#Epsteinfiles Liberals Silent When Their Paymaster Turns Predator.
The Hypocrisy of Desi Liberals, Atheists & Socialists: Accountability for Others, Silence for Their Own.
Will Liberals candle-light marchers ever protest against their own godfather?
Accountability terrifies those who thrive on hypocrisy.
When the predator is their paymaster, morality vanishes.
इस्लाम से नफ़रत की असल वजह: हवस पर लगाम और जवाबदेही का डर।
इलहाद-ए-जदीदियत की ज़ुल्मत और डॉकिन्स का फ़रेब-ए-अख़लाक़.
इल्म का गुमान और 'ब्लैक होल' की वहशियत: स्टीफन हॉकिंग.
मक्का़री का बुत और सरमायादाराना मुनफ़िक़त: बिल गेट्स.
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| जवाबदेही से भागने वाले हवस के पुजारी, इस्लाम से नफ़रत करना ही उनकी पहचान है। |
इस्लाम के पाकीजा और अखलाकि तलिमात् पर भौकने वाले देसी दहरीया, लिबरलस् और शैतानो का मजहब 'Ethics' दुनिया पर आशकार हो चुकी है।
यही है इंसानी हुकूक चार्टर, हुकुक ए निस्वा, बच्चो के हुकुक, जानवरो के हुकुक के नामनिहाद अलम्बरदार मुहज्जब दुनिया का आशियाना ' सेक्स आइसलैंड ' ।
इलहाद-ए-जदीदियत का बुत: रिचर्ड डॉकिन्स और अख्लाकियात का जनाजा.
रिचर्ड डॉकिन्स, जिन्हें इलहाद (Atheism) का 'बाबा-ए-आज़म' माना जाता है, अक्सर मजहब की अखलाकी तालीमात पर सवाल उठाते रहे हैं। आज जब उनका नाम जेफ्री एपस्टीन के उन दस्तावेज़ों में आया है, जो 'सेक्स आइलैंड' की दरिंदगी की गवाही देते हैं, तो उनके 'Ethics' की असलियत दुनिया पर आशकार हो चुकी है. यह कैसी ज़ाहिलियत है कि जो शख्स खुदा की इबादत को जहालत कहता था, वह खुद एक ऐसे शैतानी अड्डे के सरपरस्त के साथ खड़ा पाया गया जहाँ मासूमियत का कत्ल होता था। उनके चाहने वाले 'देसी दहरिया' (Local Atheists) आज खामोश हैं क्योंकि उनके ' जहाज़ के नाखुदा ' का चेहरा दागदार हो चुका है।
रिचर्ड डॉकिन्स, जिन्हें इलहाद-ए-जदीदियत (Modern Atheism) का 'बानी' और अक्ल का कुल माना जाता है, उनकी ज़ात आज रुसवाई के उस मुकाम पर है जहाँ 'तर्क' भी शर्मिंदा है।
जो शख्स इस्लाम की नूरानी तालीमात और पाकीज़ा अख़लाक़ियात को मज़हब का जुनून कहकर ठुकराता था, उसका अपना वजूद जेफ्री एपस्टीन जैसे मलऊन की सोहबत में ज़लील होता पाया गया.
यह कैसी मंतिकी (Logical) कशमक्श है कि कायनात को बेमक़सद बताने वाला यह मुल्हिद (Atheist) खुद एक ऐसे जज़ीरे का मुसाफ़िर निकला जहाँ मासूमियत की हुरमत (Dignity) पामाल की जाती थी। उनकी नामनिहाद 'Ethics' दरअस्ल उस शैतानी नज़रिया का मुक़दमा है जहाँ रूह की पाकीज़गी का कोई तसव्वुर ही नहीं, बल्कि महज़ नफ़्सानी ख़्वाहिशात (Desires) की पैरवी ही दीन-ओ-ईमान है।
इल्म का तकब्बुर और वहशियत: स्टीफन हॉकिंग का 'ब्लैक होल'
स्टीफन हॉकिंग, जिन्हें कायनात के वजुद का आलिम कहा जाता है, उनकी शख्सियत का एक स्याह पहलू उस वक्त सामने आया जब उन्हें एपस्टीन के जजीरे पर देखा गया।
जिस दिमाग ने 'कायनात के वजुद' पर थ्योरी दी, वह 2006 में उसी 'सेक्स आइलैंड' पर एक खास सबमरीन की सवारी कर रहा था जिसे दरिंदगी का आशियाना माना जाता है।
हालांकि उनके चाहने वाले और तक़लीद करने वाले का जवाब है कि वह सिर्फ एक 'साइंस कॉन्फ्रेंस' के लिए वहां गए थे, लेकिन सवाल यह है कि एक 'आलिम' को वहशियत के उस अड्डे पर जाने की जरूरत ही क्या थी?
यह उनके उन नजरियात पर एक जबरदस्त तंज है जो इंसान को केवल एक 'बायोलॉजिकल मशीन' मानते हैं और रूहानी पाकीजगी का मजाक उड़ाते हैं।
स्टीफन हॉकिंग का नाम जब 'सेक्स आइलैंड' की मुसाफ़िर फ़ेहरिस्त (Flight Logs) में नुमाया हुआ, तो इल्म-ओ-दानिश के तमाम दावे धरे के धरे रह गए. जिस ज़ेहन ने वक़्त और कायनात के पेच-ओ-ख़म सुलझाने के दावे किए, वह खुद वक़्त के एक ऐसे स्याह धब्बे (Black Hole) में डूबा मिला जहाँ इंसानी कदरों का जनाज़ा निकाला जाता था.
यह उन 'देसी उदारवादियों' के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा है जो हॉकिंग के नज़रियात को इंसानी तरक्की का मेयार (Standard) समझते थे। वहशियत के उस मर्कज़ (Center) पर हॉकिंग की मौजूदगी महज़ एक इत्तिफ़ाक़ नहीं, बल्कि उस ज़ेहनी इर्तिदाद (Intellectual Apostasy) की निशानी है जो रूहानी अक़्दार (Values) से महरूम होकर इंसान को महज़ एक 'हयवान-ए-नातिक' (Speaking Animal) बना देती है।
निस्वां हुकूक का मसीहा या ढोंग का ताज: बिल गेट्स की बेनकाब सच्चाई.
बिल गेट्स, जो दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों, स्वास्थ्य और 'फेमिनिज्म' के सबसे बड़े स्पॉन्सर (Sponsor) बनकर उभरते हैं, उनकी हकीकत सबसे ज्यादा शर्मनाक है। एक तरफ वह NGO चलाकर दुनिया को तहजीब सिखाते हैं, और दूसरी तरफ उसके तार उस एपस्टीन से जुड़े मिलते हैं जिसने न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी तबाह कर दी।
बिल गेट्स, जो मगरीब की उस मुनफ़िक़ाना (Hypocritical) तहजीब के सबसे बड़े दायी (Sponsor) हैं, उनका किरदार 'आस्तिन के सांपो' की मिसाल है.
एक जानिब वह 'NGO' और इमदाद (Funding) के ज़रिए पूरी दुनिया में 'वुमन्स राइट्स' का ढोंग रचाते हैं, तो दूसरी जानिब पर्दे के पीछे उसी एपस्टीन के साथ उसके ताल्लुक़ात का तसलसुल (Continuity) रहा है जो लड़कियों की तस्करी का सरगना था.
गेट्स की फ़ंडिंग पर पलने वाली 'सरकश' तंज़ीमें (Organizations) जो ज़रा सी बात पर सड़कों पर हंगामा बरपा करती हैं, आज अपने आका की इस दरिंदगी पर खामोश क्यों हैं?
यह महज़ चंदा देने वाला हाथ नहीं, बल्कि यह उस ज़हरीले निज़ाम का सरपरस्त है जो दुनिया को अख़लाक़ का सबक देता है और खुद अंधेरों में मासूमों के लहू से अपनी प्यास बुझाता है।
कहाँ चले गए वो NGO, वो लिबरल, वो एथीस्ट और फ़ेमिनिस्ट गिरोह जो हर रोज़ इंसानियत और औरत के हक़ पर लंबा-चौड़ा ख़ुत्बा पढ़ते हैं? जब उनके ख़ुदा-ए-फ़ंड का चेहरा बेनक़ाब होता है, तो उनके दोहरे उसूल और दोगली दलीलें सामने आ जाती हैं।
ये वही देसी मुनाफ़िक़ीन हैं जो बाहर से फंड लेकर मुल्क में NGO चलाते हैं, औरत मार्च में नारे लगाते हैं, इंसानियत पर किताबें लिखते हैं। मगर जब उनके 'गॉड फ़ादर' की हैवानियत बच्चों के साथ सामने आती है, तो वही नज़रिया उसके बचाव में खड़ा हो जाता है।
शर्म से डूब मरना चाहिए उन चंदाख़ोरों को, जो दूसरों के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जलाते हैं, मगर अपने आका के गुनाहों पर चुप्पी साध लेते हैं।
2026 की ताजी रिपोर्ट्स बताती हैं कि गेट्स ने एपस्टीन के साथ अपनी मुलाकातों को 'गलती' बताया है, लेकिन दस्तावेजों में दर्ज उनके 'इलीगल ट्राइस्ट्स' और आपसी रिश्तों की गर्माहट कुछ और ही दास्तां बयां करती है.
यह उन फेमिनिस्टों के लिए डूब मरने का मुकाम है जो बिल गेट्स के एक इशारे पर सड़कों पर 'सर्कस' शुरू कर देते हैं, जबकि उनका अपना रोल मॉडल एक दरिंदे का हमप्याला निकला।
बाबा ए आज़म के अंधे हिमाय्ति और 'बाल ' के पुजारि.
रिचर्ड डॉकिन्स- इलहाद, फाइल्स में 29 बार नाम का ज़िक्र.
स्टीफन हॉकिंग- भौतिकी और शैतानि नज़रियात. 2006 में 'सेक्स आइलैंड' का दौरा और औरगी (Orgy) के इल्जाम.
बिल गेट्स- अय्यशि नज़रियात और फेमिनिस्ट के गोड फादर. एपस्टीन के साथ लंबे वक़्त तक निजी और वित्तीय संबंध.
सेक्स आइलैंड या लिबरल्स का आशियाना?
यह 'सेक्स आइलैंड' महज एक जगह नहीं, बल्कि उस 'मुहज्जब दुनिया' के खोखलेपन का मरकज़ है जिसे लिबरल अपना आशियाना कहते हैं।
यहाँ इंसानी हुकूक का चार्टर मासूमों के चीखों के नीचे दफन हो गया और 'हुकूक-ए-निस्वां' (Women's Rights) का राग अलापने वाले खुद दरिंदगी के तमाशबीन बने रहे।
जो लोग इन शख्सियतों को अपना 'रोल मॉडल' मानते हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि उनका नजरिया कितना खतरनाक है जो चमक-धमक वाली शख्सियतों के पीछे छिपी हैवानियत को नहीं देख पाता।
मगरीब की दोहरी राय और मुनफ़िक़त का ज़वाल.
मगरीब का यह 'मुहज्जब' (Civilized) मुआशेरा दरअस्ल एक मुनफ़िक़ाना आशियाना है, जहाँ हुकूक-ए-इंसानी का चार्टर महज़ कमज़ोर (Weak) मुल्कों को डराने के लिए इस्तेमाल होता है। 'सेक्स आइलैंड' महज़ एक ज्योग्राफियाई मुकाम नहीं, बल्कि लिबरल निज़ाम की वो हकीकत है जिसे 'सेक्युलरिज्म' और 'आज़ादी' के ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों से ढका गया है।
जब इस्लाम पाकीज़गी और हया का दर्स देता है, तो ये उसे दकियानूसी करार देते हैं, लेकिन जब इनके अपने 'बाबा-ए-आज़म' मासूमों के साथ दरिंदगी करते हैं, तो उसे जाति मामला कहकर टाल दिया जाता है।
यह मगरीब की वो दोहरी राय (Double Standards) है जिसका पर्दा अब फ़ाश हो चुका है और इनके इल्म, फ़लसफ़े और अख़लाक़ का खोखलापन दुनिया के सामने ज़ाहिर है।
आज इस्लाम की पाकीजा तालीमात पर भौंकने वाले उन 'शैतानों' का पर्दाफाश हो चुका है जो एक हाथ में 'Ethics' की किताब और दूसरे में 'सेक्स आइलैंड' का टिकट रखते हैं।
इस्लाम का सबसे बड़ा ख़ौफ़ इन देसी देहरियों और लिबरल गिरोह को यही है कि यहाँ हर शख़्स से हिसाब लिया जाएगा। ये लोग उस मज़हब से नफ़रत करते हैं जो उनके हवस पर लगाम कसता है और उनके शैतानी नज़रिए को नंगा कर देता है।
चंदाख़ोरों की चुप्पी: हवस के आका के गुनाह पर खामोशी, और दूसरों पर मोमबत्ती मार्च।
लिबरल और एथीस्ट गिरोह की पूरी फ़लसफ़ा हवस की आज़ादी पर टिकी है। जब इस्लाम कहता है कि इंसान अपने अमल का ज़िम्मेदार है, तो इनकी दज्जाली सोच को झटका लगता है। यही वजह है कि ये मज़हब से ज़लन महसूस करते हैं और हर उस उसूल का मज़ाक उड़ाते हैं जो इंसानियत को बचाता है।
ये वही लोग हैं जो औरत के हक़ पर मोमबत्तियाँ जलाते हैं, मगर हवस के बाज़ार में अपने आका के साथ खड़े रहते हैं। जवाबदेही से भागना इनकी आदत है, और इस्लाम की सख़्ती इनकी मुनाफ़िक़त को बेनक़ाब कर देती है।
देसी देहरिया और लिबरल गिरोह को शर्म से डूब मरना चाहिए। हवस की आज़ादी के नाम पर इंसानियत का सौदा करने वाले ये लोग इस्लाम से इसलिए नफ़रत करते हैं क्योंकि यहाँ उनके लिए कोई 'नो अकाउंटेबिलिटी क्लब' नहीं है।
क्या देसी लिबरल, मुनाफ़िक़ीन, इलहाद-परस्त और सोशलिस्ट अपने आका और बच्चों का क़ातिल 'गेट्स' के ख़िलाफ़ कभी मार्च करेंगे?
जो 'बच्चों का गोश्त' नोचने वाला है, उसके ख़िलाफ़ कोई मुहिम चलाएंगे या फिर चंदे की थाली में ही अपनी ज़मीर बेचते रहेंगे?
जब दूसरों पर मोमबत्तियाँ जलाते हैं तो अपने आका की दरिंदगी पर क्यों अंधे और गूँगे बन जाते हैं?
क्या अब उसूल याद रहेंगे या फिर चंदे की चमक में हमेशा की तरह भुला दिए जाएंगे?
ये इंसानियत और औरत के हक़ पर किताबें लिखता है, मगर अपने गॉडफ़ादर की हैवानियत पर चुप्पी साध लेता है।
ऐ अल्लाह!
हम सबको परहेज़गारी और तक़वा की राह पर क़ायम रख।
हमारी बेटियों और बहनों को पर्दे की हिफ़ाज़त और इज़्ज़त की चादर में महफ़ूज़ रख।
उनके दिलों को ईमान की रोशनी से भर दे और उनके कदमों को इस्लाम की सीरत पर मज़बूत कर।
ऐ रब्बुल आलमीन!
हमें उन लिबरल और मुनाफ़िक़ाना नज़रियाति फ़िक्रों के शर से बचा,
जो हवस और दज्जाली सोच के नाम पर हमारी तहज़ीब और हमारी शराफ़त को मिटाना चाहते हैं। हमें उनके धोखे और चालों से महफ़ूज़ रख, और हमारी ज़बान, हमारे दिल और हमारे अमल को तेरे हुक्म और तेरे उसूलों का पाबंद बना।
हम सबको तेरे हुक्म की इताअत करने वाला बना, और हमें हर उस गिरोह से दूर रख जो तेरे दीन से नफ़रत करता है। आमीन या रब्बुल आलमीन।







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