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Falasteen Me Arab Kab Se Aabad Hain? Arab history in Palestine | फलस्तीन में अरब कब से आबाद हैं

Falasteen (Palestine) Me Arab Kab Se Aabad Hain? History of Arabs in Palestine | Falasteen Me Arbon Ki Tareekh

Arab Settlement in Palestine: Historical Roots and Legacy.
Explore the deep historical roots of Arab settlement in Palestine, tracing cultural, tribal, and political influences across centuries of change.

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फलस्तीन में अरब कब से आबाद हैं ? एक इतिहास 

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बड़े बेटे हज़रत इस्माईल को मक्का में आबाद किया और छोटे बेटे हजरत इस्हाक़ को फलस्तीन में , फिर आज फलस्तीन अरबों के कैसे हो गया ? फलस्तीन हज़रत इस्हाक़ की संतान इस्राइलियों का होना चाहिए

यह वह सवाल है जो अक्सर खड़ा किया जाता है और मुसलमानों की ओर से आम तौर पर यह जवाब दिया जाता है कि यहां से इसराइली निकल गए थे और ईसाई आबाद थे अरबों ने उन पर विजय प्राप्त की और चौदह सौ वर्षों से यहां आबाद हैं इस लिए अब यह उनका वतन है

लेकिन क्या सच में फलस्तीन देश में अरब सिर्फ चौदह सौ वर्षों से ही आबाद हैं ? जब हज़रत इब्राहीम अपने बेटे इस्हाक़ को यहां ले कर आए और आबाद हुए क्या उस से पहले यह गैर आबाद देश था या आबादी थी अगर आबादी थी तो वह कौन लोग थे और अब कहां हैं ?

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History of Arabs In Palestine

पवित्र तौरेत व बाइबल में फलस्तीन को कनआन या किनआन लोगों की ज़मीन कहा गया है जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यहां आ कर आबाद हुए उस समय यहां किनआन कौम आबाद थी हज़रत इब्राहीम ने उनसे जमीन खरीदी और रहने लगे जिस जगह उन्होंने रहना शुरू किया आज वहां शहर आबाद है जिसका नाम अल खलील है जो अल कुद्स या योरोशलम से करीब है अल खलील शहर में ही उनकी क़ब्र है

यह किनआन कौम के लोग कौन थे और अब कहां हैं ? कनआन अरब के पुराने कबीले अमालिका की एक ब्रांच थी अमालिक़ा बहुत बहादुर कबीला था लंबे तगड़े होते थे इनका असल क्षेत्र दक्षिण यमन था वहां से यह लोग निकल कर आस पास के देशों में फैल गएं अरब इतिहासकार मसऊदी के अनुसार मिस्र के फिरऔन व इराक़ के नमरूद का संबंध भी अमालिका से था

आमालिका की एक शाखा कनआन यमन से निकल कर भूमध्यसागरीय तटों पर आबाद हो गई यह लोग लेबनान व फलस्तीन में आबाद हुए थोड़े बहुत कनआनी सीरिया व जार्डन के कुछ इलाकों में भी आबाद हुए

हज़रत इब्राहीम के बेटे हज़रत इस्हाक़ फिर उनके बेटे हज़रत याकूब हुए हज़रत याकूब का ही नाम इसराइल भी था उनके बारह बेटे थे उनमें एक बेटे हज़रत यूसुफ़ भी थे जिनकी कहानी कुरान में है वह मिस्र देश में मंत्री बन गएं और फिर पूरा खानदान फलस्तीन छोड़ कर मिस्र में आबाद हो गया

शुरुआत में इसराइली मिस्र में बड़े आराम से थे खूब फले फूले लेकिन बाद में इन्हें फिरऔन ने गुलाम बना लिया कई शताब्दियों तक यह गुलाम रहे उसके बाद हज़रत मूसा ने इन्हें फिरऔन से छुटकारा दिलाया और मिस्र से निकाल लाए

हज़रत मूसा इन्हें मिस्र से लेकर फलस्तीन आए उस समय भी यहां किनआनी लोग आबाद थे जो बहुत ताकतवर थे इसी लिए कुरान में उन्हें कौम ए जब्बार यानी जबरदस्त कौम कहा गया है

किनआनी बादशाह जालूत को हज़रत दाऊद ने कत्ल कर दिया और इसराइली लोगों का राज्य स्थापित किया पहले खुद बादशाह हुए उनके बाद उनके बेटे हज़रत सुलेमान बादशाह हुए और बहुत शानदार हुकुमत चलाई उन्होंने एक बहुत बड़ी इबादत घर बनाया जिसे हैकल सुलेमानी कहा जाता था

बाद में यहां हज़रत ईसा पैदा हुए यहूदियों ने उनका विरोध किया और अपनी जानकारी में उन्हें फांसी दे दी हज़रत ईसा के 90 वर्ष बाद यहां रोमन साम्राज्य ने हमला किया और इसराइली लोगों से सत्ता छीन ली हैकल सुलेमानी को गिरा कर जमीन बराबर कर दी रोमन साम्राज्य ने इन से हज़रत ईसा पर होने वाले ज़ुल्म का बदला चुन चुन कर लिया

फिर इसलाम आया हज़रत उमर के जमाने में फलस्तीन मुसलमानों के कब्जा में आ गया और वहां के रहने वाले किनआनी लोग मुसलमान हो गए

इस से आप को पता चल गया होगा कि इस्राइलियों के जन्म लेने से पहले भी यहां अरब थे और आज भी हैं इसराइली यहां आते जाते रहे हैं जबकि अरब सत्ता में रहें या सत्ता से बाहर वह इस देश को छोड़ कर नहीं गए हैं और इंशाल्लाह न भविष्य में जाएंगे

आज के फलस्तीनी चाहे बहुसंख्यक मुस्लिम हों या अल्पसंख्यक ईसाई ज्यादा तर किनआनी लोगों के वंशज हैं बाद में इनमें अरब के दूसरे लोग भी मिल गए हैं

यह है फलस्तीन में अरबों की तारीख एक बात जान लेना जरूरी है कि हर अरबवासी हज़रत इस्माईल की संतान नहीं है एक सभ्यता एक धर्म और आपसी रिश्तेदारियों के चलते सब को इस्माइल के वंशज समझ लिया जाता है.

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Palestine Social media censorship: Palestine ki Awaz aur Facebook Jaise Social Media Platforms ka Shadow Ban.

 Soft Censorship of Pro-Palestinian Voices on Social Media.

Digital Suppression: The Hidden Bias Against Palestine Online.
Censorship of Pro-Palestinian Voices on Social Media.
Understanding Soft Censorship in the Digital Age.
Case Studies of Suppressed Palestinian Advocacy.
Platform Policies and Their Impact on Free Speech.
Global Reactions and Resistance Movements.
Meta, Facebook Political bias Algorithm and Shadow ban.

सोशल मीडिया पर फ़िलिस्तीन समर्थक आवाज़ों की सेंसरशिप.
फ़िलिस्तीन की पुकार और डिजिटल सेंसरशिप — जब एल्गोरिदम बन गया ख़ामोश पहरेदार.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स कैसे फ़िलिस्तीन की सच्चाई को शैडोबैन कर रहे हैं। जानिए, ये खामोश सेंसरशिप कैसे इंसानियत की आवाज़ दबा रही है।

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फ़िलिस्तीन की पुकार और डिजिटल सेंसरशिप. 

आप सब ने यह जरूर महसूस किया होगा के जब भी ग़ज़ा मे इस्राएल का नरसंहार, मोसाद का फिलिस्तीन के नेताओ, उसके रहबर को एक एक कर निशाना बनाने की खबर आती है तो उससे जुड़े पोस्ट्स, वीडियो, लेख, फोटो को ज्यादा रीच नही मिलता है, उसपर ज्यादा कंमेंटे, लाइक, व्यूज़ नही आते है। 

इसलिए के वे सभी पोस्ट्स जिसमे ग़ज़ा के नरसंहार को दिखाया जा रहा है, फिलिस्तीन की आवाज़ उठाई जाती है उसे यह नामनिहाद आज़ादी का समर्थक वाला सोशल मीडिया फेसबुक, whatsapp, X (ट्वीटर) सब एक साथ उसे reach-down कर देते है। यानी उन सभी पोस्ट्स को डेलेट न करके उसे दुसरो तक पहुँचने से रोक देते है, उसे खुद के अलावा किसी दूसरे को नही दिखायेगा और आपको भी दूसरे के पोस्ट्स को जल्दी नही दिखायेगा। इसलिए के दुनिया इजरायली नरसंहार के बारे मे नही जाने। उसे किसी तरह छिपाना है, ताकि खुद को जो मानवाधिकार और लोकतंत्र का मसीहा समझते है वह चेहरा बेनकाब न हों जाये। य़ूरोप और अमेरिका का जो आज़ादी का चैंपियन वाला शाख है उसका पर्दाफाश हों जाये। यह सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट्स पर ही नही बल्कि यूटूब के चैनल्स और वीडियो पर भी, यहाँ तक के यूटूब द्वारा बहुत सारे चैनल्स पर पाबंदी लगाना, उसे वार्निंग देना, उसके वीडियो को कंटेंट मॉडरेशन मे डाल देना, कंमयूनिटी guideline का उल्लंघन् कह कर उसे छुपा देना, रिमूव कर देना शामिल है। पेजेस, ब्लॉग, वेबसाइट, प्रोफाइल, गुरूप सभी के साथ यह होता आया है। सभी को restrict करना, वार्निंग देना, उसकी पहुँच को रफ्ता रफ्ता कम करना, उसे इस तरह से दबाया जाता है के किसी को मालूम भी न हो और वह आवाज़ खामोश हो जाए। यह किसी चैनल्स या गुरूपस् के कंटेंट को सेंसर करना नही है बल्कि यह फिलिस्तीन की आवाज़ को खामोश करने का जरिया है, ग्ज़ा के नरसंहार को और नेतन्याहु का फिलिस्तीन विरोधी मांसुबा को छुपाने का एक जरिया है। 
यह हमसब के साथ हुआ है और हो रहा है। 
इसके खिलाफ कई मीडिया संगठनो और फिलिस्तीन के लिए काम करने वाली संस्था ने आवाज़ उठाई है।

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म फ़िलिस्तीन के हक़ में उठी आवाज़ों को कैसे दबा रहे हैं? शैडोबैन, सेंसरशिप और एल्गोरिदम की खामोश जंग का तजज़िया।

आज के दौर में लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, इंटरनेट की स्क्रीन पर भी लड़ी जा रही है। मोबाइल की स्क्रीन और डेटा के दरमियान लड़ी जा रही है।
जहाँ पहले बम गिरते थे,अब वहाँ एल्गोरिदम और सेंसरशिप का साया पड़ा है।

Al Jazeera की रिपोर्ट (24 अक्टूबर 2023) ने इस पर रोशनी डाली कि किस तरह बड़े-बड़े सोशल-मीडिया प्लेटफ़ॉर्म Facebook (Meta), Instagram, YouTube और X (Twitter) — पर “Palestine” आवाज़ें लगातार सेंसर और Shadowban की जा रही हैं।

फ़िलिस्तीन के मसले पर यही कुछ हो रहा है।
जो भी इंसान या अकाउंट “ग़ज़ा”, “फ़्री फ़िलिस्तीन” या “इज़रायल के हमले” की बात करता है, उसकी पोस्ट या तो गायब हो जाती है, या लोगों तक पहुँचने से पहले ही दफ़न हो जाती है। इसे कहा जा रहा है — शैडोबैन।

शैडोबैन वो तरीका है जिसमें आपकी आवाज़ बंद नहीं की जाती, बल्कि उसकी गूंज दबा दी जाती है। आपकी पोस्ट दिखती तो है, मगर किसी को सुनाई नहीं देती। ऐसे लगता है जैसे कोई अदृश्य दीवार है, जो सिर्फ़ “फ़िलिस्तीन” बोलने वालों के लिए खड़ी की गई हो।

सच्चाई कभी-कभी इतनी सीधी होती है कि समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए पर जो हुआ है, उस पर सवाल उठाना हमारी ज़िम्मेदारी है। आज जब फ़िलिस्तीन की तक़लीफ़ें दुनिया के सामने हैं, बहुत से ऐसे सवाल उभर कर आ रहे हैं जिन पर हम सबको नज़र डालनी चाहिए।
 यूरोप आँखें बंद करके इज़राइल का साथ दे रहा हैं  चाहे वह कूटनीति हो या खुला दादागिरी रवैया। ये केवल राजनैतिक हिमायत नहीं, बल्कि आम लोगों की ज़िन्दगियों पर असर डालने वाले फैसले हैं। ऐसे में सोचना ग़लत नहीं कि क्या ये रुख़ बस राजनैतिक मुनाफ़े और हितों का नतीजा है, या कहीं कोई बड़े एजेंडा— 'ज़ियॉनिस्ट एजेंडा' कहते हैं—काम कर रहा है।

मगरिबि टेक कंपनियों का छुपा क्रुशेड। 

टेक्नॉलॉजी की दुनिया में अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियाँ हैं , जो हमारी बातें सुनतीं, हमारे फ़ोटो रखतीं और हमारे डेटा को सम्भालतीं हैं। 
अब सवाल उठता है: क्या यही डेटा कभी किसी ख़ुफ़िया मक़सद या ख़ुद किसी देश की खुफ़िया अदायगी में काम आता है? 
कुछ लोगों का कहना है कि बड़ी तकनीकी कंपनियों की मदद से कुछ हुकूमतें या एजेंसीज़ दूसरे मुल्कों की निगरानी में आसानी से क़दम बढ़ा सकती हैं। यह एक बड़ी चिंता की बात है.
हम ऐसे बयान नहीं दे रहे कि "यह हुआ" और "वह हुआ"  बल्कि हम सब जानना चाहते हैं कि डेटा,क्लाउड और सॉफ्टवेयर जब हथियार बन जाएँ, तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी? 
अगर किसी माँ का रोता हुआ वीडियो “गाइडलाइन वायलेशन” बन जाए, तो समझ लो कि दुनिया के सर्वर अब ज़मीर के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं।
क्या कंपनियाँ सिर्फ़ बिज़नेस कर रही हैं, या उनकी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी भी बनती है कि वे जाने कि उनकी तकनीक का इस्तेमाल कैसे हो रहा है?
फिलिस्तिन के मस्ले पर मगरिब्, युरोप और अमेरिका कि कम्पनिया मोसाद से डाटा बेचति है ताकि दुनिया मे फिलिस्तिन कि आवाज़ उठाने वाले पर नज़र रखि जाये, उसे निशाना बनया जाये. 
मगरिब कि सरकर इस मामले मे इस्रएल कि मदद करती है, फिलिस्तिनियो को परेशान करने के लिये. खास कर उन्हे जो फिलिस्तिन के लिये काम कर रहे है। मिक्रोसोफ्ट, फेस्बूक जैसी बड़ी कम्पनिया.

अक्टूबर 2023 के बाद से फेसबुक/इंस्टाग्राम (Meta) पर बहु-तरफ़ा आराेप उठे कि फ़िलिस्तीनी आवाज़ों, प्रदर्शनकारी सामग्री और कुछ अरबी नारे पर अनौपचारिक रूप से रोक-टोक या हटाने के सिलसिले में अत्यधिक क़दम उठाए गए। मानवाधिकार संगठन और स्वतंत्र निगरानी समूहों ने "शैडोबैनिंग", पोस्ट-हटाना, या भाषाई अनुवाद की गलतियों के ज़रिये द्वेषपूर्ण असर का हवाला दिया।
Human Rights Watch ने 20–21 दिसम्बर 2023 को विस्तृत रिपोर्ट जारी की जिसमें यह दावा किया गया कि Meta के नीतिगत और तंत्रगत फ़रज़ (algorithms, moderation rules) ने फ़िलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन वाली सामग्री को दुनिया भर  में दबा दिया.
Amnesty International और अन्य संगठनों ने भी इसी दौर में Meta की भाषाई/संदर्भ-पॉलिसीज़ पर सवाल उठाए और सुझाव दिए कि 'ज़ियॉनिज़्म' जैसे शब्दों पर व्यापक प्रतिबंध असंतुलित हैं। 

Meta ने कुछ मामलों में तकनीकी बग्स और गलत अनुवादों का हवाला दिया, तथा कहा कि वे सामुदायिक मापदण्डों के तहत कार्रवाई करते हैं। दूसरी तरफ़ निगरानी रिपोर्टों ने प्रणालीगत (systemic) झुकाव के ठोस उदाहरण दिये  जहाँ न केवल गलतियाँ, बल्कि नीतिगत इम्प्लीमेंटेशन के पैटर्न दिखे। सांसदों और नियामक संस्थाओं ने भी कंपनी से स्पष्टीकरण माँगा। एक खास प्रोपगंडे के तहत ग़ज़ा के क़त्ल ए आम पर पर्दा डाला जा रहा है। 
बड़े क्लाउड और एआई प्रदाता — विशेषकर Microsoft ने इज़राइली सरकारी और मिलिट्री इकाइयों को फिलिस्तिन से जुडे डाटा दीं (इंजीनियरिंग सपोर्ट, Azure क्लाउड, AI टूल्स)। इस बारे में दो तरह के सवाल उठते हैं: 
(1) क्या ये सेवाएँ नागरिकों की निगरानी/हर्ट के लिए इस्तेमाल हुईं? 
(2) क्या कंपनी ने अपने टर्म्स और नैतिक मार्गदर्शिकाओं को ठीक तरह लागू किया?

Microsoft ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि वे इज़राइल के साथ तकनीकी तथा साइबर-रक्षा सहयोग करते हैं। 2025 में कंपनी ने इस पर विस्तृत बयान भी जारी किया जिसमें यह बताया गया कि वे इज़राइल की कुछ संस्थाओं को सेवाएँ दे रहे है/दे चुके हैं, और भीतर की जाँचों का हवाला दे कर कहा कि प्लेटफ़ॉर्म के दुरुपयोग के साक्ष्य नदारद भी मिले। साथ ही, मीडिया रिपोर्ट्स (2025) में यह भी उभरा कि Microsoft ने कुछ सेवाओं की एक्सेस सीमित/रोक दी थी. मोसाद से डाटा लिक किया.

फ़िलिस्तीन की आवाज़ पर डिजिटल सेंसरशिप — कैसे सोशल मीडिया शैडोबैन से सच्चाई दबा रहा है.
2024 के महीनों में  इज़राइली खुफ़िया एजेंसियों ने Hezbullah की कम्युनिकेशन डिवाइसेज़  विशेषकर ताइवान-निर्मित पेजर्स/वॉकी-टॉकी जैसे उपकरण में छेड़छाड़ की, जिन्हें बाद में विस्फोटक या ट्रैकिंग मैकेनिज़्म से जोड़ा गया। Reuters और कई अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने इन घटनाओं की कवरेज की और संकेत दिए कि यह एक जटिल आपरेशन था जिसमें आपूर्ति-श्रृंखला और डिवाइस-उत्पादन के स्तर पर परिवर्तन किए गए।
Facebook, Instagram, X (twitter), Youtube जैसे प्लत्फोर्म्स का शैडोबैन ही नही बल्कि मगरिबी मीडिया भी अपने खास प्रोपगंडे के तहत मोर्चा संभाले हुए है। 
शैडोबैन मतलब — (Reach Down) “शैडोबैन” कोई खुली पाबंदी नहीं होती। 
आपकी पोस्ट दिखती है — मगर किसी को दिखाई नहीं देती, आप सोचते हैं कि आपने दुनिया तक सच पहुँचा दिया,मगर हक़ीक़त में आपकी बात एल्गोरिदम के अंधेरे कोने में खो जाती है। यह मगरिब् के मीडिया के तरफ से भी होता है। 

 कई उप्योग्कर्ता और रिपोर्ट में कई ऐसे लोगों के तज़ुर्बे बताए गए हैं जिन्होंने देखा कि उनकी “फ़िलिस्तीन” से जुड़ी पोस्ट पर अचानक व्यूज़ गिर गए. लाइक और कमेंट गायब हो गए, और उनके अकाउंट की रीच लगभग खत्म हो गई और शेयरिंग लगभग बंद हो गई।

रिपोर्ट बताती है कि यूरोप, अरब और एशिया के कई देशों के यूज़र्स  फ़िल्ममेकर, पत्रकार, और आम लोग  सब कह रहे हैं कि जब वो Gaza, Genocide, Free Palestine या Ceasefire Now, Free Palestine, Israel Terrorist, IDF Terrorist, "From the river to the sea Palestine will be free" Israelis Terror, Mossad Terrorist, Silent genocide,  जैसे शब्द लिखते हैं तो उनके पोस्ट की पहुँच घट जाती है।

बेल्जियम के एक वीडियोग्राफर ने बताया कि उनका वीडियो, जिसमें उन्होंने ग़ज़ा पर हो रहे हमलों की निंदा की थी,
पहले हज़ारों लोगों ने देखा, फिर अचानक “view count” रुक गया।
Meta और Instagram ने कहा कि ऐसा “bug” या “तकनीकी गलती” की वजह से हुआ।
कंपनी ने कहा कि “किसी भी राजनीतिक झुकाव के साथ जानबूझकर सेंसरशिप नहीं की गई।”
सवाल यह है — अगर बार-बार वही गलती एक ही दिशा में हो रही है, तो क्या उसे महज़ गलती कहा जा सकता है?
एक डिजिटल राइट्स संगठन 7amleh के मुताबिक, सिर्फ़ 2023 में लगभग 238 मामले दर्ज हुए,
जहाँ “Pro-Palestine” कंटेंट या तो हटाया गया, या उसकी रीच घटा दी गई।
कई अकाउंट अस्थायी तौर पर सस्पेंड भी किए गए। यह कोई एक-दो केस नहीं, बल्कि संगठित पैटर्न जैसा दिखता है। जो करुशेड का हिस्सा है। जिसे मंसूबे के तहत अंजाम दिया जा रहा है। 
रिपोर्ट में यूरोपीय यूनियन की नई Digital Services Act (DSA) का ज़िक्र भी है। 
जो कहती है कि सोशल-मीडिया कंपनियों को बताना होगा कि किसी यूज़र की पोस्ट क्यों सीमित की गई।
और इस बीच “Pro-Israel” नैरेटिव खुलकर चलता है, जबकि “Palestine” पोस्टों पर साया पड़ जाता है।
यह सवाल अहम है। अगर कोई पोस्ट नफ़रत फैलाए तो उसे हटाना ठीक है, मगर मानवीय हक़ और नरसंहार पर बोलना किसी भी कानून और व्यवस्था में गुनाह नहीं हो सकता। 
जब एल्गोरिदम सिर्फ़ कुछ शब्द सुनकर कंटेंट रोक देता है, तो वो डिजिटल सेंसरशिप बन जाता है —
जो न सिर्फ़ आवाज़ दबाता है बल्कि कहानी का रुख़ भी बदल देता है। लेकिन सिर्फ फ़िलिस्तीन के माम्ले पर हि यह नियम, शर्त, कानुन, एल्गोरिदम, परोग्राम या बग कैसे ज़िंदा हो जाता है? फ़िलिस्तीन के हक़ में बोलने वालों की आवाज़ को दबा रहे हैं--- कभी “बग” के नाम पर, कभी “कंटेंट वायलोशन” के बहाने।
क्या हमेशा एक ही तरफ़ की गलती हो सकती है?
अगर गलती होती है, तो वो “Pro-Israel” कंटेंट पर क्यों नहीं दिखती?
यहि मेटा के फेस्बूक ने रुस के खिलाफ युक्रैन के समर्थन मे हिंसा बढाने और ऐसे पोस्ट डालने वाले शख्स,मिडिया, सस्था, कम्पनी सभी का साथ देने का एलान किया था. फिर यहाँ उसी कंपनी का अल्गोरीदम कैसे हिंसा, नफरत का साथ देने लगता है? यह अल्गोरीदम कोई फॉर्मूला है या धार्मिक प्रोपगैंडा। 

  फ़िलिस्तीन के लिए आवाज़ उठाना अपराध क्यों बन गया है?

डिजिटल जंग — जहाँ सच्चाई को भी दुश्मन समझा गया
सोचिए — जब कोई बच्चा मलबे के नीचे दबा हो,
जब एक माँ अपने परिवार को खोज रही हो, तो क्या उसकी तस्वीर दिखाना “नियमों का उल्लंघन” है?
क्या सच बोलना इतना ख़तरनाक हो गया है कि उसे एल्गोरिदम की जेल में डाल दिया जाए? 
दरअसल “डिजिटल प्रोपेगैंडा” का नया चेहरा है —
जहाँ सेंसरशिप को “सुरक्षा” और खामोशी को “नियम” कहा जाता है।
सोशल मीडिया जिसे लोगों ने “बे आवाजे- की आवाज़” बनने का वादा किया था,
आज वही प्लेटफ़ॉर्म आवाज़ को म्यूट कर रहे हैं। सियासि दबाओ और नज़रिया से सब कुछ बदल सकता है.
सिर्फ़ तकनीकी मसला नहीं  यह इंसानियत का इम्तेहान है।

पारदर्शिता की माँग करें
कंपनियों से पूछें कि किस आधार पर पोस्ट हटाई जा रही है? 
वैकल्पिक प्लेटफ़ॉर्म पर आवाज़ उठाएँ
ब्लॉग, इंडी मीडिया, लोकल नेटवर्क, (Yandex Browser, Russian and Chinese apps) और स्वतंत्र वेबसाइटें इस्तेमाल करें।
डिजिटल राइट्स की निगरानी करें
7amleh, Access Now जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें पढ़ें और साझा करें।
कानूनी जवाबदेही की पहल। 
यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाये कि कंपनियाँ “shadowban” जैसी नीतियों की व्याख्या करें।

यूरोप और अमेरिका की दोहरी पॉलिसी.
यूरोपीय यूनियन की Digital Services Act (DSA) कहती है कि सोशल-मीडिया कंपनियों को बताना होगा कि किसी पोस्ट को क्यों सीमित किया गया।
मगर असल में ये नियम सिर्फ अपने सवार्थ के हिसाब से लागू होते है, वही प्लेटफ़ॉर्म जो “Free Speech” का झंडा उठाते हैं, वे फ़िलिस्तीन की आवाज़ पर ताले लगा रहे हैं।

कहा जाता है कि एल्गोरिदम “न्यूट्रल” होते हैं,
मगर अगर हर बार एक ही पक्ष को दबाया जाए,
तो ये तकनीक नहीं, तहरीक बन जाती है।
जो आवाज़ इंसानियत के लिए उठती है,
उसे “ख़तरनाक” बता कर म्यूट कर देना —
यह डिजिटल ज़माने का सबसे बड़ा गुनाह है।

फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर जो बम गिरते हैं,
वो सिर्फ़ घर नहीं, आवाज़ें भी उजाड़ देते हैं।
और अब, इंटरनेट की दुनिया में वही आवाज़ें
एल्गोरिदम की दीवारों में कैद हो रही हैं।  
मगर याद रखो - सच्चाई को सेंसर किया जा सकता है, मगर मिटाया नहीं जा सकता। क्योंकि हर खामोशी के पीछे एक चीख होती है और हर शैडोबैन के पीछे एक आवाज़ जो अब भी जिंदा है।

तकनीक अगर इंसानियत की दुश्मन बन जाए, तो हमें उसे बेनक़ाब करना होगा।
क्योंकि सच्चाई की रोशनी को चाहे कितनी भी परछाई ढके, वो फिर भी दिखती है… और बोलती है.
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Do Qibla Ki Siyasat: Muslim Hukmran Aur Awam Al-Quds

Kya Muslim Duniya Ka Asal Qibla Al-Quds Hai Ya White House? Haqeeqat Ka Inkishaaf!

Arab Leaders Exposed: Palestine Support or White House Politics? The Double Standard Revealed!
मुस्लिम हुक्मरानों का दोहरा चेहरा: क़ुद्स की नारेबाज़ी, वाशिंगटन की पैरवी
अक़्सा की हिफ़ाज़त या अमन के काग़ज़? जॉर्डन–इस्राइल तर्ज़-ए-तअल्लुक़ात.
The Arab world often speaks loudly for Palestine, yet many governments quietly align with global powers. This double standard raises tough questions about loyalty, justice, and the future of the Muslim ummah. Explore the hidden truths behind Arab politics and Palestine’s struggle.
Arab politics White House influence.
Truth about Arab Palestine stance.
Arab leaders and Palestine conflict.
Palestine vs Arab governments.
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Arab Palestine double standard.
यह बहस सिर्फ सियासत नहीं, उम्मत की रूह की पुकार है: हुक्मरानों का क़िब्ला अक्सर व्हाइट हाउस साबित होता है, जबकि अवाम का क़िब्ला मस्जिद-ए-अक़्सा और फ़िलिस्तीन की हिफ़ाज़त है। इस फासले ने मुस्लिम दुनिया की शाख, ताअल्लुक़ात और अक़ीदती अहद को कमज़ोर किया, और यही दोहरापन आज की तबाही की जड़ है। 

मुस्लिम हुक्मरानों का दोहरा क़िब्ला: अवाम अल-क़ुद्स की, हुकूमतें व्हाइट हाउस की.

मुस्लिम दुनिया के हुक्मरानों की ताज़ा सियासत में एक कड़वा सच उभरता है: अवाम फ़िलिस्तीन के साथ खड़ी है, मगर हुकूमतें वाशिंगटन और तेल-अवीव के दरबार में पैर ज़्यादा जमाती दिखती हैं। अब्राहम अकोर्ड्स, इज़राइल-जॉर्डन मुआहिदा, और मिस्र में 2013 की तख्था-पलट—ये तीनों मिसालें दिखाती हैं कि कैसे कूटनीतिक “वाक़ेअत” ने उम्मत की तवक़्क़ोआत को गिरवी रख दिया।

- व्हाइट हाउस बनाम मस्जिद-ए-अक़्सा  
  अवाम का रुख़ अल-क़ुद्स और फ़िलिस्तीन की हिमायत है, जबकि कई हुकूमतें ताल्लुक़ात-ए-ख़ारिज़ा में वॉशिंगटन-मरकज़ि मंसूबों को तरजीह देती हैं, जिसका खुला इज़हार 2020 के अब्राहम अकोर्ड्स और उससे पैदा होने वाले रिश्तों के जाल में नज़र आता है।

- UAE की इज़राइल से नार्मलाइज़ेशन  
  UAE–इज़राइल इत्तिफ़ाक वाइट हाउस में दस्तख़्त होकर जनवरी 2021 में नाफ़िज़ हुआ, जिस से अरब-इस्राइल नार्मलाइज़ेशन की रफ़्तार तेज़ हुई और पूर्व-ख़फ़िया ताल्लुक़ात को खुला फ्रेम मिल गया—यही वह मोड़ है जहाँ अवामी जज़्बात और हुकूमती मंसूबों में खाई और गहरी दिखी।

- जॉर्डन की अल-अक़्सा में वक़्फ़ी भूमिका और अमन-मुआहिदा  
  1994 के शांति मुआहिदे में जॉर्डन के “ख़ुसूसी किरदार” को तस्लीम किया गया, मगर असल इख़्तियारात इस्राइली सेक्योरिटी सुपरविज़न के साये में हैं—यानी अल-अक़्सा की हिफ़ाज़त का दावा काग़ज़ पर मजबूरियों के साथ बंधा है, और यही सियासी तनाज़ुर अवाम-हुकूमत फासले को बढ़ाता है।

- मिस्र: हक़ीक़त-ए-क़ुर्सी  
  3 जुलाई 2013 को जनरल अब्दुल फ़तह अल-सीसी ने मोहम्मद मुर्सी को हटाकर इंतेज़ामी दौर का नक़्शा पेश किया, ऐडली मंसूर को आर्बिटरी सदर बनाया और सियासी ढांचे को फ़ौजी निगरानी में रीडिज़ाइन किया—यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने अरब बहार के मिस्री सफ़े को पलट दिया।

- तख्ता पलट के बाद बाहरी सहारा  
  रियाज़, अबूधाबी और कुवैत से अरबों डॉलर की फ़ौरी मालियाती मदद आई; रिसर्च बताती है कि खाड़ी हमीदीन की तेजी से ताईद और फंडिंग-डिपॉज़िट्स ने सीसी निज़ाम की सांसें खोलीं—इस सिलसिले में अमेरिका-इस्राइल-खाड़ी की सपोर्ट को भी तनाज़ुर में बयान किया गया है। 

“जनता के नाम” और “आतंक के ख़िलाफ़” 
  ब्रिटैनिका के ताज़ा तज्ज़िए और दस्तावेज़ी हवाले बताते हैं कि सड़कों के “मंडेट” और “आतंक से जंग” की तर्ज़ ने तख्ता पलट के बाद क़ानूनी-नैरेटिव को मज़बूत किया—मगर नतीजा सख़्त पकड़, मुखालिफ़ आवाज़ों पर शिकंजा, और अवाम-हुक्मरान दरम्यान भरोसे की खाई।

 मुल्क-दर-मुल्क का क़िब्ला अव्वल वाशिंग्टन

- पाकिस्तान  
  कूटनीतिक बयानों में फ़िलिस्तीन-हमायत की धुन रहती है, मगर क़ौमी माअशियात की गिरफ़्त—IMF वग़ैरह—बाहरी इशारों पर इबारत लिखवाती है; यही इक्तेसादी इनहिसार सियासी आज़ादी को महदुद करके अवामी जज़्बात से फासला पैदा करता है।

- तुर्किये  
  नाटो रुक्नियत और मग़रिबी तवाज़ुनात तुर्की की बाहरी पॉलिसी को बांधते हैं; ग़ज़ा के इम्तिहान में सख़्त अमली क़दमात की जगह बयानात और मीडिया-डिप्लोमेसी का पलड़ा भारी दिखता है—यानी क़ियादत का दावेदारी बयान से आगे जाकर लागत मांगती है।

- UAE  
  अब्राहम अकोर्ड्स ने UAE–इज़राइल ताल्लुक़ात को धोके भर की ख़ामोश समझदारियों से निकालकर औपचारिक भागीदारी में बदला—तिजारत, सफ़ारत, और टेलिफ़ोनी–उड़ानों का खुलना नई मैपिंग की दलील बना, जो अवाम के फ़िलिस्तीनी दर्द से टकराती है।

- जॉर्डन  
  हरम-ए-क़ुद्स में जॉर्डन वक़्फ़ की दिन-ब-दिन इदारा-साज़ी बनी रही, मगर अमन-मुआहिदा के तहत इस्राइली सिक्योरिटी सुपर्विज़न ने असल तहफ़्फ़ुज़ात को सीमित रखा—इसी दोहरे तर्ज़ के कारण अवामी नज़र में हिफ़ाज़ती दावे कमजोर महसूस होते हैं। 

- सऊदी अरब  
  2013 की मिस्री तख्ता पलट पर फ़ौरन हिमायत और बाद-अज़ां मालियाती बैकिंग ने रियाज़ की रिजनल प्रायॉरिटीज़ को वाज़ेह किया—हिफ़ाज़त-ए-हरमैन के दावे के साथ रियल-पॉलिटिक का यह मेल अवाम की तवक़्क़ोआत से टकराता है।

- ईरान  
  फ़िलिस्तीन पर बुलंद बयानात के बावजूद, मैदान-ए-अमल में स्ट्रैटेजिक सेल्फ-इंटरेस्ट हावी रहता है; रिजनल प्रॉक्सी–हिसाब–किताब ने वसीअ-उम्मती मक़सदात को अक्सर क़ौमी अजेंडे के पीछे धकेला।

 मिस्र में सीसी की हुकूमत.
- 3 जुलाई 2013: फ़ौज के सरबराह अल-सीसी ने मुर्सी की बरतरफ़ी, शूरा कौंसिल की तहलील और इंतेज़ामी नक़्शा एलान किया; ऐडली मंसूर को आर्बिटरी सदर बनाया गया, जब कि मुर्सी को हिरासत में रखा गया।

- खाड़ी सपोर्ट: सऊदी, UAE, कुवैत से लगभग 12 अरब डॉलर के पैकेज और लंबी मियाद के डिपॉज़िट्स—केंद्री बैंकी रिकार्ड और तज्ज़िया मिस्र की न्यू-लिक्विडिटी का अहम सोर्स बताते हैं।

- बाहरी बैकिंग का सियासी असर: रियाज़ और अबूधाबी की फ़ौरन हिमायत, और वॉशिंगटन–तेल-अवीव की रज़ामंदी ने “आर्ब स्प्रिंग” के मिस्री मोर्चे को पलट दिया, जिससे “क़ानून-ओ-कायदा” के नाम पर सख़्त गिरफ़्त का दौर शुरू हुआ। 

- शख्सियत-साज़ी: BBC और मगरिबि लेफ्ट मिडिया सीसी को “आयरन ग्रिप” वाले हाकिम के तौर पर बयान करते हैं—इस्तिहकाम की कीमत सियासी आज़ादियों की सिकुड़न और मुख़ालिफ़ आवाज़ों की दमनकारी पॉलिसी बनी।

- नैरेटिव का रंग: ब्रिटैनिका के मुताबिक़ “आतंक से जंग” और “जनता का मंडेट” जैसी तर्ज़ों ने क़ू के बाद क़ानूनी-नैरेटिव को शह दी.

 नुक्ता-ए-नज़र 
- “क़िब्ला-ए-अव्वल व्हाइट हाउस” का मतलब यह कि पॉलिसी-बनाने में अवामी रुज्हानात पर बाहरी हमायत, फंडिंग और सेक्योरिटी-मैट्रिक्स हावी हो जाते हैं—नार्मलाइज़ेशन और अमन-मुआहिदे इसी जंगल में रास्ते बनाते हैं।
“अवाम मस्जिद-ए-अक़्सा के साथ” का मफ़हूम यह कि स्ट्रीट-सेंटिमेंट और दुआ-ए-क़िब्ला फ़िलिस्तीन की मज़हबी-सियासी हिफ़ाज़त से वाबस्ता है, मगर हुक्मरानों के तआवुनी डाँचे अक्सर इसके बरअक्स कदम रखते हैं। 

- “हुकूमत इस्राइल के साथ” की तश्कील UAE–इज़राइल इत्तिफ़ाक़ात, मिस्र–इस्राइल इत्तिफ़ाक़ात और जॉर्डन–इस्राइल अमन–मुआहिदे की मौजूदगी से वाज़ेह होती है—यानी नज़्म-ओ-नसक़ की मजबूरियाँ अवामी तवक़्क़ोआत से टकराती हैं।

इस्लामी दुनिया की सियासत आज ऐसी मोड़ पर है जहाँ हुक्मरान का सज्दा वाशिंगटन की जानिब जाता है, मगर आवाम का दिल अब भी मस्जिद-ए-अक़्सा की तरफ़ झुका हुआ है।  
फ़िलिस्तीन के बच्चों पर बम गिरते हैं, और अरब-अज्म के हुक्मरान मौशिक़ि का लुत्फ लेते हुए अपने "दोस्त मुल्कों" को शाबाशी भेजते हैं।

पाकिस्तान: जो कभी उम्मत की उम्मीद कहलाता था, आज IMF की रस्सी से बंधा है। हुकूमतों की जुबाँ उम्मत के लिए नरम और अमेरिका के लिए सख़्त होनी चाहिए थी, मगर अब उल्टा मंज़र है।  

तुर्किये: सुल्तानियत का नकाब पहनकर नाटो की रिहर्सल करता है। जब ग़ज़ा सुलगती है, अंकारा केवल बयान जारी करता है। उम्मत को लाइक्स और ट्वीटों से नहीं, अमल से रहनुमाई चाहिए।  

UAE: ने तो खामोशी से मुस्कराते हुए तिलक लगा लिया — इज़राइल से हाथ मिलाकर उम्मत की हड्डियों पर सेतु बना लिया। उनकी बहार अब तेल के नहीं, शर्म के कुओं से फूटती है।  

जॉर्डन: का हाल ऐसा कि मस्जिद-ए-अक़्सा की चौकीदारी का दावा करता है, मगर हर समझौते में यहूदी राज़ को सज़दा करता है। उनकी खामोशी बाज़ार में बिक चुकी है।
  
सऊदी अरब: हरमैन की सरज़मीं होते हुए भी "विजन 2030" के नाम पर मगरिबि लिबास पहन चुका है। अंग्रेज़ी बोलने वाले शेख़ अब उम्मत की बजाए निवेश और कन्सर्ट्स के राज़दान बन गए हैं।  

ईरान: जो फ़िलिस्तीन का सबसे बड़ा हमदर्द कहा जाता है, दरअसल अपने नफ़्स और सियासी अजेंडे का असिर है। उसकी लफ़्ज़ी जंग ज़्यादा और अमली मदद कम है। 
 
मिस्र के फ़तह अल-सीसी:  अरब बहार की क़ब्र खोदने वाला आदमी। उसने अपने ही अवाम पर टैंक्स चलाए और फिर अमरीकी मुआवज़े से कुरसी को थामा। उसकी सियासत में उम्मत का लहू महज़ फुटनोट है।  

 नतीजतन इशारा
जब तक अवाम का क़िब्ला और हुक्मरानों की कूटनीति के क़िब्ले में यह बुनियादी फासला रहेगा, उम्मत का तवाज़ुन मुज़्तरिब और तावान ख़तरे में रहेगा—इत्तिहाद की ज़मीन बयान से नहीं, बेबाक और अमली इस्लामी उसूलों पर मुश्तमिल पॉलिसी से तैयार होगी। 
मुस्लिम हुकमरानो को यह समझना होगा कि असल ताक़त न दौलत से आती है, न सियासत के खेल से। असल ताक़त आती है इमान, इंसाफ़ और इत्तेहाद से। जब हुक्मरान अपना रुख़ अल-अक़्सा और कुरआन की रोशनी की तरफ़ मोड़ेंगे, तभी उम्मत को इज़्ज़त और सुकून मिलेगा। वरना अगर क़िब्ला व्हाइट हाउस की तरफ़ रहेगा, तो अवाम हमेशा बेचैन और मजबूर रहेगी। यह वक़्त है कि मुस्लिम हुक्मरान अपनी सियासत को अपनी रूहानी ज़िम्मेदारी के साथ जोड़ें और उम्मत को यक़ीन और अमन का रास्ता दिखाएँ।

या अल्लाह, मुस्लिम उम्मत को इत्तेहाद और इमान की रोशनी अता फ़रमा। हुक्मरानों को इंसाफ़ और अदल की राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। उम्मत के लिए अमन, इज़्ज़त और तरक़्क़ी का दरवाज़ा खोल दे। आमीन।

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Western Media aur Palestine: BBC Kaise Bana Israel Ka Mouthpiece Media?

Western Media Kaise Palestine me Israel ke Qatl-E-Aam Ko Chupa Raha hai?

How Western Media Conceals Israel's Mass Killings in Palestine?
How BBC became Mouthpiece of Israel and IDF?
The Silence of Western Media on Israel's Atrocities in Palestine.
Media Bias: Western Coverage of Israel's Violence in Palestine.
Unseen Truths: Western Media and the Palestinian Crisis.
Selective Outrage: Western Media’s Role in Masking Palestinian Suffering.
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BBC इस्राएल का माउथपीस.
फ़िलिस्तीन का मसला: मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति और ग़ज़ा के ज़ुल्मों का राज़फ़ाश |
बीबीसी और पश्चिमी मीडिया का प्रोपगैंडा कैसे छिपा रहा है इज़राइल के ज़ुल्म?
BBC की निष्पक्षता और इस्राएल की चाटुकारिता। 
आज हम बात करेंगे दुनिया के सबसे मुहज्जब, ज़दीद, आज़ाद ख्याल, इंसानियत मे यकीन रखने वाले और इंसानी हुकुक का नुमाइंदा कहलाने वाले क़ौम के बारे मे, जिन्होंने जम्हूरियत और इंसानी हुकुक के नाम पर दुनिया मे सबसे ज्यादा इंसानो की खूने बहाई है। सबसे ज्यादा जम्हूरियत और सेकुलर के नाम पर दूसरे ममालिक खासकर मुस्लिम मुल्क पर फौजी हमले किये है, इज़हार ए राय की आज़ादी के नाम पर कुरान को आग लगाए है, अल्लाह के कलाम को आग के हवाले करके आज़ादी और हक का मुजाहिरा किये है। आज वही सह्युनि सलेबी जिसका गहवारा यूरोप है। उसी ने फिलिस्तीन की आवाज़ को, ग़ज़ा के मजलुमो को दहशतगर्द बताकर इजरायली दहशत और हैवानियत, दरिंदगी को आत्म रक्षा का अधिकार बता रहा है। 
फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर इज़राइल के ज़ुल्म: एक दर्दनाक हक़ीक़त.
फ़िलिस्तीन की पवित्र ज़मीन आज इज़राइली ताक़त के ज़ुल्मों का शिकार हो रही है, जहाँ ग़ज़ा की गलियों में बेगुनाहों का ख़ून बहाया जा रहा है। स्कूलों और अस्पतालो पर बमबारी करके हज़ारों मासूम बच्चे और औरतें शहीद हो चुकी हैं, जो इंसानियत के ख़िलाफ़ एक काला बिहिश्ती अमल है। इज़राइल ने ग़ज़ा को एक खुली जेल बना दिया है, जहाँ भोजन, दवा और पानी की किल्लत से लाखों लोग तड़प रहे हैं, और यह सब प्रोपगैंडा के ज़रिए छिपाया जा रहा है।अस्पतालों के नीचे सुरंगें होने का झूठा इल्ज़ाम लगाकर मरीज़ों को निशाना बनाया जाता है, जो साफ़ ज़ालिमाना हरकत है। इन ज़ुल्मों में 64 हज़ार से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके हैं, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, और यह सब दुनिया की नज़रों से ओझल करने की साज़िश है। मग़रिबी मीडिया इन ज़ुल्मों को 'आत्मरक्षा' कहकर सफ़ेदी देता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह एक संगठित नरसंहार है।

ग़ज़ा का सच और मग़रिबी मीडिया का पर्दा
आज दुनिया एक अजीब कशमकश से गुज़र रही है। एक तरफ़ ग़ज़ा की गलियों में इंसानी ज़िंदगियों का क़त्लेआम हो रहा है, तो दूसरी तरफ़ हज़ारों मील दूर टीवी स्टूडियो में बैठकर इस क़त्लेआम को जायज़ ठहराने की कोशिशें की जा रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, बल्कि हमारे दिमाग़ों में भी लड़ी जा रही है—और इस लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार मीडिया है, ख़ासकर पश्चिमी मीडिया। मगरिब् का ज़ियोनिस्ट मीडिया या माफिया जो कहे लेकिन वे इसी तरह से काम कर रहे है। वे फिलिस्तीन के ज़मीन को इस्राएल का घर और देश बताकर इस्राएल के बोम्बारी को सही ठहराते है। 
 लफ़्ज़ों का खेल: जब 'क़त्ल' को 'हादसा' बताया जाए
सबसे पहले हमें मग़रिबी मीडिया के लफ़्ज़ों के चुनाव पर ग़ौर करना होगा। जब इज़राइल बमबारी करता है, तो उसे "आत्मरक्षा" (Self-defense), "जवाबी कार्रवाई" (Retaliation) या "सैन्य अभियान" (Military Operation) कहा जाता है। वहीं, जब फ़िलिस्तीनी मारे जाते हैं, तो ख़बर बनती है, "ग़ज़ा में झड़पों के दौरान 50 लोगों की मौत।"
यहां "किसने मारा" यह सवाल ही ग़ायब कर दिया जाता है। passive voice का इस्तेमाल करके ऐसा दिखाया जाता है जैसे लोग किसी कुदरती आफत में मर गए, किसी ने उन्हें मारा नहीं। वहीं, अगर इज़राइली नागरिक की मौत हो, तो उसे सीधे-सीधे "आतंकी हमला" (Terrorist Attack) कहा जाता है। यह लफ़्ज़ों का वो जादू है, जो ज़ालिम को मज़लूम और मज़लूम को हमलावर बना देता है।
 दोहरा मापदंड: एक ज़ुल्म, दो नज़़रिये
पश्चिमी मीडिया का दोहरा मापदंड तब और साफ़ हो जाता है, जब हम ग़ज़ा के हालात का मुक़ाबला दुनिया के दूसरे संकटों से करते हैं। जब यूक्रेन पर हमला होता है, तो उसे "आक्रामकता" (Aggression) और "मानवाधिकारों का हनन" कहा जाता है, जो कि वो है भी। लेकिन जब ग़ज़ा की घेराबंदी करके वहां के स्कूलों, अस्पतालों और घरों पर बम बरसाए जाते हैं, तो इसे एक "जटिल मुद्दा" (Complex Issue) बताकर टाल दिया जाता है। वही अमेरिका की टेक कंपनी फेसबुक ने कहा था के जो भी रूस के खिलाफ हिंसा की बात करेगा, युक्रेन के समर्थन मे हथियार उठायेगा वह (मार्क जुकरबर्ग) ऐसा करने वाले की हिमायत करेगा, हौसला अफ़ज़ाई करेगा। मगर जैसे ही किरदार बदलता है तो ज़ियोनिस्ट का चेहरा साफ नज़र आने लगता.
यूक्रेन पर रूसी हमले को 'आक्रामकता' कहा जाता है,लेकिन ग़ज़ा में इज़राइली बमबारी को 'जटिल मुद्दा' मार्च 2025 में ग़ज़ा पर बड़े हमले में 412 फ़िलिस्तीनी मारे गए, लेकिन मीडिया ने इसे 'हमास टारगेट पर स्ट्राइक' कहा, बिना मौतों की गंभीरता दिखाए। यह पूर्वाग्रह मुस्लिम और अरबों को 'कम इंसानी' दिखाने की पुरानी प्रवृत्ति को ज़ाहिर करता है।
फिलिस्तीन मे ज़ालिम मजलुम बनता है और उस ज़ालिम को आत्मरक्षा का अधिकार देकर उसे मजलुम (वही रूस के खिलाफ हिंसा का समर्थन करने वाला) बना देता है, दूसरी तरफ फिलिस्तिनियो के ज़मीन पर कब्ज़ा करके, उसी पर 80 साल से बोम्बारी करके फिलिस्तीन को ज़ालिम और दहशतगर्द साबित कर देता है। यह है मगरिब् का असली खेल जिसके लिए लॉबी, मीडिया और नैरेटिव की जरूरत होती है। जिसके बदौलत वह खूनी को मासूम और मजलुम को दहशतगर्द बना देता है। यह सह्युनि का इंफोर्मेशन वार का हिस्सा है। 
 लफ़्ज़ों की दोहरी तलवार: इज़राइली पीड़ा को भावुक बनाना, फ़िलिस्तीनी दर्द को संख्याओं में बदलना. 

फ़िलिस्तीन मसले पर बीबीसी और मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति
बीबीसी ने विदेशी पत्रकारों को ग़ज़ा में जाने से रोका, लेकिन इज़राइल की स्टोरीज़ को प्रमुखता दी है। 
BBC जैसे बड़े मीडिया घराने भी इज़राइली पक्ष को ज़्यादा समय और हमदर्दी देते हैं। फ़िलिस्तीन से बात करने के लिए अक्सर ऐसे लोगों को बुलाया जाता है, जो पश्चिमी सोच से सहमत हों, जबकि इज़राइल का पक्ष रखने के लिए ताक़तवर प्रवक्ता आते हैं, जो आक्रमक तरीके से अपनी बात रखे और राई का पहाड़ बनाये। ग़ज़ा के अंदर से आने वाली सच्ची तस्वीरों और पत्रकारों की रिपोर्टों को यह कहकर सेंसर कर दिया जाता है कि "इनकी पुष्टि नहीं हो सकी है।"
फ़िलिस्तीन का मसला आज दुनिया के सामने एक काला साये की तरह खड़ा है, जहाँ ग़ज़ा की ज़मीन पर ख़ून बह रहा है और मग़रिबी मीडिया के स्टूडियो में उस ख़ून को धोने की कोशिशें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में हम बीबीसी और अन्य पश्चिमी मीडिया घरानों की दोहरी नीति को उजागर करेंगे, जो इज़राइल के नरसंहार को जायज़ ठहराते हुए फ़िलिस्तीनियों की आवाज़ को दबा रहे हैं। यह नीति न सिर्फ़ ख़बरों के लफ़्ज़ों में, बल्कि कवरेज के तौर-तरीक़े में भी साफ़ नज़र आती है, जो आम लोगों को गुमराह करने का काम कर रही है।
मग़रिबी मीडिया, ख़ासकर बीबीसी, अपनी रिपोर्टिंग में लफ़्ज़ों का ऐसा इस्तेमाल करता है जो इज़राइली मौतों को इंसानी त्रासदी के रूप में पेश करता है, जबकि फ़िलिस्तीनी मौतों को महज़ आंकड़ों की तरह।
उदाहरण के तौर पर, इज़राइली पीड़ितों के लिए 'मासुम और पिडित महिला' शब्द का 18 गुना ज़्यादा इस्तेमाल होता है, और 'मर्डर' जैसे भावुक लफ़्ज़ इज़राइलीयों के लिए 220 बार आते हैं, जबकि फ़िलिस्तीनियों के लिए सिर्फ़ एक बार। वहीं, ग़ज़ा में 34 गुना ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मौतें होने के बावजूद, बीबीसी इज़राइली मौतों को प्रति मौत 33 गुना ज़्यादा कवरेज देता है।  यह भाषाई पूर्वाग्रह न सिर्फ़ दर्शकों के दिलों को इज़राइल की तरफ़ झुकाता है, बल्कि फ़िलिस्तीनी दर्द को कमतर आंकता है। इसे बिबिसि का शब्द युद्ध कह सक्ते है.
बीबीसी की रिपोर्टिंग में फ़िलिस्तीनी नज़रिए को लगातार दबाया जाता है, जबकि इज़राइली पक्ष को प्रमुखता दी जाती है। एक साल की विश्लेषण से पता चला कि बीबीसी ने टीवी और रेडियो पर 2,350 इज़राइली इंटरव्यू लिए, लेकिन फ़िलिस्तीनियों के सिर्फ़ 1,085, और प्रस्तुतकर्ता इज़राइली नज़रिए को 11 गुना ज़्यादा व्यक्त करते हैं। इसके अलावा, जेनोसाइड के इल्ज़ामों को 100 से ज़्यादा बार दबा दिया गया,जबकि इज़राइली लीडर्स के जेनोसाइडल बयानों का ज़िक्र ही नहीं किया जाता। अन्य मग़रिबी मीडिया जैसे सीएनएन भी इज़राइली दावों को बिना वेरिफ़िकेशन के दोहराते हैं, जिससे फ़िलिस्तीनी जीवन को कम इंसानी दिखाया जाता है. यह असमानता ख़बरों को प्रोपगैंडा का रूप दे देती है।
आंतरिक विद्रोह: बीबीसी के अपने कर्मचारी दोहरी नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. BBC इस्राएल का माउथपीस:
बीबीसी के अंदर से ही इस दोहरी नीति के ख़िलाफ़ सख़्त आलोचना हो रही है। 100 से ज़्यादा कर्मचारियों ने डायरेक्टर-जनरल को खुला पत्र लिखा, जिसमें बीबीसी को इज़राइली सरकार का 'माउथपीस' कहा गया है। उन्होंने 'ग़ज़ा: डॉक्टर्स अंडर अटैक' जैसे डॉक्यूमेंट्री को ब्लॉक करने की निंदा की, जो इज़राइल की आलोचना करता था। इसके अलावा, 400 से ज़्यादा मीडिया पर्सनल ने बोर्ड मेंबर रॉबी गिब को हटाने की मांग की,क्योंकि उनके कनेक्शन्स इज़राइली पक्ष को बढ़ावा देते हैं। ये कर्मचारी कहते हैं कि यह नीति बीबीसी की निष्पक्षता को नुक़सान पहुँचा रही है और फ़िलिस्तीनियों को डिह्यूमनाइज़ कर रही है।
यह रिपोर्ट साफ़ करती है कि बीबीसी और मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति फ़िलिस्तीन मसले को और जटिल बना रही है, जहाँ इज़राइल को बचावकर्ता दिखाया जाता है और फ़िलिस्तीन को हमलावर।आम लोगों को चाहिए कि वे मुख्यधारा की ख़बरों से परे स्वतंत्र स्रोतों पर भरोसा करें।  अगर मीडिया अपनी निष्पक्षता बहाल न करे, तो दुनिया का भरोसा और टूटेगा।
 तारीख़ को मिटाने की साज़िश
पश्चिमी मीडिया अक्सर इस पूरे मसले को ऐसे पेश करता है, जैसे यह कुछ दिनों पहले शुरू हुआ हो। वो यह नहीं बताते कि यह लड़ाई दशकों पुराने क़ब्ज़े (Occupation), बस्तियों के ग़ैर-क़ानूनी निर्माण और 15 साल से ज़्यादा की नाकाबंदी (Blockade) का नतीजा है। जब आप किसी मसले को उसकी तारीख़ से काटकर दिखाते हैं, तो आप असल में सच को छुपा रहे होते हैं। ग़ज़ा के लोगों को एक खुली जेल में रखकर जब उनकी हर हरकत को नियंत्रित किया जाता है, तो उनके प्रतिरोध को "बिना वजह की हिंसा" कैसे कहा जा सकता है?

 नतीजा: हमें क्या करना चाहिए?
यह समझना ज़रूरी है कि मग़रिबी मीडिया इज़राइल के नरसंहार पर पर्दा डालने और उसे "व्हाइटवॉश" करने का काम बड़ी होशियारी से कर रहा है। वो ख़बरें नहीं रोकते, बल्कि ख़बरों का मतलब बदल देते हैं। वो तस्वीरों को नहीं छिपाते, बल्कि तस्वीरों के पीछे की कहानी को छिपाते हैं। वे इस्राएल का मुखबिर के तौर पर काम करते है। IDF का मुखपत्र BBC जैसे मीडिया है। 
ऐसे में, एक आम इंसान के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हमें मुख्यधारा की मीडिया पर आँख बंद करके भरोसा करने के बजाय, सच्चाई की तलाश करनी होगी। हमें सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पत्रकारों, ज़मीनी हक़ीक़त दिखाने वाले लोगों और उन आवाज़ों को सुनना होगा, जिन्हें दबाया जा रहा है।
क्योंकि जब तक हम ख़बरों के पीछे छिपे प्रोपगैंडा को नहीं समझेंगे, तब तक ग़ज़ा में गिरते बमों का शोर हमारे कानों तक पहुँचने से पहले ही दबा दिया जाएगा। मीडिया एक खास किस्म से काम करता है, वे एक खास  प्रोपगैंडा के तहत न्यूज़ को छापते और छुपाते है। वे लफ्जो के मफहुम को बदल देते है। 

फ़िलिस्तीन के मज़लूमों के लिए दुआएं: अल्लाह से रहमत की पुकार.
ऐ अल्लाह, फ़िलिस्तीन के मज़लूमों पर अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा, उनके दर्द को दूर कर और उनके ज़ुल्मों का बदला ले। ऐ रब्बुल आलमीन, ग़ज़ा के बेगुनाहों को अपनी पनाह दे, उनके घरों को तबाह होने से बचा और उन्हें आज़ादी की दौलत अता कर। फ़िलिस्तीनी बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला,उनकी माँओं के आंसू पोंछ और इज़राइली ज़ुल्मों को ख़त्म कर दे। ऐ मेहरबान, मज़लूम फ़िलिस्तीन की आवाज़ को दुनिया तक पहुँचा, उनकी हिफ़ाज़त फ़रमा और अमन की बहार ला।  अल्लाहुम्मा आमीन, फ़िलिस्तीन को अपनी नेमतों से नवाज़ और उनके दुश्मनों को सबक सिखा।
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Sultan Salahuddin Ayyubi aur Unka Khufiya (Jasusi) Mahkma. Sultan and their intelligence agency. Aashiyana-E-Haqeeqat

 Kisi Qaum ko bagair Jung ke Shikast Deni ho to Unke Nawjawano me fahashi aam Kar do.

Sultan Salahuddin Ayyubi: The Noble Warrior of  Global History.

Sultan Salahuddin Ayyubi – Legendary Muslim Leader & Conqueror of Jerusalem.

Salahuddin Ayyubi defeated the Crusaders and reclaimed Jerusalem. A symbol of justice, Peace, courage, and unity in the Islamic world.

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सल्तनत-ए- अय्युबि का शम्स: सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी

सलाहुद्दीन अय्यूबी رحمة الله علیه का नाम इस्लामी तारीख़ में शुजाअत (बहादुरी), हिम्मत, ईमान और इंसानियत का पैग़ाम है। आप 1137 ईसवी (532 हिजरी) में तक़रीबन तिकरीत (इराक़) में पैदा हुए। आपके वालिद का नाम नज्मुद्दीन अय्यूब और चचा का नाम असदुद्दीन शीरकुह था। ये दोनों शख़्स सलजूक़ी हुकूमत के साथ जुड़े हुए थे और जिहाद व ग़ज़वा में शामिल रहते थे।

बचपन से ही सलाहुद्दीन ने तलवार, तीरंदाज़ी, सवारी और इल्म में कमाल हासिल किया। आप पर बचपन से ही दीनी रूहानियत का गहरा असर था। इल्म-ए-दीन, कुरआन और हदीस से गहरी दिलचस्पी रखते और उलमा व सूफ़िया की सोहबत में रहते।

आलम-ए-अरब और उस दौर की दुनिया

जब सलाहुद्दीन जवान हुए तो आलम-ए-अरब (अरब दुनिया) का हाल बहुत कमज़ोर था। एक तरफ़ सलजूक़ी हुकूमत के अन्दर आपसी झगड़े और इख़्तिलाफ़ात थे, दूसरी तरफ़ फ़ातिमी ख़िलाफ़त मिस्र में कमज़ोर हो चुकी थी। यूरोप की तरफ़ से सलीबी (क्रुसेडर) फ़ौजें बार-बार हमला करतीं और मुसलमानों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठातीं।

यहूद व नसारा (यहूदी व ईसाई ताक़तें) मिलकर मुसलमानों को कमज़ोर करना चाहतीं, कभी धोखे से, कभी फ़ितने और कभी सीधी जंग के ज़रिये।

सुल्तान बनना और हुकूमत संभालना

सलाहुद्दीन पहले अपने चचा असदुद्दीन शीरकुह के साथ मिस्र पहुँचे। वहाँ की फ़ातिमी सल्तनत बहुत कमज़ोर थी। चचा की वफ़ात के बाद सलाहुद्दीन मिस्र के वज़ीर बनाए गए और धीरे-धीरे पूरी फ़ातिमी सल्तनत उनके क़ब्ज़े में आ गई। इस तरह मिस्र और शाम (सीरिया) दोनों इलाक़े उनके हाथ में आ गए।

1174 ई (≈ 569 हिजरी) के बाद, नूरुद्दीन की मौत के बाद, सलाहुद्दीन ने सीरिया के विभिन्न इलाकों (दमिश्क, अलेप्पो आदि) को अपने अधीन किया।

उन्होंने फ़ौज़ी ताक़त, नीति, आसलाह़-की व्यवस्था और ज़मीनी प्रशासन को मज़बूत किया जिससे सल्तनत-ए-अय्युबी स्थापित हुई।

सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपने हुकूमत का बुनियाद कुरआन और सुन्नत पर रखा। इंसाफ़, सादगी और दीनी जुनून उनके निज़ाम की पहचान थी।

मस्जिद-ए-अक़्सा की फतह

सबसे बड़ी फतह जो सलाहुद्दीन अय्यूबी ने हासिल की, वह थी मस्जिद-ए-अक़्सा की आज़ादी। सन 1187 ईसवी में जंग-ए-हत्तीन (Battle of Hattin) में सलाहुद्दीन ने सलीबी फ़ौजों को शिकस्त दी। इसके बाद क़ुद्स (Jerusalem) की तरफ़ क़दम बढ़ाया और मस्जिद-ए-अक़्सा को दुश्मनों से आज़ाद कराया।

यह फतह मुसलमानों के लिए सिर्फ़ जंग जीतना नहीं थी बल्कि ईमान और उम्मत की बहाली थी। सलाहुद्दीन ने सलीबियों पर ग़ालिब आने के बाद भी उन्हें माफ़ किया और इस्लामी अख़लाक़ (मोरल वैल्यूज़) की रोशन मिसाल पेश की।

फ़हाशि (अश्लीलता) और अनैतिकता से बचने का उनका बड़़ा इल्म-ए-क़ौल मौजूद है; बहुत से ऐतिहासिक लेखकों ने लिखा है कि सलाहुद्दीन नशा, ज़य أبیش (अशाल), या इत्तीफाक़-ए-फ़हाशा आदि को अपने दरबार या शासन व्यवस्था में बर्दाश्त नहीं करते थे। हालांकि “फ़हाशी” के ज़्यादा खुल्ले खुल्ले उद्धरण बहुत कम हैं, पर ब्रिटानिका आदि स्रोतों में यह उल्लेख है कि वे “devoid of pretense, licentiousness, and cruelty” अर्थात दिखावा, बेशर्मी और क्रूरता से दूर रहने वाला शासक था।

"अगर किसी क़ौम को बगैर जंग के शिकस्त देनी है तो उनके नव्जवानो मे फहाशि आम कर दो."

दुश्मनों की मक्कारी और धोखे

यहूद व नसारा बार-बार धोखे और चालों के ज़रिये मुसलमानों को कमज़ोर करने की कोशिश करते। कभी अपने एजेंट्स को भेजते, कभी सुल्तान की फ़ौज में फ़ितना डालने की कोशिश करते। लेकिन सलाहुद्दीन का ख़ुफ़िया निज़ाम (जासूसी) इतना मज़बूत था कि दुश्मनों की हर चाल नाकाम हो जाती।

सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी का जासूसी निज़ाम पूरी दुनिया की जंगी तारीख़ में एक मिशाल है।

सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने फ़रमाया था: अगर आप दुश्मन का एक जासूस पकड़ कर मार दो तो समझो आपने दुश्मन के एक हज़ार जंगजू मार दिये।

सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के दौर में उनका एक जासूस फ़लस्तीन से वापिस आया और सलीबी फ़ौज के बारे में मुकम्मल मालूमात दीं। सुल्तान ने इस को तनख़्वाह के अलावा कीमती  तहायेफ भी दिये। इस पर फ़ौज के चंद सिपाहियों ने एतराज़ किया कि हम लोग मैदान-ए-जंग में आप के साथ लड़ते हैं, हमें इतनी क़ीमती तहायेफ क्यों नहीं दिये जाते?

तो सुल्तान ने जवाब दिया:
जब आप लोग लड़ते हैं तो मैं आप के साथ होता हूँ, अगर आप लोग शहीद हो जाएँ तो आप को यक़ीन है कि आप का जनाज़ा भी पढ़ा जाएगा और क़ब्र भी नसीब होगी।

मगर मेरे जासूस मेरे वो गुमनाम सिपाही हैं कि अगर पकड़े जाएँ तो उन्हें कफ़न भी नसीब नहीं होता, ये मेरी आँखें और कान हैं जिन से मैं मिलियन दूर दुश्मन को देखता और सुनता हूँ।

अगर ये चाहें तो अपने ईमान का सौदा कर के अपने (हम सब ) लिये शिकस्त का सबब बन सकते हैं, मगर वतन से दूर दुश्मन के अंदर रह कर  ये लोग अपना ईमान नहीं बेचते और मोहम्मद ﷺ के दीन के लिये अपनी जान  निसार करते है.

सलाहुद्दीन का जासूसी और ख़ुफ़िया निज़ाम

सुल्तान ने जासूसों को सिर्फ़ दुश्मन की हरकतों की निगरानी के लिए नहीं लगाया बल्कि उनकी मदद से दुश्मन की ताक़त, कमज़ोरी, हथियार और नक़्शा-ए-जंग का पूरा अंदाज़ा लगाया जाता।

सलाहुद्दीन की फ़ौज़ और प्रशासन में चर-चर (Reconnaissance/खुफ़िया जानकारी) और चालाक़ी से काम लिया जाता था। युद्ध से पहले दुश्मन की स्थिति जानना, आपूर्तियों और जल स्रोतों की सीलिंग करना इत्यादि रणनीति का हिस्सा था। उदाहरण के लिए Battle of Hattin में पानी की आपूर्ति बंद करने की रणनीति।

वो अपने सिपाहियों से कहते: 

“जब तुम मैदान-ए-जंग में लड़ते हो, तो अपनी शहादत पर यक़ीन रखो। मगर अगर मेरे जासूस पकड़ लिए जाएं तो समझो लाखों मुसलमानों की जान दाँव पर लग जाएगी।”

उनका यक़ीन था कि जासूस उम्मत की आँख और कान होते हैं।

सलाहुद्दीन अय्युबी की मौत 4 मार्च 1193 (4 March 1193 CE) दमिश्क (Damascus, Syria) मे  हुई, जो कि 27 सफर 589 हिजरी के दिन है।

उनकी मौत के वक़्त जाति माल एक दिनार और सैंतालीस  दिरहम थी (बहुत कम) क्योंकि उन्होंने ज़्यादा माल व दौलत मुफ्लिसो, बेवाओ, बेसहारो पर खर्च कर दिया था। 

सलाहुद्दीन के वफात के बाद अय्युबी सल्तनत उनके वरिसो (बच्चे और रिश्तेदार) के बीच तक्सिम हो गई। मिस्र, सीरिया, यमन आदि हिस्से अलग-अलग अमीरों के मातेहत हो गए।

दलायेल तारिखि किताबो से.

Ibn Shaddād — “The Life of Saladin” (Kitāb Ṭabaqāt al-Shām) — एक मश्हूर इतिहासकार जिन्होंने सुल्तान के खुबियो, तर्ज ए हुकुमत और शक्शियत को बड़े बारीकी से लिखा है।
Why Islam — उनकी महानता, धैर्य, न्याय, और इन्साफ़ पर आधारित लेख जो उनकी ज़िंदगी से प्रेरणा लेते हैं।
Encyclopaedia Britannica — सुल्तान की ज़िंदगि, दौर ए हुकुमत, जंग और फ़तहें.
Stanley Lane-Poole — ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट, जिन्होंने “The Life of Saladdin and the Fall of the Kingdom of Jerusalem” जैसी किताब में सलाहुद्दीन की बहादुरी, न्यायप्रियता और व्यक्तिगत चरित्र पर प्रकाश डाला है।

ईमान और सबक़

सलाहुद्दीन अय्यूबी का असल हथियार तलवार नहीं बल्कि ईमान था। उन्होंने उम्मत को यह सबक़ दिया कि अगर अपने वतन से दूर रहकर भी लोग अपना ईमान बचाएँ और दीनी ज़िंदगी गुज़ारें, तो अल्लाह उनकी मदद करता है।

उनकी ज़िंदगी इस बात का सबूत है कि जंग सिर्फ़ तलवार से नहीं, बल्कि ख़ुफ़िया तदबीर, सब्र, इल्म और ईमान से जीती जाती है।

सलाहुद्दीन अय्यूबी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िंदगी हमें सिखाती है कि मुसलमान अगर अपने दीनी उसूलों, इंसाफ़ और ईमान पर क़ायम रहें तो पूरी दुनिया की ताक़तें मिलकर भी उन्हें मात नहीं दे सकतीं।
मस्जिद-ए-अक़्सा की फतह, उनका इंसाफ़, दुश्मनों से रहमदिली और जासूसी निज़ाम — सब हमें आज भी यह याद दिलाते हैं कि उम्मत को इल्म, सब्र और तदबीर की ज़रूरत है।

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Musalman Galib Rahenge Chahe Israel aur Europe Jitni Bomb Giraye. Palestine lives

Gaza aur Palestine me Europe Nasal Kushi kaise kar raha hai?

Kaha Gaye Duniya ke Human rights, Womens Rights aur peace Community wale?
Israel Kis ke Madad se Palestine.Qatar,Lebnan par Bomb Gira raha hai?

Arabo ne jab Jab Salebi/Sahyuni (Europe) par Bharosa kiya tab Dhoka Mila?

Isreali aggression, UN peace, Arabs betrayel, Europe loyalty, Muslim Ummah and Palestine.

ہم ہی غالب رہیں گے-
غزہ لہو لہو ہے اور جگر پارہ پارہ.... کیوں کہ وہاں گرائے جانے والے ہر بم کے چھرّے ہمارے دل میں پوست ہو رہے ہیں.... ادھر ہونے والی آتش و آہن کی بارش ہماری روح کو جھلسا رہی ہے.... ہر نیا سورج ہمارے لیے سوز و غم اور حسرت و یاس کا طوفان لے کر آ رہا ہے.... ہر طرف بے یقینی کی کیفیت ہے.... لیکن میں ماضی کے جھروکے میں جھانک رہا ہوں....

مجھے 7 اکتوبر 2001ء کی وہ گھڑی یاد ہے، جب امریکا نے افغانستان پر پہلا بم گرایا.... اس کے بعد اس امت کے لیے ہر دن کسی ڈراؤنے خواب سے کم نہ تھا.... ہر لمحے کسی نہ کسی جگہ سے فضائی حملے، شہادتوں اور سقوط کی خبر آتی تھی.... ایسے تباہ کن بم گرائے جا رہے تھے کہ جسم مٹی اور فضا میں تحلیل ہو رہے تھے.... چند گھڑیوں قبل جس جگہ درجن بھر لوگ تھے.... بم گرنے کے بعد وہاں ایک انچ کا انسانی چھیتڑا نہ ملتا تھا.... امریکا کی فضائی طاقت کے آگے افغان اسی طرح بے بس تھے جیسے آج اہل غزہ....

ہر سوں بے یقینی تھی.... ہمت ٹوٹتی جاتی تھی.... امت کا مورال مسلسل گر رہا تھا.... 7 دسمبر 2001ء کو طال، بان نے قندھار بھی چھوڑ دیا.... امارت اسلامیہ کی بساط لپٹ گئی.... یوں لگا جیسے ایک حسین خواب تھا ٹوٹ گیا.... اور صبر کا امتحان شروع ہوگیا.... 20 سال ایمان کو ٹٹولا گیا.... عزم کو مانپا گیا.... "وزلزلوا زلزالا شديدا" کی مانند جھنجھوڑا گیا.... استقامت کو جانچا گیا.... یہاں تک کہ 2021ء میں اللہ سبحانہ وتعالیٰ نے 15 اگست کا دن دیکھنا نصیب کیا.... طالبان اس شان سے کابل میں داخل ہوئے کہ ہر غم دھل گیا.... ماضی کی تلخ یادیں کافور ہوگئیں.... ٹھنڈ کا ایک ایسا احساس ملا جو رگوں میں خون کے ساتھ دوڑتا محسوس ہوتا تھا....
اس لیے ہمیں کبیدہ خاطر نہ ہونا چاہیے.... مایوس وہ ہو جس کا خدا نہ ہو.... غزہ پر پریشانی اور غم کے بادل اہل ایمان کی پہلی آزمایش نہیں ہے.... "ولما يأتكم مثل الذين خلوا من قبلكم" کی قرآنی رہنمائی بتاتی ہے کہ انبیا سابقین اور ان کے مصاحبین پر جھنجھوڑ دینے والے ایسے امتحان آئے تھے کہ وہ "متى نصر الله" پکار اٹھے تھے.... اللہ سبحانہ وتعالی نے انہیں بھی تسلی دی تھی کہ "الا ان نصر الله قريب".... جس کے ساتھ ہی ہر بار آسمانی مدد ضرور اتری....

خندق میں جناب رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم اور آپ کے اصحاب پرت در پرت آزمایش میں تھے.... ایک طرف خوف، بھوک اور سردی.... تو دوسری جانب سامنے فولاد میں غرق اتحادی افواج اور پشت پر یہود و اہل نفاق.... پھر اللہ سبحانہ و تعالیٰ نے اپنے لشکر بھیجے.... آندھی، ملائکہ، دہشت اور دشمن کے دلوں و صفوں میں پھوٹ.... وہ اپنا تان توبڑا اٹھاکر فرار ہوگئے.... اہل ایمان کی ایسی نصرت کی گئی کہ عہد رسالت نئے دور میں داخل ہوگیا.... زبان مبارک سے نوید سنائی گئی: "الآن نغزوهم ولا يغزوننا".... اب ہم ان پر چڑھائی کیا کریں گے یہ ہم پر حملہ نہیں کریں.... پھر تین ہی سال میں مکہ مکرمہ فتح ہوگیا اور پانچ سال میں جزیرہ عرب سے ادیان باطلہ کو دیس نکالا دے دیا گیا....
اس لیے یاد رہے کہ "وانتم الاعلون ان كنتم مؤمنين" کا خدائی وعدہ ہر دور کے لیے ہے.... غزہ پر بھی نصرتِ خداوندی ضرور اترے گی.... جنگ کی آزمایش اس امت کے لیے ایمان کی کسوٹی ہے.... اس کے ذریعے اللہ تعالی ناپاکی کو پاکی سے نکال پھینکتے ہیں.... نفاق کو ایمان سے جدا کر دیتے ہیں.... "مروا دیا"، "تباہ کروا دیا"، "اجڑوا دیا" کہنے والے ہر دور میں ہماری صفوں میں موجود رہے ہیں.... 20 سال قبل بھی کچھ لوگوں کو وہی سب کچھ کہا گیا جو آج حماس اور دیگر فلسطینی مزاحمت کاروں کو کہا جا رہا ہے.... لیکن جس طرح دو دہائیوں بعد وہ زبانیں گنگ ہیں.... اسی طرح یہ آوازیں بھی دب مر جائیں گی....
غزہ میں بہائے گئے خونِ ناحق کے اس سمندر میں کفر کی شان و شوکت غرق ہوگی.... نفاق کے علاقائی تخت لرزیں گے.... گریں گے.... صرف فلسطین ہی آزاد نہیں ہوگا، بلکہ امت کو تقسیم کرنے والی ہر جغرافیائی حد برابر ہو جائے گی.... کیوں کہ یہ سرحدیں ریت پر کھنچی اس بے وقعت لکیر کی مانند ہیں جنہیں کمزور سی لہر مٹا دیتی ہے.... پھر خدا کی مشیت کے آگے ذلت کے یہ نقشے کیسے باقی رہ سکتے ہیں.... مسلمانوں کو عروج ضرور ملے گا، کیوں کہ ہمارا ایمان ہے کہ عزت صرف خدا، اس کے رسول اور انہیں ماننے والوں ہی کو سزاوار ہے.... لیکن بیمار دل ان باتوں کو سمجھ نہیں سکتے....

Munib Hussain
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Palestine: Muslim Duniya ki Qayadat (Ledearship) Kaun karne ke layek hai? Musalmano ka Rahnuma kaun?

Musalmano Ka Rehnuma aaj kaise log bane hue hai?

मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने के लायक कौन है तुर्की या सऊदी अरबिया?

मुसलमानों को कैसा रहनुमा की आज जरूरत है?
मुसलमानों का रहनुमा आज कैसे कैसे लोग बनने को तैयार है?
मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने के लायक कौन है तुर्की या सऊदी अरबिया?
मुस्लिम दुनिया की कयादत ( लीडरशिप) कौन कर सकता है तुर्की या सऊदी अरबिया?
सियासत के मैदान में क़ियादत का दावा आसान है, मगर उम्मत का खैर ख्वाहि किसी का काम नहीं।
मुस्लिम दुनिया दो ताक़तवर दावेदारों के दरमियान खड़ी है – सऊदी अरब, जो हरमैन के साये में मज़हबी क़द्रों की हिफाज़त का दावा करता है, और तुर्किये, जो सुल्तानियत की यादों के सहारे सियासी असर वापस पाने की कोशिश में है। मगर सवाल यह है कि क्या तुर्किये की सियासत उम्मत की रूहानी ज़रूरतों से हमआहंग है या फिर वह मगरिब् के रंग मे खो गया है? मुसलमानों को यह तय करना होगा कि क़ियादत का मतलब ताक़त का दिखावा है या अल्लाह के हुक्म की तामील। वे हुकमरां क़यादत मतलब सिर्फ बयाँबाजीयां समझते है मुसलमानो को खुश करने के लिए या किब्ला अव्वल आज़ाद कराना चाहते है। वैसे इन हुक्मरानो का क़ीबला ए अव्वल तो वाइट हाउस है। फिर आज़ाद किसको कराएंगे? 
Palestenian and Current Global Order, Western Countries. 
मस्जिद ए अक्सा से दुनिया भर के मुसलमानों का क्या ताल्लुक है?
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Muslim World Leader
तुम मेरा पानी ले लो, मेरे पेड़ो को जला दो, मेरे घरों को तबाह कर दो, नौकरियां छीन लो, मां बाप की हत्या कर दो, मेरे देश में धमाके करो, हमे भूखा रखो, अपमानित करो लेकिन  हमे इन सबके बदले एक रॉकेट दागने के लिए दोषी ठहराओ "
ये आवाज है फिलिस्तीन की, जहां एक बुजुर्ग ने यह बातें कही थी इससे  उनके दुःख ओ दर्द, परेशानी और मुसीबत का अंदाजा लगाया जा सकता है के किस कदर उन पर इसराइली सैनिकों द्वारा जुल्म ढाया जा रहा है.

तकरीबन 100 साल पहले पहली जंग ए अजीम ( प्रथम विश्व युद्ध ) में उस्मानिया सल्तनत की हार हुई उसके बाद फिलिस्तीन पर अंग्रेजो ( इंग्लैंड ) का हुकूमत हुआ। दुनिया के बड़े देशों ने यह फैसला किया के फिलिस्तीन को यहूदियों का देश बना दिया जाए जिसका नतीजा यह हुआ के फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र बना दिया गया। उस वक्त फिलिस्तीनी नेता ने इस फैसले का विरोध भी किया मगर उनकी आवाजों को दबा दिया गया, अंग्रेज चले गए उसके बाद यहूदी नेताओ ने अपना राष्ट्र बना लिया जिसे आज इजरायल या इसराइल कहते है।

जब एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी से यहूदियों को भगाया था तब दुनिया के किसी देश ने इनलोगो को पनाह नहीं दिया था अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन .... वगैरह देशों ने यहूदी शरणार्थियों से भरे जहाजों को वापस लौटा दिया ये देश अपने यहां इन लोगो को शरण देने से इंकार कर दिया आखिर में ये लोग शरणार्थी बनकर पनाह लेने  फिलिस्तीन आए और अपने बड़े से जहाज पर बैनर लगाकर अपील की थी दरख्वास्त की थी के " The Germans Destroyed our Families and homes, dont you Destroyed our hopes "
जर्मनों ने हमारे घर और परिवार तबाह कर दिए , आप हमारी उम्मीदों को मत कुचलना।

जिस फिलिस्तीन ने इन यहूदियों को पनाह दी, अपने यहां इन लोगो को रहने के लिए जमीन दिए, नई जिंदगी दी, इंसानियत की खिदमत करते हुए उन्हें घर परिवार बसाने दिए, उनके उम्मीदो पर पानी नहीं फेरा बल्कि उसे अपने जैसा इंसान ही समझा और उसे स्वीकार किया आज वही यहूदी एहसान का बदला फिलिस्तीनियों को मारकर चुका रहा है। आज अपने ही मुल्क में फिलिस्तीनी पराए हो गए, आज खुद के घर में ही बेघर हो गए, मासूम फिलिस्तीनी जिन्होंने हिटलर के कत्लेआम से बचने के लिए यहूदियों को पनाह दी आज वही इसकी सजा भुगत रहे है, इन मासूम फिलिस्तीनियों को कहां पता था के हम जिसे अपना समझ कर यहां पनाह दे रहे है वही हमारा आस्तीन का सांप निकलेगा।

आज इन्ही फिलिस्तीनियों के रहने लिए घर नही, इजरायल जब चाहता है तब मिसाइल, रॉकेट और टैंकों से इन फिलिस्तीनियों पर हवाई हमले करता है और इनके पास अपनी हिफाजत करने के लिए कंकरो और पत्थरों के सिवा कुछ नहीं तब भी आज मीडिया इन्हे चरमपंथी, कट्टरपंथी और आतंकवादी कह रही है।

un (संयुक्त राष्ट्र) जो हर वक्त मानवाधिकार ( इंसानी हुकूक ) के उल्लघन का मुद्दा उठाता है और वक्त बे वक्त जब चाहे तब उसपे पाबंदी लगा दिया जाता है, जैसे ईरान पर कई सालो से अमेरिका ने पाबंदी आयेद किए हुआ है सिर्फ इसलिए के उसने अमेरिका की बात न मानी, गुस्ताख ए रसूल के मुआमला को मानवाधिकार का हनन बोलकर यूरोपीय संसद में पाकिस्तान के खिलाफ भारी बहुमत के साथ एक बिल पास कर दिया गया जबकि उसने एक सबूत भी पेश न कर सका के कहां पर इस कानून का गलत इस्तेमाल हुआ, मगर जब फिलिस्तीनियों का नरसंहार किया जा रहा है, उसपे ड्रोन, मिसाइल और रॉकेट दागे जा रहे है लाखो करोड़ों लोग बेघर हो गए मगर मानवाधिकार की बात करने वाला मानवाधिकार आयोग एक भी बयान नही दिया और न चिंता ही जाहिर की है।

मानवाधिकार की वकालत करने वाले , अपना धर्म इंसानियत बताने वाले, मानवता की सेवा करने वाले, लिबरल का चोला डाले हुए किधर चले गए जिनको कल तक मुसलमान आतंकवादी नजर आरहा था, चरमपंथी और कट्टरपंथी लग रहा था आज वही फिलिस्तीनियों के कत्लेआम पर खामोश क्यों?

एक तरफ जहां इजरायल, जिसे अमेरिका यूरोप और संयुक्त  राष्ट्र का समर्थन हासिल, जिसके पास रॉकेट लांचर, मिसाइल और ड्रोन है तो दूसरी तरफ बेघर फिलिस्तीनी जिसके पास कंकर और पत्थर के सिवा कुछ नहीं तब भी लोगो को फिलिस्तीनी   आतंकवादी और चरमपंथी ही नजर आ रहा है।

जब अलविदा जुमे (07 मई 2021) की नमाज अदा करने फिलिस्तीनी अल अक्सा मस्जिद में गए तभी इसराइली पुलिस ने उन पर गोलियां चलाना शुरू कर दी।

क्या अब फिलिस्तीनी अपने मुल्क में इबादत भी नही कर सकते?
वही फिलिस्तीनी जिन्होंने यहूदियों को अपने यहां पनाह दी आज वही खुदा की इबादत करने पर मजबूर है।

उस्मानिया सल्तनत की हार और फिलिस्तीनियों का नरसंहार

प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत बिखर गया, सऊदी अरब उस्मानिया सल्तनत के साथ खड़ा न होकर ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया।

सऊदी अरब और उस्मानिया सल्तनत दोनो में पुरानी दुश्मनी थी इसलिए सऊदी अरब ब्रिटिश उपनिवेश का एक हिस्सा था जिससे इंग्लैंड को और ताकत मिल गया उस्मानिया सल्तनत को तबाह करने में। ब्रिटेन हमेशा उस्मानिया सल्तनत को अपना प्रतिद्वंदी ( हरिफ ) समझता था इसलिए वह नही चाहता था की इतना विशाल साम्राज्य हमारे लिए चुनौती बने जिसका नतीजा यह हुआ के अंग्रेजो ने यहां भी " डिवाइड एंड रूल " वाली पॉलिसी अपनाई और मुसलमानों को आपस में लड़ा दिया ताकि मुस्लिम मुमालिक कभी एक न रहे और उसकी जगह हमेशा के लिए इंग्लैंड को मिल जाए।
फिर क्या था उस्मानिया सल्तनत की हार हुई और फिलिस्तीन यहूदी राष्ट्र बन गया, अहले अरब खामोश तमाशा देखते रह गए।
क्या सऊदी अरब की इतनी बड़ी दुश्मनी थी उस्मानिया सल्तनत से, के यहूदियों को फिलिस्तीनियों के नरसंहार के लिए यहूदी राष्ट्र बनने दिया?
क्या यह कहना गलत होगा के सऊदी अरब अपनी खुदगर्जी के लिए फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र बना दिया?

मुख्तसर कहा जाए तो सऊदी अरब ने अपने निजी फायदे के लिए फिलिस्तीनियों को बली का बकरा बनाया जो आज तक बनाया जा रहा है।

जरा सोचे अगर उस्मानिया सल्तनत की हार न हुई होती तो फिलिस्तीन और फिलिस्तीनी कैसे होते?

अगर इंग्लैंड फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र ना बनाकर मुस्लिम राष्ट्र बनाया होता तो कैसा होता?, क्युकी मुसलमान वहां बहुसंख्यक (अक्सरियत) थे और यहूदी अल्पसंख्यक (अकलियत).

सऊदी अरब तब भी अंग्रेजो ( ब्रिटेन ) से मदद लिया था और आज भी अमेरिका और यूरोप की तरफ ही हाथ फैलाता है अपनी हिफाजत के लिए, लेकिन उस्मानिया सल्तनत अपने दौड़ का सबसे ताकतवर और बड़ा सल्तनत था और आज भी उसका एक छोटा सा हिस्सा तुर्की जदीद असलहा से लैस।

अहले अरब को चाहिए के अमेरिका और यूरोप का मोहताज बनने के बजाए खुद के पैरो पर खड़ा होना सीखे, अपना इंटिलिजेंस एजेंसी, मिलिट्री पावर , डिफेंस सिस्टम और साइंटिस्ट बनाए। दीनी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम भी हासिल करे नही तो इसी कमजोरी का फायदा अहले यूरोप हमेशा उठाएगा।

अपनी गलतियों को सुधारें, दीन के मुआमले में भी अपनी दिलचस्पी रखे और इसके साथ सियासत में भी।
अपनी कमजोरी की सजा गरीब मुस्लिम देशों पर दबाव डालकर और अमेरिका से धमकी दिलवाकर ना दें, आज फिलिस्तीनियों पर इसराइली सैनिकों द्वारा रॉकेट हमले किए जा रहे है और अहले अरब हमेशा की तरह निंदा करके रस्म अदा कर रहे है।

ओ आई सी (O I C) वही करता है जो सऊदी अरबिया चाहता है, oic सउदी अरब के फायदे वाली तंजीम (संस्था) है ना के मुसलमानों के हुकूक की आवाज उठाने वाली तंजीम।
जब कश्मीर से 370 की धारा खतम की गई तो खुद को मुसलमानों का रहनुमा समझने वाले अहले अरब ने इसे अंदुरूनी मामला बोलकर खारिज कर दिया, कुछ सालो बाद यहां भी कश्मीरियों का वही अंजाम होगा जैसा फिलिस्तीन में हो रहा है, मगर वक्त रहते हुए अपनी जिम्मेदारी न समझने वाला नकारा, ना अहेल अहले अरब भला मुसलमानों का रहनुमा कैसे बन सकता है?

UAE (United Arab Emirates) , जॉर्डन वगैरह अरब देशों ने पिछले साल (2020) में इजरायल से राजनयिक संबंध भी कायम किया इससे यही जाहिर होता है के इन देशों ने इनडायरेक्ट तरीके से इजरायल को मदद पहुंचाना शुरू कर दिया।

बेगाना के शादी में अब्दुल्ला दीवाना

पिछले साल (2020) में जब अजरबैजान ने तुर्की की मदद से जबरदस्ती कब्जे किए इलाके ( नारागोना काराबाख ) को आर्मीनिया से छुड़ाने में कामयाब रहा तो कई यूरोपीय देशों से यह बर्दास्त ना हुआ। इसलिए यूपियन कंट्री ने तुर्की पे तरह तरह की पाबंदियां लगाई, तुर्की ने जब साइपर्स में तेल का भंडार खोज निकाला
तो ग्रीस ने साइप्रस पर अपना दावा किया जिसकी वजह ने इन दोनो देशों में तनाव बढ़ गया।
ग्रीस जो के ईसाई देश है इसके हिमायत में यूरोपीय देश खड़ा था तो दूसरी तरफ तुर्की खुद तन्हा मैदान में था।
अरब देशों  ( UAE) ने ग्रीस को मदद के लिए कई हथियार भी भेजे ताकि तुर्की को सबक सिखाया जाए।
फिर ये अरब देश कैसे मुसलमानों के हक की बात कर सकता है जो अपनी निजी फायदे के लिए मुस्लिम देश ( तुर्की ) के खिलाफ ग्रीस को मदद पहुंचा रहा हो?
अगर वाकई ये मुसलमानों के नेतृत्व के काबिल होते तो आपसी गीले शिकवे को  भुला कर तुर्की की मदद के लिए जान की बाजी लगा दिए होते।
और आज जब फिलिस्तीनियों पर हवाई हमले किए जा रहे है तो अहले अरब खामोश क्यों?
इनको सिर्फ मुस्लिम देशों से ही दुश्मनी निभाने आती है बाकी तो सब इनके वफादार दोस्त है।
हमे रहजनों से गीला नही तेरी रहबरी का सवाल है।

कुछ ऐसा ही समझे, यह मामला दो देशों के बीच का है तुर्की और ग्रीस। ईसाई देशों ने ग्रीस का साथ दिया कूटनीतिज्ञ, पैसे और हथियार से तो दूसरी तरफ अहले अरब जो खुद को मुस्लिम दुनिया का कयादत ( नेतृत्व ) करना चाहता है इन्होंने ईसाइयों का साथ दिया अपने निजी स्वार्थ के लिए। अगर इन देशों को वाकई मुसलमानों की फिक्र होती तो तुर्की के साथ खड़े होते या ग्रीस के साथ?
जो मुसलमान अहले अरब को अपना रहनुमा और मददगार समझते है वह खुदको धोखे में डाल रहे उसी तरह जैसे फिलिस्तीनियों ने यहूदियों को अपने यहां पनाह दी और आज इसी का बदला इनसे चुकाया जा रहा है।
तकरीबन 60 लाख यहूदियों को मारकर एक तिहाई (1/3) आबादी खतम करने वाला एडोल्फ हिटलर ने कहा था के मै कुछ यहूदियों को जिंदा छोड़ रहा हूं ताकि दुनिया देखे मैंने उन्हें क्यों मारा? वाकई आज दुनिया देख रही है।
हिटलर ने यह भी कहा था के यहूदी पीठ में छुरा मारने वाली कौम है

अरब देश मुस्लिम दुनिया का कयादत करने के लायक नही है , क्योंकि वह ऐसे अपाहिज है जो लाठी और डंडे के सहारे चल रहे है या फिर दूसरों की टांगो के सहारे।
अब कोई बेवकूफ ही होगा जो अहले अरब को अपना रहनुमा समझेगा।

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UN Double Standared.
जो देश खुद दूसरों के मिलिट्री पावर पे टिका हो वह क्या खाक मुसलमानों के हक की बात करेगा?

जो देश अमेरिका के इशारे पे काम करता हो, मुस्लिम देशों के खिलाफ हथियार भेजकर उसे तबाह करने की चाहत रखता हो वह मुसलमानों का कभी हमदर्द नही हो सकता है?
अरब देश अमेरिका का कठपुतली है , वह जैसे चाहता है नचाता है।
मुस्लिम कंट्री के खिलाफ गैरो की मदद करने वाला कभी मुसलमानों का वफादार नही हो सकता।
जिस तरह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के इशारे पे चलता है उसी तरह OIC (Organization of Islamic Co-operation)  सउदी अरब के इशारे पर।

तुर्की अगर अत्याधुनिक हथियारों से लैस है तब भी वह मुसलमानों का रहनुमा बनने के लायक नही, क्योके वह दिन के मामले में बहुत ही पीछे है, गैरो के तहजीब को अपनाकर खुद को फूले नहीं समाते। बुराइयां आम है, फाजिर वा फाशिको की कमी नहीं, फहाशी आम है वहां, इस्लामिक तरीको से उसका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं।

बे गैरती की हद है वहां , तो ऐसे में वह हमारा कैसे कयादत कर सकता है?
तुर्किये, अगर तू सचमुच उम्मत की क़ियादत चाहता है तो अपने झंडे पर इस्लामी हक़ीक़त लिख, न कि सेक्युलर नारा; वरना तेरी सियासत भी मगरिब् की हवा में बिखर जाएगी।

मुसलमानों को कैसा रहनुमा चाहिए?

हमे ऐसा रहनुमा चाहिए जो दीन के साथ साथ दुनियावी मामले में भी हमारी रहनुमाई कर सके, जो हमे शरीयत के मुताबिक जीने की नसीहत करे।

चीन उइगर मुसलमानों को मार रहा है,

इंडिया में कश्मीरी मुसलमानों पर जुल्म ढाए जा रहे है,
म्यांमार में रोहिग्या मुसलमानों का कत्ल किया जा रहा है,
इजरायल फिलिस्तीनी मुसलमानों को मार रहा है तब भी दुनिया इसलाम को आतंकवाद का धर्म कहती है और मीडिया मुसलमानों को कट्टरपंथी और आतंकवादी कहती है।
हमे ऐसा कायेदिन चाहिए जो #इस्लामोफोबिया और #हिजाबोफोबिया से लड़ सके, दुनिया को इसका जवाब दे सके, मुसलमानों की आवाज उठा सके और मुसलमानों पर हो रहे जुल्म के लिए अगर जरूरत पड़े तो फौजी करवाई भी कर सके है।
वैसा रहनुमा चाहिए जो विगर मुसलमानों की आवाज को आलमी सतह पर उठाए, फिलिस्तीनी मुसलमानों के कत्लेआम पर सिर्फ निंदा करके ही खामोश न रहे बल्कि  फिलिस्तीनियों पे हो रहे हवाई हमले का बदला हवाई हमले से ही दे। अपनी निजी स्वार्थ के खातिर मुसलमानों को बली का बकरा बनाने वाला गद्दार हमारा कभी रहनुमा नही बन सकता है।

इंसानियत के सब दर्स हवा कर दिए तुमने
ये घर के घर बमों से तबाह कर दिए तुमने

यमन के जमीं कौमी जंगो के हवाले करके
क्या अपने अपने हक अदा कर दिए तुमने

अजदहो के मानिंद मुल्क ए शाम निगल कर
नन्हे मासूम बच्चे भी जबह कर दिए तुमने

बमों की बू अभी भी फैली है गलियारों में

ये गांव गांव , शहर शहर वबा कर दिए तुमने

यकीनन ये कश्तियां अब मझधार में डूबेंगी
समुंदरो के हवाले ना खुदा कर दिए तुमने।

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Iran Protests and Europe’s Conspiracy: Geopolitics & Social Media War.

 Western Leaders’ Statements: USA, Europe, and Israel

 Europe’s Conspiracy Against Iran – Global Geopolitical Equations.
Starlink and the Information War in Iran.
ईरान में विरोध: क्या यह जन आक्रोश है या विदेशी साजिश.
स्टारलिंक और सोशल मीडिया: ईरान में सूचना युद्ध का नया अध्याय.
ईरान में जारी मौजूदा अशांति और इसके पीछे छिपे वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित विश्लेषण.
विरोध का वैश्विक असर, ईरान की अशांति, अंतरराष्ट्रीय नेताओं , यूरोप की साज़िश
ईरान की सड़कों से यूरोप की रणनीति तक – विरोध का वैश्विक असर.
ईरान में जारी मौजूदा अशांति और इसमें विदेशी शक्तियों की संलिप्तता को समझने के लिए जनवरी 2026 के शुरुआती दिनों की घटनाओं और बयानों का सिलसिला बेहद अहम है। यह टाइमलाइन स्पष्ट करती है कि कैसे अमेरिका और इसराइल के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम को एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ाया है।

आज के दौर में किसी देश को अस्थिर करने के लिए केवल सेना की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि एनजीओ (NGO),  ज़र खरिद बुद्धिजीवी और मीडिया विंग्स का एक पूरा तंत्र इस्तेमाल किया जाता है । जब कोई हुकूमत अमेरिका या पश्चिमी देशों की शर्तों पर नहीं चलती, तो ये संगठन अचानक सक्रिय होकर सड़कों पर उतर आते हैं । ईरान में मौजूदा तनाव इसी रणनीति का हिस्सा नज़र आता है, जहाँ जून 2025 में इसराइल के साथ हुए युद्ध और अमेरिका द्वारा परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी के बाद स्थिति को और भड़काया जा रहा है ।

 ईरान में अशांति: जन-आक्रोश या सुनियोजित वैश्विक साजिश?
ईरान की सड़कों पर जारी विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन इस हलचल के पीछे सिर्फ स्थानीय मुद्दे नहीं, बल्कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय बिसात बिछी हुई नज़र आती है।
 तेहरान में एक अकेले प्रदर्शनकारी के वीडियो का तुरंत पुलिस द्वारा काउंटर-वीडियो जारी करना और यह दावा करना कि यह 'प्लांटेड' था, इस बात की ओर इशारा करता है कि सूचना युद्ध (Information War) अब चरम पर है। 
 जहाँ एक ओर प्रदर्शनकारी सड़क पर हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, इसराइल और यूरोपीय देशों का इस आग में घी डालने का तरीका इसे एक खतरनाक मोड़ दे रहा है ।

 पश्चिमी फंडिंग और एनजीओ का सक्रिय नेटवर्क.
दुनियाभर में जब भी कोई सरकार अमेरिकी या पश्चिमी हितों के खिलाफ खड़ी होती है, तो वहां अक्सर यूरोपीय देशों और अमेरिका की फंडिंग पर पल रहे एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और मीडिया विंग्स सक्रिय हो जाते हैं। 
ये समूह 'लोकतंत्र' और 'आजादी' के नाम पर जनता को लामबंद करते हैं, जबकि इनका असली मकसद सत्ता परिवर्तन (Regime Change) होता है. ईरान में भी यही पैटर्न देखा जा रहा है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिए एक ही समय पर पूरी दुनिया में ईरान विरोधी नैरेटिव फैलाया जा रहा है, ताकि वहां की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किया जा सके।

 इसराइल का डर और परमाणु शक्ति का संघर्ष.
इसराइल के लिए एक मज़बूत और परमाणु संपन्न ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जून 2025 में हुए युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी इसी रणनीति का हिस्सा थी कि ईरान को कभी भी निर्णायक रूप से शक्तिशाली न होने दिया जाए। 
   इसराइल की खुफिया एजेंसियां और मीडिया लगातार यह संदेश फैला रहे हैं कि ईरान की सैन्य ताकत को भीतर से ही तोड़ना ज़रूरी है. यही कारण है कि माइक पोम्पियो जैसे नेता खुलेआम प्रदर्शनकारियों के बीच 'मोसाद' की मौजूदगी की बात स्वीकार कर रहे हैं, जो ईरान की संप्रभुता पर सीधा हमला है।

 ट्रंप की चेतावनी और मनोवैज्ञानिक युद्ध.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2 और 4 जनवरी 2026 को दी गई चेतावनियां महज कूटनीति नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा हैं.
 यह कहना कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है, सीधे तौर पर ईरानी सुरक्षा बलों को डराने और प्रदर्शनकारियों के भीतर हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का प्रयास है। यह वही तरीका है जो अमेरिका ने पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ अपनाया था, जहाँ एक समानांतर सरकार को मान्यता देकर देश को गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया गया।

 नैरेटिव वॉर: मीडिया और सोशल मीडिया का हथियार.
 ईरानी अधिकारियों ने देशव्यापी इंटरनेट पाबंदी नहीं लगाई है, जिससे एक दिलचस्प स्थिति पैदा हो गई है। अमेरिका और इसराइल के सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स, विशेष रूप से फ़ारसी भाषा में, प्रदर्शनों के समर्थन में दिन-रात सामग्री साझा कर रहे हैं। यह डिजिटल दखलंदाजी कुछ प्रदर्शनकारियों का हौसला तो बढ़ाती है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर देती है कि इस आंदोलन की डोर कहीं न कहीं विदेशी हाथों में है।
 ईरानी सेना का अलर्ट पर होना और बाहरी हस्तक्षेप के प्रति सख्त रुख अपनाना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई अब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की है.

जनवरी 2026: ईरान विरोधी बयानों और हस्तक्षेप की टाइमलाइन.

1 जनवरी 2026: इसराइली मीडिया और रक्षा विश्लेषकों ने रिपोर्ट करना शुरू किया कि ईरान के भीतर "बदलाव का समय" आ गया है। इसी दिन इसराइली अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर फ़ारसी भाषा में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए सीधे संदेश भेजने शुरू किए, जो मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी.

2 जनवरी 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पहली बड़ी चेतावनी जारी की। 
उन्होंने सोशल मीडिया और आधिकारिक ब्रीफिंग में कहा कि यदि ईरानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया, तो अमेरिका "मदद के लिए दखल" देने को पूरी तरह तैयार है। उन्होंने ईरान को आगाह किया कि पूरी दुनिया देख रही है।

2 जनवरी 2026 (शाम): अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक बेहद विवादित बयान दिया। उन्होंने सड़कों पर उतरे ईरानियों को नए साल की बधाई देते हुए ट्वीट किया कि "उनके साथ हर मोसाद एजेंट भी चल रहा है"। यह बयान सीधे तौर पर ईरान के भीतर इसराइली खुफिया एजेंसी की सक्रिय मौजूदगी की पुष्टि करने जैसा था.

4 जनवरी 2026: राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी चेतावनी को और कड़ा करते हुए दोहराया कि अमेरिका 'पूरी तरह तैयार' (Locked and Loaded) है। इसी दिन यूरोपीय संघ (EU) के कुछ प्रमुख नेताओं ने भी बयान जारी कर ईरान पर प्रतिबंधों की धमकी दी, जिससे एक साथ वैश्विक दबाव बनाने की कोशिश की गई।

7-8 जनवरी 2026: इसराइली (Occupied Palestine) प्रधानमंत्री कार्यालय और मीडिया विंग्स ने ईरान के भीतर हो रही झड़पों के वीडियो को वैश्विक स्तर पर वायरल करना शुरू किया.
 अमेरिकी विदेश विभाग के फ़ारसी अकाउंट्स ने प्रदर्शनकारियों को संगठित होने के तरीके और "विदेशी समर्थन" का भरोसा दिलाना जारी रखा।

9 जनवरी 2026: ईरान के सर्वोच्च नेता और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर आरोप लगाया कि यह अशांति अमेरिका और इसराइल द्वारा प्रायोजित है और देश की सेना किसी भी बाहरी उकसावे का जवाब देने के लिए हाई अलर्ट पर है। एलन मस्क ने ईरान के ऊपर स्टारलिंक सक्रिय करने का संकेत दिया, यह कदम न केवल तकनीकी बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप भी है.

ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म विदेशि नर्रेटिव की आवाज़ को वैश्विक स्तर पर पहुंचा रहे हैं। इससे ईरान की आंतरिक समस्या एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गई है। स्टारलिंक और सोशल मीडिया ने इस संघर्ष को सूचना युद्ध का नया आयाम दिया है, जिससे यह लड़ाई सड़कों से निकलकर डिजिटल स्पेस तक फैल गई है।
इसराइल और अमेरिका का साझा उद्देश्य.
यह टाइमलाइन दर्शाती है कि जून 2025 में ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी बमबारी के बाद से ही इसराइल और अमेरिका का एक ही लक्ष्य रहा है—ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को भीतर से अस्थिर करके खत्म करना।
 माइक पोम्पियो का मोसाद वाला बयान और ट्रंप की लगातार धमकियां यह साबित करती हैं कि ये प्रदर्शन महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसराइल द्वारा समर्थित एक गहरी भू-राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। 
पश्चिमी मीडिया और यूरोपीय नेताओं का एक सुर में बोलना इस 'नैरेटिव वॉर' को और मजबूती देता है, जिसका अंतिम उद्देश्य क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना है।

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