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शान में गुस्ताख़ी करते हैं, लेकिन उन पर कोई सख़्त कार्रवाई नहीं होती। जब ऐसे नफ़रत फैलाने वालों को सियासी पनाह मिलती है, तो समाज में कट्टरता और तशद्दुद का माहौल बनना लाज़िमी है। यह बयानबाज़ियां इस्लामोफ़ोबिया को हवा देती हैं और मुसलमानों को दूसरे दर्जे का शहरी महसूस कराती हैं।
कभी-कभी लगता है कि अब ग़ाली देना भी एक सियासी पहचान का हिस्सा बन गया है। जो जितना ज़्यादा ज़हर उगलता है, उसे उतना ही “राष्ट्रभक्त” कहा जाता है। और मुसलमान?
वो फिर भी खामोश रहता है — क्योंकि उसे सिखाया गया है कि सब्र ईमान का हिस्सा है।
आलमी सतह पर रद्दे-अमल
भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा पर आलमी बिरादरी की भी नज़र है। ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और अमेरिकी कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम (USCIRF) जैसी तंज़ीमें अपनी सालाना रिपोर्ट्स में लगातार भारत में मुस्लिम अक़लियत के हुक़ूक़ के हनन पर तशरीह करती रही हैं। वे नफ़रती भाषणों, भेदभावपूर्ण क़ानूनों (जैसे CAA) और हिंसा के मुजरिमों पर कार्रवाई न होने पर सवाल उठाते हैं। अल-जज़ीरा, द गार्डियन और द न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे बड़े आलमी मीडिया इदारे भी इन मसाइल को लगातार कवर करते हैं, जिससे दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत के तौर पर भारत की साख मुतास्सिर होती है।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारत का मुसलमान आज भी उम्मीद और सब्र के साथ अपने आइनी हक़ूक़ और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहा है।
कभी-कभी लगता है कि इस वतन की रगों पर किसी ने बर्फ़ की चादर डाल दी हो।
मुसलमान की पहचान यहाँ फूल भी है और काँटा भी—फूल इसलिए कि उसने इस मिट्टी को अपनी मोहब्बत, अपनी तहज़ीब, अपनी अदब से सींचा; और काँटा इसलिए कि कुछ दिलों में उसके लिए जगह नहीं, बस उलझनें हैं।
यही वजह है कि आज “भारत में मुस्लिम पहचान” कोई साधारण हक़ीक़त नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है जो हर रोज़ नए हादसों, नए तानों और नए भेदभाव से लिखता रहता है।
हवाओं में नफ़रत की तपिश भी है, और उम्मीद की ठंडी साँसें भी;
लेकिन वक़्त की रवानी बताती है कि पहचान पर हमला जितना पुराना है, उससे ज़्यादा पुराना मुसलमान का सब्र और मज़बूती है।
एक मुसलमान का दर्द — जो लिखा नहीं जाता
इस मुल्क में हर मुसलमान के सीने में एक ख़ामोश कहानी है। कोई मज़दूर है जो सिर्फ़ अपने नाम की वजह से काम से निकाल दिया गया। कोई स्टूडेंट है जो क्लास में “टेररिस्ट” कहलाया। कोई औरत है जो हिजाब पहनने पर सवालों में घिर गई।
इन सबके बावजूद, वो सब्र करते हैं। मुसलमानों की आँखों में आज भी उम्मीद है, कि शायद कभी हालात बदलेंगे। वो अपने मुल्क से मोहब्बत करते हैं, क्योंकि ये वही ज़मीन है जहाँ उनके बुज़ुर्गों ने अपना लहू दिया, अपनी तहज़ीब दी, अपनी विरासत दी।
अगर एक मुसलमान सब्र से जी रहा है, तो वो किसी कमज़ोरी से नहीं, बल्कि अपने ईमान की मज़बूती से जी रहा है।
कभी-कभी लगता है कि मुसलमान होना अब एक जुर्रत है — एक ऐसा सब्र जो रोज़ आज़माया जाता है।
मगर याद रखिए — नफ़रत की उम्र छोटी होती है, मोहब्बत की सांसें लंबी।
हासिल ए कलाम.
भारत में मुसलमान होना किसी शिकायत का बयान नहीं—बल्कि एक सच्चाई है जो हर दिन की साँसों में महसूस होती है।
जहाँ लोकतंत्र के दावे ऊँचे हैं, वहाँ इंसाफ़ की राहें कभी-कभी तंग दिखती हैं।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर नफ़रत के पीछे कोई न कोई उम्मीद की चिंगारी ज़रूर बची रहती है, और वही चिंगारी समाजों को गिरने नहीं देती।
No comments:
Post a Comment