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X Update: Mulk Ke Gaddar Ya Bahari Agents?

Digital Conspiracy Against Muslim World on Twitter.

Twitter Exposé: Freedom or Hidden Agenda?
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डिजिटल दुनिया में जो दिखता है, वह असल में होता नहीं है।
चाहे ईरान हो, सऊदी अरब हो या कोई और मुस्लिम मुल्क, जब भी वहां कोई छोटा मुद्दा उठता है, तो सोशल मीडिया पर अचानक हजारों पोस्ट्स की बाढ़ आ जाती है। यह अपडेट साबित करता है कि यह 'जनता का गुस्सा' नहीं होता।

एक्स (Twitter) का महा-खुलासा: कैसे 'फ्रीडम' और 'हक' के नाम पर मुस्लिम दुनिया के खिलाफ रची जा रही है डिजिटल साजिश?

एलन मस्क की सोशल मीडिया साइट "एक्स" (पूर्व में ट्विटर) पर हाल ही में आए एक 'ग्लिच' या कहें 'गलती से हुए अपडेट' ने इंटरनेट की दुनिया में एक डिजिटल परमाणु धमाका कर दिया है। इस अपडेट ने न सिर्फ बोट्स (Bots) की लॉबी को बेनकाब किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि मुस्लिम दुनिया, इस्लामी अकीदे और मुस्लिम ख्वातीन के खिलाफ जो नफरत और "इल्हाद" की आंधी चल रही है, उसका रिमोट कंट्रोल कहीं और है।

 उस बड़े खेल का पर्दाफाश जो आपकी सोच, आपके दीन और आपके मुल्क को निशाना बना रहा है।

1. लोकेशन फीचर का सच: अपने ही मुल्क के गद्दार या विदेशी एजेंट?

एलन मस्क के प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर आए सिर्फ दो मामूली अपडेट्स ने बरसों से चल रही अंतरराष्ट्रीय साजिशों और उनके "विदेशी आकाओं" (Foreign Masters) की पोल खोलकर रख दी है। इस खुलासे ने साबित कर दिया कि डिजिटल दुनिया में जो दिखता है, वह असल में होता नहीं है।

1. असली लोकेशन (Real Location) का पर्दाफाश:
भले ही यूजर ने अपने बायो (Bio) में "रियाद", "अंकारा" या "तेहरान" "काहिरा" लिख रखा हो, इस अपडेट ने दिखा दिया कि वह अकाउंट हकीकत में तेल अवीव (इजराइल), लंदन या किसी पश्चिमी देश से ऑपरेट हो रहा था। यानी जो "मकामी" (Local) बनकर आपके मुल्क और मजहब को गालियां दे रहा था, वह असल में हजारों मील दूर बैठा एक दुश्मन एजेंट था।

2. 'सब-कॉन्टिनेंट' और नेटवर्क की पहचान:
दूसरा अपडेट यह था कि आप जिसे फॉलो कर रहे हैं या जो अकाउंट्स एक-दूसरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश (Amplify) कर रहे हैं, उनका नेटवर्क  कहाँ से जुड़ा है। इससे पता चला कि मुस्लिम दुनिया में फितना फैलाने वाले, हुक्मरानों के खिलाफ बगावत उकसाने वाले और ख्वातीन को गुमराह करने वाले अकाउंट्स का सर्वर और कंट्रोल रूम एक ही जगह था।

 जो लोग खुद को "सच्चा देशभक्त" बताते थे, वे हजारों मील दूर बैठकर फितना फैला रहे थे।
हैरत की बात यह थी कि मुस्लिम मुल्कों में आपसी लड़ाई करवाने वाले 99% अकाउंट्स का ताल्लुक इजराइली खुफिया यूनिट 8200 से निकला, जो साइबर वॉरफेयर में माहिर है।

भारत मे जो सरकार से सवाल पुछ्ने के बहाने यहाँ के असल पह्चान, तह्जिब को निचा दिखाने, सेकुलर के नाम पर मुसल्मानो का साथ देने का धोंग करने और हिंदुओ को निचा दिखा कर खुद को नाम् निहाद आज़ाद खयाल बनकर बैठने वाले का भि सच सामने आगया है. इस से यह पता चलता है के वह अलप्संख्यक के नाम पर मुसलमानो से साथ ले लेते है यह सब उस्के मन्सुबे का हिस्सा होता है, ताकि यह दिखा सके के हम कम्ज़ोरो के साथ है, मगर इस से मुसलमानो को मिला कुछ नहि, बल्कि मुसलमान जेल जाते है और वे लोग बैठ कर मजे करते है, वे नेता बनकर हमे वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करते है. वे चुनाव जित् कर लाल बत्ति वाले मे गाडि मे घुमते है दुसरि तरफ मुसलमान जेल के हवा खाते है, उमर खालिद, सरजिल इमाम कितने नाम बताये? 

यह साफ हो गया कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला गुस्सा 'हकीकत' नहीं, बल्कि एक "मैन्युफैक्चर्ड" (Manufactured/गढ़ा हुआ) एजेंडा था। इन अपडेट्स ने झूठ के उस साम्राज्य को नंगा कर दिया है जो डॉलर और पाउंड के दम पर हमारे मुल्कों को जलाने की साजिश रच रहा था।

2. इल्हाद (Atheism) का यलगार और फेक नैरेटिव

इस खुलासे ने मुस्लिम दुनिया में फैल रहे "इल्हाद" (नास्तिकता) के एजेंडे की भी पोल खोल दी है। सोशल मीडिया पर ऐसे हजारों अकाउंट्स हैं जो अरबी या उर्दू में इस्लामी शिक्षाओं का मजाक उड़ाते हैं और नौजवानों को दीन से दूर करने के लिए विचार्धारा के नैरेटिव का सहारा लेते हैं।

हकीकत यह है कि:

 ये अकाउंट्स किसी "मुस्लिम नौजवान" के नहीं होते जो सवाल पूछ रहा है, बल्कि यह एक ऑर्गेनाइज्ड गैंग है।
इनका मकसद मुस्लिम नौजवानों के जेहन में अपने मजहब और अपने निज़ाम के खिलाफ शक पैदा करना है।

 यूरोप और अमेरिका में बैठे ये "पेड एजेंट्स" (Paid Agents) खुद को "मजलूम" बताकर सहानुभूति बटोरते हैं, जबकि असल में यह एक मनोवैज्ञानिक जंग (Psychological War) है।

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NGOs और ट्रस्ट: समाज सेवा या जासूसी का अड्डा?
3. मुस्लिम ख्वातीन: आजादी के नाम पर फरेब.

सबसे खतरनाक खेल मुस्लिम ख्वातीन के साथ खेला जा रहा है। "वुमन राइट्स", "फेमिनिज्म" और "आजादी" के झूठे ख्वाब दिखाकर उन्हें इस्लाम के फरायज और पारिवारिक निजाम से बगावत करने पर उकसाया जाता है।

क्या आपने कभी गौर किया है कि अचानक किसी मुस्लिम मुल्क में, जहाँ कल तक सब कुछ शांत था, रातों-रात हजारों महिलाएं सड़कों पर कैसे उतर आती हैं? 
कैसे एक छोटा सा मुद्दा अचानक एक "बगावत" की शक्ल ले लेता है? 
NGOs और ट्रस्ट: समाज सेवा या जासूसी का अड्डा?

यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश (Well-planned International Conspiracy) है, जिसका मकसद औरतों के कंधों पर बंदूक रखकर मुस्लिम हुकूमतों और इस्लामी निजाम को निशाना बनाना है।
उस "सॉफ्ट वॉर" (Soft War) का सच, जिसमें विदेशी डॉलर और मीडिया के जोर पर आपके घर की इज्जत को मोहरा बनाया जा रहा है।

फेक प्रोफाइल्स: 'आयशा', 'फातिमा' या 'सना' नाम के अकाउंट्स से पर्दा और हया के खिलाफ मुहिम चलाई जाती है। लोकेशन चेक करने पर पता चलता है कि ये अकाउंट्स किसी मुस्लिम महिला के नहीं, बल्कि किसी पश्चिमी देश या इजराइल में बैठे किसी मर्द के हैं।

सबसे पहले यह खेल "इन्सानियत की सेवा" के नाम पर शुरू होता है। अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी एजेंसियां मुस्लिम मुल्कों में अपनी शाखाएं (Branches) खोलती हैं।

फंडिंग का जाल: "महिला सशक्तिकरण" और "शिक्षा" के नाम पर करोड़ों डॉलर की फंडिंग भेजी जाती है।

स्लीपर सेल्स: छोटे-छोटे ट्रस्ट और इदारे (Institutions) बनाए जाते हैं जो जाहिरि तौर पर तो सिलाई-कढ़ाई या तालीम का काम करते हैं, लेकिन परदे के पीछे इनका असल काम औरतों की जेहन-साजी (Brainwashing) करना होता है। ये इदारे धीरे-धीरे ख्वातीन के दिमाग में यह बात बिठाते हैं कि उनका अपना मुल्क, उनका अपना मजहब और उनके अपने मर्द उन पर जुल्म कर रहे हैं।

ट्रस्ट का जाल: मानवाधिकार (Human Rights) के नाम पर कई विदेशी फंडिंग वाली NGOs और ट्रस्ट्स इस नैरेटिव को हवा देते हैं। इनका मकसद मुस्लिम समाज की बुनियादी ईंट यानी 'परिवार' को तोड़ना है।
 ये दिखाते हैं कि मुस्लिम औरत कितनी "मजलूम" है और उसे अपने बाप, भाई या शौहर के खिलाफ बगावत कर देनी चाहिए। जबकि हकीकत में यह समाज को अंदर से खोखला करने की साजिश है।

4. बगावत की आग: ईरान और अरब मुल्कों का हाल.

जब विदेशी आकाओं को लगता है कि किसी मुस्लिम मुल्क की हुकूमत को गिराना या कमजोर करना है, तो वे एक इशारा करते हैं।
अचानक वही NGOs, जो कल तक खामोश थे, हजारों औरतों को एक साथ एक ही वक्त पर सड़कों पर ले आते हैं।

उनके हाथों में एक जैसे बैनर, एक जैसे नारे और एक जैसी तख्तियां होती हैं—जो यह साबित करता है कि यह गुस्सा कुदरती नहीं, बल्कि स्पॉन्सर्ड (Sponsored) है।
 इन प्रदर्शनों के लिए बसों का इंतजाम, खाने-पीने का बंदोबस्त और मीडिया कवरेज का पूरा खर्च वही "अनजान हाथ" (Hidden Hands) उठाते हैं।

विदेशी मीडिया और सोशल मीडिया का यलगार.

जैसे ही ये महिलाएं सड़कों पर आती हैं, पश्चिमी मीडिया (BBC, CNN, और अन्य) का पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है।

विक्टिम कार्ड: टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया पर 24 घंटे एक ही रट लगाई जाती है—"देखिए, यह हुकूमत अपनी ही बेटियों पर कितना जुल्म कर रही है।"

जो पुलिस या फौज मुल्क में अमन कायम रखने की कोशिश करती है, उसे "जालिम" और "कातिल" बनाकर पेश किया जाता है।

इस पूरे नैरेटिव को ऐसे बुना जाता है कि देखने वाले को लगे कि ये प्रदर्शनकारी महिलाएं बिल्कुल बेबस हैं और विदेशी ताकतें ही उनकी असली "खैर-ख्वाह" (Sympathizers/Saviors) हैं।

हमदर्दी का नाटक और 'एजेंट्स' का किरदार.

इस साजिश का सबसे खतरनाक पहलू वो "एजेंट्स" हैं जो आपकी अपनी जुबान बोलते हैं।
 ये लोग लंदन, पेरिस या न्यूयॉर्क में बैठे होते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसे पेश आते हैं जैसे वे आपके पड़ोसी हों।
अरबी, फारसी या उर्दू बोलने वाले ये ट्रेंड एजेंट्स (Trained Agents) वीडियो और पोस्ट्स के जरिए ख्वातीन को यकीन दिलाते हैं कि "इस्लाम और शरिया कानून तुम्हें कैद कर रहा है, बगावत करो तो तुम्हें असली हक मिलेगा।"

 हकीकत यह है कि इन्हें हर एक टवीट और हर एक भड़काऊ वीडियो के लिए मोटी रकम मिलती है। इनका मकसद आपकी आजादी नहीं, बल्कि आपके मुल्क को सीरिया, लीबिया या इराक की तरह आग में झोंकना है।

घर भी बर्बाद, मुल्क भी बर्बाद
ईरान हो या अरब मुल्क, जहाँ-जहाँ यह खेल खेला गया, वहां अंजाम क्या हुआ?
 वह "आजादी" तो कभी नहीं मिली जिसका वादा किया गया था, लेकिन मुल्क की अर्थव्यवस्था (Economy) और सुरक्षा (Security) तबाह हो गई।

ये विदेशी ताकतें सिर्फ तब तक साथ देती हैं जब तक हुकूमत गिर नहीं जाती। उसके बाद, उन्हीं महिलाओं को बे यारो - मददगार छोड़ दिया जाता है, और मुल्क खाना  जंगि  (Civil War) की आग में जलने लगता है।

बाहरी रिमोट कंट्रोल: यूके (UK) और यूरोप में बैठे लोग खुद को ईरान या अरब का स्थानीय नागरिक बताकर सड़कों पर उतरने और सरकार गिराने की अपील करते हैं।
 मकसद सिर्फ एक है—मुस्लिम मुल्कों में स्थिरता (Stability) को खत्म करना और उन्हें सीरिया या इराक जैसा बना देना।

सबक: अपनी आँखें खुली रखें- हक़ीक़त को पहचाने.
यह वाकया हमारे लिए एक चेतावनी (Eye-opener) है। सोशल मीडिया पर जो शोर-शराबा, जो नफरत, और जो "इस्लाम विरोधी" माहौल हमें दिखता है, वह हकीकत नहीं बल्कि एक मुहिम और मनसुबा (Simulation) है।

दुश्मन अब तलवार से नहीं, बल्कि कीबोर्ड और फेक आईडी से हमला कर रहा है। 
उसका मकसद आपकी पहचान, आपके दीन और आपके मुल्क की अमन व चैन को खत्म करना है। 
इसलिए, अगली बार जब आप इंटरनेट पर कोई भड़काऊ पोस्ट देखें, तो याद रखें हो सकता है कि 'समीर' या 'सारा' के नाम के पीछे कोई विदेशी एजेंसी बैठी हो जो आपको मोहरा बना रही है।

मुस्लिम ख्वातीन को यह समझना होगा कि जो विदेशी ताकतें फलस्तीन, कश्मीर और शाम (सीरिया) में हमारी बहनों के कत्ल पर खामोश रहती हैं, वे अचानक आपके "हक" के लिए इतनी फिक्रमंद क्यों हो गईं?

यह हमदर्दी नहीं, यह एक सियासी चाल है। अपनी ख्वातीन को पहचानें, अपने निजाम पर भरोसा रखें और इन रंग-बिरंगे एनजीओ और सोशल मीडिया के फरेब से अपने घर और मुल्क को महफूज रखें।

ट्विट्टर के नये अपडेट ने बेनकाब कर दिया ही उन चेहरों को जो यूरोप और इसराइल मे बैठ कर मुस्लिम हुकमराँ और इस्लामी शयार् के खिलाफ अवाम को उकसाते है, वे इसे उस मुल्क और खितते के अवाम का गुस्सा और  नाराजगी के तौर पर दिखाते थे, लेकिन मालूम हुआ के यह अवाम की नाराजगी नही बल्कि दुष्मनाँन ए इस्लाम का गुस्सा है। 
अवाम की नाराजगी हो सकती है इसमे कोई शक नही लेकिन वह हुकमरां के खिलाफ होगी निज़ाम के खिलाफ नही। 
और इतना बडी भी गुस्सा नही जिस तरह से से पूरे मुल्क का मसला बताया जाता था। 
जिस तरह से खवातीन को मजलुम के तौर पर और हुकमराँ को ज़ालिम और ज़ाबिर, औरतो का दुश्मन, खवातीन का मुखालिफ् के तौर पर दिखाया जाता था महज वह एक प्रोपगंडे का हिस्सा था जैसे उस्मानिया हुकूमत के खिलाफ अरबो मे क़ौम प्ररस्ति का ज़हर डाला अंग्रेजी खुफिया कमांडर ने, अरबो को खुदमुखतार और आज़ाद मुल्क का ख्वाब दिखाया ताकि इससे तुर्को के खिलाफ अरब को इस्तेमाल करके उसे तबाह कर दिया जाए, इसमे वे कामयाब भी हुए लेकिन अरबो को क्या हासिल हुआ? 

फ्रांस और बर्तानीया ने अरबो को धोका दिया फिर फिलिस्तीन को यहूदियों के हवाले कर दिया गया और इसराइल नाम का एक कील अरबो के सीने पे ठोक दिया गया। 

वह अब उनके गले की हड्डी बन गयी है, उनको वह आज़ादी जो उस्मानिया हुकूमत से चाहिए थी वही गुलामी इसराइल के हाथो मिल गयी, वे एक से निजात पाकर दूसरे के गुलाम हो गए। 
अंग्रेजो को तो मुसलमानो के अंदर फुट डाल कर काम लेना था, क्योंके सभी एक रहते तो मजबूत होते, मुसलमानो को आपस मे कैसे लडाया जाए, इस्लाम के नाम पर सब एक थे इसलिए नस्ल के नाम पर लडाया गया, एक तुर्क तो दूसरा अरब।

वही काम खवातीन् से लेना चाहते है, के दिखा सके के उसके अंदर ही खुद औरतों के साथ ना इंसाफी होता है, क्या वह मुसलमान नही है? अगर है तो ऐसा क्यो? 
यही जेहन साजि करने का पर्दाफाश एक अपडेट  ने कर दिया है। 
इससे खौफ खा कर खुद एलोन मुस्क ने इस फीचर को इसराइल वाले यूजर पर बंद कर दिया है।

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Fall of Fatimid Rule & Rise of Salahuddin Ayyubi.

From Fatimid Decline to Salahuddin’s Glory.

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ज़वाल से उरूज तक: फ़ातिमी से अय्यूबी का सफ़र.
"ज़वाल और उरूज—दोनों इंसानियत को याद दिलाते हैं कि हक़ और सब्र ही असली जीत है।" सलाहुद्दीन अय्यूबी का उरूज, इमान और हिम्मत से नई तारीख़ लिखी जाती है।

 फ़ातिमी हुकूमत  का ज़वाल और सलाहुद्दीन अय्यूबी का उरूज: तारीख़ का एक नया मोड़

फ़ातिमी हुकूमत , जो कभी शुमाली अफ़्रीक़ा (North Africa), मिस्र और शाम (Syria) पर अपनी शान-ओ-शौकत का सिक्का जमाए हुए थी, आख़िरकार 1171 ईसवी में अपने अंजाम को पहुंची  यह एक अज़ीम-उश-शान शिया सल्तनत थी, लेकिन वक्त की गर्दिश और सियासी कमज़ोरियों ने इसकी बुनियादों को खोखला कर दिया था। इसके ज़वाल के पीछे तवील अरसे से जारी अंदरूनी साज़िशें, फ़ौजी कमज़ोरियां और सलीबी जंगों (Crusades) का बढ़ता हुआ दबाव कारफ़रमा था.

 फ़ातिमी सल्तनत के बिखरने के असबाब
फ़ातिमी हुकूमत का खात्मा रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह एक तवील सिलसिले का नतीजा था। जब सलीबी ताक़तें बैत-उल-मुक़द्दस की तरफ बढ़ रही थीं, उस वक्त काहिरा के तख्त पर वो मज़बूती नहीं रही थी जो कभी अल-मुइज़्ज़ या अल-अज़ीज़ के दौर में हुआ करती थी।

 1. यरुशलम का सुकूत और दिफ़ाई नाकामी
1099 ईसवी में जब पहली सलीबी जंग अपने उरूज पर थी, फ़ातिमी हुकूमत यरुशलम (Jerusalem) का मुअस्सिर दिफ़ा करने में नाकाम रही। यह एक बहुत बड़ा धक्का था, जिसके नतीजे में न सिर्फ़ यरुशलम, बल्कि फ़िलिस्तीन और शाम के कई साहिली इलाक़े सलीबियों के क़ब्ज़े में चले गए. यह वाक़या फ़ातिमी ताक़त के बिखरने की एक वाज़ेह अलामत बन गया था।

 2. सियासी बोहरान और अंदरूनी इख़्तिलाफ़
बारहवीं सदी के वस्त तक आते-आते फ़ातिमी हुक्मरान महज़ कठपुतली बनकर रह गए थे, और असल ताक़त उनके वज़ीरों के हाथ में आ चुकी थी। अंदरूनी साज़िशों ने रियासत को इतना कमज़ोर कर दिया था कि कभी यह बग़दाद की अब्बासी ख़िलाफ़त के लिए ख़तरा थी, लेकिन अब खुद अपने वजूद के लिए जूझ रही थी।

 सलाहुद्दीन अय्यूबी की आमद और नया सियासी मंज़रनामा

इस नाज़ुक दौर में, जब मिस्र सियासी तौर पर कमजोर था, वहां एक नई क़ियादत का ज़हूर हुआ। यह दौर था नुरुद्दीन ज़ंगी का, जो शाम से सलीबियों के ख़िलाफ़ जिहाद का परचम बुलंद किए हुए थे। उनका मक़सद मिस्र को सलीबी असर से बचाना और दोबारा इस्लमिक दायरे में लाना था।

 शेरकोह और सलाहुद्दीन का किरदार
नुरुद्दीन ज़ंगी ने अपने क़ाबिल सिपहसालार शेरकोह और उनके भतीजे सलाहुद्दीन अय्यूबी को मिस्र भेजा। इन दोनों का मक़सद मिस्र के वज़ीरों की आपसी रंजिशों का फ़ायदा उठाकर वहां इस्लामी इत्तेहाद क़ायम करना था। शेरकोह की वफ़ात के बाद, सलाहुद्दीन को वज़ारत का ओहदा मिला। यह वो मौक़ा था जहां से तारीख़ ने एक नया मोड़ लिया।

 फ़ातिमी हुकुमत का ख़ात्मा और ख़ुत्बे की तब्दीली

सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपनी हिकमत-ए-अमली और सियासी बसीरत से धीरे-धीरे मिस्र में अपनी पकड़ मज़बूत की।

-आख़िरी हुकमरान का इंतक़ाल: 1171 ईसवी में जब आख़िरी फ़ातिमी हुकमरा अल-आज़िद (Al-Adid) का इंतक़ाल हुआ, तो यह फ़ातिमी दौर का रस्मी तौर पर ख़ात्मा साबित हुआ।

अब्बासी ख़ुत्बे की बहाली: सलाहुद्दीन ने इंतेहाई होशियारी से काम लेते हुए मिस्र की मस्जिदों में जुमे के ख़ुत्बे में फ़ातिमी हुकुमत के बजाय बग़दाद के अब्बासी हुकमरान का नाम शामिल करवा दिया। यह इस बात का ऐलान था कि मिस्र अब मज़हबी तौर पर दोबारा बग़दाद और सियासी तौर पर नुरुद्दीन ज़ंगी की रियासत के ज़ेरे-असर आ चुका है.

 अय्यूबी सल्तनत का क़याम: एक नई ताक़त का जहूर

नुरुद्दीन ज़ंगी के इंतक़ाल के बाद हालात ने फिर करवट ली। सलाहुद्दीन, जो अब तक ज़ंगी सल्तनत के वफ़ादार थे, ने महसूस किया कि सलीबियों का मुक़ाबला करने के लिए मिस्र और शाम का एक मज़बूत मरकज़ पर मुत्तहिद होना ज़रूरी है।

 1. इत्तेहाद की कामयाबी
सलाहुद्दीन ने बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक झंडे तले जमा किया। उन्होंने दमिश्क़, हलब और मिस्र को मिलाकर एक ऐसी ताक़तवर अय्यूबी सल्तनत (Ayyubi Empire) की बुनियाद रखी, जिसने सलीबी रियासतों के गिर्द घेरा तंग कर दिया।

 2. सलीबियों के लिए नई चुनौती
अय्यूबी सल्तनत के क़याम ने सलीबियों के लिए एक नई और दुश्वारगुज़ार रुकावट खड़ी कर दी। वो ताक़त जो पहले मिस्र और शाम के दरमियान बँटी हुई थी, अब एक मुट्ठी बनकर उभरी। इसी इत्तेहाद का नतीजा था कि आगे चलकर हत्तीन की जंग में मुसलमानों को अज़ीम फ़तह नसीब हुई।

 मुख़्तसर जायज़ा (Conclusion)

फ़ातिमी ख़िलाफ़त का ज़वाल और सलाहुद्दीन का उरूज महज़ एक हुकूमत का बदलना नहीं था, बल्कि यह मशरिक़-ए-वुस्ता (Middle East) के सियासी और मज़हबी नक़्शे की अज़-सरे-नौ तश्कील थी। इस तब्दीली ने सलीबी जंगों का रुख़ पूरी तरह मोड़ दिया। जिस मिस्र को सलीबी एक आसान निवाला समझ रहे थे, वही उनके ख़िलाफ़ इस्लामी मुक़ामात (Resistance) का सबसे मज़बूत क़िला बन गया। सलाहुद्दीन की क़ियादत ने उम्मत को यह पैग़ाम दिया कि इत्तेहाद और मज़बूत इरादों से ही तारीख़ का रुख बदला जा सकता है.
फ़ातिमी हुकूमत का ज़वाल, सबक़ देता है कि ताक़त हमेशा के लिये नहीं होती।

सलाहुद्दीन अय्यूबी के मशहूर ज़ेरे-अक़वाल जो हमे तारिकि मे रौशनि दिखाता है.

"मुल्कों को तलवार से नहीं, इंसाफ़ से फ़तह किया जाता है।"

"हक़ की राह में सब्र सबसे बड़ी जंग है।"

"इंसान की असली जीत उसके अख़लाक़ और रहमदिल दिल में है।"

"जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए कोई ताक़त रुकावट नहीं बन सकती।"

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Hazrat Usman Ghani (R.A): Biography, Life & Caliphate.

Who was Hazrat Usman Ghani (R.A)? Biography & Legacy.

Hazrat Usman Ghani (R.A) Full Biography and Life History.
Why is He Called Zun-Nurain? (Possessor of Two Lights)
Early Life and Acceptance of Islam.
The Caliphate of Hazrat Usman (Khilafat-e-Usmani).
Major Contributions (Compilation of the Holy Quran).
Martyrdom (Shahadat) of Hazrat Usman Ghani.
Life of Zun-Nurain: Hazrat Usman Ghani (R.A) Full Story.
Hazrat Usman (R.A): The 3rd Caliph & Quran Compilation.
Hazrat Usman Ghani (R.A) Biography: Life & Martyrdom.

किसी क़ौम या जमात की अजमत का अंदाजा इससे नही लगाया जाता है के वह कितनी ताक़तवर, अक़लमंद और बहादुर थी/है, बल्कि इससे के वह अपनी तारीख, तहजीब और शकाफत को कितना संभाल कर रखति है। तारीख खामोश नही रहती बल्कि वह बोलती है, हमे सिर्फ उसे सुनने का तजुर्बा होना चाहिए। उम्मत ए मुस्लेमा का ज़वाल उस वक़्त शुरू हुआ जब उन्होंने इल्म और तलवार को छोड़कर गैरो की मुसाबिहत् इख़्तियार कर लिया। अंग्रेजो के दस्तरखवाँ पर छोड़ा हुआ हड्डी को खाने पर टूट पड़ा। उम्मत की ताक़त उसके अफराद मे नही, बल्कि उसके इत्तेहाद्द और अखलाकी किरदार मे है। मुसलमानो को तारीख मे अपना खोया हुआ मुक़ाम हासिल करने के लिए अपनी बुनियादी उसूलो यानी कुरान व सुन्नत को अपनाना होगा, उसी पर अमल करना और नक़्श ए कदम पर चलना होगा। उम्मत ए मुस्लेमा का एक फर्द होना फलसफा है, जिसका मकसद तमाम इंसानियत के लिए रहमत और रहनुमाई का नमुना पेश करना है।
This post has been shared with the full permission of the original author, who encouraged its publication to spread Islamic knowledge and reflections. All views and insights are credited to the author, whose intention is to benefit the Ummah through thoughtful sharing.

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 ​﷽
سیـدنا عثمـان رضی اللہ عنہ
شہید اسلام دامادِ رسول خلیفہ ثالث سیدنا عثمان غنی رضی اللہ عنہ
خلیفہ سوم سیدنا عثمان غنی رضى اللہ عنہ کا تعلق قریش کے معزز قبیلے سے تھا۔ والد عفان کو قدر کی نگاہ سے دیکھا جاتا تھا۔
 سلسلہ نسب عبد المناف پر رسول اللہ صلى اللہ علیہ وسلم سے جا ملتا ہے ۔
سیدنا عثمان ذوالنورین رضى اللہ عنہ کی نانی نبی پاک کی پھوپھی تھیں۔

* آپ رضى اللہ عنہ کا نام عثمان اور لقب ” ذوالنورین “ ہے۔ اسلام قبول کرنے والوں میں آپ رضى اللہ عنہ ” السابقون الاولون “ کی فہرست میں شامل تھے، آپ رضى اللہ عنہ نے خلیفہ اول سیدنا سیدنا ابوبکر صدیق رضى اللہ عنہ کی دعوت پر اسلام قبول کیا تھا۔*

طبقات ابن سعد کے مطابق
آپ رضى اللہ عنہ نے چوتھے نمبر پر اسلام قبول کیا ۔

*رسولِ اکرم صلى اللہ علیہ وسلم پر ایمان لانے اور کلمہ حق پڑھنے کے جرم میں سیدنا عثمان غنی رضى اللہ عنہ کو ان کے چچا حکم بن ابی العاص نے لوہے کی زنجیروں سے باندھ کر دھوپ میں ڈال دیا،*

کئی روز تک علیحدہ مکان میں بند رکھا گیا، چچا نے آپ رضى اللہ عنہ سے کہا کہ جب تک تم نئے مذہب (اسلام ) کو نہیں چھوڑو گے آزاد نہیں کروں گا۔

*یہ سن کر آپ رضى اللہ عنہ نے جواب میں فرمایا کہ:-*

چچا ! اللہ کی قسم میں مذہب اسلام کو کبھی نہیں چھوڑ سکتا اور اس ایمان کی دولت سے کبھی دستبردار نہیں ہوں گا۔
*سیدنا عثمان غنی رضى اللہ عنہ اعلی سیرت و کردار کے ساتھ ثروت و سخاوت میں بھی مشہور تھے ۔*

*رسول اللہ صلى اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ:-*

جنت میں ہر نبی کا ساتھی و رفیق ہوتا ہے میرا ساتھی ”عثمان “ رضى اللہ عنہ ہوگا۔

*سیــدنا عثمـان بن عفـان رضی اللہ عنـہ اصحـاب رسولﷺ میـں تیسری معــــزز ترین شخصیت:*

عَنْ ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، ‌‌‌‌‌‏قَالَ:‌‌‌‏ "كُنَّا نُخَيِّرُ بَيْنَ النَّاسِ فِي زَمَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ،‌‌‌‏ فَنُخَيِّرُ أَبَا بَكْرٍ، ‌‌‌‌‌‏ثُمَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ، ‌‌‌‌‌‏ثُمَّ عُثْــمَانَ بْنَ عَفَّانَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ".

*عبداللہ بن عمـرؓ فرماتے ہیـں :*
نبی کریم صلی اللہ علیہ وسلم کے زمانــہ ہی میں جب ہمیں صحـــابہ کے درمیان انتخــاب کے لیے کہا جاتا تو سب میں افضـــل اور بہتـــر ہم ابوبکر صـدیق رضی اللہ عنہ کو قـــرار دیتے، پھر عمـــر بن خــطاب رضی اللہ عنہ کو پھر عثمان بن عــــفان رضی اللہ عنہ کو۔
*صحیح البخـاری : ٣٦٥٥*

سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ کے دائرہ اسلام میں آنے کے بعد نبی اکرم صلى اللہ علیہ وسلم نے کچھ عرصہ بعد اپنی صاحب زادی سیدہ رقیہ رضى اللہ عنہا کا نکاح آپ سے کردیا۔

*جب کفار مکہ کی اذیتوں سے تنگ آکر مسلمانوں نے نبی کریم صلى اللہ علیہ وسلم کی اجازت اور حکم الہی کے مطابق ہجرت حبشہ کی تو سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ بھی مع اپنی اہلیہ سیدہ رقیہ رضى اللہ عنہا حبشہ ہجرت فرما گئے،*

مگر جب یہ غلط افواہ پھیلی کہ کفار قریش مسلمان ہوگئے ہیں اور حالات سازگار ہوگئے ہیں تو دوسرے مسلمانوں کی طرح سیدناعثمان غنی رضى اللہ عنہ بھی واپس آگئے ۔

*جب ہجرت مدینہ کا حکم ہوا تو سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ اپنے اہل و عیال کے ساتھ مدینہ منورہ تشریف لے گئے،*
وہاں بھی آپ رضى اللہ عنہ نے تجارت کی اور کامیاب تاجر ثابت ہوے۔ ان دنوں مدینہ منورہ میں پانی کی قلت تھی جس پر سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ نے نبی پاک صلی اللہ علیہ و سلم کی اجازت سے پانی کا کنواں خرید کر مسلمانوں کے ليے وقف فرمایا۔
*غزوہ بدر میں سیدنا رقیہ رضى اللہ عنہا کی علالت کے سبب نبی اکرم صلى اللہ علیہ وسلم کی اجازت سے نہ جا سکے ۔*
غزوئہ احد اور خندق میں شریک ہوئے ۔
جب سیدہ رقیہ رضى اللہ عنہا کا انتقال ہوا تو پیارے آقا صلى اللہ علیہ وسلم نے دوسری صاحبزادی سیدہ ام کلثوم رضى اللہ عنہا کو آپ کی زوجیت میں دے دی۔

 اس طرح آپ رضى اللہ عنہ کا لقب ” ذوالنورین“ یعنی دو نور والے معروف ہوا۔
(اہل بیت عظام رضی اللہ عنہم اور خاندانِ عثمان غنی رضی اللہ عنہ کے مابین رشتہ داریوں کی تفصیل ملاحظہ ہو )
جب رسول اکرم صلى اللہ علیہ وسلم نے زیارت خانہ کعبہ کا ارادہ فرمایا*
تو حدیبیہ کے مقام پر یہ علم ہواکہ قریش مکہ آمادہ جنگ ہیں ۔ اس پر آپ صلى اللہ علیہ وسلم نے سیدنا عثمان غنی رضى اللہ عنہ کو سفیر بنا کر مکہ بھیجا۔

قریش مکہ نے سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ کو روکے رکھا تو افواہ پھیل گئی کہ سیدناعثمان غنی رضى اللہ عنہ کو شہید کردیا گیا ہے ۔
* اس موقع پر چودہ سو صحابہ رضى اللہ عنہم سے نبی اکرم صلى اللہ علیہ وسلم نے بیعت لی کہ سیدناعثمان رضى اللہ عنہ کا قصاص لیا جائے گا ۔ یہ بیعت تاریخ اسلام  میں ” بیعت رضوان “ کے نام سے معروف ہے ۔

قریش مکہ کو جب صحیح صورت حال کا علم ہوا تو آمادہ صلح ہوگئے اور سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ واپس آگئے۔

غزوہ تبوک میں جب رسول اللہ صلى اللہ علیہ وسلم نے مالی اعانت کی اپیل فرمائی

تو سیدنا عثمان غنی رضى اللہ عنہ نے تیس ہزار فوج کے ایک تہائی اخراجات کی ذمہ داری لے لی ،

اس موقع پر آپ صلى اللہ علیہ وسلم اتنا خوش اور راضی ہوئے کہ اسی وقت کئی مرتبہ آپ نے سیدنا عثمان کو جنت کی خوشخبری دی۔

رسول اکرم صلى اللہ علیہ وسلم کے ” خطبہ حجہ الوداع “ کے موقع پر سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ آپکے ہمراہ تھے ۔
آپ رضی اللہ عنہ خلیفہ اول سیدنا ابوبکر صدیق رضى اللہ عنہ کی مجلس مشاورت کے اہم رکن تھے ۔

سیدنا عمر رضى اللہ عنہ کی خلافت کا وصیت نامہ آپ رضى اللہ عنہ نے ہی تحریر فرمایا ۔

دینی معاملات پر آپ رضى اللہ عنہ کی رہنمائی کو پوری اہمیت دی جاتی ۔

 سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ صرف کاتب وحی ہی نہیں تھے بلکہ قرآن مجید آپ کے سینے میں محفوظ تھا۔ آیات قرآنی کے شان نزول سے خوب واقف تھے ۔

بطور تاجر دیانت و امانت آپ کا طرئہ امتیاز تھا۔ نرم خو تھے اور فکر آخرت ہر دم پیش نظر رکھتے تھے۔
نبی پاک صلى اللہ علیہ وسلم کا ارشاد ہے :-
عثمان رضى اللہ عنہ کی حیا سے فرشتے بھی شرماتے ہیں ، تبلیغ و اشاعت اسلام کے ليے فراخ دلی سے دولت صرف فرماتے۔

عام طور پر دن کو روزہ رکھتے، رات ریاضت و عبادت میں گزارتے ۔ ہر جمعہ کو ایک غلام آزاد کرتے ۔ یتیموں، بیواﺅں اور مسکینوں کی مسلسل خبر گیری فرماتے ۔
ابن عساکر نے زید بن ثابت رضى اللہ عنہ سے روایت کی ہے کہ نبی کریم صلى اللہ علیہ وسلم نے فرمایا:
”میرے پاس سے جب عثمان رضى اللہ عنہ گزرے تو میرے پاس فرشتہ بیٹھا ہوا تھا۔ اس فرشتہ نے کہا کہ یہ شہید ہیں ان کو قوم شہید کر دے گی مجھے ان سے شرم آتی ہے“ ۔

ام المومنین سیدناعائشہ رضى اللہ عنہا سے روایت ہے کہ:-
جب سیدنا عثمان رضى اللہ عنہ ہمارے پاس آتے تو اللہ کے نبی صلى اللہ علیہ وسلم اپنے لباس کو درست فرما لیتے اور فرماتے تھے کہ اس سے کس طرح شرم نہ کروں جس سے فرشتے بھی شرم کرتے ہیں ۔

آپ صلى اللہ علیہ وسلم نے فرمایا:-

کہ اے عثمان رضى اللہ عنہ اللہ تعالی تجھے خلافت کی قمیص پہنائیں گے ، جب منافق اسے اتارنے کی کوشش کریں تو اسے مت اتارنا یہاں تک کہ تم مجھے آملو۔

چنانچہ جس روز آپ رضى اللہ عنہ کا محاصرہ کیا گیا تو آپ رضى اللہ عنہ نے فرمایا:
کہ مجھے حضور صلى اللہ علیہ وسلم نے عہد لیا تھا ( کہ منافق خلافت کی قمیص اتارنے کی کوشش کریں گے تم نہ اتارنا ) اس ليے میں اس پر قائم ہوں اور صبر کر رہا ہوں ۔

 35ھ میں ذی قعدہ کے عشرہ میں باغیوں نے سیدنا عثمان ذوالنورین کے گھر کا محاصرہ کیا اور آپ رضى اللہ عنہ نے صبر اوراستقامت کا دامن نہیں چھوڑا ،
صحیح بخاری میں آپکی شہادت کا واقعہ تفصیل کے ساتھ موجود ہے،

محاصرہ کے دوران آپ رضى اللہ عنہ کا کھانا اور پانی بند کردیا گیا تقریبا چالیس روز بھوکے پیاسے 82 سالہ مظلوم مدینہ سیدنا عثمان ذوالنورین کو جمعة المبارک 18ذو الحجہ کو انتہائی بے دردی کے ساتھ روزہ کی حالت میں قرآن پاک کی تلاوت کرتے ہوے ظالموں نے شہید کردیا گیا ،

اسلامی تاریخ میں آپکی شہادت کو انتہائی معصوم و مظلوم شہادت کے نام سے جانا جاتا ہے ، شہادت سے کچھ پہلے آپ رضی اللہ عنہ کو خواب میں رسول ِ اکرم کی زیارت بھی ہوئی۔`
ﷲ تعالیٰ آپ پر بے شمار رحمتیں نازل فرمائے ، اور امت ِ مسلمہ کو آپکی سیرت پر چلنے کی توفیق عطا فرمائے۔
آمیــن یــا رب العالمیــن-

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Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 1.

Khilafat Hazrat Abu Bakr R.A | Islamic History Part 1. Early life

Tarikh E Islam. Hazrat Abu Bakr Razi Allahu Anahu. Part-1
Islam ke Pahle Khalifa Hazrat Abu Bakr Razi Allahu Anahu.
Caliphate of Hazrat Abu Bakr (R.A) – Part 1.
Khilafat-E-Siddique, Daur e Sahaba, Pahle Khalifa HAzrat Abu bakr razi allahu anahu, first khalifa islam
Islamic History: Daur-E-Sahaba.
 تاریخ اسلام۔ عہدِ خلافتِ صدیقیؓ، قسط: (01) 
حضرت ابوبکرصدیق رضی اللہ عنہ:
ابتدائی حالات:
حضرت ابوبکرؓ قبیلہ تیم بن مرہ بن کعب سے تعلق رکھتے تھے، ان کا نسب آٹھویں پشت پر مرہ پر جا کر رسول اللہ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم سے مل جاتاہے، تفصیل یہ ہے:

کلاب، قصی، عبدمناف، ہاشم، عبدالمطلب، عبداللہ، محمد رسول اللہ ﷺ۔
مرہ، تیم، سعد، کعب، عمرو، عامر، عثمان ابوقحافہ، ابوبکرصدیقؓ۔

مکہ میں بسنے والے تمام قبائل کو کعبہ کے مناصب میں سے کوئی نہ کوئی منصب ضرور سپرد ہوتاتھا، بنو عبد مناف کے سپرد حاجیوں کے لیے پانی بہم رسائی اور انہیں آسائش پہنچانے کے انتظامات موجود تھے، بنو عبدالدار کے ذمے جنگ کے وقت عَلم برداری کعبہ کی دربانی اور دارالندوہ کا انتظام تھا، لشکروں کی سپہ سالاری خالد بن ولید کے اجداد بنو مخزوم کے حصے میں آئی تھی، خون بہا اور دیتیں اکٹھا کرنا بنو تیم بن مرہ کا کام تھا، جب ابوبکرؓ جوان ہوئے تو یہ خدمت ان کے سپرد کی گئی، خوں بہا اور دیتوں کے تمام مقدمات ان کے سامنے پیش ہوتے تھے اور جو فیصلہ وہ کرتے تھے اسے قریش کو منظور کرنا ہوتا تھا، خون بہا کے متعلق تمام اموال بھی ان کے پاس جع ہوتے تھے، اگر ان کے سوا کسی اور شخص کے پاس جمع ہوتے تھے تو قریش اسے تسلیم نہ کر تے تھے۔

بنو تیم کے جو اوصاف کتابوں میں بیان ہوئے ہیں وہ دوسرے قبائل سے کچھ زیادہ مختلف نہیں، ان میں کوئی ایسا وصف مخصوص نہ پایاجاتا تھا جو انہیں ان کے ہم عصر دوسرے قبائل سے ممتاز کر سکے، شجاعت، سخاوت، مروت، بہادری اور ہمسایوں کی حمایت و حفاظت کی جو صفات دوسرے قبائل عرب میں موجود تھیں، وہی بنوتیم میں بھی موجود تھیں۔

*نام، لقب اور کنیت:
حضر ت صدیقؓ کا نام عبداللہ تھا اور کنیت ابوبکرؓ، والد کی کنیت ابوقحافہ تھی اورنام عثمان بن عامر۔ والدہ کی کنیت ام الخیر تھی اور نام سلمیٰ بنت صخر بن عامر۔

بعض کتابوں میں لکھا ہے کہ اسلام لانے سے قبل ابوبکرؓ کا نام عبدالکعبہ تھا، لیکن اسلام قبول کرنے کے بعد رسول اللہ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم نے یہ مشر کانہ نام تبدیل کر کے عبداللہ رکھ دیا، بعض روایات کے مطابق انہیں عتیق بھی کہتے تھے، وجہ یہ تھی کہ آپ کی والدہ کے لڑکے زندہ نہ رہتے تھے، انہوں نے نذر مانی کہ اگر ان کے لڑکا پیدا ہوا اور زندہ رہا تو وہ اس کا نام عبدالکعبہ رکھیں گی اور اسے کعبہ کی خدمت کے لیے وقف کر دیں گی، چنانچہ جب ابوبکرؓ پیدا ہوئے تو انہوں نے نذر کے مطابق ان کا نام عبدالکعبہ رکھا، جوان ہونے پر وہ عتیق (آزاد کردہ غلام) کے نام سے موسوم کیے جانے لگے، کیونکہ انہوں نے موت سے رہائی پائی تھی، بعض راویوں کا کہنا ہے کہ عتیق کے لقب انہیں نہایت سرخ و سفید ہونے کے باعث دیا گیا اور روایات میں آتا ہے کہ ان کی بیٹی حضرت عائشہ صدیقہؓ سے بعض لوگوں نے پوچھا کہ ان کے والد کو عتیق کیوں کہا جاتا ہے تو انہوں نے فرمایا:

*’’ایک مرتبہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم نے ان کی طرف دیکھا اور فرمایا: ھذا عتیق اللہ من النار (اللہ کا یہ بندہ آگ سے آزادہ شدہ ہے)۔‘‘*

یہ روایت اس طرح بھی آئی ہے کہ ایک مرتبہ ابوبکرؓ چند لوگوں کے ساتھ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم کی خدمت میں حاضر ہوئے، انہیں دیکھ کر آپ نے فرمایا:

’’جو چاہتا ہو کہ آگ سے آزاد شدہ بندہ دیکھے وہ ابوبکر کو دیکھ لے، ابوبکرؓ ان کی کنیت تھی اور عمر بھر اپنی کنیت ہی سے موسوم کیے جاتے رہے، لیکن اس کنیت کا حقیقی سبب معلوم نہ ہو سکا، بعد میں آنے والے مؤرخین کہتے ہیں، یہ کنیت اس لیے پڑی کہ آپ سب سے پہلے اسلام لائے،،

*بچپن او ر جوانی:*
بچپن کا زمانہ انہوں نے اپنے دوسرے ہم سن بچوں کے ساتھ مکہ کی گلیوں میں کھیلتے گزارا، جوان ہونے پر ان کی شادی قتیلہ بنت عبدالعزیٰ سے ہوئی، ان سے عبداللہ اور اسماء پیدا ہوئے، اسماء کا لقب بعد میں ذات النطاقین قرار پایا، قتیلہ کے بعد انہوں نے ام رومان بنت عامر بن عویمر سے شادی کی ان سے عبدالرحمن اور عائشہؓ پیدا ہوئے، اس کے بعد مدینہ آ کر پہلے انہوں نے حبیبہ بنت خارجہ سے شادی کی، پھر اسماء بنت عمیس سے اسماء کے بطن سے محمد پیدا ہوئے۔

مؤرخین نے اس کنیت سے مشہور ہونے کی ایک اور وجہ بھی لکھی ہے کہ عربی میں بکر جوان اونٹ کو کہتے ہیں، چونکہ انہیں اونٹوں کی غور و پرداخت سے بہت دلچسپی تھی اور ان کے علاج و معالجے میں بہت واقفیت رکھتے تھے، اس لیے لوگوں نے انہیں ابوبکرؓ کہنا شروع کر دیا، جس کے معنی ہیں اونٹوں کا باپ۔

*پیشہ، حلیہ اور اخلاق و عادات:*
قریش کی ساری قوم تجارت پیشہ تھی اور اس کا ہر فرد اسی شغل میں مشغول تھا، چنانچہ ابوبکرؓ بھی بڑے ہو کر کپڑے کی تجارت شروع کر دی جس میں انہیں غیر معمولی فروغ حاصل ہوا اور آپ کا شمار بہت جلد مکے کے نہایت کامیاب تاجروں میں ہونے لگا، تجارت کی کامیابی میں ان کی جاذب نظر شخصیت اور بے نظیر اخلاق کو بھی بڑا خاصا دخل تھا۔ ان کارنگ سفید، بدن دبلا، داڑھی خشخاشی، چہرہ
شگفتہ، آنکھیں روشن اور پیشانی فراخ تھی، وہ بہترین اخلاق کے مالک، رحمدل اور نرم خو تھے، ہوش و خرد، عاقبت اندیشی اور بلندیٔ فکر و نظر کے لحاظ سے مکہ کے بہت کم لوگ ان کے ہم پلہ تھے، عقل و خرد جہاں انسان کے قلب و نظر کو جلا بخشتی ہے وہاں بسا اوقات بے راہ روی کا موجب بھی ہو جاتی ہے، لیکن اللہ کی طرف سے ابوبکرؓ کو قلب سلیم ودیعت ہوا تھا، اسی لیے وہ اپنی قوم کے اکثر گمراہ کن اعتقادات اور اسلام دونوں زمانوں میں شراب کا قطرہ تک نہ چکھا اور حالانکہ اہلِ مکہ شراب کے عادی ہی نہیں بلکہ عاشق تھے، ابن ہشام اپنی سیرت میں ان کے اخلاق کا ذکر کرتے ہوئے لکھتے ہیں:

’’ابوبکر! اپنی قوم میں بہت ہر دل عزیز تھے، علم الانساب کے بہت بڑے ماہر تھے، قریش مکہ کے تمام خاندان کے نسب انہیں ازبر یاد تھے اور ہر قبیلے کے عیوب ونقائص اور محامد و فضائل سے بخوبی واقف تھے، اس وصف میں قریش کا کوئی فرد ان کا مقابلہ نہ کر سکتاتھا، وہ خلیق، ایمان دار اور ملنسار تاجر تھے، قوم کے تمام لوگ ان کے اعلیٰ اخلاق اور عمدہ برتاؤ کے معترف تھے اور انہیں فضائل کے باعث ان سے بے حد محبت کرتے تھے‘‘۔
=========> جاری ہے ۔۔۔
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Kya Namaj Me Sajda Ke Dauran Apni Juban Me Dua Padh Sakte Hai?

Kya Farz Namaj Me Sajda Ke Dauran Apni Juban me Dua Padh Sakte Hai?

Kya Sajda ya Rukoo Me Qurani Duawayein Nahi Padh Sakte Hai? 
This Islamic post has been published with the full consent of the original author, who has expressly permitted its sharing to spread beneficial knowledge. The author’s intention is to educate and inspire through their thoughts and reflections. All rights remain with the original creator.
   Author: الفرقان اسلامک میسج سروس
  Reference: آفیشل ویب سائٹ
Sajde me dua, Namaj Me Dua, Dua ka tarika, Namaj-E-Nabwi, Namaj ki ahamiyat,
Sajda Me Apni Juban Se Dua Mangna.
"سلسلہ سوال و جواب نمبر-389"
سوال : کیا فرض نماز میں سجدہ کے دوران اپنی زبان میں دعا پڑھی جا سکتی ہے؟ اور سنا ہے کہ سجدہ رکوع میں قرآن پڑھنا منع ہے تو کیا سجدہ و رکوع میں قرآنی دعائیں بھی نہیں پڑھ سکتے.؟
*جواب :*
*الحمدللہ..!*
*اس بات میں کوئی شک نہیں کہ سجدہ کی حالت میں انسان اللہ کے قریب ترین ہوتا ہے اور یہ دعا کی قبولیت کا ایک موقع بھی ہے یعنی سجدہ ایک ایسی حالت ہے کہ جس میں اللہ تعالیٰ اپنے بندے کی دعا قبول فرماتا ہے،*
 ارشاد نبوی ہے
📚عن ابی ہریرة رضی اللہ عنہ ان رسول اللہ صلی اللہ علیہ و سلم قال:
أَقْرَبُ ما يَكونُ العَبْدُ مِن رَبِّهِ، وهو ساجِدٌ، فأكْثِرُوا الدُّعاءَ.
ابو ہریرہ رضی اللہ عنہ سے مروی ہے کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا : ''بندہ اپنے رب کے قریب ترین اسوقت ہوتا ہے جسوقت وہ سجدے کی حالت میں ہو ، لہذا سجدے کی حالت میں زیادہ سے زیادہ دعا کرو'' 
(صحیح مسلم، کتاب الصلاة باب ما یقال فی الرکوع و السجود رقم الحدیث :482)
(سنن ابو داؤد -875)

📚ایک دوسری راویت میں ان الفاظ کی زیادتی بھی ہے:
''و اما السجود فاجتھدوا فی الدعاء فقمن ان یستجاب لکم'' 
ترجمہ: ''سجدے میں زیادہ سے زیادہ دعا کی کوشش کرو عین ممکن ہے کہ تمہاری دعا قبول ہو جائے' (صحیح مسلم -479)

*باقی رہا یہ مسئلہ کہ اپنی زبان میں دعا کر سکتے ہیں یا نہیں؟ تو اس مسئلہ میں اگر نمازی کو عربی میں دعائیں یاد ہیں اور مسنون صحیح دعائیں ہیں تو ان دعاؤں کے پڑھنے کی افضلیت میں سب متفق ہیں لیکن ایک مسلمان جس کو عربی میں کوئی دعا یاد نہیں ایسے شخص کے متعلق علماء کا اختلاف ہے بعض علماء اس کو جائز قرار دیتے ہوئے دلیل یہ دیتے ہیں کہ مذکورہ حدیث مطلق ہے اس میں کوئی قید نہیں کہ عربی میں دعا کرو یا عجمی زبان میں رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے اس کی حد بندی نہیں کی لہذا فرض نماز کے سجدے میں دعا مانگی جاسکتی ہے، چاہے جس زبان میں مانگیں*

*جبکہ دوسری جانب بعض علماء کہتے ہیں کہ یہ نفل نماز میں جائز ہے فرض میں نہیں کیونکہ یہ ''کلام الناس '' لوگوں کی باتیں ہیں، اور یہ نماز میں جائز نہیں ہیں جیسے کہ مندرجہ ذیل روایت میں ہے*

📚معاویہ بن حکم سلمی رضی اللہ بیان کرتے ہیں کہ میں رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے ساتھ باجماعت نماز ادا کررہا تھا کہ ایک شخص نے چھینک لی اور الحمد للہ کہا ، اس پر میں نے جواباً یرحمک اللہ کہہ دیا اس کے رد عمل میں لوگوں نے مجھے گھور گھور کر دیکھنا شروع کیا ، میں نے(نماز ہی میں لوگوں سے)کہا : کیا بات ہے تم مجھے ایسے کیوں دیکھ رہے ہو ؟ اب لوگوں نے اپنی رانوں پر مجھے خاموش کروانے کیلئے ہاتھ مارنا شروع کیے میں نے دیکھا کہ لوگ مجھے خاموش کروا رہے ہیں تو میں خاموش ہو گیا ، جب رسول اللہ صلی اللہ علیہ نے نماز مکمل کی(میرے ماں باپ آپ صلی اللہ علیہ وسلم پر قربان ہوں میں نے آپ جیسا استاد اور معلم کہیں نہیں دیکھا اللہ کی قسم نہ آپ نے مجھے مارا اور نہ ہی ڈانٹا اور نہ ہی گالی دی ) آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا
''ان ھذہ الصلاة لا یصلح فیھا شیء من کلام الناس انما ھو التسبیح و التکبیر و قراء ة القرآن '' 
یہ نماز ہے اس میں لوگوں سے باتیں کرنا صحیح نہیں ہے یہ نماز تسبیح (سبحان اللہ کہنا ) اور تکبیر (اللہ اکبر کہنا) اور قرآن مجید کی تلاوت کرنے کا نام ہے۔
(صحیح مسلم ، کتاب المساجد ، باب تحریم الکلام فی الصلاةو نسخ ماکان من اباحتہ ،
حدیث نمبر -537)
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العلماء کی فتاویٰ ویبسائٹ پر یہ سوال کیا گیا کہ
📒سوال (3335)
اگر کوئی شخص عربی نہیں جانتا ہے یا اسے صرف فاتحہ ہی آتی ہے تو کیا وہ اپنی زبان میں نماز میں دعائیں مانگ سکتا ہے، اکثر عرب علمائے کرام اس کے جواز کا فتویٰ صادر فرما رہے ہیں۔

جواب از: فضیلۃ العالم ڈاکٹر ثناء اللہ فاروقی حفظہ اللہ 

نہیں!  اپنی زبان میں دعائیں نہیں مانگ سکتا بلکہ وہ قراءت کی جگہ سبحان الله الحمدللہ اللہ اکبر لا الہ الا اللہ پڑھ لے ،
📚سیدنا رفاعہ بن رافع رضى اللہ تعالى عنہ سے مروی مسيئى الصلاۃ يعنى جو شخص صحيح طريقہ سے نماز ادا نہيں كر رہا تھا والى حديث ميں ہےـ بيان كرتے ہيں كہ اسے رسول كريم صلى اللہ عليہ وسلم نے فرمايا:

“فإن كان معك قرآن فاقرا وإلا فاحمد الله وكبره وهلله”
” اگر آپ كو كچھ قرآن ياد ہو تو وہ پڑھو، وگرنہ الحمد للہ، اللہ اكبر، اور لا الہ الا اللہ كہو ”
سنن ترمذى حديث نمبر ( 302 )
 امام ترمذى نے اسے حسن كہا ہے، سنن ابو داود حديث نمبر ( 858 ) علامہ البانى رحمہ اللہ تعالى نے صحيح ابو داود حديث نمبر (767 ) ميں اسے صحيح قرار ديا ہے.
_______&_________
*لہٰذا صحیح بات یہی لگتی ہے کہ نماز فرض ہو یا نفل، ہے تو نماز ہی، اور نماز میں ہم اپنے رب سے باتیں کر رہے ہوتے ہیں جسکا طریقہ نبی کریم صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم نے ہمیں سکھلایا ہے عربی زبان میں مسنون دعائیں پڑھ کر، اور عام کلام سے منع کیا گیا ہے،لہذا بہتر یہی ہے کے سجدہ و رکوع میں مسنون عربی دعائیں ہی پڑھیں اور عربی زبان کے علاوہ کسی اور زبان میں دعا نہ کی جائے یہاں تک کہ کوئی صریح نص قرآن و حدیث سے ثابت ہو۔۔ہاں اگر کوئی نیا مسلمان ہوا ہے یا اسکو عربی کی دعائیں یاد نہیں ہو رہی وہ کوشش کرتا رہے ساتھ میں ۔۔ اور جب تک یاد نا ہو جائیں تب تک وہ الحمدللہ ، اللہ اکبر۔۔۔۔ کہہ لے، جیسا کہ اوپر حدیث میں ۔۔۔ہے اور اگر کسی شخص کو یہ الفاظ بھی یاد نا ہوں یا وہ عربی بول نا سکتا ہو تو جب تک وہ سیکھ نہیں لیتا تب تک اپنی مادری زبان میں دعائیں پڑھ لے لیکن یہ اجازت بہت مجبوری میں ہونی چاہیے*
(واللہ اعلم باالصواب )
ـــــــــــــ&ــــــــــــ
*دوسرا حصہ سوال کا تھا کہ سجدہ و رکوع میں قرآنی دعائیں پڑھنا کیسا ہے؟*
تو عرض ہے کہ رکوع اور سجدہ میں قرآن مجید کی آیات کی تلاوت کرنا ممنوع ہے، لیکن اگر اسکی نیت بطورِ دعا  ہے تو سجدہ و رکوع میں قرآنی دعائیں پڑھی جا سکتی ہیں۔ حدیث کے مطابق، رکوع میں اللہ کی عظمت بیان کرنی چاہیے اور سجدے میں خوب دعا کرنی چاہیے، کیونکہ اس وقت انسان اللہ کے سب سے قریب ہوتا ہے،

جیسا کہ حدیث میں ہے!
📚سیدنا عبداللہ بن عباس (رض) بیان کرتے ہیں کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے (بیماری کی حالت میں اپنے دروازے کا) پردہ اٹھایا (اس وقت) لوگ ابوبکر رضی اللہ عنہ کے پیچھے صف بستہ تھے۔ آپ نے فرمایا: ”لوگو! نبوت کی بشارتوں میں سے اب صرف سچے خواب باقی رہ گئے ہیں جو مسلمان خود دیکھے گا یا اس کے لیے (کسی دوسرے کو) دکھایا جائے گا۔ خبردار رہو! بلاشبہ مجھے رکوع اور سجدے کی حالت میں قرآن پڑھنے سے منع کیا گیا ہے، جہاں تک رکوع کا تعلق ہے اس میں اپنے رب عزوجل کی عظمت و کبریائی بیان کرو اور جہاں تک سجدے کا تعلق ہے اس میں خوب دعا کرو، (یہ دعا اس) لائق ہے کہ تمہارے حق میں قبول کر لی جائے۔“ امام مسلم کے اساتذہ میں سے ایک استاد ابوبکر بن ابی شیبہ نے حدیث بیان کرتے ہوئے (”مجھے سلیمان نے خبر دی“ کے بجائے) سلیمان سے روایت ہے، کہا۔
(صحيح مسلم/كتاب الصلاة/حدیث:479) 
( سنن ابو داؤد حدیث نمبر- 876)
(سنن نسائی حدیث نمبر -1046)

📒اس حدیث کی بنا پر ركوع اور سجدہ ميں قرآت كرنے كى كراہت پر علماء كرام كا اتفاق ہے. ديكھيں: المجموع ( 3 / 411 ) 
اور المغنى لابن قدامۃ المقدسى (2 / 181)

📒اس ميں حكمت يہ ہے كہ:
اس ليے كہ نماز كا افضل ترين ركن قيام ہے، اور افضل ترين ذكر قرآن ہے اس ليے افضل كو افضل كے ليے ركھا گيا، اور اس كے علاوہ كسى دوسرے ميں پڑھنے ميں منع كر ديا گيا تا كہ باقى اذكار كے ساتھ اس كى برابرى كا واہمہ نہ ہو. (ماخوذ از: عون المعبود شرع سنن ابو داود

📒اور ايک قول يہ بھى ہے:
اس ليے كہ قرآن مجيد اشرف الكلام ہے، كيونكہ يہ كلام اللہ ہے، اور ركوع و سجود كى حالت بندے كى جانب سے عاجزى و ذل ہے، لہذا ادب يہ ہے كہ ان دونوں حالتوں ميں قرآن مجيد كى تلاوت نہ كى جائے.
ديكھيں: مجموع الفتاوى ( 5 / 338 ).

*سجدہ و رکوع میں قرآنی آیات کو بطور دعا پڑھ سکتے ہیں*
صحیح سند سے یہ بات مسند احمد کے اندر موجود ہے

📚حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ ، حَدَّثَنِي فُلَيْتٌ الْعَامِرِيُّ ، عَنْ جَسْرَةَ الْعَامِرِيَّةِ ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ قَالَ : صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَيْلَةً، فَقَرَأَ بِآيَةٍ حَتَّى أَصْبَحَ، يَرْكَعُ بِهَا وَيَسْجُدُ بِهَا : { إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ }. فَلَمَّا أَصْبَحَ قُلْتُ : يَا رَسُولَ اللَّهِ، مَا زِلْتَ تَقْرَأُ هَذِهِ الْآيَةَ حَتَّى أَصْبَحْتَ، تَرْكَعُ بِهَا وَتَسْجُدُ بِهَا. قَالَ : " إِنِّي سَأَلْتُ رَبِّي الشَّفَاعَةَ لِأُمَّتِي، فَأَعْطَانِيهَا، وَهِيَ نَائِلَةٌ - إِنْ شَاءَ اللَّهُ - لِمَنْ لَا يُشْرِكُ بِاللَّهِ شَيْئًا ".
ترجمہ:
کہ نبی اکرم صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم نے رات کو نماز پڑھی اور صبح تک ایک آئیت تلاوت کرتے رہے اور سجدہ و رکوع میں بھی وہی آئیت (دعا) کے طور پڑھتے رہے ،
(مسند احمد حدیث نمبر-21328)
حكم الحديث: إسناده حسن
لہذا اگر سجدہ و رکوع ميں قرآن كريم ميں وارد شدہ كوئى دعا پڑھى جائے، تو اس میں کوئی حرج نہیں ہے

📚جيسا كہ فرمان بارى تعالى ہے:
﴿ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ﴾ البقرۃ ( 201 )
اے ہمارے رب ہميں دنيا ميں بھلائى عطا فرما اور آخرت ميں بھى بھلائى عطا فرما، اور ہميں آگ كے عذاب سے محفوظ ركھ.

کیونکہ اس كا مقصد دعا پڑھنا ہے، نہ كہ تلاوت قرآن۔۔۔ تو اس ميں كوئى حرج نہيں،

📚كيونكہ نبى كريم صلى اللہ عليہ وسلم كا فرمان ہے: " اعمال كا دارومدار نيتوں پر ہے، اور ہر شخص كے ليے وہى ہے جو اس نے نيت كى 
(صحيح بخارى حديث نمبر ـ 1 ) 
(صحيح مسلم حديث نمبر - 1907 )

📒 سعودی عرب کی مستقل فتوى كميٹى كے علماء كرام سے دريافت كيا گيا:
ہميں معلوم ہے كہ سجدہ ميں قرآن مجيد كى قرآت كرنا جائز نہيں، ليكن كچھ آيات دعا پر مشتمل ہيں

مثلا فرمان بارى تعالى ہے:
﴿ ربنا لا تزغ قلوبنا بعد إذ هديتنا ﴾
اے ہمارے رب ہميں ہدايت نصيب كرنے كے بعد ہمارے دلوں كو ٹيڑھا نہ كر دينا.

لہذا قرآن مجيد ميں وارد شدہ اس طرح كى دعائيں سجدہ ميں پڑھنے كا حكم كيا ہے ؟

كميٹى كے علماء كرام كا جواب تھا:
" اگر دعا سمجھ كر پڑھى جائيں تو اس ميں كوئى حرج نہيں، انہيں تلاوت قرآن سمجھ كر نہيں پڑھنا چاہيے" انتہى.
ديكھيں: فتاوى اللجنۃ الدائمۃ للبحوث العلميۃ والافتاء ( 6 / 443 ).

(مآخذ : الاسلام سوال وجواب )
(محدث فورم)
(العلماء ڈاٹ او آر جی)

((( واللہ تعالیٰ اعلم باالصواب )))

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Kya Duniya Ko Aabad Rakhne Ka Asal Mujrim Mard Hai?

Maa Ki Haqeeqi Aazadi Aur Khawateen Ki Niswaniyat.

Mamta Ka Janaza Aur Ek Zalim Majdur ka Matam.
Kya Duniya Ko Aabad Rakhne Ka Asal Mujrim 'Mard' hai?
جدیدیت کا فریب ,ماں کی عظمت, خاندانی نظام کی اہمیت, اسلام میں عورت کا مقام , نسلوں کی تربیت , لبرل ازم کا دھوکہ , 
جدیدیت کا فریب *   ماں کی عظمت *   خاندانی نظام کی اہمیت *   اسلام میں عورت کا مقام *   نسلوں کی تربیت *   لبرل ازم کا دھوکہ *   اردو اصلاحی تحریر *   فیمنزم کا جھوٹ
 ممتا بمقابلہ معیشت: ایک المناک جنگ.
ممتا کا جنازہ اور ’کماتے ہوئے مرد‘ کا نوحہ: کیا دنیا کو آباد رکھنے کا اصل مجرم ’مرد‘ ہے؟ - 
ممتا کا نوحہ اور مرد کی خاموش صلیب: ایک فکری جائزہ.

تاریخ کے سینے میں سب سے گہرا زخم نہ تو ہیروشیما کی راکھ ہے اور نہ ہی ماحولیاتی آلودگی کا دھواں، بلکہ اکیسویں صدی کا سب سے بھیانک المیہ وہ "تہذیبی خودکشی" ہے جس کا جشن جدیدیت کے ایوانوں میں منایا جا رہا ہے۔ یہ المیہ بارود سے نہیں، بلکہ فطرت سے بغاوت سے جنم لے رہا ہے، جہاں نسلِ انسانی کی بقا کو ’کیریئر‘ اور ’آزادی‘ کی بھینٹ چڑھا دیا گیا ہے۔
 سرابِ آزادی اور کھوئی ہوئی جنت
اگر ہم ماضی کے جھروکوں سے جھانکیں، تو ایک عجیب منظر نظر آتا ہے۔ وہ دور جسے آج کی نام نہاد روشن خیالی "تاریک دور" کہتی ہے، دراصل وہی دور تھا جب گھروں میں زندگی کی رمق تھی۔ یہ وہ زمانہ تھا جب مرد گھر کی دہلیز کے باہر زمانے کے سرد و گرم جھیلتا تھا، تاکہ گھر کے اندر بیٹھی عورت "ماں" بننے کا سکون پا سکے۔

جدیدیت نے عورت کے کان میں ایک افسوں پھونکا کہ "تمہاری قدر گھر کے سکون میں نہیں، دفتر کے ہنگاموں میں ہے۔" اسے باور کرایا گیا کہ اولاد کی پرورش ’قید‘ ہے اور غیر مردوں کے شانہ بشانہ فائلیں سنبھالنا ’آزادی‘۔ مگر جب بنتِ حوا نے اس پرفریب نعرے کے پیچھے چل کر عملی میدان میں قدم رکھا، تو اسے تلخ حقیقت کا سامنا کرنا پڑا۔ اسے معلوم ہوا کہ جسے وہ مرد کی ’بادشاہت‘ سمجھتی تھی، وہ دراصل کانٹوں کا تاج تھا۔ روزی کمانا محض طاقت کا اظہار نہیں، بلکہ اپنی انا کو روزانہ بازار میں نیلام کرنے کا نام ہے۔

 مرد: ایک خاموش محافظ یا نام نہاد مجرم؟

آج کے فیمنسٹ بیانیے میں مرد کو کٹہرے میں کھڑا کر دیا گیا ہے، لیکن حقیقت کی آنکھ کچھ اور ہی دیکھتی ہے۔ کیا کبھی سوچا ہے کہ عورت کے لیے "ماں" بننا اور پانچ پانچ بچوں کی پرورش کرنا کیوں ممکن تھا؟
 صرف اس لیے کہ ایک مرد پہاڑ بن کر زمانے کی سخت ہواؤں کو اپنے سینے پر روک رہا تھا۔

مرد کی وہ مشقت، وہ خاموش قربانی، اور وہ کفالت ہی تھی جس نے عورت کو یہ موقع فراہم کیا کہ وہ معاشی فکروں سے آزاد ہو کر اپنی گود ہری رکھ سکے۔
 اگر مرد صدیوں پہلے یہ کہہ دیتا کہ "میں اپنی کمائی کا واحد حقدار ہوں، مجھے کسی کا پیٹ نہیں پالنا" تو انسانیت کب کی دم توڑ چکی ہوتی۔ یہ مرد کا ایثار تھا جس نے عورت کو ممتا کی معراج تک پہنچنے کا موقع دیا۔

 ممتا بمقابلہ معیشت: ایک المناک جنگ.

جب عورت نے مرد کی ڈھال ہٹا کر خود کمانے کا فیصلہ کیا، تو فطرت نے اپنا انتقام لیا۔ معاشی دوڑ اور ممتا کی ذمہ داری ایک ساتھ نہیں نبھائی جا سکتی تھی۔ نتیجہ کیا نکلا؟
 جدید عورت نے سب سے پہلے اسی بوجھ کو کندھے سے اتارا جو اس کی ترقی کی راہ میں رکاوٹ تھا—یعنی اولاد۔

آج مغرب کے ویران ہوتے اسکول اور گرتی ہوئی شرحِ پیدائش اس بات کا نوحہ پڑھ رہے ہیں کہ جب عورت ’ورکر‘ بنی، تو اس کے اندر کی ’ماں‘ مر گئی۔ "میرا جسم، میری مرضی" کا نعرہ دراصل ممتا کے خلاف ایک کھلی بغاوت ہے۔ یہ نعرہ اس بات کا اعلان ہے کہ اب  ترجیح  وہ  ننھی جان نہیں جو فطرت کا تحفہ ہے، بلکہ وہ  مصنوعی آزادی ہے جو سرمایہ دارانہ نظام  نے اسے بیچی ہے۔

 جدیدیت کا سنہرا فریب اور ماں کی آغوش: تہذیب کی بقا کا اصل مرکز.

جدیدیت نے عورت کو ایک حسین خواب دکھایا—آزادی، خود مختاری اور مساوات کا خواب۔ اسے بتایا گیا کہ تمہاری شناخت، تمہاری قدر اور تمہاری کامیابی گھر کی چاردیواری سے باہر، بازار کی چمک دمک اور دفتر کی اونچی کرسی میں پوشیدہ ہے۔ یہ ایک ایسا دلکش نعرہ تھا جس نے عورت کو اس کی فطرت سے بغاوت پر اکسا دیا اور اسے یقین دلایا کہ اس کی اصل طاقت ’ماں‘ بننے میں نہیں، بلکہ ’مرد‘ جیسی بننے میں ہے۔

مگر یہ خواب محض ایک سراب تھا، ایک ایسا فریب جس کی قیمت آج پوری انسانیت ادا کر رہی ہے۔

ماں کی آغوش: کائنات کی پہلی درس گاہ

جدیدیت کے شور میں ہم یہ بھول گئے کہ انسانیت کی پہلی اور سب سے عظیم درس گاہ ماں کی گود ہے۔ یہ وہ جگہ ہے جہاں صرف جسم نہیں، بلکہ روحیں، کردار اور نسلیں پروان چڑھتی ہیں۔ یہ وہ یونیورسٹی ہے جہاں سے حیا، قربانی، محبت اور ایمان کا پہلا سبق ملتا ہے۔ ایک بچے کے لیے ماں کی آغوش محض پناہ گاہ نہیں، بلکہ اس کی پوری شخصیت کی بنیاد ہوتی ہے۔ جو قومیں اپنی ماؤں کی گود کو ویران کر دیتی ہیں، ان کے معاشرے کھوکھلے ہو جاتے ہیں اور ان کی تہذیبیں کھنڈر بن جاتی ہیں۔

جدیدیت نے عورت سے کہا کہ بچے کی پرورش تمہارے کیریئر میں رکاوٹ ہے، جبکہ حقیقت یہ ہے کہ نسلوں کی پرورش سے بڑا کوئی ’کیریئر‘ نہیں ہے۔ اس نے ماں کے آنچل کے ٹھنڈے سائے کو قید اور کارپوریٹ دنیا کی تپتی دھوپ کو آزادی کا نام دیا۔ یہ تاریخ کا سب سے بڑا جھوٹ تھا، جس نے عورت سے اس کا سکون، وقار اور حقیقی طاقت چھین کر اسے ایک ایسی مشین بنا دیا جو پیسے تو کما سکتی ہے، مگر انسانیت کو جنم نہیں دے سکتی۔
ایک باریک پیغام: فریب کو پہچانو

اے بنتِ حوا! جدیدیت اور لبرل ازم کے جھوٹے خوابوں سے بیدار ہو جاؤ۔ وہ تمہیں تمہاری ذمہ داریوں سے بھاگنے کو ’آزادی‘ کہتے ہیں، جبکہ اصل آزادی اپنی فطرت کو پہچاننے اور اس پر فخر کرنے میں ہے۔ تمہارا اصل مقابلہ مرد سے نہیں، بلکہ اس شیطانی نظام سے ہے جو تمہیں ’ورکر‘ اور ’آئٹم‘ بنا کر تمہارے ’ماں‘ ہونے کے مقدس رتبے کو چھیننا چاہتا ہے۔

یاد رکھو! تمہاری گود میں پلنے والا بچہ صرف ایک فرد نہیں، بلکہ امت کا مستقبل ہے۔ تمہاری گود جتنی آباد ہوگی، ہماری تہذیب اتنی ہی مضبوط ہوگی۔ اپنی اصل قدر کو پہچانو، کیونکہ ایک پڑھی لکھی اور باشعور ماں ایک سو اسکولوں سے بہتر ہے، اور ایک نیک ماں کی تربیت یافتہ اولاد ہی دنیا و آخرت میں کامیابی کی ضمانت ہے۔
 خلاصہ کلام: واپسی کا راستہ

خواتینِ اسلام اور باشعور طبقے کے لیے یہ لمحہ فکریہ ہے۔ وہ نظام جس نے آپ کو گھر کی ملکہ کے بجائے بازار کا مزدور بنا دیا، وہ آپ کا خیر خواہ نہیں ہے۔ دنیا کی رونقیں بچوں کی کلکاریوں سے ہیں، اور یہ کلکاریاں تبھی گونجیں گی جب ہم اس ’کمانے والے مرد‘ کی قدر کریں گے جسے آج ظالم بنا کر پیش کیا جا رہا ہے۔

فطرت کے اصول اٹل ہیں۔ اگر دنیا کو ویرانی سے بچانا ہے تو ہمیں دوبارہ اسی تقسیمِ کار کی طرف لوٹنا ہوگا جہاں مرد ’محافظ‘ ہو اور عورت ’مربی‘۔ ورنہ یاد رکھئے! "خود کفیل اور آزاد" عورت نے تو فیصلہ سنا دیا ہے کہ اسے اب نسلِ انسانی بڑھانے میں کوئی دلچسپی نہیں، اور یہ فیصلہ انسانیت کے تابوت میں آخری کیل ثابت ہو سکتا ہے۔

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Europe and Liberalism: Europe Ki Sabse Badi Galati?

Liberalism Crisis in Europe – Kya Europe Khud Ke Pairo par Kulahadi Maar liya hai?

Demographic Suicide: क्या मर्द ही इंसानियत का असली सहारा था?
Europe vs Liberalism: Kya Apna Future Khud Bigaad Raha Hai?
Liberalism in Europe: Self‑Destruction or Progress?
Europe Liberalism Collapse – Reality Check
#DemographicSuicide #LowBirthRate #MotherhoodCrisis #PopulationDecline #ModernSociety #Mamata #FamilyStructure #DINKCouples #EconomicPressure #ParenthoodCrisis
#DemographicSuicide #LowBirthRate #MotherhoodCrisis #PopulationDecline #ModernSociety #Mamata #FamilyStructure #DINKCouples #EconomicPressure #ParenthoodCrisis
Europe Liberalism Collapse – Reality Check.
ममता का जनाज़ा और कमाते हुए मर्द का सच — आधुनिक इंसानियत का भयावह मोड़
इंसानी इतिहास की मंज़िलें जब पलटकर देखी जाती हैं तो दो तरह के हादसे दिखाई देते हैं—कुछ शोर के साथ, और कुछ खामोशी में।

एटम बम गिरने की आवाज़ दुनिया ने सुनी…मगर एक ऐसा बम है जिसकी गूंज सुनी नहीं जाती,
बस उसकी राख इंसानियत पर गिर रही है।

ये बम है —
Demographic Suicide (आबादीाती खुदकुशी)

और इसकी जड़ में वो दर्दनाक तज़िया छुपा है जिसे दुनिया सुनना पसंद नहीं करती।
इंसानियत का असली अलमिया—आबादी का गिरना, और घरों का सूना होना

हम आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां:

  • जापान में स्कूल बंद हो रहे हैं

  • कोरिया में क्रैडल्स खाली पड़े हैं

  • यूरोप बूढ़ों के महाद्वीप में तब्दील हो रहा है

  • चीन में जन्मदर 70 साल के निचले स्तर पर है

ये महज़ आंकड़े नहीं.
ये उस इंसानी सभ्यता की सांसें हैं जो टूट रही है।
इंसानियत का असली अलमिया सिर्फ़ जंग, भूख या नफ़रत नहीं—बल्कि धीरे-धीरे घटती आबादी, ख़ाली होते घर, और वक़्त से पहले बूढ़ा होता समाज है। आज दुनिया के कई मुल्क—खासतौर पर यूरोप, जापान, साउथ कोरिया और चीन—एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ लोग अमीरी तक पहुँचने से पहले ही बूढ़े हो रहे हैं, जबकि अगली नस्ल पैदा होने से क़तराती जा रही है।

लाइफ़स्टाइल, करियर-रेस, महंगाई, तनहाई, रिश्तों की कमज़ोरी और बच्चे पालने का भारी ख़र्च—इन सब ने मिलकर नई पीढ़ी को शादी और औलाद दोनों से दूर कर दिया है।

दूसरी तरफ़ दुनिया में रिश्तों के मायने बदल रहे हैं, और कई समाजिक रुझान—जैसे कि खानदानी ढांचे से हटकर जीना, या वो लाइफ़स्टाइल अपनाना जिसमें औलाद का हिस्सा कम या न के बराबर होता है—इन मुल्कों की पहले से गिरती आबादी को और भी तेज़ी से नीचे धकेल रहे हैं।

(यहाँ किसी भी इंसानी हक़ या रुझान की नफ़ी नहीं—बल्कि डेमोग्राफिक हक़ीक़त का तटस्थ बयान है।)

यूरोप और दूसरी तरक़्क़ी याफ़्ता दुनिया के पॉलिसी मेकर्स की सबसे बड़ी टेंशन यही है कि आने वाले 20–30 सालों में:
  • नौजवान कम और बूढ़े बहुत ज़्यादा होंगे

  • काम करने वाले हाथों की कमी बढ़ेगी

  • टैक्स देने वाले कम और सरकारी सहारे पर रहने वाले ज़्यादा हो जाएंगे

  • फ़ौजी, मेडिकल और टेक्निकल फ़ील्ड में वर्कफ़ोर्स का संकट पैदा होगा

  • और सबसे बड़ा डर: ख़ानदानी ढाँचा टूट जाने से समाज की बुनियाद कमज़ोर पड़ जाएगी

दुनिया के कई मुल्क आज अरबों डॉलर सिर्फ़ इसी बात पर लगा रहे हैं कि लोग शादी करें, बच्चे पैदा करें, और घरों में फिर से रौनक लौट आए।
इंसानियत का यह अलमिया खामोश है—लेकिन तेज़ी से बढ़ रहा है:
घर बड़े होते जा रहे हैं, और उनमें रहने वाले लोग कम।
सड़कों पर रौनक बढ़ रही है, लेकिन ख़ानदानों में आवाज़ें घट रही हैं।
इंसान अमीर हो रहा है… मगर अकेला भी।
यही वजह है कि आज दुनिया यह सोचने पर मजबूर है:
अगर इंसानी नस्ल ही कम होती चली गई—तो तरक़्क़ी, टेक्नोलॉजी और अमीरी का फ़ायदा किसे होगा?

तो सवाल है के  क्या यूरोप ने वाक़ई अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है?
ये सवाल सिर्फ़ किसी बाहरी तन्क़ीद का नहीं—बल्कि बहुत-से यूरोपीय स्कॉलर्स, डेमोग्राफर्स और सोशल थिंकर्स का अपना अन्दरूनी ऐतराफ़ है।
यूरोप ने सदियों की जंगों और तबाही के बाद एक आज़ाद, फ़लाही और इंसान-परस्त समाज बनाने की कोशिश की मगर वक़्त के साथ हद से बढ़ा हुआ इंडिविजुअलिज़्म, बे-लगाम लिबरलिज़्म, और बतमिजि, बेहयायि को “फ़्रीडम” का नाम देकर जिस तरह अपनाया गया… उसने समाज की रूह से ले कर ख़ानदान की बुनियाद तक हर चीज़ को कमज़ोर कर दिया।
हद से ज़्यादा इंडिविजुअलिज़्म—रिश्तों का बोझ या ज़िम्मेदारी?

यूरोप ने फ़र्द को इतनी तरजीह दी कि रिश्ते, ख़ानदान और औलाद—सब “चॉइस” बनकर रह गए।
नतीजा:

लोग शादी से भाग रहे हैं.
बच्चे पालना एक बोझ समझा जा रहा है.
नस्ल बढ़ना एक समाजिक अहमियत नहीं—बल्कि एक “निजी प्रॉब्लम” बन गई है.
इंसान आज़ाद हुआ—मगर तन्हा भी।

बे-तरतीब लिबरलिज़्म—जहाँ हदें टूटें और मायने धुँधले पड़ जाएँ

लिबरलिज़्म ने दीं—हक़ूक़, इज़्ज़त, बराबरी।
लेकिन जब हर हद को “रेस्ट्रिक्शन” और हर क़ीमती रिवायत को “पुरानी बात” कहकर तोड़ा गया…

तो समाज का ताना-बाना ही उधड़ने लगा।
जो चीज़ें इंसानियत को सँभालती थीं—
वफ़ादारी, जिम्मेदारी, क़ुर्बानी, शर्म-ओ-हया, पारिवारिक मज़बूती.
उन्हें एक-एक कर के “पुरानी सोच” में फेंक दिया गया।

बेहयाई और सेक्स की बाजारियत—आज़ादी या तिजारत?
यूरोप में सेक्स इंडस्ट्री, पोर्न, मुफ़्त मिक्स-कल्चर, और रिश्तों की बदलती कैटेगोरीज़ ने एक ऐसा माहौल बना दिया जिसके नैतिक और मानसिक असर अब खुद यूरोप में बहस का विषय हैं।
जवानी का मज़ा सब चाहते हैं—मगर ज़िम्मेदारी कोई नहीं।
लतें बढ़ रही हैं, रिश्ते टूट रहे हैं, और बच्चे… पैदा ही नहीं हो रहे।

यूरोपीय पॉलिसी-मेकर्स का बेशक़ीनी से भरा डर.
आज यूरोपीय सरकारें खुद मान रही हैं कि:
आबादी खतरनाक हद तक गिर रही है.
नौजवान कम, बुज़ुर्ग ज़्यादा हो रहे हैं
इमिग्रेशन के बग़ैर अर्थव्यवस्था चलाना नामुमकिन हो गया है.
खानदान टूट चुका है, और समाज में अपनापन घट रहा है.
कई यूरोपीय थिंक टैंक साफ़ कहते हैं: हमने फ़्रीडम तो पा ली… लेकिन समाज खो दिया।
असल मुद्दा—तरक़्क़ी इंसानियत को बचाए, मिटाए नहीं

आज़ादी अच्छी है…
लेकिन जब आज़ादी इंसान को रिश्तों से काट दे,
जब फ़्रीडम इंसान को वफ़ादारी से डराए,
जब मॉडर्निज़्म इंसानियत से मोहब्बत ही छीन ले…

तो वह समाज आगे नहीं बढ़ता—अन्दर से खोखला हो जाता है।

यूरोप ने गलती की या नहीं—ये बहस अलग है,
मगर यह सच है कि: जो समाज सिर्फ़ फ़र्द (Individualism)  की आज़ादी पर खड़ा हो, मगर ख़ानदान की मज़बूती पर नहीं—वह लम्बे वक़्त तक स्थिर नहीं रह सकता।

यह दुनिया के लिए भी एक सबक है: तरक़्क़ी ज़रूरी है—

लेकिन इंसानियत, हया, रिश्ता, और ख़ानदान उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं

अगर ये खो जाएँ- तो फिर समाज बचेगा ही किसके लिए?

वो दौर जब मर्द अकेला कमाता था, और ममता फलती-फूलती थी.
गरीबी थी… मगर बांझपन नहीं था.

हमारे दादा–परदादा के दौर में:

  • एक मर्द कमाता था

  • औरत घर चलाती थी

  • परिवार बड़े होते थे

  • बच्चे नेमत समझे जाते थे

  • ममता किसी किताब का विषय नहीं—एक हकीकत थी

मर्द कमाता था, औरत पालती थी।
दोनों की जिम्मेदारियाँ वज़ाहत के साथ तय थीं।

और इसी तालमेल की वजह से:
✔ घर भी आबाद
✔ बच्चे भी खुशहाल
✔ और समाज भी मजबूत

फिर आया वो इंकलाब जिसने दुनिया की दिशा बदल दी
 "फ़ेमिनिज़्म ने औरत से कहा — “कमाई तुम्हारी आज़ादी है
वो आवाज़ उठी:
  • "घर गुलामी है"
  • "बच्चा बोझ है"
  • "मातृत्व पिछड़ापन है"
  • "कमाना ताक़त है"

औरत को दफ्तर की चकाचौंध दिखाई गई,
मगर उन इमारतों के भीतर का दमघोंटू सच छुपा लिया गया।

जब औरत ने खुद कमाई की तो एक सख्त हकीकत सामने आई

वो समझ गई कि:

  • तनख्वाह पाना आसान नहीं

  • इज्ज़त के साथ नौकरी मिलना मुश्किल

  • बॉस की झिड़कियाँ पेट काटकर सहनी पड़ती हैं

  • कमाई के लिए अपने अरमान कुर्बान करने पड़ते हैं

अब गुलामी किसकी थी… और आज़ादी किसकी?
सच्चाई ने उसका पीछा कर लिया।

यहीं से कहानी पलटती है।

"आधुनिक औरत का फैसला — “बच्चे पैदा ही नहीं करने!”

औरत ने जब दफ्तर का बोझ महसूस किया तो:

  • पहले अपने शौक छोड़े
  • फिर रिश्ते छोड़े
  • और अंत में…
  • मातृत्व छोड़ दिया

यानी कि पहले नंबर पर क़ुर्बानी बच्चे की।
क्यों?

✔ बच्चा वक्त मांगता है
✔ बच्चा ऊर्जा मांगता है
✔ बच्चा करियर रोकता है
✔ बच्चा आज़ादी सीमित करता है

फिर आधुनिक (Liberal, Modern, Empowered, Educated) औरत ने हिसाब लगाया—

कमाई vs ममता
और कमाई जीत गई।

यहीं से शुरू हुआ Demographic Suicide

क्या ममता वाकई जब्ली (Biological) है? या मर्द की जिम्मेदारी ने उसे ज़िंदा रखा था?
 “माय बॉडी माय चॉइस” का असली मतलब
आज की औरत लड़ रही है:

  • Abortion Rights
  • Child-Free Lifestyle
  • DINK (Double Income No Kids) मॉडल

अगर ममता इतनी ही फितरी होती,
तो क्या औरत अपने ही बच्चे को मिटाने के “हक़” के लिए अदालतों में जाती?

क्योंकि जब दोनों कमाते हैं, तो दोनों को बच्चों का बोझ "घाटा" लगता है।

और अब उस "ममता" के मिथक पर भी रोशनी डाल लें—
अगर ममता इतनी ही जब्ली, इतनी ही तेज़, इतनी ही अटूट होती, तो आधुनिक औरत "अबॉर्शन राइट्स" के लिए अदालतों में क्यों लड़ रही है?

"माय बॉडी माय चॉइस" का मतलब क्या है?
ये दरअसल एक बगावत है? ममता के खिलाफ।

ये एलान है कि औरत के लिए उसका करियर, उसकी आज़ादी, उसकी सुंदरता— उस अजन्मे बच्चे से ज्यादा अहम है।

अगर ममता जैविक रूप से इतनी जबर्दस्त होती,
तो कोई औरत अपने ही बच्चे को खत्म करने के "हक" के लिए न लड़ती।

सच यही है:

औरत के अंदर की "माँ" को ज़िंदा रखने वाला असल में मर्द का साया था।
वो कहता था:
"तुम सिर्फ बच्चे को जन्म दो… उसका खर्च, उसकी छत, उसका भविष्य मेरी जिम्मेदारी है।"
जैसे ही ये साया हटा— ममता बुझने लगी।
उसकी जगह एक "कैलकुलेटेड बिज़नेस-वुमन" पैदा हुई,
जो फ़ैसला करती है कि बच्चा एक नुकसान वाला सौदा है।

असल हकीकत — मर्द की कमाई ही औरत की ममता का सहारा थी.
जब मर्द कहता था:
“तुम बच्चे को जन्म दो, उसकी रोटी मेरी जिम्मेदारी।” तो औरत का दिल भी ममता से भर जाता था।
मगर जैसे ही कहा गया कि: “तुम कमाओ, तुम खिलाओ, तुम निभाओ।” सबसे पहले खत्म हुई ममता

क्या असल में मर्द ही इंसानियत का असली खामोश मुहाफ़िज़ है?

ये सवाल चुभने वाला है? मगर जवाब वही है जो आंकड़े बताते हैं।
अगर मर्द पहले ही कह देता— “मैं क्यों कमाऊं?
तो:
  • पाँच बच्चों का घर नहीं बनता
  • दुनिया आधी आबादी से भी कम रह जाती
  • सभ्यताएँ मिट जातीं
  • इंसानियत का सिलसिला टूट जाता
दरअसल, मर्द की ख़ामोशी अक्सर उसके बोझों, ज़िम्मेदारियों और एहसासात का आईना होती है। वह बहुत कुछ सहकर भी कम ही कहता है। घर, रिश्तों और समाज की सुरक्षा के लिए वह चुपचाप कंधे आगे करता है। उसकी यह ख़ामोशियाँ कभी कमज़ोरी नहीं होतीं—यह उसके सब्र, वफ़ादारी और फ़ितरी हिम्मत का सुबूत होती हैं।
मगर याद रहे… इंसानियत की हिफ़ाज़त किसी एक gender की नहीं—ये दोनों की साझी ज़िम्मेदारी है। मर्द का हिस्सा बस इतना है कि वह बिना शोर किए अपना फ़र्ज़ निभाता चला जाता है.

क्योंकि औरत जितना जल्दी बोझ छोड़ देती है, मर्द उतना ही ज्यादा बोझ उठाता है।
आज का दुनिया-भर का अलार्म — Birth Rate जमीन में धंस रही है.
  • जापान = 1.2
  • दक्षिण कोरिया = 0.7 (दुनिया में सबसे कम)
  • यूरोप औसत = 1.4
  • अमेरिका लगातार गिरावट में
  • भारत में भी गिरावट शुरू
ये इंसानियत की धीमी मौत है।

इस्लाह और हिदायत — हल क्या है?
फितरत के खिलाफ जंग बंद हो
औरत और मर्द दोनों अपनी-अपनी फितरी जिम्मेदारियों को समझें।
मर्द की जिम्मेदारी को "ज़ालिमाना" कहना बंद हो.
वही जिम्मेदारी तो है जिसने दुनिया को आबाद रखा।
ममता, घर और बच्चों की अहमियत फिर से समझी जाए.
क्योंकि समाज की मजबूती दौलत से नहीं—अगली नस्ल से होती है।
परिवार को फिर से इज़्ज़त और तरजीह दी जाए.
खुशहाल घर ही खुशहाल समाज की नींव है।
"Birth Rate Crisis के पीछे असल वजहें"
"Family System पर नजरिया"
"DINK Culture का मनोवैज्ञानिक"
"Gender Roles की फितरी हकीकत"

लिबेरलिज्म, आर्थिक दबाव और बदलते gender roles के कारण दुनिया “Demographic Suicide” का सामना कर रही है। जब औरत कमाने लगी तो मातृत्व बोझ लगा, जन्मदर गिर गई, और समाज वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि मर्द की कमाई और जिम्मेदारी ने ही औरत की ममता को सहारा दिया था। आज का असली हल फितरी किरदारों की वापसी और परिवार की अहमियत को पुनर्जीवित करना है।

आखिरकार—दुनिया को फिर वही खामोश मजदूर बचाएगा, जिसे मर्द कहा जाता है.

अगर इंसानियत को उजड़ने से बचाना है,
तो इसी मर्द की जिम्मेदारियों को फिर से समझना होगा,
और औरत को उसकी फितरी नेमत—ममता—की इज़्ज़त देनी होगी।

वरना दुनिया की आबादी किताबों में रह जाएगी…और घरों में सिर्फ़ खामोशी।

आखिर में अलामा इक़बाल के उस पैग़ाम से सबक लेते है.

यूरोप की चमक-दमक, उसकी तरक़्क़ी और बाहरी रौनक—सब दिखती तो है, मगर अंदर कहीं न कहीं वह रूह की मजबूती, अख़लाक़ की गहराई और इंसानियत की बुनियाद से दूर होती जा रही है।
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुदकुशी करेगी,
जो शाख़-ए-नाज़ुक पर बनेगा आशियाना, नापायदार होगा।

इक़बाल ने इससे बहुत पहले आगाह कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि यूरोप की तहज़ीब देखने में भले मज़बूत लगे, मगर उसकी नींव कमज़ोर है—क्योंकि वह रूहानी क़द्रों से खाली है।
क्योंकि तहज़ीब का असली क़िला इमारतों से नहीं,
दिलों की पाकी, रिश्तों की मजबूती और इंसानी फ़ितरत की हिफ़ाज़त से बनता है।

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