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Naye Samaj ka Buniyad 01 (Seerat-un-nabi 259)

Naye Muashare Ki buniyad Madina Shahar me.
Ansar Aur Muhajiron ke Bich ki purani dushmani kaise dosti me badal gayi?
أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم.
بســــــــــــــــــــــــــــــــــــم الله الرحمن الرحيم.
Thursday, June. 18, 2020._  
पार्ट-259  सीरत ए नबी ﷺ
Seerat Un Nabi
पहला मरहला
                   *★नए समाज का गठन★*
_हम बयान कर चुके हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीने में बनू नज्जार के यहां जुमा के दिन 12 रबीउल अव्वल सन् 01 हि० मुताबिक़ 27 सितंबर सन् 622 ई० को हज़रत अबू अय्यूब अंसारी के मकान के सामने उतरे थे और उसी वक़्त फ़रमाया था कि इनशाअल्लाह (अगर अल्लाह ने चाहा) तो यहीं मंज़िल होगी ! फिर आप हज़रत अबू अय्यूब अंसारी के घर मुंतक़िल हो गए थे !_
*_मस्जिदे नबवी का निर्माण_*
_इसके बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पहला क़दम यह था कि आपने मस्जिद नबवी की तामीर शुरू की और इसके लिए वही जगह चुनी, जहां आपकी ऊंटनी बैठी थी ! उस ज़मीन के मालिक दो यतीम बच्चे थे ! आपने उनसे यह ज़मीन कीमत देकर खरीदी और मस्जिद बनाने में ख़ुद भी शरीक हो गए ! आप ईंट और पत्थर ढोते थे और साथ ही फ़रमाते जाते थे_
*_"अल्लाहुम-म ला ऐ-श इल्ला ऐशल आख़िर: फगफिर लिल अंसारि वल मुहाजिर:_*
(ऐ अल्लाह ! ज़िंदगी तो बस आखिरत की जिंदगी है, पस अंसार और मुहाजिरों को बख्श दे )
यह भी फ़रमाते-
*_हाज़ल हिमालु ला हिमा-ल खैब-र,हाजा अबर्रु रब्बिना व अतहरु_*
(यह बोझ खैबर का बोझ नहीं है ! यह हमारे पालनहार की क़सम ज़्यादा नेक और पाकीज़ा है !)
आपके इस तरीके से सहाबा किराम रजि० के जोश व खरोश और सरगर्मी में बड़ी बढ़ोत्तरी हो जाती थी, चुनांचे सहाबा किराम कहते थे-
*_लइन क़-अदना वन्नबीयु यामलु,ल-ज़ा-क मिन्नल अमलुल मुज़ल्ललु_*
(अगर हम बैठे रहे और नबी सल्ल० काम करे, तो हमारा यह काम गुमराही का होगा !)
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ان شـــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــاء الـــلـــه.
جـــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــزاکـم الــلــه خـــیـرا.
बिस्मिल्लाहिर्रहमा निर्रहीम
️ नबी करीम सलल्लाहुअलैहिव सल्लम ने फ़रमायाः "जिस शख़्स के साथ कोई भलाई की गई और उसने भलाई करने वाले से *जज़ाक अल्लाह खैरा* (अल्लाह तुमको बेहतर बदला दे ) कहा, उसने उसकी पूरी पूरी तारीफ़ कर दी।"
 *वजाहत:* यानी किसी पर एहसान किया गया हो, उसने अपने मोहसिन के लिए *"जज़ाक अल्लाह खैरा"* कहा तो उस एहसान का उसने पूरा पूरा शुक्रिया अदा कर दिया।
 *जामिउत्तिर्मिजी जील्द-4, किताब अल बीर व अस् सिलाह 27, हदीस नं. 2035, ग्रेडः हसन*
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