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Islam vs Liberalism: Liberals Ki Dohri Neeyat Exposed.

Islam vs Liberalism: Liberals Ki Dohrī Neeyat Ka Khel.

Islam aur Liberalism: Kya Liberal Soch Waqai Neutral Hai?
Liberals' ka double standard Islam ke Sath.
Islamophobia aur secular hypocrisy.
Liberalism often presents itself as a champion of freedom and equality, yet its double standards reveal a deeper hypocrisy. While liberals advocate tolerance, they frequently dismiss traditional values like Islam as outdated or oppressive. This contradiction exposes how liberalism selectively applies its principles, undermining the very fairness it claims to uphold. The clash between Islam’s consistent moral framework and liberalism’s shifting agendas highlights the growing debate over authenticity versus opportunism in modern society.
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क्या उदारवाद दोहरे मापदंड की अवधारणा  हैं?
आजाद ख्याल लिबेरल्स या आज़ाद ख्याल मुनफिक़?
लिबरलिज़्म का असली चेहरा बेनक़ाब! इस्लाम और हया पर सबसे बड़ा हमला…
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Nam-Nihad Aazad khyal ya Sach ka Saudagar?

मुस्लिम मुमालिक ने इस्लाम को अपना दस्तूर माना लेकिन उस पर अमल नही किया,
मगरीबि मुल्को ने अपना दस्तूर अकल को माना और उस पर अमल भी किया।

ज़ाहिर सी बात है के आने वाली नई नस्लें इस्लाम को लेकर बद्गुमानिया पालती और मगरीबि ख्यालात को सही और ज़दीद।

तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी।
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगा.

ज़दिद और रौशन ख्याल के नाम पर धर्म-विरोध की आड़ लेने वाले लिबरल तबके के दोहरे मापदंड को बेनक़ाब करके है  उनकी “आज़ादी” व “मसावात” की बोतल में छुपे फिक्रि व्यापार को उजागर होना जरुरि है।

 डबल स्टैंडर्ड की नक़ाब
लिबरल हर मज़हबी अलामत—दाढ़ी, हिजाब, नमाज़—को “प्राइवेट” दायरे में धकेल देने की हिदायत देते हैं, मगर अपनी थीसिस को पाठ्यक्रम, मीडिया और अदालतों तक “यूनिवर्सल वैल्यू” बताकर थोपना तअस्सुब की वही सूरत है जिसे वे दूसरों में खोजते हैं। हिजाब की बात आए तो “एजेंसी” की तमाम तशरीहें अचानक रद्द कर दी जाती हैं, और कॉर्पोरेट स्टाइलिंग को “चॉइस” का ताज पहना दिया जाता है—यानी पहचान अगर बाज़ार के साँचे में ढले तो क़बूल, और अगर रब के हुक्म पर टिके तो “रिग्रेशन” का तमगा।

आज़ादी” का तिजारती मैनिफेस्टो
लिबरलिज़्म की तालीमात में आज़ादी का बयान चमकदार है, पर उसका हाशिया बताता है कि यह “हर्म प्रिंसिपल” की आधी समझ पर खड़ी तिजारत है—जहाँ इंसान के फ़र्ज़, नैतिक ज़िम्मेदारी और क़लब की इस्लाह को “जाति” कहकर बेअसर किया जाता है। नतीजा यह कि जम्हूरी बहस “हक़ूक़” के शोर में डूब जाती है, जबकि “हद” और “हिकमत” जैसे इस्लामी उसूलों को पब्लिक स्क्वायर से बेदख़ल कर दिया जाता है—और इसी बे-हुदगी को वे तरक़्क़ी का नाम देते हैं।

 सेक्युलर फ्रेमिंग की चाल
क्लासिकल सेक्युलरिज़्म मज़हब को निजी कर देने में नजात देखता है, लेकिन यही निजीकरण बहुधा बहुसांस्कृतिक समाजों में पहचान की गैर-मामूली रूह को कुचल देता है—ख़ासकर वहाँ जहाँ दीन सिर्फ रिवायत नहीं, मुज्तमई नज़्म का हादी भी है। जब मुसलमान अपने इबादती उसूलों के लिए सार्वजनिक सहूलत चाहता है, तो “न्यूट्रैलिटी” के नाम पर पाबंदी लगती है; मगर उसी वक्त सेक्युलर मानकों को सार्वजनिक तर्ज़े-ज़िंदगी का इकलौता पैमाना बना दिया जाता है—ये कैसी न्यूट्रैलिटी है जो सिर्फ एक ख़ाने में फिट बैठने वालों को इजाज़त देती है।.

 मिसालें जो परदा उठाती हैं!
- हिजाब पर तंज़ को “जेंडर जस्टिस” का पैग़ाम बनाया जाता है, लेकिन वही लोग फैशन इंडस्ट्री के निगरानी मानकों को “एम्पावरमेंट” कहते नहीं थकते—अर्थात जेनुइन हया संदिग्ध, और ब्रांडेड हया क़ाबिले-तारीफ़।

- नमाज़ के वक़्फ़े पर ऐतराज़ यह कहकर कि “ऑफिस धर्म-निरपेक्ष है,” मगर प्रोडक्टिविटी के नाम पर ओवरटाइम की इबादत का बतर्ज़-शरीअत लगाना जायज़—यह भी एक दीन है, बस उसका मिज़ाज पूँजी है.

- मदरसा और दीनदार तालीम को “आऊटडेटेड” कहना आसान है, पर वही ज़हन जब मज़हबी उसूलों पर खड़े “अमर बिल मारूफ” की सामूहिक भलाई देखता है तो उसे “मोरल पॉलिसिंग” कहकर ख़ारिज कर देता है भलाई अगर बाज़ार से आए तो सामाजिक ज़िम्मेदारी, और अगर दीन से आए तो पितृसत्ता, पुराने ख्यालो वाला, कदामत परस्त। 

 इल्मी जिरह और इज़्ज़े-दीन
जो लोग लिबरलिज़्म को एक मुकम्मल नजात-नामे के रूप में पेश करते हैं, वे भूल जाते हैं कि इंसान की आज़ादी बिना सरहद के खुद-परस्ती में ढल जाती है, और खुद-परस्ती समाज को ताख़्त-ओ-ताज नहीं, तन्हाई और तफ्तीश देती है। इस्लाम की हिदायत आज़ादी को जवाबदेही से बाँधती है—ताक़त को अमानत, और माल को ज़कात से; यही वजह है कि इस जम्हूर का बग़ैर मज़हबी उसूलों के पढे “हक़ूक़” की बोलियाँ ऊँची तो कर सकती है, मगर दिलों में सुकून नहीं उतार सकती।

 तज्वीज़: बहस का असल पैमाना
अगर वाक़ई इंसाफ़ मुराद है तो बहस का पैमाना यह होना चाहिए कि कौन सा निज़ाम इंसान की रूह, ख़ानदान और समाज के तवाज़ुन की हिफ़ाज़त करता है—न कि किसकी कहानी मीडिया में बेहतर बिकती है। मज़हबी पहचान को हासिये पर धकेलना, और सेक्युलर क़वायद को “न्यूट्रैल” बताकर सार्वजनिक क़ानून बना देना, उसी वैचारिक वर्गीयता का बयान है जो इतिहास में दूसरी शक्लों में उपनिवेशी जबानों से सुना गया। 

   हया की इज़्ज़त
दाढ़ी और हिजाब सिर्फ बाल और कपड़े नहीं, खुददारी और हया के इस्तिआरे हैं—इन पर तंकि्द से पहले यह सोचना होगा कि तहज़ीब का सौंदर्य फ़ैशन से नहीं, फ़ज़ीलत से बनता है। सच्ची आज़ादी यह है कि पेशानी रब के आगे झुके, और रोज़गार की पेशानी किसी कुर्सि के आगे न बिके; यही पहचान बचेगी, यही कल रोशन करेगी।

 1) “न्यूट्रैलिटी” के नाम पर हिजाब-पाबंदियाँ
दफ़्तरों और सरकारी इदारों में “न्यूट्रैलिटी” का हवाल़ा देकर हिजाब जैसी धार्मिक अलामतों पर पाबंदी लगा दी जाती है, जबकि वही जगहें अपने कार्पोरेट इमेज और बहुसंख्यक सांस्कृतिक संकेतों को बेरोक जारी रखती हैं—यानी जो गैर-मज़हबी है, उसे ही “न्यूट्रल” मान लेना खुद एक पक्षधर मानक ठहरता है। यूरोपीय अदालतें अकसर राज्यों को “मार्जिन ऑफ़ एप्रिसिएशन” देकर इन पाबंदियों को जायज़ ठहराती हैं, हालाँकि असली न्यूट्रैलिटी तो यह चाहती है कि तमाम अकीदे बराबर इज़हार का हक़ रखें। यह दोहरापन इसलिए है कि “न्यूट्रल” की तअरीफ़ ग़ालिब सेक्युलर-कौमी क़दरें तय करती हैं, नतीजा यह कि धार्मिक पहचान को हाशिये पर रखना “निज़ाम-ए-आम” कहलाने लगता है।

 2) “एजेंसी/चॉइस” की एकतरफ़ा तशरीह.
लिबरल बयानिया इख़्तियार और एजेंसी को आसमानी उसूल बनाकर पेश करता है, मगर जब कोई मुसलमान ख़ातून अपनी मरज़ी से हिजाब अपनाती है, तो उसी एजेंसी को “जबर-ए-रिवायत” कहकर शुब्हा के घेरे में डाल दिया जाता है। यूरोपीय सतह पर दफ़्तरों में हिजाब-बैन को क़ानूनी ताईद मिलने से बहुत-सी महिलाओं को “रोज़गार या ईमान” में जबरी इंतेख़ाब करना पड़ता है यह एजेंसी की ताईद नहीं, उसकी तख़्फ़ीफ़ है। यह तजाद इसलिए जन्म लेता है कि लिबरल निज़ाम फ़र्द की आज़ादी को मानता है, मगर जैसे ही वह आज़ादी मज़हब से जुड़े, उसे “प्राइवेट रखो” कहकर अवामी दायरे से निकाल देता है।

 3) “बराबरी” के नाम पर अमली नाइंसाफी
क़ानूनी ज़बान में एक-सा ड्रेस-कोड या एक-सा उसूल “बराबरी” कहलाता है, लेकिन अमलन उसका ज़्यादा बोझ धार्मिक अलामतें रखने वालों पर पड़ता है—मसलन “जनरल” ड्रेस-कोड हिजाब या पगड़ी वालों को सीधे प्रभावित करता है। इंसानी हक़ूक़ की दस्तावेज़ात ने इसे “डिस्क्रिमिनेशन इन द नेम ऑफ़ न्यूट्रैलिटी” कहा है, क्योंकि जो उसूल सतही तौर पर सबके लिए है, वह अल्पसंख्यक की मुश्किल को बढ़ाता है—रस्मी बराबरी, हक़ीक़ी नाइंसाफी में बदल जाती है। यह दोहरापन इसलिए रहता है कि लिबरल बराबरी अक्सर “फ़ॉर्मल इक्वैलिटी” पर रुक जाती है, जबकि मुतनव्वे समाजों में “सब्स्टैंटिव इक्वैलिटी”—यानी अमली इंसाफ़—ज़रूरी होता है, जिससे कमज़ोर फ़रीक़ की आज़ादी भी सलामत रहे।

कुछ लोग सुबह शाम, उठते बैठते साइंस और टेक्नोलॉजी  मे मगरीब की मिशाल देते है, मगर तकलीद उनके फशक् व फुजूर, बेहयाई, फ़हाशि, हमजिंसीयत की करते है। ऐसे लोगो की मिशाल उस शख्स की तरह है जो हर वक्त कुत्ते की वफादारी की तारीफ करे मगर कुत्ते से सिर्फ भौकना सीखे। 

देसि लिबेरल्स या मुनफिक़ीन असल मे ये यूरोपियन प्रोडक्टस के खून मे वही वाइरस गर्दिश करता है जो नबी के जिंदगी पर जुबान दराजी करने वालो के खून मे था।
वैसे ये फिरंगी परस्तो को मजहब, मौलवी और शरीयत से क्या ताल्लुक़, तुम सब तो बंदरो की औलादो मे से हो इसलिए सोच और हरकत भी जानवरो वाली है।

ऐ अल्लाह! हमारी उम्मत को हर नए फ़ितने और गुमराही से महफ़ूज़ रख।  
हमारी बहनों और बेटियों को पर्दा और हया की पाकिज़गि अता कर,  उनके दिलों में ईमान की रौशनि और अमल की पाबंदी पैदा कर।  हमें दीन पर क़ायम रख, और दुनिया के धोखे से बचा।  
या रब्ब! हमें अपनी रहमत और हिफ़ाज़त में ले ले।  आमीन।

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