Mother’s Rights: The Forgotten Chapter of Women’s Rights.
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| Liberalism and Womens Right. |
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| Liberalism and Womens Right. |
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| Muslim World’s Biggest Weakness: No Powerful Alliance. |
हर जगह एक चीज़ मुश्तरका थी: मग़रिबी नैरेटिव।
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| लोकतंत्र नहीं, गुलामी ही असली पैमाना. |
“ओ ईरान के पक्के और आज़ादी पसंद लोगों! मैं तुमसे तबाही, दर्द और धोखे के दिल से बात कर रही हूँ। मैं एक ऐसी औरत की आवाज़ हूँ जिसने अपने देश की तबाही देखी, खुले दुश्मनों के हाथों नहीं, बल्कि मगरिब की धोखेबाज़ मुस्कान और उसके झूठे वादों में फँसकर।मैं तुम्हें चेतावनी देती हूँ कि वेस्टर्न साम्राज्यवादियों के धोखेबाज़ शब्दों और नारों में मत पड़ो। उन्होंने ही एक बार मेरे पिता कर्नल गद्दाफी से कहा था कि अगर तुम अपने न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दोगे तो दुनिया के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुल जाएँगे।’मेरे पिता ने अच्छे इरादों और बातचीत में भरोसे के साथ रियायतों का रास्ता चुना। लेकिन आखिर में, हमने देखा कि कैसे NATO के बमों ने हमारी ज़मीन को मलबे में बदल दिया। लीबिया खून में डूब गया, और उसके लोग गरीबी, देश बदर और तबाही में फँस गए।मेरे ईरानी बहनों और भाइयों , पाबंदियों, जानकारी देने वाले और आर्थिक हमलों के सामने तुम्हारी हिम्मत, इज्ज़त और मज़बूती यह आपके देश के सम्मान और सच्ची आज़ादी का सबूत है। दुश्मन को छूट देने से सिर्फ़ तबाही, बँटवारा और तकलीफ़ ही मिलेगी। भेड़िये से बातचीत भेड़ों को नहीं बचाएगी या अमन नहीं लाएगी—यह सिर्फ़ अगले खाने की तारीख़ तय करेगी!इतिहास ने साबित कर दिया है कि जो लोग मज़बूती से डटे रहे—क्यूबा, वेनेज़ुएला और नॉर्थ कोरिया से लेकर फ़िलिस्तीन तक वे दुनिया के हीरो के दिलों में बसे रहे और इतिहास में इज्ज़त के साथ ज़िंदा हो गए। और जिन्होंने हार मान ली, वे अपनी ही राख में मिल गए, उनके नाम भुला दिए गए।बहादुर ईरानी लोगों को सलाम! ईरानी के विरोध को सलाम! फ़िलिस्तीनी लोगों के साथ दुनिया भर की एकजुटता को सलाम! "प्यार और हमदर्दी के साथ,आयशा गद्दाफ़ी
उनके संदेश का सबसे अहम नुक्ता यह है कि पश्चिम का तरीक़ा लगभग हर जगह एक-सा रहा है:
लीबिया इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है। कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी ने अच्छे इरादों से पश्चिम पर भरोसा किया। उन्होंने अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दिया, यह सोचकर कि अब लीबिया को स्वीकार कर लिया जाएगा।
आयशा गद्दाफ़ी साफ़ शब्दों में ईरान को चेतावनी देती हैं कि:
पश्चिमी साम्राज्यवादियों की मुस्कान पर भरोसा मत करो
उनकी भाषा शांति की होती है, लेकिन इरादे क़ब्ज़े के,
दुश्मन को दी गई रियायत आज नहीं तो कल तबाही बनकर लौटती है.
ईरान इसलिए निशाने पर नहीं है कि वह “ख़तरनाक” है, बल्कि इसलिए कि वह:
आयशा गद्दाफ़ी का संदेश ईरान के लिए एक लिविंग वॉर्निंग है—
क्यूबा
वेनेज़ुएला
नॉर्थ कोरिया
फ़िलिस्तीन
आयशा गद्दाफ़ी का यह संदेश सिर्फ़ ईरान के लिए नहीं, बल्कि हर उस देश के लिए है जो पश्चिमी दबाव में समझौते की सोच रहा है।
पहलवी परिवार का वारिस आज जिस तरह से खुद को ईरान के “विकल्प” के तौर पर पेश कर रहा है, वह असल में अमेरिका द्वारा एक्सपोर्ट की जाने वाली हुकूमत की पूरी तस्वीर है।
उसकी सोच साफ़ तौर पर इसराइल-परस्त और अमेरिका-परस्त है। वह कह चुका है कि सत्ता मिली तो वॉशिंगटन के इशारों पर चलेगा।
यह कोई राजनीतिक दूरदृष्टि नहीं, बल्कि खुली ग़द्दारी का एलान है। बदले में वादा सिर्फ़ इतना है कि प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, ताकि लोग भूख से न मरें—लेकिन इसकी क़ीमत ईरान की संप्रभुता, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी।
ईरान के मामले में पश्चिम का दोहरा मापदंड पूरी तरह उजागर हो जाता है। अगर सच में लोकतंत्र मुद्दा होता, तो वे किसी राजशाही चेहरे को आगे न बढ़ाते। लेकिन यहाँ लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं है।
यहाँ पैमाना सिर्फ़ एक है—कौन अमेरिका की लाइन पर चलता है। जो चलेगा, वह “मॉडरेट”, “डेमोक्रेटिक” और “रिफॉर्मर” कहलाएगा। जो नहीं चलेगा, वह “तानाशाह”, “ख़तरा” और “दुष्ट शासन” घोषित कर दिया जाएगा।
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| Is the Muslim World Ready to Break Free? 57 Nations Face Historic Choice. |
मुस्लिम दुनिया आज पहले से कहीं ज़्यादा बंटी हुई है। न कोई साझा रणनीति है, न कोई सामूहिक नेतृत्व।
अगर अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध होता है, तो मुस्लिम देशों के सामने सबसे बड़ी दुविधा खड़ी होगी।
NATO सैन्य दबाव का औज़ार है
EU आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम है
G7 वैश्विक नीतियों को दिशा देने वाला मंच है
इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये पश्चिमी देश न सिर्फ़ आपस में जुड़े रहते हैं, बल्कि विकासशील और कमजोर देशों पर अपनी शर्तें भी थोपते हैं—चाहे वो अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या सुरक्षा नीतियाँ।
सिर्फ़ काग़ज़ी संस्थाएँ बनकर रह गई हैं।
न OIC के पास कोई ठोस राजनीतिक शक्ति है, न कोई सामूहिक सुरक्षा ढांचा। न ही GCC तेल और धन के बावजूद मुस्लिम दुनिया को जोड़ने में सफल हो पाया।
इसी पृष्ठभूमि में BRICS का उभार बेहद अहम हो जाता है। यह मंच अमेरिका के एकध्रुवीय दबदबे को चुनौती देता है और एक मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रखता है।
हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक सहयोग और उसमें तुर्किये के शामिल होने की ख़बरें उम्मीद की किरण ज़रूर हैं।
1979 की इस्लामिक क्रांति ने इस पूरी व्यवस्था को पलट दिया। पहली बार मध्य-पूर्व में एक ऐसा राज्य उभरा जिसने कहा कि वह न तो अमेरिका के आदेशों पर चलेगा और न ही इसराइल के अस्तित्व को वैधता देगा।
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| माँ का दामन तले तालीम का पहला मदरसा होता है। |
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| लिबास के इंतेखाब से पहले यह चंद बातें जरूर सोचिये. |
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: आगाह हो जाओ तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में सवाल किया जाएगा। पस इमाम (अमीरुल-मोमिनीन) लोगों पर निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा। मर्द अपने घर वालों का निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा और औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की निगेहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा और किसी शख्स का गुलाम अपने सरदार के माल का निगेहबान है और उससे उसके बारे में सवाल होगा। आगाह हो जाओ कि तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में पुरसिश (पूछ- ताछ) होगी। (सहीह_बुखारी-7138)
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| लाल इंकलाब' की हकीकत: आजादी या दिमागी गुलामी? जानिए कैसे लेफ्टिज्म ने इंसानियत को खोखला किया! |
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| ईरान की सड़कों से यूरोप की रणनीति तक – विरोध का वैश्विक असर. |