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Maa Ki Tarbiyat: Naslon Ki Buniyad Aur Ummat Ka Mustaqbil.

Ek Maa ke Hath me Ek Nasli ka Mustaqbil aur Qaum ki Jimmedari Hoti hai.

माँ की गोद में नस्ल, उसके दामन में क़ौम की तक़दीर।
माँ की तर्बियत से उम्मत का मुस्तक़बिल सँवरता है।
एक माँ की ममता, हज़ारों नस्लों का रास्ता।
माँ: एक नस्ल की उस्ताद, एक क़ौम की रहनुमा।
जिस माँ ने तर्बियत की, उसने तारीख़ लिखी।
माँ का दामन तले तालीम का पहला मदरसा होता है।
जिस माँ ने अपने बच्चों को अदब सिखाया, उसने पूरी क़ौम को तहज़ीब दी।
माँ की गोद में सिर्फ़ बच्चा नहीं, एक पूरी नस्ल परवान चढ़ती है।
माँ का एक लफ़्ज़, बच्चों की ज़िन्दगी का रास्ता तय करता है।
माँ की दुआ, नस्लों की तक़दीर बदल सकती है।
माँ के प्यार से बनती है क़ौम की पहचान।
नस्ल की परवरिश से क़ौम की तक़दीर लिखती है माँ।
A Mother Nurtures a Generation, Shapes a Nation.
From Cradle to Country: A Mother's Legacy.
The Hand That Raises a Child Builds a Civilization.
Mothers: The Architects of Generations and Nations.
One Mother's Care, A Nation's Destiny.
Mother afaction, Mother love, Society and mother, Mother importance,
माँ का दामन तले तालीम का पहला मदरसा होता है।
माँ की गोद में नस्ल, उसके दामन में क़ौम की तक़दीर.
माँ एक ऐसा रिश्ता है जो सिर्फ़ लफ़्ज़ों में नहीं, जज़्बातों में बसता है। उसकी मुहब्बत, उसकी दुआएँ और उसकी तरबियत किसी भी बच्चे की शख्सियत की बुनियाद रखती हैं। माँ की गोद वो पहला मदरसा है जहाँ बच्चा बोलना, चलना ही नहीं, बल्कि जीना भी सीखता है। और यही तरबियत जब सलीके से दी जाती है, तो एक नस्ल नहीं, पूरी क़ौम संवर जाती है।
माँ का किरदार सिर्फ़ घर की चारदीवारी तक महदूद नहीं होता। वो अपने बच्चों की तालीम, तर्बियत और तहज़ीब में ऐसा रंग भरती है जो उम्र भर नहीं उतरता। एक बच्चा जब माँ की बातों से अदब सीखता है, जब उसकी आँखों में माँ की उम्मीदें चमकती हैं, तो वो सिर्फ़ एक अच्छा इंसान नहीं बनता—बल्कि वो समाज का एक ज़िम्मेदार फ़र्द बनता है।

माँ की दुआओं में वो असर होता है जो तालीमगाहों की किताबों में नहीं मिलता। उसकी निगाहें बच्चों की ग़लतियों को सिर्फ़ देखती नहीं, उनकि इसलाह भी करति हैं। माँ की लोरि, एक मुस्कान, एक नसीहत—ये सब मिलकर बच्चे की सोच को ऐसा रुख देती हैं जो उसे ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में भी सीधा चलना सिखाती है।

आज अगर हम किसी क़ौम की तरक़्क़ी देख रहे हैं, तो यक़ीनन उसके पीछे माँओं की मेहनत और उनकी बेपनाह कुर्बानियाँ हैं। माँ अपने अरमानों को बच्चों की कामयाबी में ढाल देती है। वो अपनी नींदें, अपने आराम, यहाँ तक कि अपनी ज़िन्दगी भी बच्चों की तरबियत के लिए कुर्बान कर देती है।

इसलिए कहा जाता है: "माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है।" अगर माँ की तरबियत में अख़लाक़, तहज़ीब और इल्म का रंग हो, तो वो बच्चे नहीं, आने वाली नस्लों को तैयार करती है,  जब नस्लें संवरती हैं, तो क़ौमें बनती हैं, तामीर होती हैं, और दुनिया में अपनी पहचान छोड़ जाती हैं।

माँ का किरदार वक़्त से आगे चलता है। उसकी सोच, उसकी परवरिश और उसकी ममता आने वाली सदियों की बुनियाद रखती है। इसलिए माँ को सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, एक तामीर करने वाला फ़र्ज़ समझना चाहिए।
माँ की दुआ, उसकी मेहनत और उसकी कुर्बानी एक ऐसी दौलत है जो वक़्त के साथ और बढ़ती है। 

“माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है”—यह जुमला सिर्फ शायरी नहीं, बल्कि तर्ज़-ए-हयात का हकीक़ी नक़्शा है जिसमें गोद तालीमगाह, लोरी इल्म की पहली आवाज़ और दामन अमानत का पहला आसमान बन जाता है.

“माँ की गोद में एक नस्ल और दामन में क़ौम का मुस्तक़बिल होता है”—इसका मतलब है कि तरबियत का पहला लम्हा जो घर में जन्म लेता है, वही आगे चलकर समाज और तारीख़ के रुख़ को मोड़ देता है.

 बुनियादी मसअला: तरबियत किसे कहते हैं
- तरबियत सिर्फ़ हिदायत नहीं, आदत, रवैया और निगाह की तामीर है—यानी बच्चा माँ की बात नहीं, उसके सुलुक, किरदार की नक़ल करता है, और यही नक़ल उसकी शख्सियत की इमारत की पहली ईंट बनती है.  

- तरबियत का उसूल यह है कि “जो दिखेगा, उसि पे अमल करेगा”—अख़लाक़, सलीक़ा, हया, सच्चाई और रहम अगर रोज़मर्रा के अमल में हों तो बच्चा उन्हें साँस की तरह अपनी फितरत में ले लेता है .  

 माँ की गोद: पहली तालीमगाह
 माँ की गोद वह जगह है जहाँ ज़बान, लहजा और लफ़्ज़ की मिठास बच्चे के दिल पर पहली नक़्शबंदी करती है, और यहीं से उसे ख़ुद-ए-आगाही, इज़्ज़त-ए-नफ़्स और दूसरों की हुरमत का एहसास होने लगता है 
 गोद में सुनी हुई दुआ, देखी हुई सफ़ाई और महसूस की हुई शफ़्क़त, किताबों से पहले क़ल्ब पर उतरती है, और यही अहसास बाद में क़ौमी अख़लाक़ में तब्दील हो जाते हैं.

 दामन-ए-माँ: अमानत और अम्न
- माँ का दामन बच्चे के लिए अमान की पनाहगाह है—यहां खौफ पिघलता, ऐतेबार बनता और जस्बाती ज़ख्म भरते हैं; ऐसे माहौल में पले बच्चे कल को समाज में अम्न और एतबार का पुल बनते हैं.  
- जब दामन तमीज़, तवाज़ुन और तहम्मुल से भरा हो, तो बच्चा मुद्दतों बाद भी तकरार में तहजीब और इख़्तलाफ़ में इख़लास को तरजीह देता है—यही तर्ज़ शकाफत का असल हुस्न है.

 बुनियादी उसूल: इल्म, अदब, हया, इन्साफ़
इल्म रोशनी है, मगर अदब उसकी रवानी, हया उसकी हिफ़ाज़त और इन्साफ़ उसका क़याम है; माँ जब चारों को घर के साँचे में ढालती है तो बच्चे का “फ़ैसला” ज़्यादातर नेकी के हिमायत में होता है.  
इन उसूलों की घरेलू तालीम बच्चों में “ज़िम्मेदारी” की क़ुबूलियत पैदा करती है—वो फ़र्ज़ से भागते नहीं, बल्कि फ़र्ज़ को अवसर समझ कर अदा करते हैं.

असरात-ए-तरबियत: नफ़्स से नस्ल तक
- जिस घर की हवा में हक़ीक़त, शुक़्र और सादगी हो, वहाँ परवरिश पाने वाले बच्चे झूठ से घबराते हैं,यही आदतें आगे चलकर क़ौम की मआशत में अमानतदारी बनती हैं.
- माँ की आँख का एतबार बच्चे को दूसरों पर भरोसा करना सिखाता है; यह ऐतेबार फिर इदारों, इक्तेदार और मुआशरे में हक़ और सच्चाइ की चाहत में ढलता है .

 माँ का किरदार: लफ्ज़ से बढ़कर मिसाल
- बच्चे की पहली किताब माँ का किरदार है—वह अपने वक़्त की पाबंदी, बात की सच्चाई और रिश्ता निभाने की जुदाई से बच्चा सीखता है कि “कैसा इंसान होना है”. 
- जब माँ गलती पर अफ़्व करती और सज़ा में तदरीज अपनाती है, तो बच्चे का ज़ेहन “क़ानून” नहीं, “इन्साफ़” का दीवाना बनता है—यही तमीज़ कल की अदालती और समाजी रवायतों में बराबरि और इमानदारि का रंग भरती है. 
 
 ज़हन-साज़ी: ज़ुबान, लहजा, कहानी
- घर की ज़ुबान बच्चों की सोच का नक़्शा बनाती है; नर्म लहजा, साफ़ लफ़्ज़ और इज़्ज़तदार खिताब बच्चों को खुद्दारी देते हैं और बदज़बानी से नफरत पैदा करते हैं.  
- सोते-सोते सुनाई दास्तानों में सच का सरमाया और शुजाअत का ज़ायका डालना बच्चों के तसव्वुर को मेहनतकश, रहमदिल और सच्चा बनाता है.

अदब-ए-इख़्तलाफ़: तहज़ीब की रीढ़
- माँ अगर अपने इख़्तलाफ़ात को शऊर और शराफ़त से संभाले तो बच्चा बहस में हक़ीक़त-तलबी सिखता है, हमलावर लहजा नहीं; यही अदब-ए-इख़्तलाफ़ आगे चलकर हक़ीकि तालीम और क़ौमी मुक़ाबले का सलीक़ा बनता है.
- ग़ुस्से पर क़ाबू, तौहीन पर ख़ामोशी और हक़ पर इसरार—ये तीन उसूल वालिदा की मदरसा-ए-ख़ुस्न हैं जिनसे उम्मत कि बुनियाद” मे ताक़त मिलति है.  

 मआशियात पर असर: क़नाअत, क़ाबिलियत, किफ़ायत
- माँ जब क़नाअत सिखाती है—यानी “कम में ख़ुश रहना”—तो औलाद “हक़” और “हराम” की लकीर पहचानती है; यह पहचान रीश्वत के ख़िलाफ़ अन्दर की अदालत खड़ी कर देती है.  
- किफ़ायत और तदबीर से घर चलाने का हुनर आगे चलकर कारोबार में खुद मुखतारि, मुनज़्ज़मियत और टिकाऊ ख़र्च-सोज़ी की बुनियाद रखता है.

मुज्तमई असर: पड़ोस से शहर तक
- जिस घर का बच्चा “हक़-ए-जावर” सीखता है, वह बड़ा होकर ट्रैफ़िक से लेकर तहज़ीब तक क़ानून को अपने फ़ायदे का मज़ार नहीं, समाज की अमानत समझता है.  
- माँ की दी हुई “ख़िदमत” की रूह, बच्चा स्कूल, मोहल्ला और दफ़्तर में लेने के बजाय देने की आदत बनाकर जाता है—ऐसे लोग मुआशरे की रूह में इअतबार और अमानत की रवानी लाते हैं.

 सियासत पर असर: शऊर-ए-शहरी और शिरकत
  माँ अगर सवाल करना सिखाती है—बेअदबी के बग़ैर—तो बच्चे में “शहरी शऊर” पैदा होता है; वह रियासत के खजाने को तिजारत नहीं, अमानत समझता है और मज़मून से ऊपर उसूल पर खड़ा होना सीखता है.  
शमूलियत, मशविरा और सब्र—ये तीनों अगर घर में क़दर पाते हैं, तो समाज में मुख्तलिफ राय का एहतिराम पैदा होती है.

तारिख़ में माँ का किरदार
- ताक़तवर तहज़ीबें सिर्फ़ फ़तह से नहीं, घर की तालीम से बनीं; जहाँ घर में अख़लाक़ था, वहाँ बाज़ार में अमानत रही और अदालत में इन्साफ़, और यही जुरअत आगे चलकर इल्म, सन्अत और अदब को आसमान तक उठाती रही.  
- गिरावट वहीं आयी जहाँ घर का मज़मून खाली हुआ—जब तरबियत बाज़ार के शोर को दे दी गई—इससे नस्लें शोहरत की तालिब और सिफ़त की ग़रीब हो गयीं.

 हक़ीक़त और अफसाना.
- माँ जब बच्चे को “कामयाबी” की नहीं, “क़ाबिलियत” की कहानी सुनाती है, तो बच्चा मंज़िल के बजाय सफ़र को सच की रौशनी में तय करना सीखता है.  
- शोर-शराबा और मुक़ाबले की आग बच्चे का हौसला जलाती है; तस्कीन, तरगीब और तादील उस आग को चिराग़ बना देती हैं.

 औलाद की शख्सियत-साज़ी: पाँच उस्तुवान
- सच बोलना—चाहे नुक़सान हो—ताकि ज़मीर की अदालत हमेशा बरी रखे .  
- वक़्त की क़द्र—क्योंकि तहज़ीब तवक्को से नहीं, तंजीम से बनती है.  
- अदब-ए-ख़िलाफ़—ताकि इख़्तलाफ़ भी तालीम दे, तौहीन नहीं.  
- मेहनत पर यक़ीन—ताकि क़िस्मत पर इंतज़ार नहीं, कोशिश पर इम्तिहान हो.  
- शुक़्र और सादगी—ताकि ख़ुशी चीज़ों से नहीं, नज़र से पैदा हो.  

 माँ की ख़ुद-साज़ी: जो नहीं, वह कैसे दे
- माँ की ख़ुद-तालीम—क़िराअत, गौर-ओ-फ़िक्र और दुआ—उसी रोशनी को दामन में जमा करती है जो फिर गोद में उतरती है.  
- थकावट के दरमियान छोटा सा वक़्फ़ा, तिलावत या ख़ामोशी की सर्ज़मीं, जज़्बाती बैलेंस को वापस लाती है—यही बैलेंस तरबियत में असर करता है.

 बाप का शेरीकाना-किरदार: इकतरफ़ा नहीं, हमसफ़र
- तरबियत का बोझ एक कंधे पर नहीं; जब बाप भी लफ़्ज़ में नर्मी, वक़्त में शिरकत और कामों में मदद देता है, तो बच्चा “इन्साफ़” को इंसानियत का अस्ल उसूल समझता है.  
- माँ-बाप की मुत्तफ़िक़ रवायत बच्चे में कन्फ्यूज़न नहीं, वाज़िह नक़्शा बनाती है; यह वुज़ूहत ज़िंदगी के फैसलों में हिम्मत और सलीक़ा देती है.

 घर के उसूल: पाँच अमली नक़्शे
- सुबह-शाम छोटा सा दुआ-ओ-अदब—दो मिनट का—ताकि घर की हवा में रूहानीत की खुशबु रहे.  
- हफ़्ते में एक “खिदमत का दिन”—जहाँ बच्चे किसी और के काम आएं—ताकि लेने से ज़्यादा देने का हौसला हो.  
- “शिकायत के बजाय हल”—हर मसअले पर “क्या करेंगे?” का सवाल—ताकि निगाह मसाइल-आफ़रीं नहीं, हल-आफ़रीं बने.  
- “स्क्रीन से पहले किताब”—कम-अज़-कम रोज़ दस मिनट—ताकि तवज्जोह बिखरे नहीं, बने.  
- “तौहीन ममनूअ”—लफ़्ज़ों की सफ़ाई पर नज़र—ताकि अदब आदत बने.

 मा’शराई इंफ्रास्ट्रक्चर: माँ की मदद के पाँच सहारे
- मोहल्ला लाइब्रेरी/रीडिंग सर्कल—ताकि किताब घर तक सीमित न रहे.  
- पैरेंटिंग वर्कशॉप—छोटी-छोटी ट्रेनिंग जिससे तरबियत में एकसा लहजा बने.  
- खिदमत ए खल्क़”—बच्चों को अमली सदका सिखाये  
- वरजिस—जिस्मानी हरकत और ज़ेहनी तख़लीक़ साथ-साथ.

 क़ौम की तक़दीर: घर से तारीख़ तक
- जो क़ौमें घर को तालीम का मरकज़ बनाती हैं, उनका बयानिया रियासत में अद्ल, बाज़ार में अमानत और अक़्लियती इख़्तिलाफ़ में तहज़ीब की शक्ल में नज़र आता है.  
- माँ की तरबियत से निकली “ज़िम्मेदार शख्सियत” ही अदालतों को इंसाफ़-परस्त और इदारों को शफ़्फ़ाफ़ रखने के लिए समाजी दबाव पैदा करती है.
माँ जब अपनी ज़ात को इल्म और अदब में तराशकर तरबियत को रहमत बना देती है, तो गोद से उठती हुई छोटी-सी आवाज़ आगे चलकर क़ौम के बड़े-बड़े फैसलों की रूह बन जाती है—यही वजह है कि “माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है” कोई मुबालग़ा नहीं, बल्कि तारीख़ का मुकम्मल बयान है.

या रब, हमारी माँओं की गोद को इल्म, अदब, हया और इन्साफ़ का बाग़ बना दे; उनकी थकन को रहमत और उनकी आँख को यक़ीन-ए-कामिल अता फरमा. 
रब्बना, हमारी नस्लों को सच, शुजाअत और शुक़्र की दौलत दे; घरों को अमन, मुहब्बत और क़नाअत का साया दे ताकि हमारी क़ौम की सुबह साफ़ हो. आमीन.

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Aurat Ki Aazadi Western Libas Me Nahi Sharai Libaas Me Hai.

Tight & Revealing Clothes Are Not Islamic Attire – A Faithful Reminder.

True Freedom for Women Lies in Modesty, Not in Tight Fashion.
Women’s liberation is not measured by how tight or revealing their clothes are, but by the dignity, respect, and honor that modest dress brings. Tight and transparent outfits may be seen as modern trends, but they do not align with the principles of Shari’ah. True empowerment comes when women embrace modesty, which protects their honor and elevates their status in society.
औरत की आज़ादी का हकीकी मफ़हूम: तंग लिबास या शरीअत की पाबंदी?
मेरी बहनों और बेटियों के नाम एक पुर-खुलूस पैगाम: हया की हिफाज़त ही असली इज्जत है।
पर्दा औरत की शान, हया ईमान, Islamic perspective, True empowerment
लिबास के इंतेखाब से पहले यह चंद बातें जरूर सोचिये.
Women’s freedom is celebrated through modesty, dignity, and respect – not through exposure. Islam teaches that real empowerment is found in covering, not in revealing.
खवातीन कि आज़ादि कि अलामत तंग और बारिक लिबास नहि शरइ लिबास है.

याद रखें कि हर वह काम और हर वह चीज़ जो आपको बे-हयाई और ज़िना की तरफ ले जाए, उससे बचो। फहश तस्वीरें और फहश ड्रामे और फहश फिल्में, फहश गाने, फहश किस्म के अफसाने और फहश डाइजेस्ट पढ़ना, गैर-महरम को देखना, तंग या बारीक (पतले) या छोटे कपड़े पहनना, बे-पर्दगी (यानी गैर-महरम से पर्दा न करना) और ना-महरम के लिए ज़ेब व ज़ीनत इख्तियार करना, ना-महरम से तन्हाई में मिलना, या ना-महरम के साथ तन्हा सफर करना, ना-महरम से बातें करना, या ना-महरम को छूना, यह सब बे-हयाई और ज़िना के रास्ते हैं। और इन सब कामों से इस्लाम हमको मना करता है, जैसा कि कुरआन में है कि:

बे-हयाई के जितने भी तरीके हैं उनके पास भी मत जाओ, ख्वाह वह अलानिया हों, ख्वाह पोशीदा। (अल-अनाम, 151).
एक और जगह पर अल्लाह का इरशाद है कि:
खबरदार ज़िना के करीब भी न फटकना क्योंकि वह बड़ी बे-हयाई और बहुत ही बुरी राह है। (बनी इसराइल, 32).

मुआशरे में इज्जत और तहफ्फुज़.
बराए मेहरबानी सब बहनों और बेटियों से दरख्वास्त है कि अपना लिबास इस्लाम की दी हुई तालीम के मुताबिक पहनें और शारई पर्दे को अपनाएं ताकि आपको मुआशरे में इज्जत मिले और आपकी इज्जत भी महफूज रहे.

अगर आप बारीक और तंग लिबास पहनेंगी तो मुआशरे में आपको इज्जत भी नहीं मिलेगी और मुआशरे में बे-हयाई भी पैदा होगी और आप मुआशरे में सताई भी जाओगी और आपको कोई इज्जत की नज़र से नहीं देखेगा बल्कि सब आपको बुरी नज़र से ही देखेंगे। और आप अल्लाह पाक की सज़ा की मुस्तहिक भी होंगी।

लिबास की खरीदारी और नामा-ए-अमाल.
 लिबास की खरीदारी से पहले जरा सोचिए कि लिबास जैसा भी हो, बोसीदा हो जाएगा। लिबास की तारीफ करने वाले या तनकीद करने वाले भी फना हो जाएंगे, लेकिन लिबास के नतीजे में मिलने वाला अजर-ओ-सवाब या गुनाह-ओ-वबाल आपके नामा-ए-अमाल में बाकी रहेगा।

इसीलिए मर्दों को भी चाहिए कि वह अपनी बीवी, बच्चों और घर में बहनों और बेटियों को लिबास के बारे में समझाएं और उनकी इस्लाह करें ताकि उनका लिबास भी इस्लामी तालीम के मुताबिक हो, क्योंकि कल को कयामत के दिन आपसे भी सवाल होगा कि घर वालों को समझाया क्यों नहीं। जैसा कि हदीस में आता है कि:
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: आगाह हो जाओ तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में सवाल किया जाएगा। पस इमाम (अमीरुल-मोमिनीन) लोगों पर निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा। मर्द अपने घर वालों का निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा और औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की निगेहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा और किसी शख्स का गुलाम अपने सरदार के माल का निगेहबान है और उससे उसके बारे में सवाल होगा। आगाह हो जाओ कि तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में पुरसिश (पूछ- ताछ) होगी। (सहीह_बुखारी-7138)
अल्लाह के अजाब से बचाव की फिक्र.

और औरतों को भी चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों,वालिदैन,और भाइयों और शौहर की फरमाबरदारी करें और अपना लिबास इस्लाम की तालीम के मुताबिक बनाएं। और अपने आप को अल्लाह पाक के अजाब से बचा लें। मर्दो को भि हुक्म है के वह अपनी नज़रे निचि रखे और ना मेहरम से बचे, अगर गलति से नज़र पर जाये तो माफ है लेकिन वह अपनि निगाहो कि हिफाज़त करे. जज़ाक-अल्लाहु खैरा।

अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है:
ऐ ईमान वालो! तुम अपने आप को और अपने घर वालों को उस (जहन्नम की) आग से बचाओ जिसका ईंधन इंसान हैं और पत्थर हैं। जिस पर सख्त दिल मजबूत फरिश्ते मुकर्रर हैं, जिन्हें जो हुक्म अल्लाह तआला देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाए बजा लाते हैं। (सूरह अत-तहरीम 66, आयत नंबर 6)

अल्लाह पाक हम सब को इस्लामी तालीमात पर अमल करने और दूसरों की इस्लाह करने वाला बनाए और हर तरह के गुनाह से बचाए। आमीन।
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Red Revolution: Jab USSR Ne Quran Par Pabandi Laga Di.

Red Revolution: Reality of Freedom or Mental Slavery?

USSR’s Red Revolution & Qur’an Ban – How Leftism Hollowed Out Humanity.
When the promise of freedom turned into chains of ideology, even the Qur’an was silenced.
The so‑called Red Revolution promised liberation, but in reality, it enslaved minds under rigid ideology. During the USSR era, mosques were shut down, and the Qur’an was banned, cutting people off from divine guidance. Leftism thought replaced spirituality with empty slogans, leaving humanity hollow.
Mental Slavery, red revolution, freedom, USSR fall, uSSR fall reason,
लाल इंकलाब' की हकीकत: आजादी या दिमागी गुलामी? जानिए कैसे लेफ्टिज्म ने इंसानियत को खोखला किया!
क्या सोशलिज्म वाकई बराबरी का निजाम है या यह सिर्फ गरीबी बांटने का एक ढोंग है? कैसे 'आजादी' का नारा लगाने वाले लोग मजहबी और माशी (आर्थिक) तौर पर कौमों को तबाह करते हैं। यह हर उस फितने का हक़ और आज़दि के नाम पर वकालत करते है जो इसानि फितरत,क़ुदरत के खिलाफ है.

   जब क़ुरआन पर पाबंदी लगी सोवियत रूस (USSR) मे.
1973 का वह दौर था जब सोवियत रूस में कम्युनिज्म का 'तूति' बोलता था। दुनिया के सियासतदां और दानिशवर यह पेशीनगोई कर रहे थे कि अब बहुत जल्द पूरा एशिया 'सुर्ख' (लाल) हो जाएगा। इसी दौर में एक पाकिस्तानी नौजवान मास्को पहुंचा। वह बताता है कि जुमे के दिन जब उसने नमाज की ख्वाहिश जाहिर की, तो मालूम हुआ कि वहां की मस्जिदों को या तो गोदाम बना दिया गया है या सियाह के ठहरने की जगह।

बड़ी जद्दोजहद के बाद एक बंद मस्जिद का ताला खुलवाया गया। अजान की आवाज गूंजी तो लोग सहम गए कि यह कौन है जिसने मौत को दावत दी है? 
                                                  तन्हा नमाज पढ़कर जब वह बाहर निकला, तो एक बच्चा उसे अपने घर ले गया। वहां जो मंजर उसने देखा, वह रूह कंपा देने वाला भी था और ईमान रौशन करने वाला भी।

जब उस नौजवान ने अपनी जेब से कुरआन का एक छोटा नुस्खा निकालकर बच्चे को पढ़ने के लिए दिया, तो बच्चा हक्का-बक्का रह गया। उसे 'नाज़रा' (देखकर पढ़ना) नहीं आता था। लेकिन जैसे ही उस शख्स ने एक आयत की इब्तिदा की, बच्चे ने जबानी पूरा पारा सुनाना शुरू कर दिया। 

इल्हाद और लिबरलिज्म का फरेब.
यही वह मुकाम है जहां 'सुर्ख' नजरियात और खुद-साख्ता लिबरल दानिशवरों के खोखलेपन का हक़ीक़त आशकार होता है। यह वही तबका है जो 'आजादी-ए-राय' और 'हुकूक' का ढिंढोरा पीटते नहीं थकता, लेकिन जहां इनका इक्तदार (सत्ता) आता है, वहां सबसे पहले मजहबी किताबों और अकीदों को निशाना बनाया जाता है। इनका लिबरलिज्म सिर्फ वहीं तक है जहां तक मजहब की तौहीन की बात हो, लेकिन जब अपनी विचारधारा थोपने की बारी आती है, तो ये फासीवाद की तमाम हदें पार कर जाते हैं।

सोवियत रूस में कुरआन रखने पर खानदान के खानदान को फांसी दे दी जाती थी। जो लोग आज मजहबी आजादी के नाम पर शोर मचाते हैं, उन्हें तारीख के इन पन्नों को पलटना चाहिए कि कैसे लिबरल नकाब ओढ़कर ये लोग इंसानी रूह को कुचलने की कोशिश करते हैं। इनका 'लाल इंकलाब' दरअसल इंसानी फितरत और रूहानियत के खिलाफ एक जंग थी।

सीनों में महफूज खुदा का कलाम.

उस बच्चे के वालिदैन ने बताया कि वहां के दरजी,सब्जी फरोश और मोची, दुकानदार असल में 'हाफिज़-ए-कुरआन' थे। वे बच्चों को मजदूरी के बहाने बुलाते और चुपके से सीना-ब-सीना कुरआन हिफ्ज़ कराते। रूस (इलहाद) की रियासत ने कागज पर तो पाबंदी लगा दी, लेकिन वे उन सीनों पर पाबंदी न लगा सके जिनमें खुदा का नूर बसा था। वहा किताबे नहि होने पर वे लफ्ज़ नहि पह्चान सकते, लकिन आयते उन्हे याद करा दि गयि थी इस्लिये वे देख कर तिलावत तो नहि कर सकते थे क्युंके वे हरुफ ए तहजि से ला इल्म थे मगर उंके दिलो मे क़ुरान कि आयते महफुज थी.

यह वाकिया इस आयत की जिंदा मिसाल है:
"बेशक यह ज़िक्र (कुरआन) हमने ही नाजिल फरमाया और बेशक हम ही इसके निगहबान हैं।"

आज के दौर में भी जो लोग मजहब को 'अफीम' कहते हैं या इसे तरक्की की राह में रुकावट समझते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि दुनियावी निजाम और नजरियात बदलते रहते हैं, मिटते रहते हैं, लेकिन खुदा का कानून अटल है। जो लोग आजादी के नाम पर मजहबी किताबों को जलाते या उन पर पाबंदी लगाते हैं, वे दरअसल अपनी जहालत और बुजदिली का सबूत पेश करते हैं। अल्लाह ने क़ुरान कि हिफाज़त् कि जिम्मेदारि खुद लि है फिर यह दुनिया वाले कौन सि ताक़त रखते है तो उसे पबंदि लगा कर खत्म कर दे, मिटा दे. बेशक अल्लाह हि यह दुनिया बनाने वाला है और असल मालिक ए कायेनात है.

तर्जीह-ए-बातिल: लेफ्टिज्म और सोशलिज्म का ज़ाम.
आज के दौर में 'लेफ्टिज्म' और 'सोशलिज्म' जैसे नजरियात को बड़ी चमक-दमक के साथ पेश किया जाता है। खुद को 'प्रोग्रेसिव' और 'रोशन ख्याल' कहने वाला यह तबका असल में दिमागी कज-रवी (टेढ़ापन) का शिकार है, इनका बुनियादी फलसफा यह है कि मजहब एक 'अफीम' है, जबकि हकीकत यह है कि इनका अपना नजरिया एक ऐसा नशा है जो इंसान से उसकी फितरी पहचान छीन लेता है।

माशी (आर्थिक) तबाही का मंजर.

सोशलिज्म का सबसे बड़ा मुगालता 'मसावात' (बराबरी) है। यह नारा सुनने में तो बड़ा दिलकश लगता है, लेकिन अमली तौर पर यह 'गरीबी की बराबरी' है।
 यह निजाम इंसान के इनफरादि सलाहियतो (Individual Skills) का कत्ल कर देता है। जब एक मेहनतकश और एक कामचोर को एक ही तराजू में तोला जाएगा,तो मुआशरे से जद्दोजहद का जज्बा खत्म हो जाता है। 
यही वजह है कि जहां-जहां 'सुर्ख परचम' लहराया, वहां की मइशत (Economy) दम तोड़ गई। इन्होंने सरमायादारी (Capitalism) की बुराइयों को खत्म करने के नाम पर रियासती जुल्म का ऐसा निजाम कायम किया जहां इंसान सिर्फ एक मशीन का पुर्जा बनकर रह गया।

मुआशरती बिगाड़ और लिबरल पाखंड.

इन 'जदीद' नजरियात ने खानदानी निजाम (Family System) को जो चोट पहुंचाई है, वह किसी से ढकी-छुपी नहीं। आजादी के नाम पर बद-अख्लाकि, बुराइ, बदकारि (Unrestrained behavior) को फिरोघ देना इनका असल एजेंडा है। ये उस वक्त तक 'लिबरल' रहते हैं जब तक आप इनके सुर में सुर मिलाएं, लेकिन जैसे ही आप खुदा, रसूल या अपनी रिवायत (Tradition) की बात करेंगे, इनका सारा बर्दाश्त का मादा खत्म हो जाता है। 

    जो लोग आज मजहबी किताबों पर पाबंदी की वकालत करते हैं, वही लोग अपनी 'लाल किताब' (लाल सलाम) को मुकद्दस मनवाने के लिए इंसानी खून बहाने से भी गुरेज नहीं करते। स्टालिन,लेनिन जैसे इनके रहबरो ने क्या किया? 
गुलाग मे क्या हुआ यह सब छुपाना इनकि असलियत को दिखाता है.
कम्युनिज़्म और लेफ़्टिज़्म ने मज़दूरों के नाम पर करोड़ों इंसानों की जान ली। सोवियत रूस के गुलाग कैम्प्स में लाखों लोग भूख, ठंड और ज़ुल्म से मारे गए। यह सब "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" के नाम पर हुआ, मगर हक़ीक़त में इंसानियत को गुलाम बना दिया गया

सोवियत यूनियन का जबरी मज़दूरी कैम्प सिस्टम (1929–1953) । इसमें दुश्मन-ए-रियासत कहे जाने वाले लोग, मज़दूर, आलिम, और आम जनता को कैद किया जाता था. सिर्फ़ स्टालिन के ज़माने में ही लाखों को भूख और कत्ल-ए-आम का शिकार बनाया गया. तक़रीबन 1.6 से 15 मिलियन मौतें हुईं। करीब 18 मिलियन लोग गुलाग से गुज़रे. 
कहाँ हुआ: रूस और सोवियत यूनियन के दूर-दराज़ इलाक़ों में, ख़ासकर साइबेरिया और आर्कटिक की सर्दियों में।
क्यों हुआ: "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" का नारा देकर, असल में इंसानियत को दिमाग़ी गुलामी में धकेलने के लिए।
किस सोच ने किया: लेफ़्टिज़्म और कम्युनिस्ट फ़िक्र, जिस ने इंसनियत का नारा दिया, धर्म/मजहब को अफिम बताया और पाखंड कहकर विज्ञान के नाम पर अपना नज़रिया थोपा. जिस ने कहा के दुनिया मे सभि धर्मो का चेहरा अवाम के खून से रंगा है वगैरह.

लेफ़्ट ने मज़दूर को आज़ादी नहीं दी, बल्कि गुलाग की ज़ंजीरों में जकड़ दिया। नारा था इंसाफ़ का, हक़ीक़त थी कत्ल-ए-आम की.

यह नजरिया इंसान को रूहानियत से काटकर सिर्फ 'पेट' तक महदूद कर देता है। लेकिन इन्हें याद रखना चाहिए कि रूस की रियासत तो टूट सकती है, दीवार-ए-बर्लिन तो गिर सकती है, मगर वो कलमा जो सीनों में उतर जाए, उसे दुनिया की कोई ताकत मिटा नहीं सकती।

दुआ-ए-खैर
ऐ अल्लाह! हमें इन फितना परवर और गुमराह कुन नजरियात के शर से महफूज फरमा। हमारे ईमान की हिफाजत फरमा और हमारी नस्लों को इन 'सुर्ख' और 'लिबरल' फितनों के बहकावे से बचा। हमें सिरात-ए-मुस्तकीम पर साबित कदम रख. ऐ अल्लाह! हमें हक़ को हक़ दिखा और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे।  
हमें बातिल को बातिल दिखा और उससे मह्फुज रख।  
ऐ अल्लाह! हमें हर तरह के फ़ितनों से महफ़ूज़ रख, ख़ास तौर पर लिब्रलिज़्म और नई गुमराह करने वाली सोच से।
आमीन या रब्बुल आलमीन।

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Iran Protests and Europe’s Conspiracy: Geopolitics & Social Media War.

 Western Leaders’ Statements: USA, Europe, and Israel

 Europe’s Conspiracy Against Iran – Global Geopolitical Equations.
Starlink and the Information War in Iran.
ईरान में विरोध: क्या यह जन आक्रोश है या विदेशी साजिश.
स्टारलिंक और सोशल मीडिया: ईरान में सूचना युद्ध का नया अध्याय.
ईरान में जारी मौजूदा अशांति और इसके पीछे छिपे वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित विश्लेषण.
विरोध का वैश्विक असर, ईरान की अशांति, अंतरराष्ट्रीय नेताओं , यूरोप की साज़िश
ईरान की सड़कों से यूरोप की रणनीति तक – विरोध का वैश्विक असर.
ईरान में जारी मौजूदा अशांति और इसमें विदेशी शक्तियों की संलिप्तता को समझने के लिए जनवरी 2026 के शुरुआती दिनों की घटनाओं और बयानों का सिलसिला बेहद अहम है। यह टाइमलाइन स्पष्ट करती है कि कैसे अमेरिका और इसराइल के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम को एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ाया है।

आज के दौर में किसी देश को अस्थिर करने के लिए केवल सेना की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि एनजीओ (NGO),  ज़र खरिद बुद्धिजीवी और मीडिया विंग्स का एक पूरा तंत्र इस्तेमाल किया जाता है । जब कोई हुकूमत अमेरिका या पश्चिमी देशों की शर्तों पर नहीं चलती, तो ये संगठन अचानक सक्रिय होकर सड़कों पर उतर आते हैं । ईरान में मौजूदा तनाव इसी रणनीति का हिस्सा नज़र आता है, जहाँ जून 2025 में इसराइल के साथ हुए युद्ध और अमेरिका द्वारा परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी के बाद स्थिति को और भड़काया जा रहा है ।

 ईरान में अशांति: जन-आक्रोश या सुनियोजित वैश्विक साजिश?
ईरान की सड़कों पर जारी विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन इस हलचल के पीछे सिर्फ स्थानीय मुद्दे नहीं, बल्कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय बिसात बिछी हुई नज़र आती है।
 तेहरान में एक अकेले प्रदर्शनकारी के वीडियो का तुरंत पुलिस द्वारा काउंटर-वीडियो जारी करना और यह दावा करना कि यह 'प्लांटेड' था, इस बात की ओर इशारा करता है कि सूचना युद्ध (Information War) अब चरम पर है। 
 जहाँ एक ओर प्रदर्शनकारी सड़क पर हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, इसराइल और यूरोपीय देशों का इस आग में घी डालने का तरीका इसे एक खतरनाक मोड़ दे रहा है ।

 पश्चिमी फंडिंग और एनजीओ का सक्रिय नेटवर्क.
दुनियाभर में जब भी कोई सरकार अमेरिकी या पश्चिमी हितों के खिलाफ खड़ी होती है, तो वहां अक्सर यूरोपीय देशों और अमेरिका की फंडिंग पर पल रहे एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और मीडिया विंग्स सक्रिय हो जाते हैं। 
ये समूह 'लोकतंत्र' और 'आजादी' के नाम पर जनता को लामबंद करते हैं, जबकि इनका असली मकसद सत्ता परिवर्तन (Regime Change) होता है. ईरान में भी यही पैटर्न देखा जा रहा है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिए एक ही समय पर पूरी दुनिया में ईरान विरोधी नैरेटिव फैलाया जा रहा है, ताकि वहां की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किया जा सके।

 इसराइल का डर और परमाणु शक्ति का संघर्ष.
इसराइल के लिए एक मज़बूत और परमाणु संपन्न ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जून 2025 में हुए युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी इसी रणनीति का हिस्सा थी कि ईरान को कभी भी निर्णायक रूप से शक्तिशाली न होने दिया जाए। 
   इसराइल की खुफिया एजेंसियां और मीडिया लगातार यह संदेश फैला रहे हैं कि ईरान की सैन्य ताकत को भीतर से ही तोड़ना ज़रूरी है. यही कारण है कि माइक पोम्पियो जैसे नेता खुलेआम प्रदर्शनकारियों के बीच 'मोसाद' की मौजूदगी की बात स्वीकार कर रहे हैं, जो ईरान की संप्रभुता पर सीधा हमला है।

 ट्रंप की चेतावनी और मनोवैज्ञानिक युद्ध.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2 और 4 जनवरी 2026 को दी गई चेतावनियां महज कूटनीति नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा हैं.
 यह कहना कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है, सीधे तौर पर ईरानी सुरक्षा बलों को डराने और प्रदर्शनकारियों के भीतर हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का प्रयास है। यह वही तरीका है जो अमेरिका ने पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ अपनाया था, जहाँ एक समानांतर सरकार को मान्यता देकर देश को गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया गया।

 नैरेटिव वॉर: मीडिया और सोशल मीडिया का हथियार.
 ईरानी अधिकारियों ने देशव्यापी इंटरनेट पाबंदी नहीं लगाई है, जिससे एक दिलचस्प स्थिति पैदा हो गई है। अमेरिका और इसराइल के सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स, विशेष रूप से फ़ारसी भाषा में, प्रदर्शनों के समर्थन में दिन-रात सामग्री साझा कर रहे हैं। यह डिजिटल दखलंदाजी कुछ प्रदर्शनकारियों का हौसला तो बढ़ाती है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर देती है कि इस आंदोलन की डोर कहीं न कहीं विदेशी हाथों में है।
 ईरानी सेना का अलर्ट पर होना और बाहरी हस्तक्षेप के प्रति सख्त रुख अपनाना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई अब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की है.

जनवरी 2026: ईरान विरोधी बयानों और हस्तक्षेप की टाइमलाइन.

1 जनवरी 2026: इसराइली मीडिया और रक्षा विश्लेषकों ने रिपोर्ट करना शुरू किया कि ईरान के भीतर "बदलाव का समय" आ गया है। इसी दिन इसराइली अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर फ़ारसी भाषा में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए सीधे संदेश भेजने शुरू किए, जो मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी.

2 जनवरी 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पहली बड़ी चेतावनी जारी की। 
उन्होंने सोशल मीडिया और आधिकारिक ब्रीफिंग में कहा कि यदि ईरानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया, तो अमेरिका "मदद के लिए दखल" देने को पूरी तरह तैयार है। उन्होंने ईरान को आगाह किया कि पूरी दुनिया देख रही है।

2 जनवरी 2026 (शाम): अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक बेहद विवादित बयान दिया। उन्होंने सड़कों पर उतरे ईरानियों को नए साल की बधाई देते हुए ट्वीट किया कि "उनके साथ हर मोसाद एजेंट भी चल रहा है"। यह बयान सीधे तौर पर ईरान के भीतर इसराइली खुफिया एजेंसी की सक्रिय मौजूदगी की पुष्टि करने जैसा था.

4 जनवरी 2026: राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी चेतावनी को और कड़ा करते हुए दोहराया कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है। इसी दिन यूरोपीय संघ (EU) के कुछ प्रमुख नेताओं ने भी बयान जारी कर ईरान पर प्रतिबंधों की धमकी दी, जिससे एक साथ वैश्विक दबाव बनाने की कोशिश की गई।

7-8 जनवरी 2026: इसराइली (Occupied Palestine) प्रधानमंत्री कार्यालय और मीडिया विंग्स ने ईरान के भीतर हो रही झड़पों के वीडियो को वैश्विक स्तर पर वायरल करना शुरू किया.
 अमेरिकी विदेश विभाग के फ़ारसी अकाउंट्स ने प्रदर्शनकारियों को संगठित होने के तरीके और "विदेशी समर्थन" का भरोसा दिलाना जारी रखा।

9 जनवरी 2026: ईरान के सर्वोच्च नेता और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर आरोप लगाया कि यह अशांति अमेरिका और इसराइल द्वारा प्रायोजित है और देश की सेना किसी भी बाहरी उकसावे का जवाब देने के लिए हाई अलर्ट पर है। एलन मस्क ने ईरान के ऊपर स्टारलिंक सक्रिय करने का संकेत दिया, यह कदम न केवल तकनीकी बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप भी है.

ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म विदेशि नर्रेटिव की आवाज़ को वैश्विक स्तर पर पहुंचा रहे हैं। इससे ईरान की आंतरिक समस्या एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गई है। स्टारलिंक और सोशल मीडिया ने इस संघर्ष को सूचना युद्ध का नया आयाम दिया है, जिससे यह लड़ाई सड़कों से निकलकर डिजिटल स्पेस तक फैल गई है।
इसराइल और अमेरिका का साझा उद्देश्य.
यह टाइमलाइन दर्शाती है कि जून 2025 में ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी बमबारी के बाद से ही इसराइल और अमेरिका का एक ही लक्ष्य रहा है—ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को भीतर से अस्थिर करके खत्म करना।
 माइक पोम्पियो का मोसाद वाला बयान और ट्रंप की लगातार धमकियां यह साबित करती हैं कि ये प्रदर्शन महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसराइल द्वारा समर्थित एक गहरी भू-राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। 
पश्चिमी मीडिया और यूरोपीय नेताओं का एक सुर में बोलना इस 'नैरेटिव वॉर' को और मजबूती देता है, जिसका अंतिम उद्देश्य क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना है।

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Dastak Dena Mard Ki Fitrat Aur Darwaza Nahi Kholna Aurat Ka Husn.

Modesty: Empowering Muslim Women with Haya & Rida‑e‑Iffat.

A voice of dignity, a call of modesty — Binte Hawwa rising with Haya & Rida‑e‑Iffat.
Celebrating the Strength and Grace of Binte Hawwa: Modesty, Faith & Empowerment.
दस्तक देना मर्द की फितरत है और दरवाज़ा न खोलना औरत का हुस्न...
दस्तक, हया और रिदा-ए-इफ़्फ़त: बिन्ते हव्वा के नाम एक पैग़ाम.
 क्यों हर दस्तक पर दिल का दरवाज़ा खोलना नादानी है?
#BinteHawwa #Haya #Niswaniyat #UrduAdab #IslamicValues #Dastak
दस्तक, दिल और दर-ए-हया: औरत के वक़ार की एक दास्तान.
एक औरत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी हया है। हया सिर्फ लिबास का नाम नहीं, बल्कि सोच की पाकीज़गी और लहजे की नफ़ासत का नाम है। जब एक बेटी अपने वक़ार की हिफाज़त के लिए अजनबियों से फासला रखती है, तो वो महज़ एक इंसान नहीं रहती, बल्कि 'मुकद्दस रिदा' में लिपटी एक हकीकत बन जाती है।
फितरत का दस्तूर है कि तलाश मर्द की जानिब से होती है और 'इस्तग़ना' (बेपरवाही) औरत का ज़ेवर है। दस्तक देना मर्द की जबिल्लत (Nature) हो सकती है, वो हर दर पर सदा देता है, मगर उस हर दस्तक पर दिल के दरवाज़े न खोलना ही औरत की असल नज़ाकत है। औरत का हुस्न उसकी दस्तयाबी (Availability) में नहीं, बल्कि उसकी 'ना-याबी' (Rareness) में है।

मर्द की फितरत और औरत का तग़ाफ़ुल: एक जमालियाती तवाज़ुन.
कहा जाता है कि दस्तक देना मर्द की फ़ितरत है, वह हर दर-ए-ना-आशना (अनजान दरवाज़े) पर सदा देता है, मगर उस दस्तक पर बे-ताब होकर दर-ए-दिल वा (खोलना) न करना ही औरत का असल हुस्न है। शराफ़त का तक़ाज़ा है कि अपने दिल, दिमाग़ और जज़्बात की देहलीज़ को हर राह चलती सदा के लिए वक़्फ़ न किया जाए। यह दरवाज़ा सिर्फ़ उस 'शारिक-ए-सफ़र' के लिए खुलना चाहिए जो तक़द्दुस-ए-निकाह के साथ आपकी ज़िंदगी के आंगन में क़दम रखे।

हया से सुर्ख़ हो जाना भी क्या कमाल का हुस्न है,
बिना ज़ेवर के भी औरत बे-मिसाल लगती है।

अजनबियत के साए और ज़हनी सुकून का हिसार.
किसी अजनबी को अपने क़ीमती लम्हात और ज़ाती ज़िंदगी में दख़ल-अंदाज़ी का मौक़ा देना गोया खुद को ज़हनी कर्ब  की नज़्र करना है। याद रखिए, जो हाथ आज सताइश के फूल बरसा रहे हैं, वही कल आपके किरदार पर उंगलि उठाने में देर नहीं करेंगे। अपनी गुफ़्तगू और मेल-जोल में एक मोतबर फासला बरक़रार रखिए; यही वह हिजाब है जो आपकी रूह को भी महफ़ूज़ रखता है और सुकून-ए-क़ल्ब का ज़ामिन भी है।

निसवानियत का एहतराम और हलाल की मंज़िल.
जो मर्द आपको अपनी 'इज़्ज़त' तसव्वुर करता है, वो आपको सड़कों पर रुस्वा नहीं करेगा, बल्कि निकाह के पाकीज़ा रिश्ते के ज़रिए आपको अपने घर की मल्लिका बनाएगा। याद रखिए, जो दस्तक हराम रास्ते से आए, वो सिर्फ तबाही का पैगाम लाती है। औरत की नज़ाकत का तकाज़ा है कि वो अपनी कीमती मोहब्बत को सिर्फ उस 'शहसवार' के लिए बचाकर रखे जो खुदा को गवाह बनाकर उसका हाथ थामे।

मोहब्बत की मेराज: हवस से निकाह तक का सफ़र.

किसी की शख्सियत से मुतास्सिर होना फ़ितरी अमर है, मगर इस जज़्बे को गुनाह के शोला में झोंकना अपनी तौहीन है। अगर दिल की गहराइयों में कोई सितारा रौशन हो, तो उसे निकाह के पाकीज़ा रिश्ते की चांदनी से मुनव्वर करें। अगर मुआशरति दीवारें हायल हों और मंज़िल का हुसूल नामुमकिन नज़र आए, तो मसलहत इसी में है कि इस अफसाने को वहीं तमाम कर दिया जाए।

वो मोहब्बत जो निकाह के रास्ते से न आए,
वो महज़ नफ़्स की लज़्ज़त और रूह की तबाही है।

हवस और मुहब्बत का बारीक फ़र्क़.
मर्द जिस औरत को सच्चे दिल से अपनी इज़्ज़त मानता है, वह उसे ज़माने की आलूदा (गंदी) नज़रों से महफुज कर, अपनी इज़्ज़त बनाकर रखता है। जो मर्द आपकी नुमाइश चाहे, जो आपके ज़ीनत को नामेहरमों के सामने पेश करने पर खुश हो, याकिन जानिये कि उसके दिल में आपके लिए इज़्ज़त नहीं बल्कि महज़ मतलब और लज़्ज़त-ए-नज़र की प्यास है।

 रिदा-ए-हया ही औरत का असली ताज है,
इसी के दम से क़ायनात में उसका राज है।

नामेहरम की रफ़ाक़त: एक खुशनुमा फ़रेब.
मेरी प्यारी बहनों! यह एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि नामेहरम मर्द न कभी सच्चा दोस्त हो सकता है, न हमदर्द और न ही मुहाफ़िज़। वह मर्द जो आज आपकी ज़ुल्फ़ों के असीर होने का दावा करता है, कल वही आपको 'बद-किरदार' का लक़ब देकर किसी नए शिकार की जुस्तजू में निकल जाएगा। औरत का हकिकि मुहाफ़िज़ उसका शौहर है, जो उसे मुआशरे में एक मोतबर मुक़ाम और अपनी आग़ोश में तहफ़्फ़ुज़ फराहम करता है। 
अपनी नज़ाकत को हया के पर्दे में महफूज़ रखिए, क्योंकि जो कोइ हर किसी के लिए दस्तयाब हो,उसकी अहमियत सामने वाले कि नज़र में कम हो जाती है। अपनी कदर व अहमियत जाने,आप अल्लाह की दी हुई सबसे मुकद्दस अमानत हैं।

आज के दौर में जहाँ नुमाइश को हुस्न कहा जाता है, वहाँ एक बा-हया औरत अपनी सादगी और हया से फरिश्तों को भी रश्क करने पर मजबूर कर देती है। आपका वक़ार इसी में है कि आप हर किसी के लिए दस्तयाब न हों। आपकी खामोशी में एक ऐसी हैबत होनी चाहिए कि कोई भी नामेहरम आपकी तरफ देखने से पहले अपनी नज़रें झुकाने पर मजबूर हो जाए।
हया की सुर्ख़ी ज़ेवर से कहीं ज़्यादा चमकती है,
जो पाकीज़ा हो सूरत, वो दिलों में घर बनाती है।

 इरशाद-ए-रब्बानी और हया की खुशबू.
ख़ालिक़-ए-दो-जहां ने हमें नामुहरम से बात करते हुए लहजे में नज़ाकत और नरमी रखने से मना फ़रमाया है, मुबादा कोई बीमार दिल फ़ितने में पड़ जाए। पाकीज़गी की यह रविश ही वह मेआर है जो हमें आम से ख़ास बनाती है। हराम रिश्तों में आरज़ी लज़्ज़त तो मिल सकती है, मगर वह सुकून और अल्लाह की खुशनुदी कभी हासिल नहीं हो सकती जो हलाल रिश्तों का ख़ासा है।

हया को ढाल बना कर जो घर से निकलती हैं,
  फरिश्ते राहों में उनकी दुआएं पढ़ते हैं।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त तमाम बेटियों की अस्मत की हिफ़ाज़त फ़रमाए, उन्हें अपने मुक़ाम को पहचानने की तौफीक दे और सिरात-ए-मुस्तक़ीम पर गामज़न रखे। आमीन या रब्बल आलमीन।

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Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 40. Last

Bahrain Me ir'tadaad aur Uska Sad-E-Baab.

Khilafat-E-Siddique: Hazrat Abu Bakr Razi Allahu Anahu. Part-40 last.
Bahrain Apostasy Crisis: How Caliph Abu Bakr (RA) Preserved Islamic Unity.
The Apostasy in Bahrain and Its Suppression under the Caliphate of Abu Bakr (RA).
The apostasy in Bahrain tested the unity of Islam after Prophet Muhammad ﷺ. Caliph Abu Bakr (RA) acted firmly, crushed the rebellion, and restored stability — proving his leadership preserved faith and order in the early Muslim community.
This Islamic post has been published with the full consent of the original author, who has expressly permitted its sharing to spread beneficial knowledge.
Islamic history, Muslim Rulers, Islamic governance, Seerat-E-Sahaba, Khilafat-E-Siddique,

When Bahrain Turned Away from Islam — Abu Bakr’s Leadership Restored Faith and Order.

    تاریخ اسلام۔ عہدِ خلافتِ صدیقیؓ، قسط: (40) Last.
بحرین میں ارتداد اور اس کا سد باب:

جس مہینے رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے وفات پائی اسی مہینے منذر بن ساوی کا بھی انتقال ہوا اور عرب کے دوسرے علاقوں کی طرح بحرین والے بھی سب کے سب مرتد ہو گئے، رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے ایلچی حضرت علاء حضرمی رضی اللہ عنہ کو بحرین سے نکلنا پڑا، لیکن جارود بن معلی عبدی بدستور اسلام پر قائم رہے، انہوں نے اپنی قوم بنو عبدالقیس سے ارتداد کا سبب پوچھا۔ انہوں نے کہا:

" اگر محمد نبی ؐ ہوتے تو کبھی وفات نہ  پاتے۔"

جارود نے پوچھا:
تم جانتے ہو محمد صلی اللہ علیہ وسلم سے پہلے بھی اللہ اپنے انبیاء کو مبعوث فرماتا رہا، وہ سب کے سب کہاں گئے؟
انہوں نے جواب دیا: فوت ہو گئے۔
جارود نے کہا:

"جس طرح دیگر انبیاء فوت ہو گئے اسی طرح محمد رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم بھی فوت ہو گئے، اگر دوسرے انبیاء کے فوت ہونے سے ان کی نبوت میں کوئی فرق نہیں پڑا، تو رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے فوت ہونے سے آپ کی نبوت کس طرح زائل ہو سکتی ہے؟ میں گواہی دیتا ہوں کہ اللہ کے سوا اور کوئی معبود نہیں اور محمد صلی اللہ علیہ وسلم اس کے بندے اور رسول صلی اللہ علیہ وسلم ہیں۔"

جارود کی باتوں کا ان کی قوم پر بہت اثر ہوا اور وہ لوگ دوبارہ کلمہ پڑھ کر مسلمان ہو گئے۔

بنو عبدالقیس گو اسلام لے آئے، لیکن بحرین کے دوسرے قبائل حطم بن ضبیعہ کے زیر سرکردگی بدستور حالت ارتداد پر قائم رہے اور انہوں نے بادشاہی کو دوبارہ آل منذر میں منتقل کر کے منذر بن نعمان کو اپنا بادشاہ بنا لیا، سب سے پہلے انہوں نے جارود اور قبیلہ بنی عبدالقیس کو اسلام سے برگشتہ کرنے کی کوشش کی، لیکن اس کوشش میں یکسر ناکامی ہوئی، اس پر حطم بن ضبیعہ نے طاقت کے زور سے انہیں زیر کرنا چاہا، اس نے قطیف اور ہجر میں مقیم غیر ملکی تاجروں اور ان لوگوں کو جنہوں نے اس سے قبل اسلام قبول نہ کیا تھا، اپنے ساتھ ملا لیا اور قصبہ جراثی کے قریب جارود اور ان کے ساتھیوں کا محاصرہ کر لیا، یہ محاصرہ نہایت سخت تھا، بھوک اور پیاس کی وجہ سے بنو عبدالقیس جاں بہ لب ہو چکے تھے، لیکن انہوں نے انتہائی ثابت قدمی دکھائی اور دوبارہ ارتداد اختیار کرنا قبول نہ کیا۔

بحرین سے ارتداد کی خبریں موصول ہونے پر حضرت ابوبکرؓ صدیق رضی اللہ عنہ نے حضرت علاء بن حضرمی کو مرتدین کے مقابلے کے لیے روانہ فرمایا، دریں اثناء حضرت خالدؓ بن ولید، مسیلمہ اور ان کے پیروؤں کو عقرباء میں عبرتناک شکست دے چکے تھے، اس لیے جب حضرت علاء رضی اللہ عنہ یمامہ سے گزرے تو بنی حنفیہ کی ایک کثیر جمعیت ثمامہ بن آثال اور قیس بن عاصم منقری کے زیر سرکردگی ان کے ساتھ ہو لی، اہل یمن اور بعض دیگر قبائل کے لوگ بھی کثیر تعداد میں ان کے لشکر میں شامل تھے جنہیں یقین تھا کہ مسلمان آخر سارے عرب پر قابض ہو جائیں گے، کیونکہ ہر زمانے میں یہی ہوتا رہا ہے کہ لوگ قوت و طاقت ہی کے آگے سر جھکاتے ہیں۔

   مرتدین بحرین کی شکست:
حضرت علاء بن حضرمی لشکر لے کر بحرین پہنچے اور حطم کے قریب خیمہ زن ہوئے، وہاں سے انہوں نے جارود کو جو بنی عبدالقیس کے ساتھ قلعہ بند تھے، پیغام بھیجا کہ اسلامی لشکر آ پہنچا اس لیے گھبراہٹ کی کوئی وجہ نہیں، خود انہوں نے لڑائی کی تیاریاں شروع کر دیں، محاذ جنگ اور دشمنوں کا جائزہ لینے سے انہیں معلوم ہوا کہ مرتدین اس قدر بھاری تعداد میں ان کے مقابلے کے لیے موجود ہیں کہ بے سوچے سمجھے ان پر حملہ کرنا مناسب نہ ہو گا، انہوں نے اپنے لشکر کے ارد گرد خندق کھدوائی اور اس کے پیچھے لشکر لے کر پڑاؤ ڈال دیا، کبھی کبھی وہ خندق عبور کر کے مرتدین پر حملہ کرتے اور تھوڑی دیر کی لڑائی کے بعد پھر خندق کے پیچھے ہٹ آتے، اسی طرح ایک مہینہ گزر گیا، کسی فریق کو معلوم نہ تھا کہ لڑائی کا انجام کیا ہو گا، آخر ایک رات مسلمانوں کو مرتدین پر بھرپور حملہ کرنے کا موقع مل ہی گیا جس سے فائدہ اٹھا کر انہوں نے دشمن کو تہس نہس کر ڈالا۔

واقعہ اس طرح ہوا کہ ایک ر ات لشکر گاہ مشرکین کی طرف سے سخت شور و غل کی آوازیں آنے لگیں، علاء بن حضرمی نے اپنے جاسوسوں کو خبر لانے کے لیے دشمنوں کے کیمپ میں روانہ کیا، انہوں نے آ کر خبر دی کہ مشرکین کا لشکر شراب میں دھت ہے اور واہی تباہی بک رہا ہے، علاء نے موقع غنیمت جان کر فوج کو ہمراہ لیا اور خندق عبور کر کے دشمن کے لشکر میں داخل ہوتے ہی اسے گاجر مولی کی طرح کاٹ کر رکھ دیا، دشمن نے کوئی چارہ کار نہ دیکھ کر بے تحاشا بھاگنا شروع کر دیا، سینکڑوں لوگ بھاگنے کی کوشش کرتے ہوئے خندق میں گر پڑے، ہزاروں لوگوں کو قیدی بنا لیا گیا، اسی ہنگامے کے دوران میں قیس بن عاصم نے حطم کو زمین پر گرا ہوا پایا، اس نے جھٹ تلوار نکال کر آن کی آن میں اس کا کام تمام کر دیا، عنیف بن منذر الغرور کو مسلمانوں نے زندہ گرفتار کر لیا، جب وہ علاء کے سامنے پیش کیا گیا تو علاء نے کہا: 
" تمہیں تھے جنہوں نے ان لوگوں کو  دھوکا دیا تھا؟"

غرور نے کوئی چارہ کار نہ دیکھ کر اسلام قبول کر لیا اور کہا: میں دھوکا دینے والا نہیں، البتہ اپنی طاقت پر ناز ضرور تھا۔
یہ سن کر علاء نے اسے معاف کر دیا۔

جو لوگ قتل اور قید ہونے سے بچ گئے تھے انہوں نے کشتیوں میں سوار ہو کر جزیرہ دارین میں پناہ لی، علاء نے فی الحال ان سے تعرض نہ کیا، بلکہ اپنی توجہ بحرین کے دوسرے علاقوں میں امن و امان قائم رکھنے پر مبذول کی، جب سارے علاقے میں امن قائم ہو گیا، قبائل نے اسلامی حکومت کی اطاعت قبول کر لی اور علاء کے لشکر میں بھی معتدبہ اضافہ ہوگیا تو دارین کی طرف متوجہ ہوئے، ایک روایت میں مذکور ہے کہ علاء نے اس موقع پر جنگ نہیں کی اور یہ جزیرہ بہ دستور اسلامی سلطنت سے الگ تھلگ رہا اور حضرت عمرؓ بن خطاب کے زمانے میں اس کی فتح عمل میں آئی، اب اگر انہیں خطرہ تھا تو بعض ان بدوی قبائل کی طرف سے جن کا پیشہ ہی لوٹ مار اور غارت گری تھا، یا ایرانیوں کی فریب کاریوں کا جن کے اثر و نفوذ کو مسلمانوں کی پیش قدمی کے نتیجے میں سخت دھچکا لگا تھا، پھر بھی وہ اس طرف سے بڑی حد تک مطمئن تھے، کیونکہ پہلے ہی بحرین کے متعدد قبائل نے سچے دل سے ان کی اطاعت قبول کر کے اپنے آپ کو مسلمانوں کی خدمت کے لیے وقف کر دیا تھا، ان لوگوں میں پیش پیش عتیبہ بن نہاس اور مثنیٰ بن حارثہ شیبانی تھے، ان لوگوں کی کوششوں سے شکست خوردہ قبائل اور فسادی عنصر کا دوبارہ سر اٹھانے کی جرأت نہ ہوئی۔

مثنیٰ بن حارثہ نے ایرانی فریب کاریوں کا مقابلہ کرنے کے لیے باقاعدہ جدوجہد شروع کی اور اس غرض کے لیے خلیج فارس کے ساحل کے ساتھ  ساتھ  پیش قدمی کر کے دریائے فرات کے دہانے تک پہنچ گئے، مثنیٰ کا عراق کی سرحد پر پہنچ کر دشمنان اسلام کی سرگرمیوں کی روک تھام کرنا اور اس علاقے میں تبلیغ اسلام کی جدوجہد کرنا عراق کی فتح کا پیش خیمہ ثابت ہوا۔
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Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 39.

Junubi (South) Qabayel Ka Israar-E-Bagawat.

Rebellion of Southern Tribes During the Caliphate of Abu Bakr (RA)
When the Southern Tribes Defied Islam — Abu Bakr’s Courage Changed History.
During the caliphate of Abu Bakr (RA), Islam faced one of its most dangerous challenges — the rebellion of the southern tribes. These tribes refused to pay zakat and rejected the authority of the central caliphate, threatening the unity of the Muslim community. With unwavering faith and determination, Abu Bakr (RA) confronted this crisis head-on. His decisive leadership not only crushed the rebellion but also preserved the integrity of the Islamic state. This episode highlights how the foundations of the Rashidun Caliphate were built on courage, justice, and wisdom rather than mere power.
This Islamic post has been published with the full consent of the original author, who has expressly permitted its sharing to spread beneficial knowledge.
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Southern Tribes Revolt.
   تاریخ اسلام۔ عہدِ خلافتِ صدیقیؓ، قسط: (39)
   جنوبی قبائل کا اصرار بغاوت:
شمالی عرب کے منکرین زکوٰۃ اور مرتد قبائل حضرت خالدؓ بن ولید کی فوج کشی کے نتیجے میں خلیفۂ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی اطاعت قبول کر کے دوبارہ دائرہ اسلام میں داخل ہو چکے تھے، ان قبائل کی حدود عرب کے شمال مشرقی حصے سے شروع ہو کر انتہائی مشرق میں خلیج فارس تک اور وہاں سے نیچے اتر کر مکہ کے جنوب مشرق تک پھیلی ہوئی تھیں، حالانکہ جب حضرت ابوبکرؓ نے زمام خلافت سنبھالی تھی تو ان کا دائرہ اقتدار مدینہ، مکہ اور طائف کے درمیان ایک چھوٹے سے مثلث نما خطے تک محدود تھا۔

جنوبی علاقے کے قبائل نے شمالی علاقے کے واقعات سے متعلق نصیحت حاصل نہ کی اور بدستور حضرت ابوبکرؓ کے خلاف بغاوت پر آمادہ اور ارتداد پر جمے رہے، اسی سبب سے جنوبی قبائل اور مسلمانوں کے درمیان مدت دراز تک جدال و قتال کا سلسلہ جاری رہا۔

جنوبی علاقہ جو نصف عرب پر مشتمل ہے، خلیج فارس سے یمن کے شمال میں بحیرہ احمر تک پھیلا ہوا ہے اور اس میں بحرین، عمان، مہرہ، حضر موت، کندہ اور یمن کے صوبے واقع ہیں، مشرقی علاقوں سے مغربی علاقوں تک اور مغربی علاقوں سے مشرقی علاقوں تک آنے جانے کے لیے مذکورہ بالا تمام صوبوں سے گزرنا پڑتا ہے، کیونکہ یہ تمام صوبے خلیج فارس، خلیج عدن اور بحیرہ احمر کے ساحلی علاقوں پر واقع ہیں اور یمن کے سوا باقی تمام کی چوڑائی بہت کم ہے، اتنی کم کہ ان کی حدود اور ساحل بحر کا فاصلہ چند میل کا ہے، عرب کا سارا جنوبی علاقہ جو ان صوبوں کو گھیرے ہوئے ہے، ایک خوفناک لق ودق صحرا پر مشتمل ہے جسے عبور کرنا کسی صورت ممکن نہیں، اس صحرا کو دیکھ کر آج بھی اسی طرح دہشت طاری ہوجاتی ہے جس طرح پہلے زمانوں میں ہوتی تھی، اسے ربع الخالی کے نام سے موسوم کیا جاتا ہے۔

  جنوبی عرب میں ایرانی اثر ونفوذ:
ان صوبوں کے محل وقوع پر ایک نظر ڈالنے سے صاف پتا چل جاتا ہے کہ ان میں ایرانی اثر و نفوذ بہت آسانی سے راہ پا سکتا تھا، شمالی اور جنوبی علاقوں کے مابین آمدورفت کا سلسلہ بے حد دشوار تھا، کیونکہ درمیان کے ہولناک اور ویران صحرا کو قطع کرنا مشکل بلکہ ناممکن تھا، حجاز سے عمان وبحرین تک پہنچنے اور عمان و بحرین سے حجاز تک جانے کے لیے طول وطویل ساحلی علاقہ اختیار کرنا پڑتا تھا، اس لحاظ سے بحرین، عمان، حضر موت اور یمن کے مشرقی وجنوبی صوبے حجاز کے شمالی علاقے سے تقریباً کٹ کر رہ گئے تھے، اس صورت حال سے فائدہ اٹھا کر ایرانی شہنشاہوں نے ان علاقوں پر توجہ مبذول کی اور یہاں اپنا اقتدار قائم کر لیا۔

ہم پہلے ذکر کر آئے ہیں کہ یمن ’’ بدھان‘‘ کے اسلام قبول کرنے تک ایرانی عمل داری میں شامل رہا، ’’ بدھان‘‘ ابتداء میں کسریٰ کی جانب سے اس علاقے کا عامل تھا، اسلام لانے کے بعد رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے اسے بدستور یہاں کا حاکم مقرر کیے رکھا، بحرین اور عمان بھی ایرانی عمل داری میں شامل تھے اور کثیر التعداد ایرانیوں نے بحرین اور عمان میں سکونت اختیار کرکے انہیں اپنا وطن بنا لیا تھا، اس وجہ سے ایرانی اقتدار میں مزید اضافہ ہو گیاتھا، جب کبھی سلطنت ایران کو عربوں کی جانب سے بغاوت کا خطرہ ہوتا اور عرب ان کے اثر واقتدار کو زائل کرنے کی کوشش کرتے تو وہ ان ایرانی نژاد لوگوں سے کام لے کر اس بغاوت کو فرو کر دیتی اور آزادی کی جدوجہد کو ناکام بنا دیتی، 
 یہی وجہ ہے کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے عہد میں عرب کے جن علاقوں کو سب سے آخر میں اسلام لانے کی توفیق ملی وہ عمان اور بحرین کے علاقے تھے، رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی وفات کے بعد انہوں نے سب سے اول ارتداد اختیار کیا، مگر جب سخت جنگوں کے بعد فتنۂ ارتداد پاش پاش ہو گیا اور اہل عرب دوبارہ ایک دینی اور سیاسی وحدت پر جمع ہو گئے تو یہی لوگ تھے جو مجبور ہو کر سب سے آخر میں اسلام لائے۔

ان علاقوں میں جنگ ہائے ارتداد کے زمانہ وقوع کے متعلق مؤرخین میں خاصا اختلاف ہے، بعض کہتے ہیں یہ جنگیں11ھ میں وقوع پزیر ہوئیں اور بعض کہتے ہیں 12ھ میں، پھر بھی یہ اختلاف کوئی اہمیت نہیں رکھتا، کیونکہ بہرحال یہ امر مسلم ہے کہ یہ جنگیں حضرت ابوبکرؓ کی خلافت کے اوائل سے شروع ہوئیں اور اس وقت تک ختم نہ ہوئیں جب تک سارے عرب نے کاملاً ان کی اطاعت قبول نہ کرلی، ابتدا شمالی عرب سے ہوئی اور وہاں کے مرتدین کا قَلع قمع ہونے کے بعد جنگوں کا رخ جنوبی علاقے کی طرف پھر گیا۔

جغرافیائی محل و قوع کے پیش نظر مسلمانوں کے لیے اس کے سوا کوئی چارۂ کار نہ تھا کہ جنوبی علاقے میں سرگرمیوں کی ابتداء وہ یا تو بحرین سے کرتے اور عمان، مہرہ، حضرموت کے علاقوں کو زیر کرتے ہوئے یمن تک پہنچ جاتے یا اپنی کارروائیاں یمن سے شروع کرتے اور حضرموت مہرہ اور عمان کے لوگوں کی سرکوبی کرتے ہوئے ان کارروائیوں کا اختتام بحرین پر کرتے۔ تمام حالات کے پیش نظر مسلمانوں نے بحرین سے جنگی کارروائی کا آغاز کرنا مناسب خیال کیا، کیونکہ اول تو  بحرین یمامہ سے بالکل نزدیک تھا اور یمامہ میں عقرباء کے مقام پر وہ ابھی ابھی بنی حنفیہ کے مقابلے میں عظیم الشان فتح حاصل کر چکے تھے، جس کی وجہ سے ان کی دھاک تمام قبائل عرب میں بیٹھ چکی تھی، دوسرے یمن کے مقابلے میں یہاں سے کارروائی کا آغاز کرنا نسبتاً سہل بھی تھا، اگر یہاں کامیابی حاصل ہو جاتی تو اس کا اثر دوسرے قبائل پر پڑنا لازم تھا۔

9ھ میں جب رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے اپنے قاصد علاء بن حضرمی کو ان کے پاس بھیجا تو ان کا حاکم اسلام لے آیا جس پر رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے اسے بدستور بحرین کا حاکم مقرر کیے رکھا، اسلام لانے کے بعد اس نے اپنی قوم کو بھی دین حق کی دعوت دینی شروع کی اور جارود بن معلی کو دینی تربیت حاصل کرنے کے لیے رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی خدمت میں روانہ کیا، جارود نے مدینہ پہنچ کر اسلامی تعلیمات اور احکام سے واقفیت حاصل کی اور اپنی قوم میں واپس جا کر لوگوں کو دین کی تبلیغ کرنے اور اسلامی تعلیمات سے روشناس کرانے کا کام شروع کر دیا۔
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Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 38.

Military Leadership of Hazrat Khalid bin Walid (RA).

Khilafat-E-Siddique: Hazrat Abu Bakr Razi Allahu Anahu. Part-38/40.
Hazrat Khalid bin Walid (RA) – The Invincible Commander of Islam.
The Strategy and Bravery of “The Sword of Allah"
Hazrat Khalid bin Walid (RA) – Legendary Commander, Conqueror of Persia and Rome.
From desert sands to empires’ downfall — Khalid bin Walid (RA) rewrote history with his sword.
Hazrat Khalid bin Walid (RA), known as The Sword of Allah, was one of the greatest military commanders in Islamic history. His unmatched strategies and fearless leadership led to decisive victories against Persia, Rome, and Iraq etc, making him a symbol of courage and tactical brilliance.
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The Sword of Allah: How Khalid bin Walid (RA) Crushed Persia, Rome & Iraq in Record Time.
   تاریخ اسلام۔ عہدِ خلافتِ صدیقیؓ، قسط: (38)
    حضرت خالد بن ولید رضی اللہ عنہ کی سپہ سالاری:

حضرت خالدؓ بن ولید کو حضرت ابوبکرؓ نے جس لشکر کی کمان سپرد کی تھی وہ تمام لشکروں سے زیادہ مضبوط تھا اور اس میں مہاجرین و انصار کے منتخب آدمی جمع تھے، جن کا انتخاب خود حضرت خالد رضی اللہ عنہ نے کیا تھا۔ آئندہ اقساط میں آپ پڑھیں گے کہ ان لوگوں نے جنگ ہائے ارتداد میں بے نظیر کارنامے انجام دئیے اور عراق و شام کی جنگوں میں تو انہوں نے وہ معرکے سر کیے جنہیں کسی صورت فراموش نہیں کیا جا سکتا۔

ان فوجوں کی کامیابی کا راز حضرت خالد بن ولید رضی اللہ عنہ کی سپہ سالاری میں مضمر تھا، حضرت خالد کو جو جنگی مہارت حاصل تھی اس کا حال کسی سے پوشیدہ نہیں، سکندر اعظم، چنگیز خاں، جولیس سیزر ہنی بال اور نپولین کی شخصیتیں (عسکری لحاظ سے) خواہ کتنی ہی عظیم کیوں نہ نظر آتی ہوں، لیکن حق یہ ہے کہ حضرت خالدؓ کی شخصیت کے آگے وہ سب ہیچ ہیں، وہ اسلام کے بطل جلیل تھے اور ہر قسم کے خطرات و خدشات کو بالائے طاق رکھتے ہوئے دشمنوں کی صفوں میں دلیرانہ گھس جانا ان کا خاص شیوہ تھا، فنون جنگ سے گہری واقفیت میں ان کا کوئی ثانی نہ تھا، دشمن کا ہر چال اور اس کا ہر منصوبہ ان کی نگاہ میں ہوتا تھا اور مخالف کی کوئی حرکت ان سے چھپی نہ رہ سکتی تھی، تمام مسلمانوں کو ان کی صلاحیتوں کا علم تھا، خود رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے انہیں جنگ موتہ میں مسلمانوں کی قلیل التعداد فوج کو ہزارہا رومیوں کے نرغے سے نکال لانے کی بنا پر سیف اللہ کا خطاب مرحمت فرمایا تھا، زندگی بھر انہوں نے کبھی شکست نہیں کھائی، ہمیشہ فتح یاب ہی ہوتے رہے اور اسی حالت میں وفات پائی۔

اسلام لانے سے قبل بھی حضرت خالد کا شمار قریش کے چوٹی کے بہادروں میں ہوتا تھا، جنگ احد اور خندق میں وہ کفار کے دوش بہ دوش مسلمانوں سے لڑے، سرتاپا فوجی ہونے کی وجہ سے ان کی طبیعت میں خشونت، تندی اور تیزی آ گئی تھی، دشمن کو سامنے دیکھ کر ان سے مطلق صبر نہ ہو سکتا اور چاہتے تھے کہ جس قدر جلد ممکن ہو اس پر ٹوٹ پڑیں، اللہ کا فضل ہمیشہ ان کے شامل حال رہا، ورنہ ممکن تھا کہ اپنی جلد بازی کے باعث انہیں بھاری نقصان سے دو چار ہونا پڑتا، دشمن بڑی سے بڑی تعداد اور کثیر اسلحہ کے باوجود کبھی انہیں مرعوب نہ کر سکتا تھا، صلح حدیبیہ سے اگلے سال رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم عمرۃ القضاء کے لیے مکہ تشریف لے گئے تو حضرت خالد مسلمانوں سے حد درجہ نفرت کے باعث مکہ چھوڑ کر ہی چلے گئے، لیکن اچانک اللہ نے ان کے دل پر پڑے ہوئے تاریک پردے ہٹا دئیے اور انہیں حق و صداقت سے آگاہی عطا فرمائی،
 رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے مدینہ واپس تشریف لے جانے کے بعد خالد مکہ واپس آ گئے اور ایک روز انہوں نے قریش کے مجمع میں اعلانیہ کہہ دیا کہ اب ہر ذی عقل انسان پر یہ بات واضح ہو گئی ہے کہ محمد صلی اللہ علیہ وسلم نہ جادوگر ہیں نہ شاعر، ان کا کلام یقینا اللہ کی طرف سے ہے، اب قریش کے لیے آپ صلی اللہ علیہ وسلم کا اتباع اختیار کئے بغیر چارہ نہیں۔

حضرت خالدؓ کی زبان سے یہ کلمات سن کر قریش کو سخت حیرت ہوئی، ان کے وہم میں بھی یہ بات نہ آ سکتی تھی کہ خالد کا میلان اسلام کی جانب ہو سکتا ہے، عکرمہ بن ابوجہل اور خالد کے مابین بحث بھی ہوئی، لیکن خلاف معمول اس نے تیزی اختیار نہ کی، ابو سفیان اس اجتماع میں موجود نہ تھا، جب اسے اس واقعے کا علم ہوا تو اس نے انہیں بلا کر پوچھا: کیا تمہارے اسلام لانے کی خبر سچ ہے؟ حضرت خالدؓ نے جواب دیا۔ ہاں! میں اسلام لے آیا ہوں اور محمد صلی اللہ علیہ وسلم کی رسالت پر یقین رکھتا ہوں۔ یہ سن کر ابوسفیان کو بہت غصہ آیا اور اس نے کہا لات اور عزیٰ کی قسم! اگر یہی بات ہے تو میں محمد صلی اللہ علیہ وسلم سے پہلے تم ہی سے نپٹ لیتا ہوں، حضرت خالدؓ نے جواب دیا: اسلام بہرحال سچا ہے خواہ کوئی شخص اس بات کو کتنا ہی ناپسند کیوں نہ کرے۔

اسلام لانے کے بعد خالد مدینہ چلے آئے، اپنی جنگی قابلیت کی وجہ سے مسلمانوں میں خاص قدر و منزلت حاصل کر لی اور اس امر کے باوجود کہ ان کی ساری عمر اسلام کی مخالفت میں گزری تھی، ہر شخص انہیں عزت کی نگاہ سے دیکھنے لگا، اس عزت و توقیر میں گراں قدر اضافہ اس وقت ہوا جب جنگ موتہ کے بعد انہیں دربار نبوی سے سیف اللہ کا خطاب مرحمت ہوا، بعد میں انہوں نے ہمیشہ اپنے آپ کو اس خطاب کا پورا پورا مستحق ثابت کیا، عراق اور شام کی فتوحات انہیں کے ذریعے سے ہوئیں، فارس اور روم کی عظیم الشان سلطنتیں جو اس زمانے میں روئے زمین کی مالک تھیں، انہیں کے ہاتھوں نابود ہوئیں، ان ہی اوصاف کی بدولت انہیں مرتدین کے مقابلے میں سب سے بڑے لشکر کی سپہ سالاری نصیب ہوئی۔
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Aaj Kal Shadi Ke liye Rishte Kyu Nahi Aa rahe hai?

Jyada Umar Hone Ke Bad Bhi Shadi Ke Liye Rishte Kyo Nahi Aa rahe hai?

The Hidden Burden of Marriage Dreams.
Why Parents Endure Poverty, but Daughters Can’t Accept a Poor Husband?
Luxury denied to parents becomes a heavy demand at their daughter’s wedding.
In many families, parents spend their entire lives enduring poverty and sacrificing comforts. Yet, when it comes to their daughter’s marriage, society suddenly expects wealth, luxury, and status. The irony is clear: a father’s poverty is tolerated, but a husband’s poverty is seen as unacceptable. This mindset creates pressure, unrealistic expectations, and emotional burdens that weigh heavily on husband.
लडकि को बाप कि ग़रिबि मंजुर लेकिन शौहर कि गरिबि पसंद नहि.
Nikah, Shadi, Islamic marriage system, Muslim society, Islam and Nikah, Nikah,
बेटी को 'लॉटरी का टिकट' समझने वाली बीमार ज़हनियत.
अफ़सोस की बात यह है कि जो ऐशो-आराम और सहूलियतें वालिदैन को अपनी पूरी ज़िंदगी में मयस्सर नहीं होतीं, वे उन तमाम अधूरी हसरतों का बोझ अपनी बेटी के निकाह पर डाल देते हैं। 

रिश्ते क्यों नहीं होते आज कल? समाज की कड़वी हकीकत और हमारी कोताहियाँ?

आज के दौर में निकाह जैसा मुकद्दस रिशता एक रूहानी रिश्ता कम और एक 'बिजनेस स्कीम' ज्यादा नज़र आता है। आज हमारे मुआशरे (समाज) का अलमिया यह है कि हर दूसरी गली और हर रिश्तेदारी में सर की चांदी (सफेद बाल) लिए बेटियां रुख़्सती के इंतज़ार में बैठी हैं। ताज्जुब की बात यह है कि शुरू में जब पैगाम आते हैं, तो वालिदैन और खुद लड़कियां नखरों की ऐसी फेहरिस्त थमा देते हैं कि नेक और शरीफ शख्स का मिलना मुहाल हो जाता है।

शादी नहीं, सौदेबाजी के पांच पैमाने.

आजकल रिश्ते देखते वक्त इंसानियत और अख़्लाक़ के बजाय इन बेबुनियाद मुतालबात (मांगों) पर जोर दिया जाता है:
- अपना ज़ाती (निजि) आलीशान मकान हो।
- दरवाजे पर गाड़ी खड़ी हो।
- माहना आमदनी लाखों में हो। (छह डिजिट)
- देखने मे खुब्सुरत और स्टेटस बडा हो.
- फैमिली छोटी हो ताकि कोई रोक-टोक न हो।

कोई यह नहीं कहता कि हमें बस एक नेक और बा-किरदार इंसान चाहिए। लोग भूल जाते हैं कि रिज़्क़ देने वाली ज़ात अल्लाह की है। अगर लड़के की आमदनी आज के दौर में 20 से 30 हज़ार भी है, तो वह एक बा-इज़्ज़त शख्स है, ज़िंदगि जि सकता है। लेकिन अफसोस! लोग 'खर्चे कैसे पूरे होंगे' का बहाना बनाकर ठुकरा देते हैं।

कच्चे मकान और आसमान छूते नखरे.
 बेटी को 'लॉटरी का टिकट' समझने वाली बीमार ज़हनियत.

मुआशरे में एक निहायत ही अफसोसनाक रुझान पनप रहा है, जहाँ वालिदैन अपनी बेटी के निकाह को एक मुकद्दस रिश्ते के बजाय 'शॉर्टकट कामयाबी' की चाबी समझने लगे हैं। वे तमाम ख्वाब और जरूरतें—जो उन्होंने खुद अपनी पूरी ज़िंदगी में मेहनत न करने या बदकिस्मती की वजह से हासिल नहीं कीं—अब वे उसे दामाद की जायदाद और कमाई से पूरा करना चाहते हैं।
                                                        बेटी की शादी किसी इंसान से नहीं, बल्कि लड़के के बैंक बैलेंस और उसकी प्रॉपर्टी से की जाती है। ऐसा लगता है जैसे लड़की देकर उन्होंने लड़के वालों पर कोई बहुत बड़ा 'एहसान' कर दिया हो, जिसके बदले में वे अब पूरी दुनिया की सुख-सुविधाओं का मुतालबा (डिमांड) रखने का हक पा चुके हैं।

हैरत तो तब होती है जब उन लड़की वालों का अपना हाल यह होता है कि खुद कच्चे या किराये वाले मकानों में रह रहे होते हैं, वालिद की मामूली पेंशन पर गुज़ारा होता है, लेकिन ख्वाब कोठियों के देख रहे होते हैं। जहां दो वक्त की रोटी भी मशक्कत से मयस्सर आती है, लेकिन बेटी पैदा होते ही उनकी आंखों में महल और शहजादों के ख्वाब पलने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो उन्होंने बेटी की शादी को गरीबी से निजात पाने का सबसे आसान और 'शॉर्टकट फॉर्मूला' समझ लिया हो।
 फिर जब लाडली बेटी की उम्र 30 साल से तजावुज़ (पार) कर जाती है, तब बेचैनी बढ़ती है। फिर बिचौलियों और जान-पहचान वालों को सुबह-शाम फोन करके कहा जाता है कि 'सिद्दीकी साहब, कोई भी लड़का ढूंढ लें, बहुत मजबूरी है।'

बाप की गुरबत मंजूर, मगर शौहर की तंगी क्यों नहीं?
यह एक अजिब मुनाफिक़त है कि जो लड़की अपने बाप के घर में फटे हाल गुज़ारा कर लेती है, सूखी रोटियां खाकर भी खामोश रहती है, वही लड़की ससुराल कदम रखते ही 'महारानी' बनने के ख्वाब देखने लगती है। उसे अपने बाप की तंगदस्ती और मुफ़लिसी तो नज़र आती है, लेकिन शौहर की मेहनत और उसकी परेशानि दिखाई नहीं देती। अगर शौहर अपने बाप से बेहतर ज़िंदगी भी दे रहा हो, तब भी शिकायतों का अंबार लगा रहता है।

 सवाल यह है कि जिस गुरबत को आपने 20 साल तक मायके में बर्दाश्त किया, उसे शौहर के साथ मिलकर जिने में क्या जिल्लत महसूस होती है? क्या शादि का मतलब "भिखारी से रानी बनने का कोई जादुई करिश्मा" है?

यह कितनी घिनौनी सोच है कि आप खुद तो ज़मीन पर हों, लेकिन दामाद आपको 'आसमान का तारा' चाहिए। आप चाहते हैं कि कोई आए और आपकी बरसों की गुरबत को एक ही रात में सोने-चांदी से बदल दे।
 यह सरासर मुनफ़िक़त और लालच है। शादी को एक 'सौदेबाजी' बनाना बंद करें। जब आप लड़के की आमदनी को तराजू में तौलते हैं, तो आप अपनी बेटी की इज़्ज़त की कीमत लगा रहे होते हैं। एक शरीफ और नेक इंसान की कद्र करने के बजाय उसकी जेब और बैंक बैलेंस देखना इंसानियत की तौहीन है।

यह सोच न सिर्फ घटिया है बल्कि निहायत मुनफ़िकाना भी है। अपनी नाकामियों का मुआवजा दामाद से वसूल करना और बेटी को एक 'सौदे का सामान' बना देना इंसानियत की तौहीन है। जब निकाह की बुनियाद ही लालच और दूसरों के माल पर नज़र रखने पर होगी, तो वहाँ बरकत और मोहब्बत कैसे पैदा हो सकती है? 

वे इंतज़ार करते हैं कि एक बार निकाह हो जाए, फिर वे तमाम ऐश-ओ-इशरत जो उन्हें अब तक मयस्सर न थे, बेटी के वसीले से उनके आंगन में उतर आएंगे। यह सोच कितनी खोखली है कि अपनी उम्र भर की नाकामियों का मुआवज़ा उस लड़के से वसूल किया जाए जो अभी अपनी ज़िंदगी की शुरुआत कर रहा है। 
    हकीकत में, वे बेटी का घर नहीं बसाते, बल्कि अपनी महरूमियों की दुकान सजाते हैं, जहाँ रिश्ता सिर्फ एक ज़रिया होता है उन चीज़ों को पाने का जो उन्हें खुद हासिल न हो सकीं।

यही नहीं जब् सहि वक़्त पर लड्का नहि मिलता है तो, उम्र छुपाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। याद रखें, शादी की बेहतरीन उम्र 18 से 25 साल है। जब उम्र ढल जाती है, तो इनके अरमानो और शौक़ कि फेहरिश्त छोटे होने लगते है. 
वालिदैन को चाहिए कि वे अपनी बेटी को इज़्ज़त और खुददारी का सबक दें, न कि उसे किसी अमीर घराने में 'वसूली एजेंट' बनाकर भेजें। याद रखें, जो रिश्ता जायदाद को देखकर शुरू होता है, वह अक्सर ज़मीर की नीलामी पर खत्म होता है।

 पैसों की चमक और खोखले रिश्ते.
ज़्यादा पैसे वालों के चक्कर में न पड़ें। अक्सर शादी से पहले जो सब्ज-बाग दिखाए जाते हैं, शादी के बाद वे रेत के महल साबित होते हैं। कई बार तो शादी के फौरन बाद हालात ऐसे बिगड़ते हैं कि रूहानी और माली सुकून दोनों छिन जाते हैं। नेक और मुनासिब जोडा देखें और अल्लाह पर भरोसा करके रिश्ता तय करें।

अफ़सोस का मुक़ाम है कि जो ऐशो-आराम और सहूलियतें वालिदैन को अपनी पूरी ज़िंदगी में मयस्सर नहीं होतीं, वे उन तमाम अधूरी हसरतों का बोझ अपनी बेटी के ससुराल पर डाल देते हैं। उन्हें लगता है कि बेटी की रुख़्सती कोई रिश्ता नहीं, बल्कि वह सुनहरा मौका है जहाँ से उनकी अपनी महरूमियों का मदावा (इलाज) होगा। जो ख्वाब उन्होंने अपनी टूटी छतों के नीचे देखे और जो ज़ायके उन्हें उम्र भर नसीब न हुए, वे उम्मीद लगा बैठते हैं कि दामाद के घर से उन अरमानों की तक्मील (पूरा होना) होगी। 

वालिदैन के लिए एक मुखलिस मशविरा.
तमाम वालिदैन से गुज़ारिश है कि अपनी औलाद पर तरस खाएं। अपनी शुरूआती शादीशुदा ज़िंदगी को याद करें कि आपने कैसे तंगी और कोशिशों से घर बसाया था। जवान बेटी को घर बिठाए रखना और उसे शौहर से दूर रखना बहुत बडि ग़लति है। यह नाम-निहाद 'पढ़े-लिखे' और 'दीनदार' लोग इस गुनाह-ए-अज़ीम से तौबा करें और निकाह को आसान बनाएं ताकि मुआशरा बुराई से बच सके।

तल्ख नसीहत: अपनी चादर देखकर पैर फैलाएं.

 खुदा के लिए अपनी औलाद को यह ज़हरीली तालीम न दें कि उनका शौहर कोई अलादीन का चिराग लेकर आएगा। अपनी बेटियों को सब्र और शुक्र की आदत डालें। यह सोचना कि शादी गरीबी दूर करने की कोई 'स्कीम' है, निहायत ही घटिया सोच है। जिस दिन हम इंसान को उसके अख़्लाक़ से परखना शुरू करेंगे, उस दिन हमारी बेटियां घरों में बूढ़ी नहीं होंगी। 
याद रखें, दिखावे के ये महल मिट्टी के ढेर बन जाते हैं, लेकिन मोहब्बत और वफादारि की बुनियाद पर टिके रिश्ते ता-उम्र चलते हैं। इस दोहरे रवैये से तौबा करें, इससे पहले कि आपकी लालच की भेंट चढ़कर एक और मासूम ज़िंदगी मायके की दहलीज पर दम तोड दे। 

ऐ अल्लाह! उम्मे मुसलिमा पर अपनी रहमतों की बारिश फरमा। उनकी ज़िंदगी को सुकून, बरकत और इमान की रोशनी से भर दे। उनके गुनाहों को माफ़ कर और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता कर।
या अल्लाह! तमाम मुस्लिम बेटियों के मसाइल आसान कर दे। जिनके रिश्ते नहीं आते, उनके लिए नेक और अच्छा शरिक ए हयात मुक़र्रर कर। उनकी ज़िंदगी से तंगी, परेशानी और मायूसी दूर कर। उन्हें इज़्ज़त, मोहब्बत और खुशहाल घर का साया नसीब कर। उनकी जायेज़ दुआओं को कबूल कर और उनके दिलों को सब्र व तसल्ली अता कर। आमीन.
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Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 37.

Muslema Kazzab Ka Qatl aur Khalid Bin Walid R.Z.

Khilafat-E-Siddique: Hazrat Abu Bakr Razi Allahu Anahu. Part-37/40.
Who Was Musaylimah the Liar?
Legacy: Lessons from His Fall.
How Musaylimah Was Finally Defeated?
The Shocking End of Musaylimah the Liar – A Turning Point.
Discover the dramatic downfall of Musaylimah al‑Kazzab, the self‑proclaimed prophet who challenged Islam’s foundations. His death at the Battle of Yamama not only ended his rebellion but also marked one of the bloodiest and most decisive moments in Islamic history. Find out how his defeat shaped the future of the Muslim community and why his story still fascinates readers today?
This Islamic post has been published with the full consent of the original author, who has expressly permitted its sharing to spread beneficial knowledge.
Battle of Yamama, Khalid ibn al‑Walid victory, Early Islamic battles, Death of Musaylimah,
Islamic history turning points.
    تاریخ اسلام۔ عہدِ خلافتِ صدیقیؓ، قسط: (37)
  مسیلمہ کذاب کا قتل:

حضرت خالدؓ بن ولید رضی اللہ عنہ نے جب مسلمانوں کی جوش دلانے والی آوازیں سنیں تو انہیں بھی یقین ہو گیا کہ بنی حنفیہ کی سخت مدافعت کے باوجو انجام کار فتح انہیں کے حصے میں آئے گی، لیکن وہ چاہتے تھے کہ فتح کا حصول حتیٰ الامکان جلد ہو جائے، اس لیے بہت غور سے ایک بار میدان کا جائزہ لیا، انہوں نے دیکھا کہ بنو حنفیہ مسیلمہ کے گرد کٹ کٹ کر گر رہے ہیں اور مسیلمہ کی حفاظت میں موت کی بھی پروا نہیں کرتے، یہ دیکھ کر انہیں یقین ہو گیا کہ فتح کے جلد از جلد حصول کا طریق یہ ہے کہ کسی طرح مسیلمہ کو قتل کر دیا جائے،

 چنانچہ وہ اپنے آدمی لے کر آگے بڑھے اور مسیلمہ کے آدمیوں کے گرد گھیرا ڈال لیا، اس کے بعد کوشش کی کہ کسی طرح مسیلمہ ان کے سامنے آ جائے تاکہ اس کا کام تمام کیا جا سکے، لیکن قبل اس کے کہ مسیلمہ ان کے سامنے آتا، اس کے آدمیوں نے بڑھ چڑھ کر حضرت خالدؓ بن ولید رضی اللہ عنہ پر حملے کرنے شروع کیے، حضرت خالدؓ تو ان کے بس میں کیا آتے البتہ جو شخص ان کے مقابلے میں آتا زندہ واپس نہ جاتا، اس طرح بے شمار آدمی قتل ہو گئے۔

   مسیلمہ کا تردد و اضطراب:
جب مسیلمہ نے دیکھا کہ اس کے حامیوں کی تعداد بہ سرعت کم ہوتی جا رہی ہے تو اس نے کود کر حضرت خالدؓ کے مقابلے پر آنے کا ارادہ کیا، لیکن اس خیال سے رک گیا کہ اگر وہ بھی حضرت خالدؓ کے مقابلے کے لیے نکلا تو لامحالہ مارا جائے گا، اب اس کے تردد و اضطراب کی انتہا نہ رہی، اس کے جاں نثار کٹ کٹ کر گر رہے تھے اور اسے خود بھی اپنی موت سامنے نظر آ رہی تھی، وہ اس اضطراب کی حالت میں کھڑا یہ سوچ رہا تھا کہ اب کیا کرے، یکایک حضرت خالدؓ نے اپنے ساتھیوں کی مدد سے اس کے محافظین پر ایک بھرپور حملہ کر کے تلوار کے جوہر دکھانے شروع کیے، یہ دیکھ کر مسیلمہ کے ساتھیوں نے اس سے پکار کر پوچھا: آپ کے وہ وعدے جو اپنی فتح کے متعلق آپ نے ہم سے کیے تھے، کہاں گئے؟ اس وقت مسیلمہ کے حوصلے ختم ہو چکے اور اس نے میدان جنگ سے بھاگنے کا مصمم ارادہ کر لیا تھا، چنانچہ اس نے پیٹھ پھیرتے ہوئے جواب دیا:

" اپنے حسب و نسب کی خاطر لڑتے رہو۔"

لیکن اب وہ کیا لڑتے جب ان کا سردار انہیں مسلمانوں کی تلواروں کے سپرد کر کے انتہائی بزدلی کا مظاہرہ کرتے ہوئے راہ فرار اختیار کر چکا تھا، بنی حنفیہ کے ایک سردار محکم بن طفیل نے جب لوگوں کو بھاگتے اور مسلمانوں کو ان کا پیچھا کرتے دیکھا تو پکار پکار کر کہنے لگا: "اے بنو حنفیہ! باغ میں داخل ہو جاؤ۔ "

یہ باغ جسے حدیقۃ الرحمن کہا جاتا تھا میدان جنگ سے قریب ہی تھا اور مسیلمہ کی ملکیت میں تھا، یہ بہت طویل و عریض تھا اور قلعے کی طرح اس کے چاروں بلند دیواریں کھڑی تھیں، محکم بن طفیل کی آواز سن کر لوگوں نے اس باغ کی طرف بھاگنا شروع کیا، (جس میں مسیلمہ پہلے ہی داخل ہو چکا تھا) لیکن محکم اپنے چند ساتھیوں کے ہمراہ مسلمانوں کو بنی حنفیہ کے تعاقب سے روکنے کے لیے میدان جنگ ہی میں رہ گیا تھا، اس نے بہت بہادری سے مسلمانوں کا مقابلہ کیا اور آخر عبدالرحمن بن ابی بکرؓ کے ایک تیر سے جو اس کے سینے میں لگا اس کا کام تمام ہو گیا۔

مسیلمہ اور اس کی قوم باغ میں پناہ گزین ہو چکی تھی، مسلمانوں کے لیے باغ کا محاصرہ کر لینے اور کامل فتح کے حصول تک وہاں سے نہ ٹلنے کے سوا کوئی چارہ کار نہ تھا، چنانچہ انہوں نے ایسا ہی کیا، باغ کے چاروں طرف مسلمانوں نے پڑاؤ ڈال دیا اور کسی ایسی کمزور جگہ کی تلاش کرنے لگے جہاں سے باغ میں گھس کر اس کا دروازہ کھولنے میں کامیاب ہو سکیں، لیکن انتہائی تلاش کے باوجود انہیں ایسی کوئی جگہ نہ ملی، آخر براء بن مالک نے کہا:

’’مسلمانو! اب صرف یہ راستہ ہے کہ تم مجھے اٹھا کر باغ میں پھینک دو۔ میں اندر جا کر دروازہ کھول دوں گا۔‘‘

لیکن مسلمان یہ کس طرح گوارا کر سکتے تھے کہ ان کا ایک بلند مرتبت ساتھی ہزاروں دشمنوں میں گھر کر اپنی جان گنوا دے، انہوں نے ایسا کرنے سے انکار کر دیا، لیکن براء نے اصرار کرنا شروع کیا اور کہا:

’’میں تمہیں اللہ کی قسم دیتا ہوں کہ تم مجھے باغ کے اندر پھینک دو۔‘‘

آخر مجبور ہو کر مسلمانوں نے انہیں باغ کی دیوار پر چڑھا دیا، دیوار پر چڑھ کر جب براء نے دشمن کی زبردست جمعیت کی جانب نظر دوڑائی تو ایک لمحے کے لیے ٹھٹکے، لیکن پھر اللہ کا نام لے کر باغ کے دروازے کے سامنے کود پڑے اور دشمنوں سے دو دو ہاتھ کرتے، دائیں بائیں لوگوں کو قتل کرتے دروازے کی طرف بڑھنے لگے، آخر بیسیوں آدمیوں کے قتل کے بعد وہ دروازے تک پہنچنے میں کامیاب ہو گئے اور آگے بڑھ کر بڑی پھرتی سے اسے کھول دیا، مسلمان باہر دروازہ کھلنے کے منتظر تھے ہی، جونہی دروازہ کھلا وہ باغ میں داخل ہو گئے اور تلواریں سونت کر دشمنوں کو بے دریغ قتل کرنے لگے، بنو حنفیہ مسلمانوں کے سامنے سے بھاگنے لگے لیکن باغ سے باہر وہ کس طرح نکل سکتے تھے، نتیجہ یہ ہوا کہ ہزاروں  آدمی مسلمانوں کے ہاتھوں قتل ہو گئے۔

ایک روایت یہ بھی ہے کہ صرف حضرت براء رضی اللہ عنہ نے نہیں بلکہ اور بھی کئی مسلمانوں نے دیواریں پھاند کر دروازے کا رخ کیا تھا، چونکہ حضرت براء نے دروازے کے بالکل قریب دیوار پھاندی تھی، اس لیے دروازے پر سب سے پہلے وہی پہنچے اور لڑتے بھڑتے دروازہ کھول دیا، بنو حنفیہ نے ان مٹھی بھر مسلمانوں کو روکنے کی کوشش کی، لیکن دیوار پر جو مسلمان متعین تھے انہوں نے تیر مار مار کر انہیں مسلمانوں سے دور رکھا۔

مسلمانوں نے اگرچہ باغ میں گھس کر بنو حنفیہ کو بے دریغ قتل کرنا شروع کر دیا تھا، مگر بنو حنفیہ نے بھی بڑی بہادری سے ان کا مقابلہ کیا، لیکن مسلمانوں کے سامنے ان کی پیش نہ گئی، طرفین کے کثیر آدمی اس معرکے میں قتل ہوئے، لیکن بنی حنفیہ کے مقتولوں کی تعداد مسلمانوں سے بیسیوں گنا تھی، حبشی غلام وحشی، جس نے جنگ احد میں حضرت حمزہ بن عبدالمطلبؓ کو شہید کیا تھا اور جو فتح مکہ کے وقت مسلمان ہوگیا تھا، اس موقع پر موجود تھا، اس نے مسیلمہ کو باغ میں دیکھا اور اپنا چھوٹا سا نیزہ ترک کر مسیلمہ کے مارا جو سیدھا اسے جا کر لگا، اسی وقت ایک انصاری نے بھی مسیلمہ پر تلوارکا وار کیا، حضرت وحشی رضی اللہ عنہ کہا کرتے تھے:

’’اللہ ہی جانتا ہے کہ ہم میں سے کس نے اسے قتل کیا، لیکن مسیلمہ اگر مرنے کے بعد زندہ ہوتا تو ہمیشہ ہی یہ کہتا کہ اسے اس سیاہ فام غلام نے قتل کیا ہے۔‘‘

جب بنو حنفیہ نے مسیلمہ کی موت کی خبر سنی تو ان کے حوصلے پست ہو گئے۔ مسلمانوں نے انہیں بے تحاشا قتل کرنا شروع کیا، عرب میں اس وقت تک جتنی جنگیں ہوئی تھیں، یمامہ سے بڑھ کر کسی بھی جنگ میں اتنی خونریزی نہ ہوئی تھی، اس لیے حدیقتہ الرحمٰن کا نام حدیقتہ الموت پڑ گیا اور آج تک تاریخ کی کتابوں میں یہی نام چلا آتا ہے۔

  بنی حنفیہ کے مقتولین کی تعداد:
روایات سے پتا چلتا ہے کہ حدیقتہ الموت کی لڑائی میں سات ہزار بنی حنفیہ قتل ہوئے تھے، میدان جنگ میں بھی ان کے مقتولین کی تعداد سات ہزار تھی، اس کے بعد جب حضرت خالدبن ولید ؓ نے اپنے دستوں کو مفرورین کے تعاقب میں روانہ کیا تو بھی سات ہزار آدمی قتل ہوئے۔

  مسلمان شہداء کی تعداد:
اس جنگ میں جہاں بنی حنفیہ کے مقتولین کی تعداد پچھلی تمام جنگوں سے زیادہ تھی وہاں مسلمان شہداء کی تعداد بھی پچھلی تمام جنگوں کو مات کر گئی تھی، اس جنگ میں مسلمان شہداء کی تعداد بارہ سو تھی، تین سو ستر مہاجرین، تین سو انصار اور باقی دیگر قبائل کے لوگ، ان شہداء میں تین سو ستھر صحابہ کبار اور قرآن کے حافظ بھی تھے جن کا مقام اور درجہ مسلمانوں میں بے حد بلند تھا، اگرچہ ان حافظوں کی شہادت سے مسلمانوں کو سخت نقصان پہنچا، لیکن بعض اوقات ایک نقصان دہ چیز بھی آخر فائدے کا موجب بن جاتی ہے، چنانچہ اس کا ایک بڑا فائدہ یہ ہوا کہ حضرت ابوبکر صدیقؓ نے اس ڈر سے کہ کہیں آئندہ جنگوں میں بقیہ حافظوں سے بھی مسلمانوں کو ہاتھ نہ دھونے پڑیں، قرآن جمع کرنے کا حکم دے دیا اور اس طرح پہلی مرتبہ قرآن کریم ایک جلد میں مدون کیا گیا۔

  مسلمانوں کا حزن و الم:
مسلمانوں کی بھاری تعداد کے شہید ہو جانے سے ان کے رشتہ داروں کو جس صدمے سے دو چار ہونا پڑا تھا اس کی تلافی صرف یہ چیز کر سکتی تھی کہ گو مسلمانوں کو کئی قیمتی جانوں کا نقصان اٹھانا پڑا، پھر بھی فتح کا شرف انہیں کے حصے میں آیا۔ حضرت عمرؓ بن خطاب کے صاحبزادے حضرت عبداللہ رضی اللہ عنہ جنگ یمامہ میں بہادری کے عظیم کارنامے انجام دینے کے بعد مدینہ واپس آئے تو ان کے والد نے کہا:

’’ جب تمہارے چچا زید شہید ہو گئے تھے تو تم واپس کیوں آ گئے اور کیوں نہ اپنا چہرہ مجھ سے چھپا لیا؟ ‘‘

صرف حضرت عمرؓ ہی کا یہ حال نہ تھا، بلکہ مکہ اور مدینہ کے سینکڑوں گھرانے اپنے بہادروں اور سپوتوں کی شہادت پر خون کے آنسو بہا رہے تھے۔
==========> جاری ہے ۔۔۔
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