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Feminism vs Mother Rights: Maa Ke Huqooq Aur Womens Right.

Mother’s Rights: The Forgotten Chapter of Women’s Rights.

Mother is also a woman, yet her rights are rarely discussed under "women’s rights." Feminism often highlights wives’ rights but ignores mothers, leaving a gap in justice. Real empowerment means recognizing and protecting mothers’ dignity first.
लिबरलिज़म का पाखंड: माँ के हक़ूक़ कुचलकर ख़ानदान को उजाड़ने की साज़िश!
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Liberalism and Womens Right.
माँ की क़द्र करना ही असली औरत की इज़्ज़त है।
माँ भी तो औरत है, उसके हक़ को कौन पहचानेगा?
बीवी के हक़ पर बहस होती है, माँ के हक़ पर ख़ामोशी क्यों?
फ़ेमिनिज़्म अगर हक़ की बात है, तो माँ का हक़ सबसे बड़ा है।
माँ के हक़ को नज़रअंदाज़ करना, औरत के हक़ को अधूरा करना है।

माँ भी औरत है, फिर उसके हक़़ क्यों भुलाए जाते हैं? 
लिबरल्स की साज़िश से ख़ानदान उजड़ रहे, मगरिब की तरह! #लिबरल_पाखंड #मगरिब_की_हक़ीक़त

 माँ भी तो औरत है: लिबरल्स के पाखंड में भुलाई गई हक़ीक़त

अल्लाह ने माँ के पैरो के निचे जन्नत रखा, लेकिन लिबरलिज़म के नशे में चूर ये नादान लोग माँ को भुला देते हैं। माँ भी तो "औरत" है, लेकिन उसके तहफ़्फ़ुज़ के लिए न क़ानून बनते हैं, न "वूमेन राइट्स" के बहाने उसकी बात को शामिल किया जाता। बस चिल्लाते हैं बीवी के हक़ूक़! ये दोहरी सोच क्यों? 
अरे भाइयो, फ़ैमिनिज़म का असल चेहरा ये है कि ये बीवी को शौहर से बाग़ी बनाकर ख़ानदानी निज़ाम को चूर-चूर कर देना चाहता है। माँ के हक़ूक़ की बात करो तो उनका मक़सद नाकाम हो जाता। ये साज़िशन का ख़ूबसूरत जाल है, जो नज़ाक़त से बुनते हैं!

 साज़िश का तरीक़ा-ए-कार: बीवी को हथियार बनाकर ख़ानदान तोड़ना

देखिए कैसे काम करती है ये साज़िश! 
लिबरल्स मीडिया, फ़िल्मों और सोशियल मीडिया से बीवी को भड़काते हैं – "तुम्हें आज़ादी चाहिए, शौहर तुम्हारा दुश्मन है!" क़ानून बनवाते हैं तलाक़ आसान करने के, हक़ूक़ सिर्फ़ बीवी के। नतीजा?
 घर उजड़ते हैं, बच्चे यतिम हो जाते। माँ-बाप की इज़्ज़त कुचली जाती, क्योंकि माँ के हक़ूक़ उठाने से बीवी बाग़ी न होगी। ये चालाक़ी से फैलाई जाती फ़ैशन है – अख्लाकियात का ज़वाल "महिलाओं की आज़ादी" का नाम देकर। समाज में बहयाई फैलती, रिश्ते कटते, और ख़ानदान का पुराना नज़म तबाह हो जाता। अल्लाह न करे, ये हमारे यहाँ भी घुस आया!

मगरिब की करारी मिशाल: लिबरलिज़म ने ख़ानदान उजाड़ दिए.

अब मगरिब की तरफ़ नज़र डालिए, जहाँ ये साज़िश कामयाब हो चुकी। अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस में तलाक़ की दर 50% से ज़्यादा! एक् तरफा कनुन और हक अंजाम...  मर्द डिप्रेशन के मरीज़, खुद्कुशि, औरतें अकेली। 
वहाँ के लोग किस बीमारी के शिकार? डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी, सूइसाइड रेट आसमान छू रहे।
 स्टैटिस्टिक्स चीख़-चीख़कर बताते हैं: 40% बच्चे बिना बाप के पलते, माँ-बाप अकेले मरते। लिबरल्स ने फ़ैशन फैलाया, हम जिंसियत को आज़ादी कहा, नतीजा समाज बीमार। वहाँ के नवजवान नफ़्सियाती मरीज़, ड्रग्स के शिकार, अकेलापन उनकी ज़िंदगी का हिस्सा।

 डिप्रेशन, अकेलापन और नफ़्सियाती बीमारियाँ: लिबरल्स का फैलाया ज़हर

आज का दौर देखिए – डर, डिप्रेशन, अकेलापन हर तरफ़। 
लिबरल्स की साज़िश से ख़ानदान टूटे तो इंसान अकेला पड़ जाता। बच्चे स्कूलों में डिप्रेशन के मरीज़, बूढ़े अकेले मरते। मगरिब में 1 में से 5 लोग एंटी-डिप्रेसेंट्स खाते। भारत में भी घुस रहा ये – तलाक़ बढ़े, घर उजड़े। ये फ़ैशन का ज़हर है, जो नैतिक बर्बादी लाता। लिबरल्स चिल्लाते "औरत के हक़!", लेकिन माँ को भुलाते। उनका गंदा नज़रिया उजागर हो गया.

 माँ के हक़ूक़ उठाओ, साज़िश नाकाम करो
 माँ के हक़ूक़ को वूमेन राइट्स में शामिल करो, ख़ानदानी नज़म को मज़बूत करो। लिबरल्स का पाखंड बेनक़ाब हो चुका। मगरिब की तबाही हमारे लिये सबक है। नैतिकता बचाओ, फ़ैशन से दूर रहो। अल्लाह हमारे घरों को सलामत रखे!
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Muslim Duniya Ke Pas EU, NATO Kyo Nahi?

No EU. No NATO. No G7. Just silence. Why can’t the Muslim world unite?

The Missing Civil Network: Why Muslim Unity Still Struggles.
Why the Muslim World Lacks a Union Like EU or NATO?
What Stops Muslim Nations from Building Their Own EU?
Muslim World Without EU or NATO: A Silent Crisis.
Why Western Nations Mobilize Faster Than Muslim States?
The Strategic Gap Holding Muslim Nations Back.
Imagine a Muslim Union as strong as the EU. Why doesn’t it exist yet?
The West calls, millions march. The Muslim world? Still waiting for a signal.
Unity is power. The Muslim world has neither EU nor NATO. That’s the tragedy.
Unlike Europe’s EU or NATO, the Muslim world has no strong alliance or civil network. Discover why unity remains elusive and what this means for global power balance.
 ईरान और वेनेज़ुएला: अमरीकी ताक़त का इम्तिहान, सलीबी यलग़ार और मुस्लिम दुनिया की ख़ामोशी.
जंग अब सिर्फ़ मैदान में नहीं, दिमाग़ों और स्क्रीन पर लड़ी जाती है.
और जो क़ौमें अपना नैरेटिव खो देती हैं, उनका मुक़द्दर दूसरे लिखते हैं।
Muslim World’s Biggest Weakness, Muslim World Without EU, Muslim ummah, One Ummah, humanity, Muslimah, Muslim Unity, Islamic Block, Muslim Union vs EU,
Muslim World’s Biggest Weakness: No Powerful Alliance.
मुस्लिम दुनिया के पास न कोई यूरोपियन यूनियन है, न नाटो जैसा इत्तिहाद, न G7 जैसा असरदार ब्लॉक। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक ये है कि उसके पास वो हिकमत और सिविल नेटवर्क भी मौजूद नहीं जैसे मग़रिब में एक इशारे पर सड़कों पर उतर आता है। 
अमरीका एक ऐसे मोड़ पर जहाँ हर रास्ता दलदल है.
आज की आलमी सियासत एक ऐसे नाज़ुक दौर में दाख़िल हो चुकी है जहाँ अमरीका की फ़ौजी ताक़त भी उसे फ़ैसला कुन बढ़त दिलाने में नाकाम नज़र आती है। न तो बमबारी से मसले हल हो रहे हैं और न ही पीछे हटने का कोई बाइज़्ज़त रास्ता बाक़ी बचा है।
 जनवरी 2026 का आग़ाज़ वॉशिंगटन के लिए एक ऐसे स्ट्रेटेजिक तातिल का पैग़ाम है जिसमें हर क़दम आगे बढ़ने के बजाय और गहराई में ले जाता दिखता है।

वेनेज़ुएला: अपहरण, दावा-ए-फ़तह और ज़मीनी हक़ीक़त की तौहीन.
3 जनवरी 2026 को अमरीकी स्पेशल फ़ोर्सेज़ द्वारा वेनेज़ुएला के सदर निकोलस मादुरो का ख़ुफ़िया अपहरण और न्यूयॉर्क तबदीली, वॉशिंगटन की उस सोच की नुमाइंदगी करता है जिसमें समझा गया कि सर काटने से जिस्म खुद-ब-खुद गिर जाएगा।
मगर हुआ इसके बिल्कुल बरअक्स। 
मादुरो की गैरमौजूदगी में डेल्सी रोड्रीगेज़ ने अबूरी सदर के तौर पर हलफ़ उठा लिया और उनके भाई जॉर्ज रोड्रीगेज़ ने मजलिस-ए-क़ौमी पर अपनी गिरफ़्त मज़बूत कर ली। अमरीका के लिए ये सबसे बड़ी स्ट्रेटेजिक शिकस्त है कि जिस निज़ाम को तोड़ने निकला था, वही पहले से ज़्यादा मुस्तहकम होकर सामने खड़ा है।

अमरीकी प्रॉक्सी का ख़्वाब और रोड्रीगेज़ हुकूमत की बेनियाज़ी.
वॉशिंगटन ने अगरचे डेल्सी रोड्रीगेज़ से आरज़ी मुफ़ाहमत की, मगर ये किसी भी सूरत में अमरीकी प्रॉक्सी कंट्रोल में तब्दील न हो सकी। रोड्रीगेज़ ख़ानदान उसी चाविस्टा हल्क़े से ताल्लुक़ रखता है जिसे अमरीका जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता था।
तेल के ज़ख़ाइर पर अमरीकी कंपनियों की बेरोक-टोक रसाई से साफ़ इनकार ने ये साबित कर दिया कि वेनेज़ुएला अब भी अपनी ख़ुदमुख़्तारी के तसव्वुर से चिपका हुआ है।

मारिया कोरिना माचाडो: नोबेल से नाकामी तक.
अमरीका की मंज़ूर-ए-नज़र शख़्सियत मारिया कोरिना माचाडो को नोबेल अमन इनाम दिलवाना भी ज़मीनी हक़ीक़त को तब्दील न कर सका। न फ़ौज ने साथ दिया, न अवाम ने।
 यहां तक कि खुद ट्रम्प को मानना पड़ा कि माचाडो एक सियासी तजुर्बा साबित हुईं जो बुरी तरह नाकाम रहा।

तेल, पूंजी और डर: अमरीकी कंपनियों की पसपाई
एक्सॉन मोबिल, शेवरॉन और कोनोको फिलिप्स जैसी दिग्गज कंपनियों का पीछे हटना इस बात का ऐलान है कि सिर्फ़ झंडा बदल देने से निज़ाम नहीं बदलता। 
सोशलिस्ट क़वानीन, भारी निवेश, हेवी सॉर क्रूड और आलमी बाज़ार में कम क़ीमतों ने वेनेज़ुएला को अमरीकी पूंजी के लिए ज़हरीला बना दिया है।

ईरान: बमबारी के बाद भी क़ायम निज़ाम
जून 2025 में “ऑपरेशन राइज़िंग लॉयन” के तहत ईरान की जौहरी तनसीबात पर हमले हुए। नुकसान हुआ, मगर मक़सद हासिल न हुआ। न हुकूमत गिरी, न पॉलिसी बदली।
दिसंबर 2025 के आख़िर में महंगाई और करंसी क्रैश के नाम पर मोसाद, अमेरिका ने खामेनयि के ख़िलाफ़ एहतिजाज ज़रूर हुए, मगर पासदाराने इंक़लाब और बसीज की वफ़ादारी ने निज़ाम को थामे रखा। 
अमरीकी और इस्राइली धमकियों ने ईरानी क़ौमियत को और भड़का दिया। जिसकि वजह वहा के अवाम हुकुमत के साना बसाना खडि हो गयि, और सरकार के हिमायत मे बहुत बडे मुजाहिरे हुए.

ईरान पर ज़मीनी हमला: वियतनाम से भी बदतर ख़्वाब
ईरान कोई इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान नहीं। 9 करोड़ आबादी, पहाड़ी जुग़राफ़िया, मिसाइल टेक्नोलॉजी और आबनाए-हुरमुज़ को बंद करने की सलाहियत — ये सब मिलकर अमरीका के लिए क़यामत का मंजर पेश करते हैं।
लाखों फ़ौजियों की ज़रूरत, अरबों डॉलर का ख़र्च और अंदरूनी बग़ावत — अमरीकी अवाम न इसकी इजाज़त देगी, न मआशी निज़ाम इसे झेल पाएगा।

अमरीका के अंदर बग़ावत: MAGA और डेमोक्रेट्स एक सफ़ में.

इतिहास में पहली बार MAGA ग्रुप और डेमोक्रेट्स ईरान के ख़िलाफ़ जंग पर मुत्तहिद नज़र आते हैं। बर्नी सैंडर्स, एलिज़ाबेथ वॉरेन, रो खन्ना, थॉमस मैसी और टकर कार्लसन — सबका पैग़ाम एक है: “अब और जंग नहीं।”
नायब सदर जे.डी. वांस भी इसी सोच की नुमाइंदगी कर रहे हैं।

इस्राइल, नेतन्याहू और सलीबी दबाव.
इस्राइल के अंदर सियासी दबाव में घिरे नेतन्याहू ईरान पर आख़िरी वार का क्रेडिट चाहता हैं। AIPAC और दूसरी ज़ियोनी लॉबियां अमरीकी कांग्रेस में ये नैरेटिव फैला रही हैं कि ईरान पर हमला न करना इस्राइल के वजूद से ग़द्दारी है।
ये वही पुरानी सलीबी यलग़ार है जो हर दौर में किसी न किसी बहाने मुस्लिम दुनिया को निशाना बनाती रही है।

मुस्लिम दुनिया की ग़फ़लत और तारीख़ का बेरहम इम्तिहान.
सबसे अफ़सोसनाक पहलू मुस्लिम दुनिया की ख़ामोशी है। 
  न कोई मुत्तहिद सियासी आवाज़, न कोई इज्तेमाइ स्ट्रेटेजी। हर मुल्क अपनी कुर्सी और अपने मफ़ाद में मसरुफ है, जबकि आग एक-एक कर सबको घेरे में ले रही है।

 हक़ीक़त ये है कि मुस्लिम दुनिया आज भी ख़ामोशी की गहरी क़ब्र में दबी हुई है। न कोई मुत्तहिद सियासी आवाज़, न कोई साझा फ़िक्री निज़ाम, और न ही ऐसा कोई लश्कर-ए-कलम जो ज़ुल्म के सामने दीवार बन सके। अरब हुक्मरान हों या ग़ैर-अरब मुस्लिम क़यादत, सब अपनी-अपनी कुर्सियों की हिफ़ाज़त में इस क़दर मग़्न हैं कि उन्हें ये नज़र ही नहीं आता कि आग उनके महलों की बुनियाद तक पहुँच चुकी है।

मुस्लिम दुनिया के पास न कोई यूरोपियन यूनियन है, न नाटो जैसा इत्तिहाद, न G7 जैसा असरदार ब्लॉक। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक ये है कि उसके पास वो हिकमत और सिविल नेटवर्क भी मौजूद नहीं जो मग़रिब में एक इशारे पर सड़कों पर उतर आता है। 
मग़रिब में NGOs, थिंक टैंक्स, मीडिया हाउस, यूनिवर्सिटीज़ और “ह्यूमन राइट्स” के झंडाबरदार एक स्विच दबते ही हुकूमतों के पीछे खड़े हो जाते हैं, उनकी जंगों को नैतिक जामा पहनाते हैं और मुख़ालिफ़ आवाज़ों को कुचल देते हैं।
इसके बरअक्स मुस्लिम दुनिया में न कोई ऐसा आलमी नेटवर्क है जो मग़रिबी तशद्दुद, पाबंदियों, बमबारी और तानाशाही के ख़िलाफ़ मुत्तहिद होकर खड़ा हो सके। न कोई साझा प्लेटफ़ॉर्म, न कोई असरदार नैरेटिव।
 यहाँ तक कि जब फ़लस्तीन जलती है, सीरिया खून में नहाता है, या ईरान और दूसरे मुल्क निशाने पर आते हैं, तो अरब हुक्मरानों की ज़बानें सियासि बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ पातीं।

अरब हुकूमतों की सबसे बड़ी नाकामी ये है कि उन्होंने अपनी अवाम को सिर्फ़ ख़ामोश तमाशाई बनने की तालीम दी है, सवाल करने वाला ज़ेहन पैदा नहीं किया। नतीजा ये है कि मुस्लिम दुनिया आज भी मग़रिबी मीडिया के बनाए हुए नैरेटिव के क़ैदी है और अपने ज़ख़्मों की तशरीह भी दूसरों की ज़बान से सुनती है।

ऐसे अंधेरे में BRICS एक नई उम्मीद है। ये कोई इस्लामी इत्तिहाद नहीं, मगर ये उस एक्तरफा निज़ाम को चैलेंज करता है जिसने सदियो से मुस्लिम दुनिया को दबाकर रखा है। BRICS कम-अज़-कम ये इशारा देता है कि दुनिया सिर्फ़ वॉशिंगटन, ब्रसेल्स और लंदन के इशारों पर नहीं चलेगी।

लेकिन सवाल ये है:
क्या मुस्लिम और ख़ास तौर पर अरब हुक्मरान इस मौके को समझेंगे?
या फिर ये भी एक और मौक़ा होगा जो ख़ामोशी, डर और खुदग़रज़ी की भेंट चढ़ जाएगा?

तारीख़ माफ़ नहीं करती।
और जो क़ौमें अपनी आवाज़ खो देती हैं, उन्हें दूसरों की जंगों में ईंधन बना दिया जाता है।

ईरान और वेनेज़ुएला ट्रम्प प्रशासन के गले की वो छचोंदर बन चुके हैं जिसे न निगला जा सकता है, न उगला। अगर ईरान के ख़िलाफ़ कोई बड़ी फ़ौजी मुहिम छेड़ी गई, तो ये सिर्फ़ मिडिल ईस्ट नहीं, बल्कि खुद अमरीका के लिए भी अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ से कहीं बड़ा अलमिया साबित होगी।
तारीख़ गवाह है —
सल्तनतें तलवार से नहीं, ग़ुरूर से गिरती हैं।

लीबिया, इराक़, सीरिया, वेनेज़ुएला और क्यूबा — ये महज़ मुल्कों के नाम नहीं, बल्कि ज़िंदा सबक़ हैं। हर जगह कहानी एक ही रही: 
पहले नैरेटिव तैयार किया गया, फिर अवाम को गुमराह किया गया, उसके बाद “आज़ादी”, “इंसानी हुक़ूक़” और “जम्हूरियत” के नाम पर तबाही उतारी गई। सवाल ये है कि क्या मुस्लिम दुनिया ने इनमें से किसी एक तजुर्बे से भी कुछ सीखा?

लीबिया में गद्दाफि गिरा, मगर मुल्क भी उसके साथ दफ़न हो गया।
इराक़ में सद्दाम गया, मगर खुद मुुुखतारि भी चली गई।
सीरिया को बचाने की क़ीमत लहू से चुकानी पड़ी।
वेनेज़ुएला और क्यूबा पर बम नहीं बरसे, मगर पाबंदियों ने वही काम किया जो बम करते हैं।

हर जगह एक चीज़ मुश्तरका थी: मग़रिबी नैरेटिव।

आज की जंग सिर्फ़ टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़ी जाती, बल्कि डेटा, प्लेटफ़ॉर्म और स्क्रीन से लड़ी जाती है। जैसे ही जंग का आग़ाज़ होता है, स्टारलिंक सैटेलाइट ज़मीन पर उतर आते हैं, फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और दूसरी टेक कंपनियाँ अचानक “ख़ामोश” और “चुनिंदा” हो जाती हैं। कौन सा वीडियो दिखेगा, कौन सी तस्वीर ग़ायब होगी, कौन सी आवाज़ दबेगी — ये सब पहले तय होता है।

यही नाटो का सॉफ़्ट स्लिपर सेल है —
बिना बारुद बिना टैंक, मगर उतना ही जानलेवा।

मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी ग़लती ये रही कि उसने जंग को सिर्फ़ फ़ौजी मसला समझा, जबकि दुश्मन ने उसे ज़ेहनी, मीडिया और टेक्नोलॉजी की जंग बना दिया। हमारे पास न कोई साझा मीडिया नैरेटिव है, न कोई आलमी डिजिटल नेटवर्क, न कोई ऐसा प्लेटफ़ॉर्म जो एक साथ खड़ा होकर मग़रिबी झूठ को चैलेंज कर सके।

अब सवाल ये नहीं कि दुश्मन क्या कर रहा है।
सवाल ये है कि हम क्या कर रहे हैं?

क्या हम अपनी ग़लतियों की इस्लाह करेंगे?
क्या हम दूसरों की तबाही से सबक़ लेंगे?
या फिर हर बार की तरह ख़ामोश रहकर अगला नंबर आने का इंतज़ार करेंगे?

ख़ामोशी अब बेगुनाही नहीं,
ख़ामोशी साझेदारी बन चुकी है।

अगर आज आवाज़ न उठी, नैरेटिव न बना, और ज़ेहनी ग़ुलामी से इंकार न किया गया —
तो कल तारीख़ हमें भी उन्हीं सफ़हों में दर्ज करेगी
जहाँ क़ौमें मिटती नहीं, मिटा दी जाती हैं।

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Ayesha Gaddafi Ka Paigam: Iran Aur Duniya Ke Naam.

Ayesha Gaddafi’s Bold Message to Iran & the World.

Libya Venezuela Cuba Iraq Afghanistan Democracy Failures.
Ayesha Gaddafi Breaks Silence: Truths Iran & the World Must Hear.
Colonel Gaddafi’s daughter speaks — and the world is listening.
From Libya to Iran, her words carry weight. Ayesha Gaddafi’s message is going viral.
A voice from history, echoing into today — Ayesha Gaddafi’s message is shaking the world.
लीबिया से अफ़ग़ानिस्तान तक — लोकतंत्र की सौग़ात ने शांति छीन ली।
जहाँ लोकतंत्र का वादा था, वहाँ विनाश और अस्थिरता ही हकीकत बन गई।
वेनेज़ुएला को लोकतंत्र दिया गया, पर जनता को मिला भूख, महंगाई और असुरक्षा।
क्यूबा को बदलने की कोशिश हुई, मगर उसकी पहचान और संस्कृति को चोट पहुँची।
वेनेज़ुएला को लोकतंत्र , क्यूबा , लीबिया में लोकतंत्र का वादा, इराक में लोकतंत्र
लोकतंत्र नहीं, गुलामी ही असली पैमाना.
  इराक में लोकतंत्र के नाम पर युद्ध और खूनखराबा, अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र लाने का दावा किया गया, लेकिन वहाँ की पीढ़ियाँ सिर्फ़ संघर्ष और दर्द देख रही हैं।

कर्नल गद्दाफी की बेटी आयशा गद्दाफ़ी का पैगाम: झूठे समझौते से तबाही तक.
“ओ ईरान के पक्के और आज़ादी पसंद लोगों! मैं तुमसे तबाही, दर्द और धोखे के दिल से बात कर रही हूँ। मैं एक ऐसी औरत की आवाज़ हूँ जिसने अपने देश की तबाही देखी, खुले दुश्मनों के हाथों नहीं, बल्कि मगरिब की धोखेबाज़ मुस्कान और उसके झूठे वादों में फँसकर। 

मैं तुम्हें चेतावनी देती हूँ कि वेस्टर्न साम्राज्यवादियों के धोखेबाज़ शब्दों और नारों में मत पड़ो। उन्होंने ही एक बार मेरे पिता कर्नल गद्दाफी से कहा था कि अगर तुम अपने न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दोगे तो दुनिया के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुल जाएँगे।’ 

मेरे पिता ने अच्छे इरादों और बातचीत में भरोसे के साथ रियायतों का रास्ता चुना। लेकिन आखिर में, हमने देखा कि कैसे NATO के बमों ने हमारी ज़मीन को मलबे में बदल दिया। लीबिया खून में डूब गया, और उसके लोग गरीबी, देश बदर और तबाही में फँस गए।

मेरे ईरानी बहनों और भाइयों , पाबंदियों, जानकारी देने वाले और आर्थिक हमलों के सामने तुम्हारी हिम्मत, इज्ज़त और मज़बूती यह आपके देश के सम्मान और सच्ची आज़ादी का सबूत है। दुश्मन को छूट देने से सिर्फ़ तबाही, बँटवारा और तकलीफ़ ही मिलेगी। भेड़िये से बातचीत भेड़ों को नहीं बचाएगी या अमन नहीं लाएगी—यह सिर्फ़ अगले खाने की तारीख़ तय करेगी!
इतिहास ने साबित कर दिया है कि जो लोग मज़बूती से डटे रहे—क्यूबा, वेनेज़ुएला और नॉर्थ कोरिया से लेकर फ़िलिस्तीन तक वे दुनिया के हीरो के दिलों में बसे रहे और इतिहास में इज्ज़त के साथ ज़िंदा हो गए। और जिन्होंने हार मान ली, वे अपनी ही राख में मिल गए, उनके नाम भुला दिए गए।

बहादुर ईरानी लोगों को सलाम! ईरानी के विरोध को सलाम! फ़िलिस्तीनी लोगों के साथ दुनिया भर की एकजुटता को सलाम! "
प्यार और हमदर्दी के साथ,
आयशा गद्दाफ़ी
ओमान में शरण लेकर रह रहीं आयशा गद्दाफ़ी का ईरान के लोगों के नाम संदेश सिर्फ़ भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि इतिहास से निकली एक कड़वी सच्चाई है। यह वह सच्चाई है जिसे पश्चिम बार-बार छुपाने की कोशिश करता है—कि कैसे स्वतंत्र देशों को पहले “शांति” और “राहत” के नाम पर झुकाया जाता है, और फिर उन्हें मिटा दिया जाता है।
आयशा गद्दाफ़ी की आवाज़ एक बेटी की है, जिसने अपने पिता को दुश्मनों से नहीं, बल्कि 'झूठे वादों और धोखेबाज़ समझौतों'  से खोया।
झूठा फ़ॉर्मूला: पहले निहत्था करो, फिर मारो.

उनके संदेश का सबसे अहम नुक्ता यह है कि पश्चिम का तरीक़ा लगभग हर जगह एक-सा रहा है:

  1. पहला क़दम: प्रतिबंध, दबाव, मीडिया वार और अंतरराष्ट्रीय अलगाव
  2. दूसरा क़दम: बातचीत का झांसा— “अगर तुम अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दो, तो हम सब ठीक कर देंगे”
  3. तीसरा क़दम: जब देश निहत्था हो जाए, तो सीधा सैन्य हमला या सत्ता परिवर्तन.

लीबिया इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है। कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी ने अच्छे इरादों से पश्चिम पर भरोसा किया। उन्होंने अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दिया, यह सोचकर कि अब लीबिया को स्वीकार कर लिया जाएगा।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज है—NATO के बम, तबाह शहर, बिखरा हुआ देश और एक नेता की हत्या।

यानी समझौता सुरक्षा नहीं लाया, बल्कि तबाही का न्योता बन गया।
आयशा गद्दाफ़ी का संदेश: ईरान के लिए सीधी चेतावनी.

आयशा गद्दाफ़ी साफ़ शब्दों में ईरान को चेतावनी देती हैं कि:

  • पश्चिमी साम्राज्यवादियों की मुस्कान पर भरोसा मत करो

  • उनकी भाषा शांति की होती है, लेकिन इरादे क़ब्ज़े के,

  • दुश्मन को दी गई रियायत आज नहीं तो कल तबाही बनकर लौटती है.

उनका मशहूर कथन—
भेड़िये से बातचीत भेड़ों को नहीं बचाती, यह सिर्फ़ अगले खाने की तारीख़ तय करती है
—दरअसल पूरी पश्चिमी नीति का निचोड़ है।

क्यों ईरान निशाने पर है?

ईरान इसलिए निशाने पर नहीं है कि वह “ख़तरनाक” है, बल्कि इसलिए कि वह:

  • इसराइल के आगे नहीं झुकता
  • अमेरिका की मुख़बिरी नहीं करता
  • अपने न्यूक्लियर और रणनीतिक अधिकारों को छोड़ने से इंकार करता,
  • अपनी शर्तों पर खड़ा रहता है

आयशा गद्दाफ़ी का संदेश ईरान के लिए एक लिविंग वॉर्निंग है—

कि आज जो लोग “डील” की बात कर रहे हैं, वही कल बमों की इजाज़त देंगे।

इतिहास किन्हें याद रखता है?

आयशा गद्दाफ़ी एक और अहम बात कहती हैं—
इतिहास ने उन्हें इज्ज़त दी है जो डटे रहे, चाहे क़ीमत कितनी भी बड़ी क्यों न हो:

  • क्यूबा

  • वेनेज़ुएला

  • नॉर्थ कोरिया

  • फ़िलिस्तीन

और जो झुक गए, जो “राहत” के बदले अपनी संप्रभुता बेच बैठे—
वे देश नाम के साथ ही मिटा दिए गए

गद्दाफ़ी की बेटी, लेकिन इतिहास की गवाह.

आयशा गद्दाफ़ी का यह संदेश सिर्फ़ ईरान के लिए नहीं, बल्कि हर उस देश के लिए है जो पश्चिमी दबाव में समझौते की सोच रहा है

यह एक बेटी का दर्द है, लेकिन उससे भी बढ़कर इतिहास की गवाही है।

लीबिया को पहले निहत्था किया गया, फिर तोड़ा गया, और अंत में उसके नेता को मार दिया गया।
यही फ़ॉर्मूला आज भी ज़िंदा है—सिर्फ़ देश बदलते हैं।

ईरान के लिए यह संदेश साफ़ है:
समझौता सुरक्षा नहीं लाता, मज़बूरि लाती है।

ईरान या कोई भी देश इसलिए निशाने पर नहीं आता कि वह दुनिया के लिए ख़तरा है, बल्कि इसलिए कि वह अपने लिए ख़ुदमुख़्तारी चुनता है। 
अमेरिका, NATO और उनके यूरोपीय सहयोगी ऐसे हर मुल्क को बर्दाश्त नहीं करते जो उनके इशारों पर चलने से इनकार करे। इसका तरीका भी लगभग हर जगह एक-सा होता है—पहले कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जिससे सीधे तौर पर आम जनता को भूख, महंगाई और बेरोज़गारी का तोहफ़ा मिलता है।
                                                                         जब लोग ग़रीबी और बदहाली से परेशान हो जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनका ग़ुस्सा सरकार की ओर मुड़ता है। इसी हालात को भुनाकर पश्चिम “लोकतंत्र” और “मानवाधिकार” का नाटक करता है और सत्ता परिवर्तन की ज़मीन तैयार करता है।
 इसके बाद उनकी पसंद की कठपुतली सरकार बैठा दी जाती है, जो देश के परमाणु कार्यक्रम से लेकर विदेश नीति तक सब कुछ बंद या बेच देती है।

 आज पहलवी परिवार का वारिस उसी भूमिका में पेश किया जा रहा है—वह खुलकर कह चुका है कि सत्ता मिली तो इसराइल को तस्लीम करेगा, ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करेगा और अमेरिका के इशारों पर चलेगा। बदले में उस पर से प्रतिबंध हटाए जाएंगे, ताकि लोग भूख से न मरें—
लेकिन यह राहत अस्थायी होगी, क्योंकि इतिहास बताता है कि इसके बाद या तो देश को बमों से तबाह किया जाता है या उसे हमेशा के लिए गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाता है।
 यही वजह है कि ईरान निशाने पर है—ख़तरनाक होने के कारण नहीं, बल्कि आज़ाद होने की ज़िद के कारण।

पहलवी: “एक्सपोर्टेड हुकूमत” की पश्चिमी सोच.

पहलवी परिवार का वारिस आज जिस तरह से खुद को ईरान के “विकल्प” के तौर पर पेश कर रहा है, वह असल में अमेरिका द्वारा एक्सपोर्ट की जाने वाली हुकूमत की पूरी तस्वीर है। 

उसकी सोच साफ़ तौर पर इसराइल-परस्त और अमेरिका-परस्त है। वह कह चुका है कि सत्ता मिली तो वॉशिंगटन के इशारों पर चलेगा। 

यह कोई राजनीतिक दूरदृष्टि नहीं, बल्कि खुली ग़द्दारी का एलान है। बदले में वादा सिर्फ़ इतना है कि प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, ताकि लोग भूख से न मरें—लेकिन इसकी क़ीमत ईरान की संप्रभुता, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी।

अमेरिका–यूरोप को पहलवी क्यों चाहिए?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका और यूरोप एक बादशाह को फिर से सत्ता में क्यों देखना चाहते हैं?

 जबकि वे हर जगह “लोकतंत्र” की बातें करते हैं? 
इसका जवाब लोकतंत्र में नहीं, बल्कि वफ़ादारी में छुपा है। 
पश्चिम के लिए अच्छा शासक वह नहीं होता जो जनता की आवाज़ सुने, बल्कि वह होता है जो अमेरिका की मुख़बिरी करे, उसके आदेश माने और उसके दुश्मनों को अपना दुश्मन घोषित कर दे।
पहलवी उनके लिए आदर्श उम्मीदवार है, क्योंकि वह सवाल नहीं करेगा—न इसराइल पर, न अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर, न संसाधनों की लूट पर।

लोकतंत्र नहीं, गुलामी ही असली पैमाना.

ईरान के मामले में पश्चिम का दोहरा मापदंड पूरी तरह उजागर हो जाता है। अगर सच में लोकतंत्र मुद्दा होता, तो वे किसी राजशाही चेहरे को आगे न बढ़ाते। लेकिन यहाँ लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं है।
यहाँ पैमाना सिर्फ़ एक है—कौन अमेरिका की लाइन पर चलता है। जो चलेगा, वह “मॉडरेट”, “डेमोक्रेटिक” और “रिफॉर्मर” कहलाएगा। जो नहीं चलेगा, वह “तानाशाह”, “ख़तरा” और “दुष्ट शासन” घोषित कर दिया जाएगा।

पहलवी इसी सिस्टम का हिस्सा है—एक ऐसा चेहरा जिसे लोकतंत्र के नाम पर पेश किया जाएगा, लेकिन जो असल में अमेरिका और यूरोप के हितों की रखवाली करेगा। दुनिया के सभि वोटतंत्र वाले देेेशो का गार्दियन होता है अमेरिका और उस मुल्क कि सरकार अमेरिकि दरबार का वजिर.

ईरान बनाम कठपुतली निज़ाम.
ईरान आज इसलिए निशाने पर है क्योंकि उसने यह फ़ैसला किया है कि वह अपनी शर्तों पर जिएगा। पश्चिम को ऐसा ईरान मंज़ूर नहीं जो स्वतंत्र हो। उसे ऐसा ईरान चाहिए जो निहत्था हो, झुका हुआ हो और आदेशपालक हो—और पहलवी इसी सोच का प्रतीक है।

यही वजह है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या सरकार की नहीं, बल्कि आज़ादी बनाम गुलामी की है। और इतिहास गवाह है कि जो देश अपनी ख़ुदमुख़्तारी बेच देते हैं, उन्हें न तो सम्मान मिलता है और न ही स्थायी राहत—सिर्फ़ एक नई किस्म की गुलामी।  

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Muslim World Crisis: 57 Muslim Mumalik Ke Pas Koi Alliance Kyo Nahi?

Divided Muslim World: 57 Nations at U.S. Puppetry.

Muslim World in Crisis: From Fragmented Alliances to the Call for a New Global Order.
From Washington’s Puppetry to BRICS Revolution: Muslim World’s Defining Moment.
The Shocking Truth Behind Muslim Alliances: 57 Countries Trapped in Global Power Games.
57 Muslim Nations: Puppets of America or Architects of a New World Order?
The Muslim world, split across 57 countries, faces a defining choice in the era of shifting alliances. As global power tilts toward BRICS, the question remains: will Muslim nations continue under American influence or embrace a new world order? the urgency of unity, sovereignty, and the future of geopolitics.
बँटी हुई मुस्लिम दुनिया: गठबंधनों के दौर में 57 देशों की बेबसी और नए विश्व व्यवस्था की ज़रूरत.
The Shocking Truth Behind Muslim, 57 Muslim Nations, Global Power Games,
Is the Muslim World Ready to Break Free? 57 Nations Face Historic Choice.
ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है.

इतिहास से वर्तमान तक-
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान को सिर्फ़ एक नया राजनीतिक ढांचा नहीं दिया, बल्कि उसने पश्चिमी वर्चस्व को खुली चुनौती भी पेश की। 
आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने शाह पहलवी के पश्चिमीकरण और अमेरिका-परस्त नीतियों के ख़िलाफ़ जो तेवर दिखाए, वही तेवर आज आयतुल्लाह ख़ामेनेई के नेतृत्व में किसी न किसी रूप में जारी हैं। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज का दौर कहीं ज़्यादा जटिल, खतरनाक और वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा ईरान: दबाव, प्रतिबंध और आंतरिक चुनौतियाँ

आज ईरान अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने आम ईरानी नागरिक की ज़िंदगी मुश्किल बना दी है। महंगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष बढ़ा है।
इन हालात में बाहरी ताक़तें आंतरिक असंतोष को हथियार बनाकर ईरानी राज्य को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं। तथाकथित “कलर रिवॉल्यूशन” की रणनीतियाँ—सोशल मीडिया, आर्थिक दबाव और नैरेटिव वॉर—ईरान के ख़िलाफ़ खुलकर इस्तेमाल हो रही हैं.

पश्चिम और यूरोप का दोहरा क़िरदार.

पश्चिम, ख़ासकर अमेरिका और यूरोप, मानवाधिकार और लोकतंत्र की बातें करता है, लेकिन ईरान के मामले में उसका रवैया पूरी तरह दोहरा नज़र आता है।
एक तरफ़ वे कहते हैं कि उन्हें ईरानी जनता की चिंता है, दूसरी तरफ़ वही देश ऐसे प्रतिबंध लगाते हैं जिनका सबसे ज़्यादा असर आम जनता पर पड़ता है, न कि सत्ता के केंद्र पर।

यूरोप कूटनीति की भाषा बोलता है, लेकिन व्यवहार में वह अमेरिकी लाइन से बाहर जाने का साहस नहीं दिखा पाता। परमाणु समझौते (JCPOA) का टूटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ यूरोप ने वादे किए, लेकिन निभाने में नाकाम रहा।

अरब देशों की मौक़ापरस्ती और दिखावटी एकजुटता.

मुस्लिम दुनिया आज पहले से कहीं ज़्यादा बंटी हुई है। न कोई साझा रणनीति है, न कोई सामूहिक नेतृत्व।

जब अमेरिका या इसराइल ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक क़दम उठाते हैं, तब अरब और मुस्लिम देश बयान जारी कर निंदा ज़रूर करते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका रवैया पूरी तरह अलग होता है।

कई अरब देशों के इसराइल से मज़बूत राजनयिक और सुरक्षा संबंध हैं। अमेरिका के सैन्य अड्डे इन्हीं देशों की ज़मीन पर मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह निंदा असली होती है या सिर्फ़ “चेहरा बचाने” की कोशिश?

इसराइल की साज़िश और क्षेत्रीय अस्थिरता.

ईरान को क्षेत्रीय ख़तरे के रूप में पेश करना इसराइल की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा रहा है। परमाणु कार्यक्रम को बहाना बनाकर ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना, प्रतिबंधों को सही ठहराना और सैन्य कार्रवाई के लिए माहौल बनाना—यह सब उसी साज़िश का हिस्सा है।

इसराइल जानता है कि एक मज़बूत और स्वतंत्र ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए चुनौती है। इसलिए वह अमेरिका और पश्चिम को लगातार टकराव की ओर धकेलता है।

अमेरिका-ईरान टकराव और मुस्लिम देशों की दुविधा.

अगर अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध होता है, तो मुस्लिम देशों के सामने सबसे बड़ी दुविधा खड़ी होगी।

एक तरफ़ वे अमेरिका से अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते नहीं तोड़ना चाहेंगे, दूसरी तरफ़ मुस्लिम जनता के सामने अपनी शाख भी बचानी होगी।

इतिहास बताता है कि ज़्यादातर मामलों में ये देश खुलकर विरोध नहीं कर पाएंगे। सैन्य अड्डों के इस्तेमाल से इनकार करना उनके लिए आसान नहीं होगा, ख़ासकर ट्रंप जैसे नेताओं के दौर में, जहाँ कूटनीति से ज़्यादा “एक्शन” को तरजीह दी जाती है।

संख्या बहुत, ताक़त शून्य.

आज की मुस्लिम दुनिया एक कड़वी हक़ीक़त से जूझ रही है। 57 मुस्लिम देश होने के बावजूद न कोई साझा सोच है, न कोई संयुक्त रणनीति और न ही फ़ैसले लेने की मज़बूत सामूहिक व्यवस्था। यह सिर्फ़ कमजोरी नहीं, बल्कि मुस्लिम अभिजात वर्ग की खुली ग़द्दारी और नाकामी को उजागर करता है।
जिस दौर में अमेरिका और यूरोप नए औपनिवेशिक साम्राज्यवाद को नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं, उस दौर में मुस्लिम देशों का बिखरा रहना इस बात का संकेत है कि वे दबाव के आगे समर्पण कर चुके हैं। न एकता बची है, न संप्रभुता।

यूरोप और पश्चिम: गठबंधन ताक़त कैसे बनते हैं?
यूरोप और पश्चिमी दुनिया की असली ताक़त उनके हथियारों में नहीं, बल्कि गठबंधनों में है।
  • NATO सैन्य दबाव का औज़ार है

  • EU आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम है

  • G7 वैश्विक नीतियों को दिशा देने वाला मंच है

इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये पश्चिमी देश न सिर्फ़ आपस में जुड़े रहते हैं, बल्कि विकासशील और कमजोर देशों पर अपनी शर्तें भी थोपते हैं—चाहे वो अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या सुरक्षा नीतियाँ।

यही कारण है कि पश्चिमी देश अलग-अलग दिखते हुए भी संकट के समय एक ब्लॉक बन जाते हैं।

OIC और GCC: नाम बड़े, असर शून्य.
इसके उलट मुस्लिम दुनिया के पास मौजूद संगठन.
  • OIC (इस्लामिक सहयोग संगठन)
  • GCC (खाड़ी सहयोग परिषद)

सिर्फ़ काग़ज़ी संस्थाएँ बनकर रह गई हैं।
न OIC के पास कोई ठोस राजनीतिक शक्ति है, न कोई सामूहिक सुरक्षा ढांचा। न ही GCC तेल और धन के बावजूद मुस्लिम दुनिया को जोड़ने में सफल हो पाया।

इन मंचों से न तो कोई निर्णायक राजनीतिक फ़ैसला निकलता है, न कोई साझा आर्थिक या सांस्कृतिक रणनीति बनती है। न व्यापार के लिए खुला नेटवर्क, न परिवहन की साझा व्यवस्था, न मुद्रा सहयोग—कुछ भी नहीं।

57 देश, फिर भी कोई एलायंस नहीं.
यह सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुस्लिम दुनिया के पास:
  • विशाल जनसंख्या
  • अपार प्राकृतिक संसाधन
  • ऊर्जा का नियंत्रण
  • रणनीतिक भू-स्थान

सब कुछ मौजूद है, तो फिर कोई मज़बूत मुस्लिम एलायंस क्यों नहीं?
कोई साझा करेंसी नहीं, कोई संयुक्त बैंकिंग सिस्टम नहीं, कोई रक्षा गठबंधन नहीं। हर देश अलग-अलग पश्चिम की ओर देख रहा है, जैसे सुरक्षा और तरक्की की चाबी वहीं रखी हो।
यही बिखराव मुस्लिम दुनिया को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाता जा रहा है।

BRICS और नया विश्व व्यवस्था: एक मौका.

इसी पृष्ठभूमि में BRICS का उभार बेहद अहम हो जाता है। यह मंच अमेरिका के एकध्रुवीय दबदबे को चुनौती देता है और एक मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रखता है।

नई विकास बैंक, डॉलर के विकल्प की चर्चा और दक्षिण-दुनिया सहयोग—ये सब संकेत हैं कि दुनिया बदल रही है।
लेकिन अफ़सोस, मुस्लिम देश इस बदलाव में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ़ दर्शक बने हुए हैं।

सऊदी–पाकिस्तान–तुर्किये गठबंधन: देर से सही, सही क़दम.

हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक सहयोग और उसमें तुर्किये के शामिल होने की ख़बरें उम्मीद की किरण ज़रूर हैं।

यह गठबंधन:

  • सैन्य सहयोग
  • रक्षा उद्योग
  • कूटनीतिक समन्वय
जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम दुनिया को नई दिशा दे सकता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि यह पहल बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। अगर ऐसे गठबंधन 20–30 साल पहले बने होते, तो आज मुस्लिम दुनिया की स्थिति बिल्कुल अलग होती।

या तो एकता, या फिर इतिहास में गुमनामी

आज मुस्लिम दुनिया दोराहे पर खड़ी है।
या तो वह पश्चिमी साम्राज्यवाद के आगे झुकी रहे, बयानबाज़ी और मौक़ापरस्ती करती रहे—
या फिर साझा सोच, साझा रणनीति और साझा गठबंधनों के ज़रिये अपनी संप्रभुता को फिर से हासिल करे।
अगर 57 देश मिलकर भी एक मज़बूत राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक ब्लॉक नहीं बना सके, तो इतिहास यही लिखेगा कि यह सिर्फ़ बाहरी साज़िश नहीं थी—
यह अंदरूनी कमज़ोरी और नेतृत्व की नाकामी थी।

ईरान: एक मुल्क नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़ा एक नया निज़ाम.

ईरान आज सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा प्रतीक है जो अमेरिकी वर्चस्व पर टिकी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम दुनिया इस चुनौती में उसके साथ खड़ी हो पाएगी?
जब तक मुस्लिम देशों की नीतियाँ मौक़ापरस्ती, डर और दोहरे मानदंडों से बाहर नहीं आतीं, तब तक न तो असली एकता संभव है और न ही संप्रभुता।
 तारिख गवाह रहेगा कि एक-एक करके सबने साम्राज्यवादी दबाव के आगे घुटने टेक दिए—बिना किसी साझा प्रतिरोध के।

ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है—ऐसा निज़ाम जो अमेरिकी वर्चस्व, पश्चिमी शर्तों और ज़ायोनिस्ट एजेंडे को खुलकर चुनौती देता है। यही वजह है कि यूरोप और अमेरिका दोनों को ईरान कभी स्वीकार्य नहीं रहा।

ईरान की सबसे बड़ी “ग़लती” यह है कि वह न तो इसराइल के सामने झुकता है और न ही वॉशिंगटन की मुख़बिरी करता है। 
पश्चिम जिस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को “नियम-आधारित व्यवस्था” कहता है, दरअसल वह उनके बनाए हुए मानकों का ढांचा है—जहाँ वही तय करते हैं कि कौन लोकतांत्रिक है, कौन ख़तरा है और कौन दुश्मन। ईरान इस ढांचे में फ़िट नहीं बैठता, इसलिए उसे अस्वीकार्य घोषित कर दिया गया।

यूरोप और अमेरिका को ऐसा ईरान चाहिए था जो शाह पहलवी के दौर की तरह पश्चिम-परस्त हो—जो इसराइल को बिना सवाल किए स्वीकार करे, अपने परमाणु कार्यक्रम से हाथ खींच ले और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को त्याग दे। पहलवी शासन उनके लिए इसलिए सुविधाजनक था क्योंकि वह न सिर्फ़ अमेरिकी हितों का संरक्षक था, बल्कि क्षेत्र में ज़ायोनिस्ट हितों की भी रक्षा करता था।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने इस पूरी व्यवस्था को पलट दिया। पहली बार मध्य-पूर्व में एक ऐसा राज्य उभरा जिसने कहा कि वह न तो अमेरिका के आदेशों पर चलेगा और न ही इसराइल के अस्तित्व को वैधता देगा।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी सिर्फ़ ऊर्जा या तकनीक का मुद्दा नहीं है; यह ख़ुदमुख़्तारी और संप्रभुता का प्रतीक है। पश्चिम चाहता है कि तकनीक सिर्फ़ उन्हीं देशों के पास हो जो उनकी लाइन पर चलते हों। जो देश स्वतंत्र नीति अपनाता है, उसके लिए वही तकनीक “ख़तरा” बन जाती है। यही दोहरा मापदंड ईरान के मामले में साफ़ दिखाई देता है।

ज़ायोनिस्ट लॉबी के लिए ईरान इसलिए भी असहज है क्योंकि वह सिर्फ़ विरोध नहीं करता, बल्कि क्षेत्रीय नैरेटिव को चुनौती देता है। फ़िलिस्तीन के सवाल पर उसका रुख़ नैतिक और राजनीतिक—दोनों स्तरों पर पश्चिमी चुप्पी को बेनक़ाब करता है। इसराइल की सुरक्षा-केन्द्रित सोच के लिए ऐसा वैचारिक प्रतिरोध किसी सैन्य चुनौती से कम नहीं।
यही कारण है कि आज भी पश्चिम ईरान में शासन परिवर्तन का सपना देखता है। कभी प्रतिबंधों के ज़रिये, कभी आंतरिक असंतोष को हवा देकर और कभी पहलवी परिवार जैसे प्रतीकों को दोबारा सामने लाकर। उद्देश्य साफ़ है—ईरान को फिर से उस ढांचे में लाना जहाँ वह इसराइल को स्वीकार करे, अमेरिकी शर्तों पर चले और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दे।

लेकिन ईरान का महत्व इसी में है कि वह झुकने से इनकार करता है। वह यह संदेश देता है कि दुनिया सिर्फ़ एक ध्रुव पर नहीं चल सकती। इसी वजह से ईरान आज केवल एक देश नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़े नए विश्व दृष्टिकोण का प्रतिनिधि बन चुका है—और यही बात पश्चिम को सबसे ज़्यादा बेचैन करती है।

इस पूरे परिदृश्य में शाह पहलवी के वारिस की हालिया घोषणाएँ पश्चिमी मंसूबों को और ज़्यादा बेनक़ाब करती हैं। उसने खुले तौर पर यह संकेत दिया है कि अगर उसे सत्ता मिलती है तो वह इसराइल को तुरंत तस्लीम करेगा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ख़त्म कर देगा और अमेरिका के इशारों पर चलने वाली सरकार बनाएगा।
यह साफ़ संदेश है कि बदले में पश्चिम ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटा देगा, लेकिन इसकी क़ीमत ईरान को अपनी ख़ुदमुख़्तारी, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी। ऐसा शासन ईरान का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अमेरिका की कठपुतली होगा—जो वॉशिंगटन और यूरोप के हितों की रखवाली करेगा, न कि ईरानी अवाम के।
असल में यह कोई “लोकतांत्रिक विकल्प” नहीं, बल्कि ईरान को दोबारा उसी दौर में ले जाने की कोशिश है जहाँ पहलवी सत्ता पश्चिम के दरबार में बैठकर हुक्म बजाती थी। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान सिर्फ़ एक देश नहीं रहेगा, बल्कि हमेशा के लिए यूरोपीय और अमेरिकी एजेंडे का ग़ुलाम बन जाएगा.
57 Muslim nations stand divided—will they remain American puppets or rise with BRICS into a new world order?

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Maa Ki Tarbiyat: Naslon Ki Buniyad Aur Ummat Ka Mustaqbil.

Ek Maa ke Hath me Ek Nasli ka Mustaqbil aur Qaum ki Jimmedari Hoti hai.

माँ की गोद में नस्ल, उसके दामन में क़ौम की तक़दीर।
माँ की तर्बियत से उम्मत का मुस्तक़बिल सँवरता है।
एक माँ की ममता, हज़ारों नस्लों का रास्ता।
माँ: एक नस्ल की उस्ताद, एक क़ौम की रहनुमा।
जिस माँ ने तर्बियत की, उसने तारीख़ लिखी।
माँ का दामन तले तालीम का पहला मदरसा होता है।
जिस माँ ने अपने बच्चों को अदब सिखाया, उसने पूरी क़ौम को तहज़ीब दी।
माँ की गोद में सिर्फ़ बच्चा नहीं, एक पूरी नस्ल परवान चढ़ती है।
माँ का एक लफ़्ज़, बच्चों की ज़िन्दगी का रास्ता तय करता है।
माँ की दुआ, नस्लों की तक़दीर बदल सकती है।
माँ के प्यार से बनती है क़ौम की पहचान।
नस्ल की परवरिश से क़ौम की तक़दीर लिखती है माँ।
A Mother Nurtures a Generation, Shapes a Nation.
From Cradle to Country: A Mother's Legacy.
The Hand That Raises a Child Builds a Civilization.
Mothers: The Architects of Generations and Nations.
One Mother's Care, A Nation's Destiny.
Mother afaction, Mother love, Society and mother, Mother importance,
माँ का दामन तले तालीम का पहला मदरसा होता है।
माँ की गोद में नस्ल, उसके दामन में क़ौम की तक़दीर.
माँ एक ऐसा रिश्ता है जो सिर्फ़ लफ़्ज़ों में नहीं, जज़्बातों में बसता है। उसकी मुहब्बत, उसकी दुआएँ और उसकी तरबियत किसी भी बच्चे की शख्सियत की बुनियाद रखती हैं। माँ की गोद वो पहला मदरसा है जहाँ बच्चा बोलना, चलना ही नहीं, बल्कि जीना भी सीखता है। और यही तरबियत जब सलीके से दी जाती है, तो एक नस्ल नहीं, पूरी क़ौम संवर जाती है।
माँ का किरदार सिर्फ़ घर की चारदीवारी तक महदूद नहीं होता। वो अपने बच्चों की तालीम, तर्बियत और तहज़ीब में ऐसा रंग भरती है जो उम्र भर नहीं उतरता। एक बच्चा जब माँ की बातों से अदब सीखता है, जब उसकी आँखों में माँ की उम्मीदें चमकती हैं, तो वो सिर्फ़ एक अच्छा इंसान नहीं बनता—बल्कि वो समाज का एक ज़िम्मेदार फ़र्द बनता है।

माँ की दुआओं में वो असर होता है जो तालीमगाहों की किताबों में नहीं मिलता। उसकी निगाहें बच्चों की ग़लतियों को सिर्फ़ देखती नहीं, उनकि इसलाह भी करति हैं। माँ की लोरि, एक मुस्कान, एक नसीहत—ये सब मिलकर बच्चे की सोच को ऐसा रुख देती हैं जो उसे ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में भी सीधा चलना सिखाती है।

आज अगर हम किसी क़ौम की तरक़्क़ी देख रहे हैं, तो यक़ीनन उसके पीछे माँओं की मेहनत और उनकी बेपनाह कुर्बानियाँ हैं। माँ अपने अरमानों को बच्चों की कामयाबी में ढाल देती है। वो अपनी नींदें, अपने आराम, यहाँ तक कि अपनी ज़िन्दगी भी बच्चों की तरबियत के लिए कुर्बान कर देती है।

इसलिए कहा जाता है: "माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है।" अगर माँ की तरबियत में अख़लाक़, तहज़ीब और इल्म का रंग हो, तो वो बच्चे नहीं, आने वाली नस्लों को तैयार करती है,  जब नस्लें संवरती हैं, तो क़ौमें बनती हैं, तामीर होती हैं, और दुनिया में अपनी पहचान छोड़ जाती हैं।

माँ का किरदार वक़्त से आगे चलता है। उसकी सोच, उसकी परवरिश और उसकी ममता आने वाली सदियों की बुनियाद रखती है। इसलिए माँ को सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, एक तामीर करने वाला फ़र्ज़ समझना चाहिए।
माँ की दुआ, उसकी मेहनत और उसकी कुर्बानी एक ऐसी दौलत है जो वक़्त के साथ और बढ़ती है। 

“माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है”—यह जुमला सिर्फ शायरी नहीं, बल्कि तर्ज़-ए-हयात का हकीक़ी नक़्शा है जिसमें गोद तालीमगाह, लोरी इल्म की पहली आवाज़ और दामन अमानत का पहला आसमान बन जाता है.

“माँ की गोद में एक नस्ल और दामन में क़ौम का मुस्तक़बिल होता है”—इसका मतलब है कि तरबियत का पहला लम्हा जो घर में जन्म लेता है, वही आगे चलकर समाज और तारीख़ के रुख़ को मोड़ देता है.

 बुनियादी मसअला: तरबियत किसे कहते हैं
- तरबियत सिर्फ़ हिदायत नहीं, आदत, रवैया और निगाह की तामीर है—यानी बच्चा माँ की बात नहीं, उसके सुलुक, किरदार की नक़ल करता है, और यही नक़ल उसकी शख्सियत की इमारत की पहली ईंट बनती है.  

- तरबियत का उसूल यह है कि “जो दिखेगा, उसि पे अमल करेगा”—अख़लाक़, सलीक़ा, हया, सच्चाई और रहम अगर रोज़मर्रा के अमल में हों तो बच्चा उन्हें साँस की तरह अपनी फितरत में ले लेता है .  

 माँ की गोद: पहली तालीमगाह
 माँ की गोद वह जगह है जहाँ ज़बान, लहजा और लफ़्ज़ की मिठास बच्चे के दिल पर पहली नक़्शबंदी करती है, और यहीं से उसे ख़ुद-ए-आगाही, इज़्ज़त-ए-नफ़्स और दूसरों की हुरमत का एहसास होने लगता है 
 गोद में सुनी हुई दुआ, देखी हुई सफ़ाई और महसूस की हुई शफ़्क़त, किताबों से पहले क़ल्ब पर उतरती है, और यही अहसास बाद में क़ौमी अख़लाक़ में तब्दील हो जाते हैं.

 दामन-ए-माँ: अमानत और अम्न
- माँ का दामन बच्चे के लिए अमान की पनाहगाह है—यहां खौफ पिघलता, ऐतेबार बनता और जस्बाती ज़ख्म भरते हैं; ऐसे माहौल में पले बच्चे कल को समाज में अम्न और एतबार का पुल बनते हैं.  
- जब दामन तमीज़, तवाज़ुन और तहम्मुल से भरा हो, तो बच्चा मुद्दतों बाद भी तकरार में तहजीब और इख़्तलाफ़ में इख़लास को तरजीह देता है—यही तर्ज़ शकाफत का असल हुस्न है.

 बुनियादी उसूल: इल्म, अदब, हया, इन्साफ़
इल्म रोशनी है, मगर अदब उसकी रवानी, हया उसकी हिफ़ाज़त और इन्साफ़ उसका क़याम है; माँ जब चारों को घर के साँचे में ढालती है तो बच्चे का “फ़ैसला” ज़्यादातर नेकी के हिमायत में होता है.  
इन उसूलों की घरेलू तालीम बच्चों में “ज़िम्मेदारी” की क़ुबूलियत पैदा करती है—वो फ़र्ज़ से भागते नहीं, बल्कि फ़र्ज़ को अवसर समझ कर अदा करते हैं.

असरात-ए-तरबियत: नफ़्स से नस्ल तक
- जिस घर की हवा में हक़ीक़त, शुक़्र और सादगी हो, वहाँ परवरिश पाने वाले बच्चे झूठ से घबराते हैं,यही आदतें आगे चलकर क़ौम की मआशत में अमानतदारी बनती हैं.
- माँ की आँख का एतबार बच्चे को दूसरों पर भरोसा करना सिखाता है; यह ऐतेबार फिर इदारों, इक्तेदार और मुआशरे में हक़ और सच्चाइ की चाहत में ढलता है .

 माँ का किरदार: लफ्ज़ से बढ़कर मिसाल
- बच्चे की पहली किताब माँ का किरदार है—वह अपने वक़्त की पाबंदी, बात की सच्चाई और रिश्ता निभाने की जुदाई से बच्चा सीखता है कि “कैसा इंसान होना है”. 
- जब माँ गलती पर अफ़्व करती और सज़ा में तदरीज अपनाती है, तो बच्चे का ज़ेहन “क़ानून” नहीं, “इन्साफ़” का दीवाना बनता है—यही तमीज़ कल की अदालती और समाजी रवायतों में बराबरि और इमानदारि का रंग भरती है. 
 
 ज़हन-साज़ी: ज़ुबान, लहजा, कहानी
- घर की ज़ुबान बच्चों की सोच का नक़्शा बनाती है; नर्म लहजा, साफ़ लफ़्ज़ और इज़्ज़तदार खिताब बच्चों को खुद्दारी देते हैं और बदज़बानी से नफरत पैदा करते हैं.  
- सोते-सोते सुनाई दास्तानों में सच का सरमाया और शुजाअत का ज़ायका डालना बच्चों के तसव्वुर को मेहनतकश, रहमदिल और सच्चा बनाता है.

अदब-ए-इख़्तलाफ़: तहज़ीब की रीढ़
- माँ अगर अपने इख़्तलाफ़ात को शऊर और शराफ़त से संभाले तो बच्चा बहस में हक़ीक़त-तलबी सिखता है, हमलावर लहजा नहीं; यही अदब-ए-इख़्तलाफ़ आगे चलकर हक़ीकि तालीम और क़ौमी मुक़ाबले का सलीक़ा बनता है.
- ग़ुस्से पर क़ाबू, तौहीन पर ख़ामोशी और हक़ पर इसरार—ये तीन उसूल वालिदा की मदरसा-ए-ख़ुस्न हैं जिनसे उम्मत कि बुनियाद” मे ताक़त मिलति है.  

 मआशियात पर असर: क़नाअत, क़ाबिलियत, किफ़ायत
- माँ जब क़नाअत सिखाती है—यानी “कम में ख़ुश रहना”—तो औलाद “हक़” और “हराम” की लकीर पहचानती है; यह पहचान रीश्वत के ख़िलाफ़ अन्दर की अदालत खड़ी कर देती है.  
- किफ़ायत और तदबीर से घर चलाने का हुनर आगे चलकर कारोबार में खुद मुखतारि, मुनज़्ज़मियत और टिकाऊ ख़र्च-सोज़ी की बुनियाद रखता है.

मुज्तमई असर: पड़ोस से शहर तक
- जिस घर का बच्चा “हक़-ए-जावर” सीखता है, वह बड़ा होकर ट्रैफ़िक से लेकर तहज़ीब तक क़ानून को अपने फ़ायदे का मज़ार नहीं, समाज की अमानत समझता है.  
- माँ की दी हुई “ख़िदमत” की रूह, बच्चा स्कूल, मोहल्ला और दफ़्तर में लेने के बजाय देने की आदत बनाकर जाता है—ऐसे लोग मुआशरे की रूह में इअतबार और अमानत की रवानी लाते हैं.

 सियासत पर असर: शऊर-ए-शहरी और शिरकत
  माँ अगर सवाल करना सिखाती है—बेअदबी के बग़ैर—तो बच्चे में “शहरी शऊर” पैदा होता है; वह रियासत के खजाने को तिजारत नहीं, अमानत समझता है और मज़मून से ऊपर उसूल पर खड़ा होना सीखता है.  
शमूलियत, मशविरा और सब्र—ये तीनों अगर घर में क़दर पाते हैं, तो समाज में मुख्तलिफ राय का एहतिराम पैदा होती है.

तारिख़ में माँ का किरदार
- ताक़तवर तहज़ीबें सिर्फ़ फ़तह से नहीं, घर की तालीम से बनीं; जहाँ घर में अख़लाक़ था, वहाँ बाज़ार में अमानत रही और अदालत में इन्साफ़, और यही जुरअत आगे चलकर इल्म, सन्अत और अदब को आसमान तक उठाती रही.  
- गिरावट वहीं आयी जहाँ घर का मज़मून खाली हुआ—जब तरबियत बाज़ार के शोर को दे दी गई—इससे नस्लें शोहरत की तालिब और सिफ़त की ग़रीब हो गयीं.

 हक़ीक़त और अफसाना.
- माँ जब बच्चे को “कामयाबी” की नहीं, “क़ाबिलियत” की कहानी सुनाती है, तो बच्चा मंज़िल के बजाय सफ़र को सच की रौशनी में तय करना सीखता है.  
- शोर-शराबा और मुक़ाबले की आग बच्चे का हौसला जलाती है; तस्कीन, तरगीब और तादील उस आग को चिराग़ बना देती हैं.

 औलाद की शख्सियत-साज़ी: पाँच उस्तुवान
- सच बोलना—चाहे नुक़सान हो—ताकि ज़मीर की अदालत हमेशा बरी रखे .  
- वक़्त की क़द्र—क्योंकि तहज़ीब तवक्को से नहीं, तंजीम से बनती है.  
- अदब-ए-ख़िलाफ़—ताकि इख़्तलाफ़ भी तालीम दे, तौहीन नहीं.  
- मेहनत पर यक़ीन—ताकि क़िस्मत पर इंतज़ार नहीं, कोशिश पर इम्तिहान हो.  
- शुक़्र और सादगी—ताकि ख़ुशी चीज़ों से नहीं, नज़र से पैदा हो.  

 माँ की ख़ुद-साज़ी: जो नहीं, वह कैसे दे
- माँ की ख़ुद-तालीम—क़िराअत, गौर-ओ-फ़िक्र और दुआ—उसी रोशनी को दामन में जमा करती है जो फिर गोद में उतरती है.  
- थकावट के दरमियान छोटा सा वक़्फ़ा, तिलावत या ख़ामोशी की सर्ज़मीं, जज़्बाती बैलेंस को वापस लाती है—यही बैलेंस तरबियत में असर करता है.

 बाप का शेरीकाना-किरदार: इकतरफ़ा नहीं, हमसफ़र
- तरबियत का बोझ एक कंधे पर नहीं; जब बाप भी लफ़्ज़ में नर्मी, वक़्त में शिरकत और कामों में मदद देता है, तो बच्चा “इन्साफ़” को इंसानियत का अस्ल उसूल समझता है.  
- माँ-बाप की मुत्तफ़िक़ रवायत बच्चे में कन्फ्यूज़न नहीं, वाज़िह नक़्शा बनाती है; यह वुज़ूहत ज़िंदगी के फैसलों में हिम्मत और सलीक़ा देती है.

 घर के उसूल: पाँच अमली नक़्शे
- सुबह-शाम छोटा सा दुआ-ओ-अदब—दो मिनट का—ताकि घर की हवा में रूहानीत की खुशबु रहे.  
- हफ़्ते में एक “खिदमत का दिन”—जहाँ बच्चे किसी और के काम आएं—ताकि लेने से ज़्यादा देने का हौसला हो.  
- “शिकायत के बजाय हल”—हर मसअले पर “क्या करेंगे?” का सवाल—ताकि निगाह मसाइल-आफ़रीं नहीं, हल-आफ़रीं बने.  
- “स्क्रीन से पहले किताब”—कम-अज़-कम रोज़ दस मिनट—ताकि तवज्जोह बिखरे नहीं, बने.  
- “तौहीन ममनूअ”—लफ़्ज़ों की सफ़ाई पर नज़र—ताकि अदब आदत बने.

 मा’शराई इंफ्रास्ट्रक्चर: माँ की मदद के पाँच सहारे
- मोहल्ला लाइब्रेरी/रीडिंग सर्कल—ताकि किताब घर तक सीमित न रहे.  
- पैरेंटिंग वर्कशॉप—छोटी-छोटी ट्रेनिंग जिससे तरबियत में एकसा लहजा बने.  
- खिदमत ए खल्क़”—बच्चों को अमली सदका सिखाये  
- वरजिस—जिस्मानी हरकत और ज़ेहनी तख़लीक़ साथ-साथ.

 क़ौम की तक़दीर: घर से तारीख़ तक
- जो क़ौमें घर को तालीम का मरकज़ बनाती हैं, उनका बयानिया रियासत में अद्ल, बाज़ार में अमानत और अक़्लियती इख़्तिलाफ़ में तहज़ीब की शक्ल में नज़र आता है.  
- माँ की तरबियत से निकली “ज़िम्मेदार शख्सियत” ही अदालतों को इंसाफ़-परस्त और इदारों को शफ़्फ़ाफ़ रखने के लिए समाजी दबाव पैदा करती है.
माँ जब अपनी ज़ात को इल्म और अदब में तराशकर तरबियत को रहमत बना देती है, तो गोद से उठती हुई छोटी-सी आवाज़ आगे चलकर क़ौम के बड़े-बड़े फैसलों की रूह बन जाती है—यही वजह है कि “माँ एक नस्ल की परवरिश करती है और एक क़ौम की तक़दीर लिखती है” कोई मुबालग़ा नहीं, बल्कि तारीख़ का मुकम्मल बयान है.

या रब, हमारी माँओं की गोद को इल्म, अदब, हया और इन्साफ़ का बाग़ बना दे; उनकी थकन को रहमत और उनकी आँख को यक़ीन-ए-कामिल अता फरमा. 
रब्बना, हमारी नस्लों को सच, शुजाअत और शुक़्र की दौलत दे; घरों को अमन, मुहब्बत और क़नाअत का साया दे ताकि हमारी क़ौम की सुबह साफ़ हो. आमीन.

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Aurat Ki Aazadi Western Libas Me Nahi Sharai Libaas Me Hai.

Tight & Revealing Clothes Are Not Islamic Attire – A Faithful Reminder.

True Freedom for Women Lies in Modesty, Not in Tight Fashion.
Women’s liberation is not measured by how tight or revealing their clothes are, but by the dignity, respect, and honor that modest dress brings. Tight and transparent outfits may be seen as modern trends, but they do not align with the principles of Shari’ah. True empowerment comes when women embrace modesty, which protects their honor and elevates their status in society.
औरत की आज़ादी का हकीकी मफ़हूम: तंग लिबास या शरीअत की पाबंदी?
मेरी बहनों और बेटियों के नाम एक पुर-खुलूस पैगाम: हया की हिफाज़त ही असली इज्जत है।
पर्दा औरत की शान, हया ईमान, Islamic perspective, True empowerment
लिबास के इंतेखाब से पहले यह चंद बातें जरूर सोचिये.
Women’s freedom is celebrated through modesty, dignity, and respect – not through exposure. Islam teaches that real empowerment is found in covering, not in revealing.
खवातीन कि आज़ादि कि अलामत तंग और बारिक लिबास नहि शरइ लिबास है.

याद रखें कि हर वह काम और हर वह चीज़ जो आपको बे-हयाई और ज़िना की तरफ ले जाए, उससे बचो। फहश तस्वीरें और फहश ड्रामे और फहश फिल्में, फहश गाने, फहश किस्म के अफसाने और फहश डाइजेस्ट पढ़ना, गैर-महरम को देखना, तंग या बारीक (पतले) या छोटे कपड़े पहनना, बे-पर्दगी (यानी गैर-महरम से पर्दा न करना) और ना-महरम के लिए ज़ेब व ज़ीनत इख्तियार करना, ना-महरम से तन्हाई में मिलना, या ना-महरम के साथ तन्हा सफर करना, ना-महरम से बातें करना, या ना-महरम को छूना, यह सब बे-हयाई और ज़िना के रास्ते हैं। और इन सब कामों से इस्लाम हमको मना करता है, जैसा कि कुरआन में है कि:

बे-हयाई के जितने भी तरीके हैं उनके पास भी मत जाओ, ख्वाह वह अलानिया हों, ख्वाह पोशीदा। (अल-अनाम, 151).
एक और जगह पर अल्लाह का इरशाद है कि:
खबरदार ज़िना के करीब भी न फटकना क्योंकि वह बड़ी बे-हयाई और बहुत ही बुरी राह है। (बनी इसराइल, 32).

मुआशरे में इज्जत और तहफ्फुज़.
बराए मेहरबानी सब बहनों और बेटियों से दरख्वास्त है कि अपना लिबास इस्लाम की दी हुई तालीम के मुताबिक पहनें और शारई पर्दे को अपनाएं ताकि आपको मुआशरे में इज्जत मिले और आपकी इज्जत भी महफूज रहे.

अगर आप बारीक और तंग लिबास पहनेंगी तो मुआशरे में आपको इज्जत भी नहीं मिलेगी और मुआशरे में बे-हयाई भी पैदा होगी और आप मुआशरे में सताई भी जाओगी और आपको कोई इज्जत की नज़र से नहीं देखेगा बल्कि सब आपको बुरी नज़र से ही देखेंगे। और आप अल्लाह पाक की सज़ा की मुस्तहिक भी होंगी।

लिबास की खरीदारी और नामा-ए-अमाल.
 लिबास की खरीदारी से पहले जरा सोचिए कि लिबास जैसा भी हो, बोसीदा हो जाएगा। लिबास की तारीफ करने वाले या तनकीद करने वाले भी फना हो जाएंगे, लेकिन लिबास के नतीजे में मिलने वाला अजर-ओ-सवाब या गुनाह-ओ-वबाल आपके नामा-ए-अमाल में बाकी रहेगा।

इसीलिए मर्दों को भी चाहिए कि वह अपनी बीवी, बच्चों और घर में बहनों और बेटियों को लिबास के बारे में समझाएं और उनकी इस्लाह करें ताकि उनका लिबास भी इस्लामी तालीम के मुताबिक हो, क्योंकि कल को कयामत के दिन आपसे भी सवाल होगा कि घर वालों को समझाया क्यों नहीं। जैसा कि हदीस में आता है कि:
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: आगाह हो जाओ तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में सवाल किया जाएगा। पस इमाम (अमीरुल-मोमिनीन) लोगों पर निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा। मर्द अपने घर वालों का निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा और औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की निगेहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा और किसी शख्स का गुलाम अपने सरदार के माल का निगेहबान है और उससे उसके बारे में सवाल होगा। आगाह हो जाओ कि तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में पुरसिश (पूछ- ताछ) होगी। (सहीह_बुखारी-7138)
अल्लाह के अजाब से बचाव की फिक्र.

और औरतों को भी चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों,वालिदैन,और भाइयों और शौहर की फरमाबरदारी करें और अपना लिबास इस्लाम की तालीम के मुताबिक बनाएं। और अपने आप को अल्लाह पाक के अजाब से बचा लें। मर्दो को भि हुक्म है के वह अपनी नज़रे निचि रखे और ना मेहरम से बचे, अगर गलति से नज़र पर जाये तो माफ है लेकिन वह अपनि निगाहो कि हिफाज़त करे. जज़ाक-अल्लाहु खैरा।

अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है:
ऐ ईमान वालो! तुम अपने आप को और अपने घर वालों को उस (जहन्नम की) आग से बचाओ जिसका ईंधन इंसान हैं और पत्थर हैं। जिस पर सख्त दिल मजबूत फरिश्ते मुकर्रर हैं, जिन्हें जो हुक्म अल्लाह तआला देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाए बजा लाते हैं। (सूरह अत-तहरीम 66, आयत नंबर 6)

अल्लाह पाक हम सब को इस्लामी तालीमात पर अमल करने और दूसरों की इस्लाह करने वाला बनाए और हर तरह के गुनाह से बचाए। आमीन।
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Red Revolution: Jab USSR Ne Quran Par Pabandi Laga Di.

Red Revolution: Reality of Freedom or Mental Slavery?

USSR’s Red Revolution & Qur’an Ban – How Leftism Hollowed Out Humanity.
When the promise of freedom turned into chains of ideology, even the Qur’an was silenced.
The so‑called Red Revolution promised liberation, but in reality, it enslaved minds under rigid ideology. During the USSR era, mosques were shut down, and the Qur’an was banned, cutting people off from divine guidance. Leftism thought replaced spirituality with empty slogans, leaving humanity hollow.
Mental Slavery, red revolution, freedom, USSR fall, uSSR fall reason,
लाल इंकलाब' की हकीकत: आजादी या दिमागी गुलामी? जानिए कैसे लेफ्टिज्म ने इंसानियत को खोखला किया!
क्या सोशलिज्म वाकई बराबरी का निजाम है या यह सिर्फ गरीबी बांटने का एक ढोंग है? कैसे 'आजादी' का नारा लगाने वाले लोग मजहबी और माशी (आर्थिक) तौर पर कौमों को तबाह करते हैं। यह हर उस फितने का हक़ और आज़दि के नाम पर वकालत करते है जो इसानि फितरत,क़ुदरत के खिलाफ है.

   जब क़ुरआन पर पाबंदी लगी सोवियत रूस (USSR) मे.
1973 का वह दौर था जब सोवियत रूस में कम्युनिज्म का 'तूति' बोलता था। दुनिया के सियासतदां और दानिशवर यह पेशीनगोई कर रहे थे कि अब बहुत जल्द पूरा एशिया 'सुर्ख' (लाल) हो जाएगा। इसी दौर में एक पाकिस्तानी नौजवान मास्को पहुंचा। वह बताता है कि जुमे के दिन जब उसने नमाज की ख्वाहिश जाहिर की, तो मालूम हुआ कि वहां की मस्जिदों को या तो गोदाम बना दिया गया है या सियाह के ठहरने की जगह।

बड़ी जद्दोजहद के बाद एक बंद मस्जिद का ताला खुलवाया गया। अजान की आवाज गूंजी तो लोग सहम गए कि यह कौन है जिसने मौत को दावत दी है? 
                                                  तन्हा नमाज पढ़कर जब वह बाहर निकला, तो एक बच्चा उसे अपने घर ले गया। वहां जो मंजर उसने देखा, वह रूह कंपा देने वाला भी था और ईमान रौशन करने वाला भी।

जब उस नौजवान ने अपनी जेब से कुरआन का एक छोटा नुस्खा निकालकर बच्चे को पढ़ने के लिए दिया, तो बच्चा हक्का-बक्का रह गया। उसे 'नाज़रा' (देखकर पढ़ना) नहीं आता था। लेकिन जैसे ही उस शख्स ने एक आयत की इब्तिदा की, बच्चे ने जबानी पूरा पारा सुनाना शुरू कर दिया। 

इल्हाद और लिबरलिज्म का फरेब.
यही वह मुकाम है जहां 'सुर्ख' नजरियात और खुद-साख्ता लिबरल दानिशवरों के खोखलेपन का हक़ीक़त आशकार होता है। यह वही तबका है जो 'आजादी-ए-राय' और 'हुकूक' का ढिंढोरा पीटते नहीं थकता, लेकिन जहां इनका इक्तदार (सत्ता) आता है, वहां सबसे पहले मजहबी किताबों और अकीदों को निशाना बनाया जाता है। इनका लिबरलिज्म सिर्फ वहीं तक है जहां तक मजहब की तौहीन की बात हो, लेकिन जब अपनी विचारधारा थोपने की बारी आती है, तो ये फासीवाद की तमाम हदें पार कर जाते हैं।

सोवियत रूस में कुरआन रखने पर खानदान के खानदान को फांसी दे दी जाती थी। जो लोग आज मजहबी आजादी के नाम पर शोर मचाते हैं, उन्हें तारीख के इन पन्नों को पलटना चाहिए कि कैसे लिबरल नकाब ओढ़कर ये लोग इंसानी रूह को कुचलने की कोशिश करते हैं। इनका 'लाल इंकलाब' दरअसल इंसानी फितरत और रूहानियत के खिलाफ एक जंग थी।

सीनों में महफूज खुदा का कलाम.

उस बच्चे के वालिदैन ने बताया कि वहां के दरजी,सब्जी फरोश और मोची, दुकानदार असल में 'हाफिज़-ए-कुरआन' थे। वे बच्चों को मजदूरी के बहाने बुलाते और चुपके से सीना-ब-सीना कुरआन हिफ्ज़ कराते। रूस (इलहाद) की रियासत ने कागज पर तो पाबंदी लगा दी, लेकिन वे उन सीनों पर पाबंदी न लगा सके जिनमें खुदा का नूर बसा था। वहा किताबे नहि होने पर वे लफ्ज़ नहि पह्चान सकते, लकिन आयते उन्हे याद करा दि गयि थी इस्लिये वे देख कर तिलावत तो नहि कर सकते थे क्युंके वे हरुफ ए तहजि से ला इल्म थे मगर उंके दिलो मे क़ुरान कि आयते महफुज थी.

यह वाकिया इस आयत की जिंदा मिसाल है:
"बेशक यह ज़िक्र (कुरआन) हमने ही नाजिल फरमाया और बेशक हम ही इसके निगहबान हैं।"

आज के दौर में भी जो लोग मजहब को 'अफीम' कहते हैं या इसे तरक्की की राह में रुकावट समझते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि दुनियावी निजाम और नजरियात बदलते रहते हैं, मिटते रहते हैं, लेकिन खुदा का कानून अटल है। जो लोग आजादी के नाम पर मजहबी किताबों को जलाते या उन पर पाबंदी लगाते हैं, वे दरअसल अपनी जहालत और बुजदिली का सबूत पेश करते हैं। अल्लाह ने क़ुरान कि हिफाज़त् कि जिम्मेदारि खुद लि है फिर यह दुनिया वाले कौन सि ताक़त रखते है तो उसे पबंदि लगा कर खत्म कर दे, मिटा दे. बेशक अल्लाह हि यह दुनिया बनाने वाला है और असल मालिक ए कायेनात है.

तर्जीह-ए-बातिल: लेफ्टिज्म और सोशलिज्म का ज़ाम.
आज के दौर में 'लेफ्टिज्म' और 'सोशलिज्म' जैसे नजरियात को बड़ी चमक-दमक के साथ पेश किया जाता है। खुद को 'प्रोग्रेसिव' और 'रोशन ख्याल' कहने वाला यह तबका असल में दिमागी कज-रवी (टेढ़ापन) का शिकार है, इनका बुनियादी फलसफा यह है कि मजहब एक 'अफीम' है, जबकि हकीकत यह है कि इनका अपना नजरिया एक ऐसा नशा है जो इंसान से उसकी फितरी पहचान छीन लेता है।

माशी (आर्थिक) तबाही का मंजर.

सोशलिज्म का सबसे बड़ा मुगालता 'मसावात' (बराबरी) है। यह नारा सुनने में तो बड़ा दिलकश लगता है, लेकिन अमली तौर पर यह 'गरीबी की बराबरी' है।
 यह निजाम इंसान के इनफरादि सलाहियतो (Individual Skills) का कत्ल कर देता है। जब एक मेहनतकश और एक कामचोर को एक ही तराजू में तोला जाएगा,तो मुआशरे से जद्दोजहद का जज्बा खत्म हो जाता है। 
यही वजह है कि जहां-जहां 'सुर्ख परचम' लहराया, वहां की मइशत (Economy) दम तोड़ गई। इन्होंने सरमायादारी (Capitalism) की बुराइयों को खत्म करने के नाम पर रियासती जुल्म का ऐसा निजाम कायम किया जहां इंसान सिर्फ एक मशीन का पुर्जा बनकर रह गया।

मुआशरती बिगाड़ और लिबरल पाखंड.

इन 'जदीद' नजरियात ने खानदानी निजाम (Family System) को जो चोट पहुंचाई है, वह किसी से ढकी-छुपी नहीं। आजादी के नाम पर बद-अख्लाकि, बुराइ, बदकारि (Unrestrained behavior) को फिरोघ देना इनका असल एजेंडा है। ये उस वक्त तक 'लिबरल' रहते हैं जब तक आप इनके सुर में सुर मिलाएं, लेकिन जैसे ही आप खुदा, रसूल या अपनी रिवायत (Tradition) की बात करेंगे, इनका सारा बर्दाश्त का मादा खत्म हो जाता है। 

    जो लोग आज मजहबी किताबों पर पाबंदी की वकालत करते हैं, वही लोग अपनी 'लाल किताब' (लाल सलाम) को मुकद्दस मनवाने के लिए इंसानी खून बहाने से भी गुरेज नहीं करते। स्टालिन,लेनिन जैसे इनके रहबरो ने क्या किया? 
गुलाग मे क्या हुआ यह सब छुपाना इनकि असलियत को दिखाता है.
कम्युनिज़्म और लेफ़्टिज़्म ने मज़दूरों के नाम पर करोड़ों इंसानों की जान ली। सोवियत रूस के गुलाग कैम्प्स में लाखों लोग भूख, ठंड और ज़ुल्म से मारे गए। यह सब "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" के नाम पर हुआ, मगर हक़ीक़त में इंसानियत को गुलाम बना दिया गया

सोवियत यूनियन का जबरी मज़दूरी कैम्प सिस्टम (1929–1953) । इसमें दुश्मन-ए-रियासत कहे जाने वाले लोग, मज़दूर, आलिम, और आम जनता को कैद किया जाता था. सिर्फ़ स्टालिन के ज़माने में ही लाखों को भूख और कत्ल-ए-आम का शिकार बनाया गया. तक़रीबन 1.6 से 15 मिलियन मौतें हुईं। करीब 18 मिलियन लोग गुलाग से गुज़रे. 
कहाँ हुआ: रूस और सोवियत यूनियन के दूर-दराज़ इलाक़ों में, ख़ासकर साइबेरिया और आर्कटिक की सर्दियों में।
क्यों हुआ: "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" का नारा देकर, असल में इंसानियत को दिमाग़ी गुलामी में धकेलने के लिए।
किस सोच ने किया: लेफ़्टिज़्म और कम्युनिस्ट फ़िक्र, जिस ने इंसनियत का नारा दिया, धर्म/मजहब को अफिम बताया और पाखंड कहकर विज्ञान के नाम पर अपना नज़रिया थोपा. जिस ने कहा के दुनिया मे सभि धर्मो का चेहरा अवाम के खून से रंगा है वगैरह.

लेफ़्ट ने मज़दूर को आज़ादी नहीं दी, बल्कि गुलाग की ज़ंजीरों में जकड़ दिया। नारा था इंसाफ़ का, हक़ीक़त थी कत्ल-ए-आम की.

यह नजरिया इंसान को रूहानियत से काटकर सिर्फ 'पेट' तक महदूद कर देता है। लेकिन इन्हें याद रखना चाहिए कि रूस की रियासत तो टूट सकती है, दीवार-ए-बर्लिन तो गिर सकती है, मगर वो कलमा जो सीनों में उतर जाए, उसे दुनिया की कोई ताकत मिटा नहीं सकती।

दुआ-ए-खैर
ऐ अल्लाह! हमें इन फितना परवर और गुमराह कुन नजरियात के शर से महफूज फरमा। हमारे ईमान की हिफाजत फरमा और हमारी नस्लों को इन 'सुर्ख' और 'लिबरल' फितनों के बहकावे से बचा। हमें सिरात-ए-मुस्तकीम पर साबित कदम रख. ऐ अल्लाह! हमें हक़ को हक़ दिखा और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे।  
हमें बातिल को बातिल दिखा और उससे मह्फुज रख।  
ऐ अल्लाह! हमें हर तरह के फ़ितनों से महफ़ूज़ रख, ख़ास तौर पर लिब्रलिज़्म और नई गुमराह करने वाली सोच से।
आमीन या रब्बुल आलमीन।

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ईरान की सड़कों से यूरोप की रणनीति तक – विरोध का वैश्विक असर.
ईरान में जारी मौजूदा अशांति और इसमें विदेशी शक्तियों की संलिप्तता को समझने के लिए जनवरी 2026 के शुरुआती दिनों की घटनाओं और बयानों का सिलसिला बेहद अहम है। यह टाइमलाइन स्पष्ट करती है कि कैसे अमेरिका और इसराइल के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम को एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ाया है।

आज के दौर में किसी देश को अस्थिर करने के लिए केवल सेना की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि एनजीओ (NGO),  ज़र खरिद बुद्धिजीवी और मीडिया विंग्स का एक पूरा तंत्र इस्तेमाल किया जाता है । जब कोई हुकूमत अमेरिका या पश्चिमी देशों की शर्तों पर नहीं चलती, तो ये संगठन अचानक सक्रिय होकर सड़कों पर उतर आते हैं । ईरान में मौजूदा तनाव इसी रणनीति का हिस्सा नज़र आता है, जहाँ जून 2025 में इसराइल के साथ हुए युद्ध और अमेरिका द्वारा परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी के बाद स्थिति को और भड़काया जा रहा है ।

 ईरान में अशांति: जन-आक्रोश या सुनियोजित वैश्विक साजिश?
ईरान की सड़कों पर जारी विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन इस हलचल के पीछे सिर्फ स्थानीय मुद्दे नहीं, बल्कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय बिसात बिछी हुई नज़र आती है।
 तेहरान में एक अकेले प्रदर्शनकारी के वीडियो का तुरंत पुलिस द्वारा काउंटर-वीडियो जारी करना और यह दावा करना कि यह 'प्लांटेड' था, इस बात की ओर इशारा करता है कि सूचना युद्ध (Information War) अब चरम पर है। 
 जहाँ एक ओर प्रदर्शनकारी सड़क पर हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, इसराइल और यूरोपीय देशों का इस आग में घी डालने का तरीका इसे एक खतरनाक मोड़ दे रहा है ।

 पश्चिमी फंडिंग और एनजीओ का सक्रिय नेटवर्क.
दुनियाभर में जब भी कोई सरकार अमेरिकी या पश्चिमी हितों के खिलाफ खड़ी होती है, तो वहां अक्सर यूरोपीय देशों और अमेरिका की फंडिंग पर पल रहे एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और मीडिया विंग्स सक्रिय हो जाते हैं। 
ये समूह 'लोकतंत्र' और 'आजादी' के नाम पर जनता को लामबंद करते हैं, जबकि इनका असली मकसद सत्ता परिवर्तन (Regime Change) होता है. ईरान में भी यही पैटर्न देखा जा रहा है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिए एक ही समय पर पूरी दुनिया में ईरान विरोधी नैरेटिव फैलाया जा रहा है, ताकि वहां की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किया जा सके।

 इसराइल का डर और परमाणु शक्ति का संघर्ष.
इसराइल के लिए एक मज़बूत और परमाणु संपन्न ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जून 2025 में हुए युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी इसी रणनीति का हिस्सा थी कि ईरान को कभी भी निर्णायक रूप से शक्तिशाली न होने दिया जाए। 
   इसराइल की खुफिया एजेंसियां और मीडिया लगातार यह संदेश फैला रहे हैं कि ईरान की सैन्य ताकत को भीतर से ही तोड़ना ज़रूरी है. यही कारण है कि माइक पोम्पियो जैसे नेता खुलेआम प्रदर्शनकारियों के बीच 'मोसाद' की मौजूदगी की बात स्वीकार कर रहे हैं, जो ईरान की संप्रभुता पर सीधा हमला है।

 ट्रंप की चेतावनी और मनोवैज्ञानिक युद्ध.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2 और 4 जनवरी 2026 को दी गई चेतावनियां महज कूटनीति नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा हैं.
 यह कहना कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है, सीधे तौर पर ईरानी सुरक्षा बलों को डराने और प्रदर्शनकारियों के भीतर हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का प्रयास है। यह वही तरीका है जो अमेरिका ने पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ अपनाया था, जहाँ एक समानांतर सरकार को मान्यता देकर देश को गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया गया।

 नैरेटिव वॉर: मीडिया और सोशल मीडिया का हथियार.
 ईरानी अधिकारियों ने देशव्यापी इंटरनेट पाबंदी नहीं लगाई है, जिससे एक दिलचस्प स्थिति पैदा हो गई है। अमेरिका और इसराइल के सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स, विशेष रूप से फ़ारसी भाषा में, प्रदर्शनों के समर्थन में दिन-रात सामग्री साझा कर रहे हैं। यह डिजिटल दखलंदाजी कुछ प्रदर्शनकारियों का हौसला तो बढ़ाती है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर देती है कि इस आंदोलन की डोर कहीं न कहीं विदेशी हाथों में है।
 ईरानी सेना का अलर्ट पर होना और बाहरी हस्तक्षेप के प्रति सख्त रुख अपनाना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई अब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की है.

जनवरी 2026: ईरान विरोधी बयानों और हस्तक्षेप की टाइमलाइन.

1 जनवरी 2026: इसराइली मीडिया और रक्षा विश्लेषकों ने रिपोर्ट करना शुरू किया कि ईरान के भीतर "बदलाव का समय" आ गया है। इसी दिन इसराइली अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर फ़ारसी भाषा में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए सीधे संदेश भेजने शुरू किए, जो मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी.

2 जनवरी 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पहली बड़ी चेतावनी जारी की। 
उन्होंने सोशल मीडिया और आधिकारिक ब्रीफिंग में कहा कि यदि ईरानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया, तो अमेरिका "मदद के लिए दखल" देने को पूरी तरह तैयार है। उन्होंने ईरान को आगाह किया कि पूरी दुनिया देख रही है।

2 जनवरी 2026 (शाम): अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक बेहद विवादित बयान दिया। उन्होंने सड़कों पर उतरे ईरानियों को नए साल की बधाई देते हुए ट्वीट किया कि "उनके साथ हर मोसाद एजेंट भी चल रहा है"। यह बयान सीधे तौर पर ईरान के भीतर इसराइली खुफिया एजेंसी की सक्रिय मौजूदगी की पुष्टि करने जैसा था.

4 जनवरी 2026: राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी चेतावनी को और कड़ा करते हुए दोहराया कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है। इसी दिन यूरोपीय संघ (EU) के कुछ प्रमुख नेताओं ने भी बयान जारी कर ईरान पर प्रतिबंधों की धमकी दी, जिससे एक साथ वैश्विक दबाव बनाने की कोशिश की गई।

7-8 जनवरी 2026: इसराइली (Occupied Palestine) प्रधानमंत्री कार्यालय और मीडिया विंग्स ने ईरान के भीतर हो रही झड़पों के वीडियो को वैश्विक स्तर पर वायरल करना शुरू किया.
 अमेरिकी विदेश विभाग के फ़ारसी अकाउंट्स ने प्रदर्शनकारियों को संगठित होने के तरीके और "विदेशी समर्थन" का भरोसा दिलाना जारी रखा।

9 जनवरी 2026: ईरान के सर्वोच्च नेता और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर आरोप लगाया कि यह अशांति अमेरिका और इसराइल द्वारा प्रायोजित है और देश की सेना किसी भी बाहरी उकसावे का जवाब देने के लिए हाई अलर्ट पर है। एलन मस्क ने ईरान के ऊपर स्टारलिंक सक्रिय करने का संकेत दिया, यह कदम न केवल तकनीकी बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप भी है.

ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म विदेशि नर्रेटिव की आवाज़ को वैश्विक स्तर पर पहुंचा रहे हैं। इससे ईरान की आंतरिक समस्या एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गई है। स्टारलिंक और सोशल मीडिया ने इस संघर्ष को सूचना युद्ध का नया आयाम दिया है, जिससे यह लड़ाई सड़कों से निकलकर डिजिटल स्पेस तक फैल गई है।
इसराइल और अमेरिका का साझा उद्देश्य.
यह टाइमलाइन दर्शाती है कि जून 2025 में ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी बमबारी के बाद से ही इसराइल और अमेरिका का एक ही लक्ष्य रहा है—ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को भीतर से अस्थिर करके खत्म करना।
 माइक पोम्पियो का मोसाद वाला बयान और ट्रंप की लगातार धमकियां यह साबित करती हैं कि ये प्रदर्शन महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसराइल द्वारा समर्थित एक गहरी भू-राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। 
पश्चिमी मीडिया और यूरोपीय नेताओं का एक सुर में बोलना इस 'नैरेटिव वॉर' को और मजबूती देता है, जिसका अंतिम उद्देश्य क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना है।

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