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Dastak Dena Mard Ki Fitrat Aur Darwaza Nahi Kholna Aurat Ka Husn.

Modesty: Empowering Muslim Women with Haya & Rida‑e‑Iffat.

A voice of dignity, a call of modesty — Binte Hawwa rising with Haya & Rida‑e‑Iffat.
Celebrating the Strength and Grace of Binte Hawwa: Modesty, Faith & Empowerment.
दस्तक देना मर्द की फितरत है और दरवाज़ा न खोलना औरत का हुस्न...
दस्तक, हया और रिदा-ए-इफ़्फ़त: बिन्ते हव्वा के नाम एक पैग़ाम.
 क्यों हर दस्तक पर दिल का दरवाज़ा खोलना नादानी है?
#BinteHawwa #Haya #Niswaniyat #UrduAdab #IslamicValues #Dastak
दस्तक, दिल और दर-ए-हया: औरत के वक़ार की एक दास्तान.
एक औरत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी हया है। हया सिर्फ लिबास का नाम नहीं, बल्कि सोच की पाकीज़गी और लहजे की नफ़ासत का नाम है। जब एक बेटी अपने वक़ार की हिफाज़त के लिए अजनबियों से फासला रखती है, तो वो महज़ एक इंसान नहीं रहती, बल्कि 'मुकद्दस रिदा' में लिपटी एक हकीकत बन जाती है।
फितरत का दस्तूर है कि तलाश मर्द की जानिब से होती है और 'इस्तग़ना' (बेपरवाही) औरत का ज़ेवर है। दस्तक देना मर्द की जबिल्लत (Nature) हो सकती है, वो हर दर पर सदा देता है, मगर उस हर दस्तक पर दिल के दरवाज़े न खोलना ही औरत की असल नज़ाकत है। औरत का हुस्न उसकी दस्तयाबी (Availability) में नहीं, बल्कि उसकी 'ना-याबी' (Rareness) में है।

मर्द की फितरत और औरत का तग़ाफ़ुल: एक जमालियाती तवाज़ुन.
कहा जाता है कि दस्तक देना मर्द की फ़ितरत है, वह हर दर-ए-ना-आशना (अनजान दरवाज़े) पर सदा देता है, मगर उस दस्तक पर बे-ताब होकर दर-ए-दिल वा (खोलना) न करना ही औरत का असल हुस्न है। शराफ़त का तक़ाज़ा है कि अपने दिल, दिमाग़ और जज़्बात की देहलीज़ को हर राह चलती सदा के लिए वक़्फ़ न किया जाए। यह दरवाज़ा सिर्फ़ उस 'शारिक-ए-सफ़र' के लिए खुलना चाहिए जो तक़द्दुस-ए-निकाह के साथ आपकी ज़िंदगी के आंगन में क़दम रखे।

हया से सुर्ख़ हो जाना भी क्या कमाल का हुस्न है,
बिना ज़ेवर के भी औरत बे-मिसाल लगती है।

अजनबियत के साए और ज़हनी सुकून का हिसार.
किसी अजनबी को अपने क़ीमती लम्हात और ज़ाती ज़िंदगी में दख़ल-अंदाज़ी का मौक़ा देना गोया खुद को ज़हनी कर्ब  की नज़्र करना है। याद रखिए, जो हाथ आज सताइश के फूल बरसा रहे हैं, वही कल आपके किरदार पर उंगलि उठाने में देर नहीं करेंगे। अपनी गुफ़्तगू और मेल-जोल में एक मोतबर फासला बरक़रार रखिए; यही वह हिजाब है जो आपकी रूह को भी महफ़ूज़ रखता है और सुकून-ए-क़ल्ब का ज़ामिन भी है।

निसवानियत का एहतराम और हलाल की मंज़िल.
जो मर्द आपको अपनी 'इज़्ज़त' तसव्वुर करता है, वो आपको सड़कों पर रुस्वा नहीं करेगा, बल्कि निकाह के पाकीज़ा रिश्ते के ज़रिए आपको अपने घर की मल्लिका बनाएगा। याद रखिए, जो दस्तक हराम रास्ते से आए, वो सिर्फ तबाही का पैगाम लाती है। औरत की नज़ाकत का तकाज़ा है कि वो अपनी कीमती मोहब्बत को सिर्फ उस 'शहसवार' के लिए बचाकर रखे जो खुदा को गवाह बनाकर उसका हाथ थामे।

मोहब्बत की मेराज: हवस से निकाह तक का सफ़र.

किसी की शख्सियत से मुतास्सिर होना फ़ितरी अमर है, मगर इस जज़्बे को गुनाह के शोला में झोंकना अपनी तौहीन है। अगर दिल की गहराइयों में कोई सितारा रौशन हो, तो उसे निकाह के पाकीज़ा रिश्ते की चांदनी से मुनव्वर करें। अगर मुआशरति दीवारें हायल हों और मंज़िल का हुसूल नामुमकिन नज़र आए, तो मसलहत इसी में है कि इस अफसाने को वहीं तमाम कर दिया जाए।

वो मोहब्बत जो निकाह के रास्ते से न आए,
वो महज़ नफ़्स की लज़्ज़त और रूह की तबाही है।

हवस और मुहब्बत का बारीक फ़र्क़.
मर्द जिस औरत को सच्चे दिल से अपनी इज़्ज़त मानता है, वह उसे ज़माने की आलूदा (गंदी) नज़रों से महफुज कर, अपनी इज़्ज़त बनाकर रखता है। जो मर्द आपकी नुमाइश चाहे, जो आपके ज़ीनत को नामेहरमों के सामने पेश करने पर खुश हो, याकिन जानिये कि उसके दिल में आपके लिए इज़्ज़त नहीं बल्कि महज़ मतलब और लज़्ज़त-ए-नज़र की प्यास है।

 रिदा-ए-हया ही औरत का असली ताज है,
इसी के दम से क़ायनात में उसका राज है।

नामेहरम की रफ़ाक़त: एक खुशनुमा फ़रेब.
मेरी प्यारी बहनों! यह एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि नामेहरम मर्द न कभी सच्चा दोस्त हो सकता है, न हमदर्द और न ही मुहाफ़िज़। वह मर्द जो आज आपकी ज़ुल्फ़ों के असीर होने का दावा करता है, कल वही आपको 'बद-किरदार' का लक़ब देकर किसी नए शिकार की जुस्तजू में निकल जाएगा। औरत का हकिकि मुहाफ़िज़ उसका शौहर है, जो उसे मुआशरे में एक मोतबर मुक़ाम और अपनी आग़ोश में तहफ़्फ़ुज़ फराहम करता है। 
अपनी नज़ाकत को हया के पर्दे में महफूज़ रखिए, क्योंकि जो कोइ हर किसी के लिए दस्तयाब हो,उसकी अहमियत सामने वाले कि नज़र में कम हो जाती है। अपनी कदर व अहमियत जाने,आप अल्लाह की दी हुई सबसे मुकद्दस अमानत हैं।

आज के दौर में जहाँ नुमाइश को हुस्न कहा जाता है, वहाँ एक बा-हया औरत अपनी सादगी और हया से फरिश्तों को भी रश्क करने पर मजबूर कर देती है। आपका वक़ार इसी में है कि आप हर किसी के लिए दस्तयाब न हों। आपकी खामोशी में एक ऐसी हैबत होनी चाहिए कि कोई भी नामेहरम आपकी तरफ देखने से पहले अपनी नज़रें झुकाने पर मजबूर हो जाए।
हया की सुर्ख़ी ज़ेवर से कहीं ज़्यादा चमकती है,
जो पाकीज़ा हो सूरत, वो दिलों में घर बनाती है।

 इरशाद-ए-रब्बानी और हया की खुशबू.
ख़ालिक़-ए-दो-जहां ने हमें नामुहरम से बात करते हुए लहजे में नज़ाकत और नरमी रखने से मना फ़रमाया है, मुबादा कोई बीमार दिल फ़ितने में पड़ जाए। पाकीज़गी की यह रविश ही वह मेआर है जो हमें आम से ख़ास बनाती है। हराम रिश्तों में आरज़ी लज़्ज़त तो मिल सकती है, मगर वह सुकून और अल्लाह की खुशनुदी कभी हासिल नहीं हो सकती जो हलाल रिश्तों का ख़ासा है।

हया को ढाल बना कर जो घर से निकलती हैं,
  फरिश्ते राहों में उनकी दुआएं पढ़ते हैं।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त तमाम बेटियों की अस्मत की हिफ़ाज़त फ़रमाए, उन्हें अपने मुक़ाम को पहचानने की तौफीक दे और सिरात-ए-मुस्तक़ीम पर गामज़न रखे। आमीन या रब्बल आलमीन।

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