Magarib Me Islam Ki Chahat aur Waha Ke Philosophers.
मगरिब के झरोखों से इस्लाम का एतराफ़: जब अक़्ल दंग रह गई.
जब कार्लाइल और जेम्स जींस जैसे दिमाग़ों ने कुरान को समझा, तो उनकी अक़्लें दंग रह गईं!
यह सिर्फ़ एक मज़हब नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए रूहानी और साइंसी हिदायत है।
यूरोप में इस्लाम का उभरता सूरज: पश्चिमी फिलासफरों की गवाही और बदलती हकीकत.
मगरिबी दुनिया के अज़ीम दानिश्वरों, साइंटिस्टों और अदीबों ने जब भी इस्लाम का बग़ौर मुताला किया, वे इसकी अज़मत के कायल हो गए।
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| दुनिया के सबसे बड़े साइंटिस्ट और फिलासफर इस्लाम के बारे में क्या सोचते थे? |
दुनिया के बड़े-बड़े ज़ेहनों ने इस्लाम की तालीमात को सिर्फ़ एक मज़हब नहीं, बल्कि एक मुकम्मल इंक़लाब तस्लीम किया है। आइए देखते हैं कि साइंस और अदब के इन सितारों ने इस्लाम के बारे में क्या कहा?
आज की दुनिया में जब हम आलमि सियासि और सामाजिक बदलावों पर नजर डालते हैं, तो एक हकीकत सबसे ज्यादा नुमाया होकर सामने आती है—और वह है यूरोप के दिल में इस्लाम की बढ़ती हुई मकबूलियत। यह सिर्फ एक मजहबी बदलाव नहीं है, बल्कि एक मुकम्मल तहजीबी इंकलाब है।
न्यूयॉर्क से लेकर लंदन और बर्मिंघम तक, आज दुनिया के सबसे ताकतवर और असरदार शहरों की कमान उन हाथों में है जो खुदा के सामने सर झुकाते हैं। यह वाकई एक "आई ओपनिंग" मंजरनामा है कि कैसे महज 4 मिलियन की आबादी ने 66 मिलियन के मुल्क में अपनी काबिलियत और किरदार का लोहा मनवाया है।
मगरिब के बड़े शहरों में मुस्लिम कयादत.
अगर हम मौजूदा दौर के सियासी ढांचे का मुताला करें, तो यह देखकर हैरत होती है कि दुनिया के बड़े-बड़े शहरों के मेयर मुसलमान हैं। लंदन जैसा आलमी शहर सादिक खान की कयादत में है, तो वहीं बर्मिंघम, लीड्स, ब्लैकबर्न, शेफील्ड, ऑक्सफोर्ड, ल्यूटन, ओल्डहम और रोचडेल जैसे अहम शहरों की बागडोर भी मुस्लिम नुमाइंदों के पास है।
यह इस बात की दलील है कि इस्लाम के मानने वाले न सिर्फ अपनी इबादतगाहों तक महदूद हैं, बल्कि वे मआशरे की तामीर और तरक्की में भी पेश-पश हैं। इतना ही नहीं, बर्तानिया के स्कूलों में हलाल गोश्त की फराहमी इस बात का सबूत है कि वहां की तहजीब अब इस्लामी उसूलों और जरूरतों को दिल से तस्लीम कर रही है।
चंद मगरिबी मुफक्किरीन और दानिश्वरों के तारीख़ी अक़वाल.
दुनिया-ए-इल्म व अदब में चंद ऐसी शख्सियतें गुज़री हैं जिनकी ज़हानत का लोहा पूरी दुनिया मानती है। इन दानिश्वरों ने न सिर्फ इस्लाम का गहरा मुताला किया, बल्कि अपनी मशहूर-ए-ज़माना किताबों में इस हकीकत को तस्लीम किया कि इस्लाम ही वह वाहिद दीन है जो इंसानियत को अमन और तरक्की की राह दिखा सकता है।
इस्लाम की इस बढ़ती हुई रौशनि और आलमगीर पैगाम की पेशीनगोई सदियों पहले उन मगरिबी फिलासफरों ने कर दी थी, जिन्होंने इस मजहब का गहराई से मुताला किया था। आइए जानते हैं कि तारीख के मश्हूर जेहनों ने इस्लाम के बारे में क्या कहा?
1. जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (आयरलैंड)
बर्नार्ड शॉ आयरलैंड के रहने वाले एक अज़ीम ड्रामा निगार और मुफक्किर थे। उन्हें अपनी अदबी खिदमात के लिए 'नोबेल प्राइज़' से भी नवाज़ा गया।
इस्लाम पर राय: उन्होंने अपनी किताब "The Genuine Islam" (1936) में लिखा कि हज़रत मोहम्मद ﷺ इंसानी नस्ल के नजात-दहंदा (Saviour) हैं।
वजह: उनका मानना था कि अगर किसी एक शख्स को इस दुनिया की हुक्मरानी दी जाए, तो वह तमाम मसाइल को ऐसे हल कर देगा कि दुनिया को अमन मयस्सर आ जाए।
2. जोहान वोल्फगैंग गोएथे (जर्मनी)
गोएथे जर्मनी के कौमी शायर और दानिश्वर थे। वे जर्मन अदब की तारीख में वही मकाम रखते हैं जो उर्दू में अल्लामा इक़बाल का है।
इस्लाम पर राय: उन्होंने अपनी शायरी के मजमूए "West-östlicher Divan" में इस्लाम को सच्चा दीन करार दिया।
वजह: वे कुरान-ए-करीम की तौहीद (एकेश्वरवाद) से इस कदर मुतासिर थे कि उन्होंने कहा, "अगर यही इस्लाम है, तो क्या हम सब मुसलमान नहीं हैं?"
3. लियो टॉलस्टॉय (रूस)
टॉलस्टॉय रूस के निहायत मोतबर और मुमताज नाविल निगार थे। उनकी तहरीरों ने दुनिया भर के इंकलाबात पर गहरा असर डाला।
इस्लाम पर राय: उन्होंने कुरान की तालीमात और अहादीस-ए-मुबारका का मुताला करने के बाद कहा कि इस्लाम में अक्ल और हिकमत दोनों जमा हैं।
वजह : वे रूहानी तौर पर चर्च के तसव्वुर-ए-मजहब से परेशान थे और उन्हें इस्लाम की सादगी में रूहानी सुकून नज़र आया।
4. गुस्ताव ली बॉन (फ्रांस)
डॉ. गुस्ताव ली बॉन फ्रांस के एक नामवर माहिर-ए-नफसियात (Psychologist) और मुअर्रिख (Historian) थे।
इस्लाम पर राय: अपनी किताब "La Civilisation des Arabes" में उन्होंने लिखा कि मुसलमान फातेहीन (Conquerors) ने मगलूब कौमों के साथ जो नरमी बरती, उसकी मिसाल तारीख में नहीं मिलती।
वजह: उन्होंने तहकीक से साबित किया कि दुनिया को तहजीब और साइंस का सलीका अरब के मुसलमानों ने सिखाया।
5. ह्यूस्टन स्मिथ (अमेरिका)
ह्यूस्टन स्मिथ अमेरिका के मारूफ स्कॉलर थे जो तमाम मजाहिब के गहरे इल्म के लिए जाने जाते हैं।
इस्लाम पर राय: उन्होंने इस्लाम को "अदल व इंसाफ का मुकम्मल निज़ाम" करार दिया।
वजह: उन्होंने अपनी किताब "The World's Religions" में लिखा कि इस्लाम ने नस्ली इम्तियाज़ (Racism) का खात्मा जिस खूबसूरती से किया, वह कोई दूसरा निज़ाम न कर सका।
6. एच.जी. वेल्स (बर्तानिया)
एच.जी. वेल्स इंग्लैंड के मशहूर मुअर्रिख और साइंस-फिक्शन के बानी थे।
इस्लाम पर राय: उन्होंने अपनी किताब "The Outline of History" में इस्लाम की समाजी बराबरी की तारीफ की।
वजह: उनका ख्याल था कि इस्लाम एक ऐसा दीन है जो बादशाह और फकिर को एक ही सफ में खड़ा करने की सलाहियत रखता है।
7. बर्ट्रेंड रसेल (बर्तानिया)
बर्कले और ऑक्सफोर्ड जैसे इदारों से वाबस्ता रसेल बर्तानिया के निहायत अहम फलासीफी और लॉजिशियन (Logician) थे।
इस्लाम पर राय: उन्होंने एतराफ किया कि मगरिब की मौजूदा साइंसी तरक्की मुसलमानों की दी हुई बुनियादों पर कायम है।
वजह: उन्होंने अपनी किताब "History of Western Philosophy" में तफ्सील से लिखा कि जब यूरोप जहालत के अंधेरों में था, तब इस्लामी दुनिया इल्म की शमा रोशन किए हुए थी। वैसे रसेल मुल्लहिद (Atheist) थे, इन्हि के फल्सफे का ज़िक्र अक्सर देसि मुनफिक़ीन करते रह्ते है खुद को रौशन ख्याल और ज़दिद साबित करने के लिये.
8. सर जेम्स जींस (Sir James Jeans) – बर्तानिया (साइंटिस्ट)
सर जेम्स जींस बर्तानिया के निहायत मशहूर माहिर-ए-फ़लकियात (Astronomer), भौतिक विज्ञानी (Physicist) थे।
क्या कहा: "कुरान ने कायनात के हकायेक को जिस अंदाज़ में पेश किया है, वह जदीद साइंस के ऐन मुताबिक़ है।"
क्यों कहा: जब उन्होंने कुरान की आयात का मुताला किया जो सितारों और ज़मीन की तख़लीक़ के बारे में थीं, तो वे दंग रह गए कि 1400 साल पहले एक अनपढ़ समाज में यह बारीक इल्म कैसे मुमकिन था।
9. एडवर्ड गिबन (Edward Gibbon) – बर्तानिया (मशहूर मुअर्रिख)
गिबन बर्तानिया के सबसे बड़े इतिहासकारों में शुमार होते हैं, जिन्होंने "The Decline and Fall of the Roman Empire" जैसी अज़ीम किताब लिखी।
क्या कहा: "कुरान एक ऐसी किताब है जो अक़्ल और दलील पर मबनी है। इसमें कोई ऐसी बात नहीं जो इंसान कि फितरत के ख़िलाफ़ हो।"
क्यों कहा: उन्होंने तारीख़ का मुताला करते हुए देखा कि इस्लाम ने निहायत कम वक़्त में दुनिया के बड़े हिस्से को मुतास्सिर किया, और इसकी वजह तलवार नहीं बल्कि इसकी सादा और अक़्ल-परस्त तालीमात थीं।
10. थॉमस कार्लाइल (Thomas Carlyle) – स्कॉटलैंड (मुफ़क्किर और अदीब)
कार्लाइल उन्नीसवीं सदी के स्कॉटलैंड के एक निहायत मोहतरम दार्शनिक और लेखक थे।
क्या कहा: "मोहम्मद (ﷺ) एक सच्चे पैग़ंबर थे। वे झूठ के सहारे इतना बड़ा इंक़लाब नहीं ला सकते थे। उनके दिल में खुदा की आवाज़ थी।"
क्यों कहा: उन्होंने अपनी मशहूर किताब "On Heroes, Hero-Worship, and The Heroic in History" में मोहम्मद ﷺ को 'हीरो' के तौर पर पेश किया क्योंकि वे मग़रिब में इस्लाम के ख़िलाफ़ फैली ग़लतफ़हमियों को दूर करना चाहते थे।
11. एनी बेसेंट (Annie Besant) – बर्तानिया (मुसन्निफ़ा और सियासतदान)
एनी बेसेंट बर्तानिया की मशहूर लेखक और थियोसोफ़िस्ट थीं, जिन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक में भी हिस्सा लिया।
क्या कहा: "इस्लाम औरतों के हुक़ूक़ का सबसे बड़ा मुहाफ़िज़ है। जो आज़ादी और एहतेराम इस्लाम ने औरतों को दिया, वह मगरिब में सदियों बाद भी मयस्सर नहीं आया।"
क्यों कहा: उन्होंने जब विरासत (Inheritance) और तलाक़ के इस्लामी क़ानूनों का मुताला किया, तो उन्हें अहसास हुआ कि इस्लाम ने औरतों को उस दौर में हक़ दिए जब मगरिब उन्हें इंसान भी नहीं समझता था।
12. विलियम मोंटगोमरी वाट (W. Montgomery Watt) – स्कॉटलैंड (प्रोफ़ेसर और स्कॉलर)
वाट एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और अरबी ज़बान के माहिर थे।
क्या कहा: "मोहम्मद (ﷺ) की शख्सियत में जो सब्र और इस्तक़ामत थी, वह उनके सच्चे होने की सबसे बड़ी दलील है।"
क्यों कहा: उन्होंने मोहम्मद ﷺ की सीरत पर मुस्तनद किताबें लिखीं ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि मक्का की तक्लीफ़ों के बावजूद उनका अपने मिशन पर डटे रहना कोई मामूली बात न थी।
मगरिब के इन अज़ीम ज़ेहनों का इस्लाम की तारीफ़ करना इस बात का सुबूत है कि सच्चाई कभी छुप नहीं सकती। लेकिन हमारे लिए सोचने की बात यह है कि क्या हम खुद इस्लाम की उन तालीमात पर अमल कर रहे हैं जिनसे दुनिया मुतास्सिर हो रही है? अगर हम खुद अपने किरदार को वैसा बना लें जैसा हमारे नबी ﷺ ने सिखाया, तो आज भी दुनिया इस्लाम के साए में अमन तलाश करने के लिए मजबूर हो जाएगी।
यूरोप का बदलता हुआ चेहरा और इस्लामी असर.
मशहूर माहिर-ए-नफसियात गुस्ताव ली बॉन और फिलिस्तीनी-अमरीकी स्कॉलर ह्यूस्टन स्मिथ जैसे लोगों ने भी इस बात की तस्दीक की है कि इस्लाम सिर्फ एक मजहब नहीं बल्कि एक मुकम्मल जाब्ता-ए-हयात (Code of Life) है। माइकल नोस्ट्राडेमस की पेशीनगोइयां हों या बर्ट्रेंड रसेल का तहलियाती मुताला, हर तरफ एक ही सदा सुनाई देती है कि इस्लाम यूरोप की रूह में उतर रहा है। रसेल के मुताबिक, इस्लाम पूरे यूरोप में फैलेगा और वहां ऐसे अज़ीम इस्लामी मुफक्किर पैदा होंगे जो दुनिया की सिम्ट और रफ्तार तय करेंगे।
मगरिब में इस्लाम कि आमद: तहज़ीबी कशमकश और हक़ीक़त का एतराफ़.
आज के दौर में यूरोप और अमेरिका का मआशरा एक अजीब और ग़रीब मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ़ जदीदियत (Modernism) और मादियत (Materialism) की चकाचौंध है, तो दूसरी तरफ़ रूहानी प्यास और सुकूँ कि तलाश। इसी कशमकश के बीच इस्लाम यूरोप में सबसे तेज़ी से फैलने वाला मज़हब बनकर उभरा है। यह महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं, बल्कि इस्लाम के उस आफ़ाक़ी (Universal) पैग़ाम का असर है जो हर दौर के इंसान की रूह को झकझोर देता है।
दानिश्वर तबक़ा और इस्लाम कि तरफ़ रग़बत.
यूरोप का पढ़ा-लिखा और दानिश्वर तबक़ा आज इस्लाम से मुतास्सिर हो रहा है, जिसकी चंद अहम वुजूहात हैं:
अक़्ल और साइंस का संगम: मगरिब का ज़ेहन दलील (Logic) मांगता है। जब वे कुरान का मुताला करते हैं, तो उन्हें इसमें और साइंस के मुसल्लमा हकायेक में कोई तज़ाद (Conflict) नज़र नहीं आता.
ला-जवाब निज़ाम-ए-हयात: सर जेम्स जींस और थॉमस कार्लाइल जैसे लोगों ने तस्लीम किया कि इस्लाम महज़ चंद इबादात का नाम नहीं, बल्कि यह पैदाइश से मौत तक की रहनुमाई करता है.
नस्ली इम्तियाज़ का ख़ात्मा: मगरिबी मुफ़क्किर ह्यूस्टन स्मिथ के मुताबिक़, इस्लाम ने रंग और नस्ल के बुतों को जिस तरह तोड़ा है, उसकी मिसाल दुनिया का कोई दूसरा निज़ाम पेश नहीं कर सका.
यूरोप में ख़ौफ़ और इस्लाम-फ़ोबिया की लहर.
जहाँ एक तरफ़ लोग इस्लाम की आगोश में आ रहे हैं, वहीं मगरिब का एक तबक़ा इस्लाम के बढ़ते हुए असर से ख़ौफ़ज़दा भी है। इस ख़ौफ़ की वजह मज़हब नहीं, बल्कि सियासी और नफ़सियाती है। उन्हें डर है कि अगर इस्लामी तहज़ीब ग़ालिब आ गई, तो उनका सदियों पुराना "सरमायादाराना निज़ाम" (Capitalist System) और आज़ाद-ख़्याली दम तोड़ देगी।
आख़िर इस्लाम में ऐसा क्या है जो यह बढ़ता ही जा रहा है?
इस्लाम की कु़व्वत इसकी सादगी और फ़ितरत (Nature) में छुपी है। जब एक मगरिबी शख्स अपनी तमाम दुनियावी ऐश व आराम के बावजूद रूहानी तौर पर खोखला महसूस करता है, तो उसे 'तौहीद' (Oneness of God) के तसव्वुर में वह सुकून मिलता है जो उसे कहीं और नहीं मिलता.
इस्लाम का "भाईचारा" और "तहाइफ़-ए-ज़िंदगी" (Moral Values) उसे एक मज़बूत खानदानी निज़ाम देते हैं, जिसकी कमी आज मगरिब में शिद्दत से महसूस की जा रही है.
उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए पैगाम और दावत-ए-अमल.
यह तमाम वाकयात और अक़वाल उन मुसलमानों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं जो आज दुनिया के किसी भी कोने में जुल्म और नजरअंदाजी का शिकार हैं। इस्लाम की फतह सिर्फ तादाद से नहीं, बल्कि किरदार और इत्तेहाद (Unity) से मुमकिन है। अगर उम्मत-ए-मुस्लिमा मुत्तहिद हो जाए और नेक राह पर चलने का अहद कर ले, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया का हर कोना इस्लाम की बरकतों से रोशन होगा।
मगरिब में इस्लाम कि बढ़ती हुई मक़बूलियत दरअसल इंसानी फ़ितरत की अपने असल की तरफ़ वापसी है। यूरोप के दानिश्वर इसे एक रुहानि इंक़लाब और मुकम्मल ज़ाब्ता-ए-हयात के तौर पर देख रहे हैं. मुस्तकबिल का यूरोप शायद अपनी शनाख़्त (Identity) इस्लाम के साए में ही तलाश करेगा.
इस्लाम तलवार से नहीं बल्कि किरदार से फैलता है। मगरिब का इस्लाम की तरफ़ झुकाव इस बात की दलील है कि अंधेरा कितना हि गहरा क्यों न हो, हक़ की शमा अपनी रोशनी बिखेर कर ही रहती है।
अल्हम्दुलिल्लाह! यह सफर जारी है और मुस्तकबिल इस्लाम का है। हमें सिर्फ अपने ईमान को ताजा करने और अखलाक को संवारने की जरूरत है। इंशा अल्लाह, कामयाबी हमारा मुकद्दर होगी।







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