find all Islamic posts in English Roman urdu and Hindi related to Quran,Namz,Hadith,Ramadan,Haz,Zakat,Tauhid,Iman,Shirk,daily hadith,Islamic fatwa on various topics,Ramzan ke masail,namaz ka sahi tareeqa

Showing posts sorted by relevance for query Palestine. Sort by date Show all posts
Showing posts sorted by relevance for query Palestine. Sort by date Show all posts

Falasteen Me Arab Kab Se Aabad Hain | History of Arabs in Palestine | फलस्तीन में अरब कब से आबाद हैं

Falasteen Me Arab Kab Se Aabad Hain? History of Arabs in Palestine | Falasteen Me Arbon Ki Tareekh

फलस्तीन में अरब कब से आबाद हैं ? एक इतिहास 

""""""""""""""""""""""""""""""""""""""'""""""""""""""

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बड़े बेटे हज़रत इस्माईल को मक्का में आबाद किया और छोटे बेटे हजरत इस्हाक़ को फलस्तीन में , फिर आज फलस्तीन अरबों के कैसे हो गया ? फलस्तीन हज़रत इस्हाक़ की संतान इस्राइलियों का होना चाहिए

यह वह सवाल है जो अक्सर खड़ा किया जाता है और मुसलमानों की ओर से आम तौर पर यह जवाब दिया जाता है कि यहां से इसराइली निकल गए थे और ईसाई आबाद थे अरबों ने उन पर विजय प्राप्त की और चौदह सौ वर्षों से यहां आबाद हैं इस लिए अब यह उनका वतन है

लेकिन क्या सच में फलस्तीन देश में अरब सिर्फ चौदह सौ वर्षों से ही आबाद हैं ? जब हज़रत इब्राहीम अपने बेटे इस्हाक़ को यहां ले कर आए और आबाद हुए क्या उस से पहले यह गैर आबाद देश था या आबादी थी अगर आबादी थी तो वह कौन लोग थे और अब कहां हैं ?

Falasteen Me Arab Kab Se Aabad Hain
History of Arabs In Palestine

पवित्र तौरेत व बाइबल में फलस्तीन को कनआन या किनआन लोगों की ज़मीन कहा गया है जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यहां आ कर आबाद हुए उस समय यहां किनआन कौम आबाद थी हज़रत इब्राहीम ने उनसे जमीन खरीदी और रहने लगे जिस जगह उन्होंने रहना शुरू किया आज वहां शहर आबाद है जिसका नाम अल खलील है जो अल कुद्स या योरोशलम से करीब है अल खलील शहर में ही उनकी क़ब्र है

यह किनआन कौम के लोग कौन थे और अब कहां हैं ? कनआन अरब के पुराने कबीले अमालिका की एक ब्रांच थी अमालिक़ा बहुत बहादुर कबीला था लंबे तगड़े होते थे इनका असल क्षेत्र दक्षिण यमन था वहां से यह लोग निकल कर आस पास के देशों में फैल गएं अरब इतिहासकार मसऊदी के अनुसार मिस्र के फिरऔन व इराक़ के नमरूद का संबंध भी अमालिका से था

आमालिका की एक शाखा कनआन यमन से निकल कर भूमध्यसागरीय तटों पर आबाद हो गई यह लोग लेबनान व फलस्तीन में आबाद हुए थोड़े बहुत कनआनी सीरिया व जार्डन के कुछ इलाकों में भी आबाद हुए

हज़रत इब्राहीम के बेटे हज़रत इस्हाक़ फिर उनके बेटे हज़रत याकूब हुए हज़रत याकूब का ही नाम इसराइल भी था उनके बारह बेटे थे उनमें एक बेटे हज़रत यूसुफ़ भी थे जिनकी कहानी कुरान में है वह मिस्र देश में मंत्री बन गएं और फिर पूरा खानदान फलस्तीन छोड़ कर मिस्र में आबाद हो गया

शुरुआत में इसराइली मिस्र में बड़े आराम से थे खूब फले फूले लेकिन बाद में इन्हें फिरऔन ने गुलाम बना लिया कई शताब्दियों तक यह गुलाम रहे उसके बाद हज़रत मूसा ने इन्हें फिरऔन से छुटकारा दिलाया और मिस्र से निकाल लाए

हज़रत मूसा इन्हें मिस्र से लेकर फलस्तीन आए उस समय भी यहां किनआनी लोग आबाद थे जो बहुत ताकतवर थे इसी लिए कुरान में उन्हें कौम ए जब्बार यानी जबरदस्त कौम कहा गया है

किनआनी बादशाह जालूत को हज़रत दाऊद ने कत्ल कर दिया और इसराइली लोगों का राज्य स्थापित किया पहले खुद बादशाह हुए उनके बाद उनके बेटे हज़रत सुलेमान बादशाह हुए और बहुत शानदार हुकुमत चलाई उन्होंने एक बहुत बड़ी इबादत घर बनाया जिसे हैकल सुलेमानी कहा जाता था

बाद में यहां हज़रत ईसा पैदा हुए यहूदियों ने उनका विरोध किया और अपनी जानकारी में उन्हें फांसी दे दी हज़रत ईसा के 90 वर्ष बाद यहां रोमन साम्राज्य ने हमला किया और इसराइली लोगों से सत्ता छीन ली हैकल सुलेमानी को गिरा कर जमीन बराबर कर दी रोमन साम्राज्य ने इन से हज़रत ईसा पर होने वाले ज़ुल्म का बदला चुन चुन कर लिया

फिर इसलाम आया हज़रत उमर के जमाने में फलस्तीन मुसलमानों के कब्जा में आ गया और वहां के रहने वाले किनआनी लोग मुसलमान हो गए

इस से आप को पता चल गया होगा कि इस्राइलियों के जन्म लेने से पहले भी यहां अरब थे और आज भी हैं इसराइली यहां आते जाते रहे हैं जबकि अरब सत्ता में रहें या सत्ता से बाहर वह इस देश को छोड़ कर नहीं गए हैं और इंशाल्लाह न भविष्य में जाएंगे

आज के फलस्तीनी चाहे बहुसंख्यक मुस्लिम हों या अल्पसंख्यक ईसाई ज्यादा तर किनआनी लोगों के वंशज हैं बाद में इनमें अरब के दूसरे लोग भी मिल गए हैं

यह है फलस्तीन में अरबों की तारीख एक बात जान लेना जरूरी है कि हर अरबवासी हज़रत इस्माईल की संतान नहीं है एक सभ्यता एक धर्म और आपसी रिश्तेदारियों के चलते सब को इस्माइल के वंशज समझ लिया जाता है.

Share:

Palestine: Aap kiske Sath hai Freedom Fighter ke ya Terrorist State Israel ke? Palestine liberation.

Palestine ka Sath kaun dega?

फिलिस्तिनियो को आतंकी कौन बता रहा है?
फिलिस्तिनियो के साथ कौन खड़ा है? इस्राएल को ईसाई देश क्यो समर्थन दे रहे है?

ऐ ईमान वालो तुम यहूदियों और नासराणियो को यार व मददगार न बनाओ, ये दोनो खुद ही एकदूसरे के यार ओ मदद गार है। और तुम मे से जो शख्स उनकी दोस्ती का दम भरेगा तो फिर वह उन्ही मे से होगा। यकिनन अल्लाह जालिम लोगो को हिदायत नही देता।

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कम से कम 33 बार इसराइल के लिए किया है.

" तुम मेरा पानी ले लो, मेरे पेड़ो को जला दो, मेरे घरों को तबाह कर दो, नौकरियां छीन लो, मां बाप की हत्या कर दो, मेरे देश में धमाके करो, हमे भूखा रखो, अपमानित करो लेकिन हमे इन सबके बदले एक रॉकेट दागने के लिए दोषी ठहराओ "

उपर जो आप सब ने पढ़ा अगर वैसा ही हाल आपका का हो जाए तो आप क्या करेंगे?

 
अगर बिजली काट दी जाए, घरों को तबाह कर दिया जाए और रोज़ दिन रात आपके आशियाने पर मिसाइल और हेलीकोपट्रो से बॉम्बारी किया जाए तो आप क्या सोचेंगे और क्या करेंगे?

इससे भी ज्यादा बद्तरीन हालात है अरब के एक छोटे से खितते मे बसा फिलिस्तीन का।
जो ज़मीन फिलिस्तीन के लोगो का था उस पर जबरदस्ती यहूदियों ने कब्ज़ा करके अपना नया देश इस्राएल बनाया 1948 मे।

"We Should Fight The information war this time with zionist, salebi and west propganda machine, keep commenting, writing & breaking lies they spread. Don't need to be sorry, conddemn, its time to support Palestine, Mujahiden, Freedom fighters & our Supporters."

मस्ज़िद ए अक्सा फिलिस्तीन से दुनिया के मुसलमानो का क्या ताल्लुक़ है?

आज मुस्लिम दुनिया का रहनुमा कौन है और किधर है?

फिलिस्तीन मे अरब कब से आबाद है और मकबूजा फिलिस्तीन (इस्राएल) कब बना?

दहशतगर्द इस्राएल कब बना, किसने बनाया से यहूदि स्टेट?

इस्राएल क्या पूरी तरह से अरब देश पर हमला करके उसे कब्ज़े मे ले लेगा?

इस्राएल अब ज़मीनी जंग शुरू करने जा रहा है उधर आतंकवादि अमेरिका ने इस्राएल का साथ देते ही हथियारो से लैश जहाज़ भेजा है, जिसमे एंटी क्रूज़ मिसाइल, गोला बारूद, एंटी शिप मिसाइल है।

यह शुरू होने से पहले यूरोप और इस्राएल मिलकर अफवाहों का बाजार गरम कर रहा था फिलिस्तिनियो के खिलाफ, ताकि गैर मुस्लिम दुनिया, मीडिया और तथकथित बुद्धिजीवी को अपने साथ ला सके। अगर इन लोगो को अपने खेमे मे रखेंगे तो ये लोग हमारे ज़ुल्म व ज्यादती, फिलिस्तिनियो के क़तलेआम पर मीडिया मे बहस के दौरान हमारी हिमायत करेंगे और मजलुम फिलिस्तीनईयो को आत्यचरि और आतंकवादि साबित करवा देंगे।
इस तरह से ये अभी इंफोर्मेशन वार शुरु किया है ताकि हमारे ज़ुल्म की इंतेहा पर पर्दा डाला जा सके। यूरोपियन मीडिया और हिंदी मीडिया चाहे उदारवादी हो या दक्षिणपंथी सबने फिलिस्तीन पर हो रहे ज़ुल्म को न दिखा कर फिलिस्तीन के लोगो के हाथ मे कंकर और पत्थर को दिखा रहे  है।

लेबनान के इलाको पर भी आतंकवादि इस्राएल ने बॉम्बारी की और अब ज़मीनी आतंकियो के जरिये अगल बगल के सारे देशो पर हमला करेगा लेकिन मानवाधिकार का लबादा ओढ़ने वाला अमेरिका और यूरोपीय देश इसमे इस्राएल को हर तरह से चाहे सामरिक,आर्थिक या राजनीतिक मदद कर रहा है।

अब तक 1000+ फिलिस्तिनि शहीद हुए और 2500 ज़ख़्मी है। वहाँ के अस्पताल मुर्दा घर बन गए।

लेबनान मे 50 लाख फिलिस्तिनि रहते है। पहले ये ग़ज़ा पर बॉम्ब बरसाया फिर अब मिस्र, जोर्डन और दूसरे मुल्को पर। इसे इजरायली सनक कह सकते है जिसे अपने आप पर बहुत घमंड है।

इस्राएल ने ग़ज़ा पट्टी पर फॉस्फोरस बॉम्ब भी गिराया है जिसे अमेरिका ने दुनिया को इसे इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगाया हुए है।

मिस्र को आतंकवादि देश इस्राएल ने धमकी दिया के वह ग़ज़ा मे रहने वालो को अपने यहाँ पनाह न दे।

जिसने दुसरो के ज़मीन को कब्ज़ा करके खुद बसा आज वही फिलिस्तिनि लोगो को मार कर भाग रहा है लेकिन UNSC और मानवाधिकार की रट लगाने वाला, चीन कि विगर मुसलमानो पर तंकिद करने वाला इस्राएल को हथियार दे रहा है ताकि वह ग़ज़ा और फिलिस्तिनियो का सफाया कर सके। इसे बड़ा अपराध और क्या हो सकता है? इस्राएल जिसे ब्रिटेन ने पैदा किया और अमेरिका ने भरण पोषण किया। अब वह फिलिस्तिनियो के नर संहार के लिए हथियार और सियासी मदद कर रहा है।

फ्रांस, जर्मनी , इटली, ब्रिटेन और अमेरिका इनमें से कोई भी यहुदी देश नहीं है बावजूद इसके ये खुलेआम इज़रायल के साथ खड़े हैं। यहां तक की अमेरिका ने  आतंकी इज़रायल के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए व्हाइट हाउस में नीली और सफेद रंग की रौशनी की..

क्या इस्राएल अकेले 1948 से यह सब कर रहा है?

इस्राएल को ईसाई देशो से मदद मिलती है, चाहे वह लेफ्ट हो या राइट। अमेरिका मे यहूदि लॉबी काफी जड़े जमाये हुए है। इस्राएल को मुसलमानो का जनसंहार करने के लिए लेफ्ट, लिबरल, डेमोक्रेट सभी तबके के लोग अपने अपने तरीके से मदद करता है।

मगर इन सब के बीच मुस्लिम देशों का रवैया क्या है?

अगर आप फिलिस्तीन की आज़ादी चाहते है और इजरायली सामान खरीद कर इस्तेमाल भी करते है तो समझ जाए के आप फिलिस्तिनियो का खून बहाने, मस्जिदो पर बॉमबारी करने की फंडिंग कर रहे है। साथ साथ आप झूठ भी बोल रहे है के मै क़ीबला ए अव्वल की हीफाज़त चाहता हूँ।

57 मुस्लिम देश होते हुए भी फिलीस्तीन यतीमों की तरह अकेला मुसलमानों के बैतूल मुकद्दस की हीफाजत के लिए अपनी और अपने मुस्तकबिल के खून को पानी की तरह बहाए जा रहा है।
जो मजाहेदीन आतंकियो से मुकाबला करने की सोच रहे है उसे अमेरिका और दूसरे ईसाई देशों ने आतंकवादि कहा है?

हम आह भी करते है तो हो जाते है बदनाम
वह क़त्ल भी करते है तो चर्चा नही होता।

Western Ideology:
1) Ukraine  has the right to defend
2) Israel  has the right to invade

जो अपने मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ रहा है उसे ईसाई देशो ने दहशत गर्द का लकब् दिया लेकिन जो दुसरो के ज़मीन को नजायेज कब्ज़ा कर वहाँ के बाशिंदों को कसाई की तरह मार रहा है उसे यह ईसाई देश मदद कर रहे है।

अरब देशों ने फिलिस्तीन को उसके हाल पर छोड़ कर तेल बेचने और शाही खज़ाना भरने मे मसरूफ है
उसे बड़े बड़े होटलो और नंगी औरतों के साथ रहने से वक़्त ही नही बच रहा है के वह ग़ज़ा के लोगो के बारे मे सोचे। उसने पहले से आतंकी इस्राएल के आगे घुटने टेक दिये है।

इन सब मे आम मुसलमानो को क्या करना चाहिए?

मुसलमानो को यह बात समझ लेना चाहिए के कोई भी अगर आपकी मदद कर रहा है तो उसके पीछे अपना मकसद छिपा रहता है? चाहे देशी लिब्रल्स हो या नामनिहाद् औरतो के आज़ादी के मतवाले। वह आपकी पहचान मिटाकर एक अलग दुनिया मे रखना चाहते है जहाँ आप उसकी मर्ज़ी से ही कुछ कर सकते है। आप दुसरो के ज़ुल्म पर मजलुमो का साथ देंगे, लेकिन जब आप पर ज़ुल्म होगा तो आप खुद को अकेला पाएंगे।

आप के साथ कोई खडा नही होगा। युक्रेन के साथ कितने ईसाई देश खड़े है, और सारी दुनिया को यह कह रहे के युक्रेनी लोगो का साथ दे, लेकिन यहूदि देश ने फिलिस्तीन पर हमला किया तो कितने देश आपके साथ खड़े हुए?

मुसलमान दुसरो को इंसाफ दिलाने वाला क्यों जब खुद पर ज़ुल्म होता है तो अकेला रह जाता है उसका कोई साथ नही देता। यहाँ तक के नामनिहाद् इस्लामिक मुल्क कहने वाला भी।

अमेरिका  अफगानिस्तान पर हमला किया मनवाधिकार के लिए,
इराक पर हमला किया झूठा अफवाह फैला करके, उसके पास विनाशकारी हथियार है।
वियतनाम पर हमला किया वहाँ अपना कठपुतली सरकार बनाने के लिए
वगैरह बहाने बनाकर।

दुनिया भर मे सारे देशों पर हमला करके उसे बर्बाद करने वाला सारी दुनिया को लोकतंत्र और मनवाधिकार का सबक सिखाता है। जब वह खुद दुसरो पर हमला करता है तो क्या वह अपना बनाया हुआ ग्लोबल ऑर्डर भूल जाता है, या उसका बनाया नियम उसे इसकी पूरी आज़ादी देता है?

आज जब ग़ज़ा पर आतंकी इस्राएल हमला किया तो उसका साथ देने सलेबी मुमलिक तैयार है लेकिन मुसलमानो पर हुकमरानी करने वाले सलेबी और सह्युनि एजेंट छिप कर इस्राएल का साथ दे रहे है।

इसलिए के ग्लोबल ऑर्डर के वह जाल मे फंसे हुए है। अमेरिका के बनाये हुए जाल मे फंसे हुए है जिसका नतीजा फिलिस्तिनियो को चुकाना पड़ रहा है।

आम मुसलमानो को सलेबियो की तरफ से शुरू हुआ डिजिटल वार का जवाब देना चाहिए, यह इंफोर्मेशन वार फिलिस्तिनियो के खिलाफ शुरू किये है ताकि खुद को मीडिया मे डिजिटल मजलुम साबित करे।

मुसलमान अरबो से उम्मीद न लगाए वह अपने खज़ाने को देख रहे है, लिहाज़ा आप सब फिलिस्तिनि माँ, बहनो, भाईयो के लिए दुआ करे और उनकी आज़ादी के इस मुहिम मे साथ दे।

आप वहा जा नही सकते, आप के पास उसे देने के लिए न हथियार है न पैसे लेकिन आप दुआ कर सकते है मासूम फिलिस्तिनियो के लिए, लोगो से उनका साथ देने के लिए कह सकते है।

इस्राएल फिलिस्तीन के खिलाफ प्रोपगैंडा फैलाने मे बहुत माहिर है, वो नरसंहार करने से पहले "प्रोपगैंडा वार" करता जिसका साथ यूरोप से लेकर एशिया तक के Columnist, Reporters, Anchors, Actor, Artist aur Leaders साथ देते है। इसलिए किसी भी वीडियो को देख कर अपनी राय न बनाये। बल्कि आपके पास इतिहास और 1948 से अबतक हुई घटनाएं मौजूद है उस पर नज़र दौराये। 1948 से अबतक बेशुमार मासूमो का क़त्लआम करने वाला आतंकी इस्राएल और उसका साथ देने वाला ईसाई देश एक वीडियो क्लिप से बेगुनाह साबित नही हो सकता है।

किसी नामनिहाद् सेकुलर के बहकावे मे आकर उसके प्रोपगैंडा को कामयाब न बनाये। सलेबी मीडिया पूरे जोर शोर से इस्राएल के लिए "इंफोर्मेशन वार" शुरू किये हुए है जिनमे से कुछ ये है। BBC, CNN, The Guardian, washington Post, NewYork Times, Times of Israel, ABC वगैरह से होशियार रहे। ये इस्राएल के आतंक को लोकतन्त्र और मनवाधिकार के चादर मे डाल कर आपको स्विकार करने के लिए कहेंगे।

आज फ़लस्तीनी मसला एक भावनात्मक मुद्दा हो चुका है, और पूरी दुनिया में ही नहीं, या फिर अरब देशों या फ़लस्तीन के लोग मे ही नहीं, मुसलमानों में ही नहीं, जिस पर भी इंग्लैंड के उपनिवेशवाद या अमेरिका के साम्राज्यवाद का असर पड़ा है, या जो कोई भी शोषित हैं, उनमें ये फ़लीस्तीनीयों के लिए समर्थन धीरे धीरे फैल रहा है."

यह निहथे लोगो और आतंकवादि राज्य के बीच,

तानाशाह और विस्तारवादी रवैय्या और स्वराज के बीच लडाई है।

यह वैसा ही जंग है जैसे महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोष, भगत सिंह, वीर कुंवर सिंह, खुदीराम बोस, बाल गंगाधर तिलक, बटुकेश्वर दत्त, लाला राजपत् राय जैसे महापुरुषो ने लडी थी ईस्ट इंडिया कंपनी, ब्रिटिश साम्राज्य और उपनिवेशवाद के खिलाफ अपनी खुद मुखतारी और आज़ादी के लिए।

फिर कोई अगर फिलिस्तीन के फ्रीडम फाइटर को अपनी ज़मीन के लिए लड़ने, मुहिम चलाने पर आतंकवादि और क्रूर कहता है तो यह बात अंग्रेजो ने भी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कही थी। अंग्रेजो ने भी हिंदुस्तान के जाबाज सिपाहियों को स्वराज के लिए गद्दार और दहशत गर्द कहा था और रॉलेक्ट् एक्ट बनाये थे, फांसी पर चढ़ाया था खुदीराम बोस को।

Share:

Banda Allah Se Jaisa Gumaan Rakhta Hai Allah Usko waisa Hi Ata Karta Hai.

Banda Allah se jaisa guman rakhta hai Allah use waisa hi ata karta hai? 

 Cricket Match me Kamyab hone ke bad Playground me Namaj padhna kaisa hai? 

Palestine ka Masla Sirf Palestine ya Arab ka nahi Pure Ummat ka Masla hai. 



ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ 

        *السَّلاَمُ عَلَيكُم وَرَحمَةُ اللّٰهِ وَبَرَكَاتُهُ* 
     
       ☆▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬☆                 
: Banda Allah Ta'ala Se Jaisa Gumaan Rakhta Hai Allah Usko Waisa Hi Ata Karta Hai:

Hadith:
Hazrat Abu Hurraira رضي الله تعالى عنه Se Riwayat Hai, Huzoor Nabi E Kareem صلی اللہُ علیہِ و آلہِ وسلمِ Ne Farmaya: "Allah Ta'ala Farmata Hai Ki Mera Banda Mere Mutalliq Jaisa Khayaal Rakhta Hai Mein Uske Saath Waisa Hi Maamla Karta Hu. Jab Woh Mera Zikr Karta Hai, Mein Uske Saath Hota Hu. Agar Woh Apne Dil Mein Mera Zikr (Yaani Zikr E Khafi) Kare To Mein Bhi (Apni Shaan Ke Laaiq) Apne Dil Mein Uska Zikr Karta Hu. Aur Agar Woh Jamat Mein Mera Zikr (Yaani Zikr E Jali) Kare, To Mein Uski Jamat Se Behtar Jamat (Yaani Farishton) Mein Uska Zikr Karta Hu. Agar Woh Ek Baalisht Mere Nazdeek Aaye To Mein Ek Baazu Ke Barabar Uske Nazdeek Ho Jaata Hu. Agar Woh Ek Baazu Ke Barabar Mere Nazdeek Aaye, To Mein Do Baazuo Ke Barabar Uske Nazdeek Ho Jata Hu. Aur Agar Woh Meri Taraf Chal Kar Aaye To Mein Uski Taraf Daud Kar Aata Hu."
[Sahih Bukhari, Kitab Ul Tawheed]
[Sahih Muslim, Kitab Ul Zikr Wa Dua Wa Tauba Wa Istigfaar]

[Sunan Tirmizi, Kitab Ul Zohd An Rasulallah  صلی اللہُ علیہِ و آلہِ وسلمِ]

[Sunan Ibne Majah, Kitab Ul Adab]
[06/07, 8:01 am] ‪: 

▫  *Aaj Ki Hadees*  ▫  
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
 Hazrat Sahal bin Saad Raziyallahu 'anhu riwaayat karte hain ke Rasullulah ﷺ ne irshaad farmaaya: Do waqton ki duaaein rad nahin ki jaati. Ek azaan ke waqt, dusri us waqt jab ghamasaan ki ladayee shuru ho jaye. (Abu Dawud: 2540)
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰

Agar tum mein se kisi ko (khaane ki) daawat di jaaye to daawat qubool kar leni chaahiye.
(Abu Dawood: 2460)
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
      ☆▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬☆

*Aye imaan waalo Allah ki itaat karo aur uske Rasool ki itaat karo aur apne Amalo ko Baatil na karo*

Jo Bhi Hadis Aapko Kam Samjh Me Aaye Aap Kisi  Hadis Talibe Aaalim Se Rabta Kare !

  JazakAllah  Khaira Kaseera

   ☆▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬☆

☪ Share karey … Sawab ka Haqdaar baney… In Shaa Allah Ta’ala.

Share:

Khilafat se Badshahat me Kaise tabdil hui, Islamic System kab lagu tha?

Sahaba Ke Daur me Itni Jungein Kyu hui?

Khilafat se Badshahat aur Badshahat se Jamhuriyat me Kab Tabdil ho gayi?

Masla Palestine aur Muslim Hukmran
Palestinian ke Qatl e Aam me Europe aur Ahle Arab Shamil hai.
Middle East me Israel banane ke bad se kya kya hua?
Palestine me Maujuda halat aur Arab Hukmrano ki Zimmedariya.

"سلسلہ سوال و جواب نمبر-224"
سوال_ صحابہ کرام کے عہد میں اتنی جنگیں کیوں ہوئیں؟اور خلافت بادشاہت میں کیسے تبدیل ہوئی؟ نیز باغی پارٹی کا انجام کیا ہوا؟

Published Date:22-3-2019

جواب:
الحمدللہ:

(تاریخ اسلام پر آخری سلسلہ )

جیسا کہ آپ جانتے ہیں کہ ہر جمعہ کے دن ہم تاریخ اسلام کے مشہور واقعات اور صحابہ کرام رضوان اللہ علیہم اجمعین پر کیے جانے والے اعتراضات اور انکے جوابات پڑھتے ہیں،پچھلے سلسلہ جات نمبر.

87٫88،92٫96٫102 131،133٫134، 139،145،151،156,166

*میں سب سے پہلے ہم نے تاریخ کو پڑھنے اور اور جانچنے کے کچھ اصول پڑھے پھر یہ پڑھا کہ خلافت کی شروعات کیسے ہوئی؟ اور خلیفہ اول حضرت ابوبکر صدیق رض کی خلافت اور ان پر کیے جانے والے اعتراضات کا جائزہ لیا، اور یہ بھی پڑھا کہ واقعہ فدک کی حقیقت کیا تھی؟ اور یہ بھی پڑھا کہ حضرت عمر فاروق رض کو کس طرح خلیفہ ثانی مقرر کیا گیا،اور حضرت عمر فاروق رض کے دور حکومت کے کچھ اہم مسائل کے بارے پڑھا ،کہ انکے دور میں فتنے کیوں نہیں پیدا نہیں ہوئے اور ،حضرت خالد بن ولید رض کو کن وجوہات کی بنا پر سپہ سالار کے عہدہ سے ہٹا کر ابو عبیدہ رض کی کمانڈ میں دے دیا،اور خلیفہ دوئم کی شہادت کیسے ہوئی، اور پھر سلسلہ 133٫134 میں ہم نے پڑھا کہ تیسرے خلیفہ راشد کا انتخاب کیسے ہوا؟
اور کیا حضرت علی رضی اللہ عنہ نے بیعت نہیں کی تھی؟اور کیا حضرت علی رضی اللہ عنہ کے ساتھ اس موقع پر بے انصافی ہوئی؟ اور دور عثمانی کی باغی تحریک کیسے وجود میں آئی؟ انہوں نے کس طرح عثمان رض کو شہید کیا اور صحابہ کرام نے عثمان رض کا دفاع کیسے کیا؟اور پھر سلسلہ نمبر-139 میں ہم نے پڑھا کہ باغی تحریک نے کس طرح عثمان غنی رض پر الزامات لگائے اور انکی حقیقت بھی جانی،  اور پھر سلسلہ_145 میں ہم نے پڑھا کہ عثمان غنی رض کو شہید کرنے کے بعد فوراً صحابہ نے باغیوں سے بدلہ کیوں نا لیا؟ چوتھے خلیفہ راشد کا انتخاب کیسے ہوا؟

*کیا صحابہ کرام سے زبردستی بیعت لی گئی؟اور کیا علی رض  باغیوں سے بدلہ لینے کے حق میں نہیں تھے؟اور کیا علی (رض) نے عثمان رض کے قاتلوں کو خود حکومتی عہدے دیے تھے؟ اس ساری تفصیل کے بعد سلسلہ نمبر-151 میں ہم نے جنگ جمل کے بارے پڑھا کہ وہ جنگ* *باغیوں کی منافقت اور دھوکے کہ وجہ سے ہوئی تھی، جس میں باغیوں کی کمر تو ٹوٹی مگر ساتھ میں بہت سے مسلمان بھی شہید ہوئے، اور پھر سلسلہ نمبر_156 میں ہم نے جنگ صفین کے بارے پڑھا کہ جنگ صفین کیسے ہوئی،اسکے اسباب کیا تھے، اور پھر مسلمانوں کی صلح کیسے ہوئی اور پھر سلسلہ نمبر-166 میں ہم نے جنگ صفین کے بعد واقع تحکیم یعنی مسلمانوں میں صلح کیسے ہوئی، کون سے صحابہ فیصلہ کرنے کے لیے حکم مقرر کیے گئے اور حضرت علی و معاویہ رضی اللہ عنھما کے مابین تعلقات کیسے تھے،*
*اور پھر پچھلے سلسلہ نمبر-171 میں ہم نے  یہ پڑھا کہ خوارج کیسے پیدا ہوئے اور باغی جماعت میں گروپنگ کیسے ہوئی؟
خوارج کا نقطہ نظر کیا تھا؟*
*حضرت علی نے خوارج سے کیا معاملہ کیا؟خوارج سے جنگ کے نتائج کیا نکلے؟اور بالآخر مصر کی باغی پارٹی کا کیا انجام ہوا؟*
*اور سلسلہ نمبر 176 میں ہم نے پڑھا کہ حضرت علی (رض) کیسے شہید ہوئے؟ حضرت علی (رض) کی شہادت کے وقت صحابہ کرام اور باغیوں کے کیا حالت تھی؟حضرت علی ( رض) کی شہادت پر صحابہ کے تاثرات کیا تھے؟حضرت علی(رض) کے دور میں فرقوں کا ارتقاء کیسے ہوا؟حضرت علی (رض) کی خلافت کس پہلو سے کامیاب رہی؟حضرت علی (رض) کے دور میں بحران کیوں نمایاں ہوئے؟ اور اسی طرح سلسلہ نمبر 181 میں ہم نے پڑھا کہ حضرت علی رض کی شہادت کے بعد خلیفہ کون بنا؟ حضرت حسن اور معاویہ رض کا اتحاد کن حالات میں ہوا؟

اس کے کیا اسباب تھے اور اس کے نتائج کیا نکلے؟اور کیا معاویہ رض نے زبردستی اقتدار پر قبضہ کیا تھا؟اور حضرت معاویہ کی کردار کشی کیوں کی گئی؟ معاویہ پر کیا الزامات عائد کیے گئے اور ان کا جواب کیا ہے؟ اور حضرت معاویہ نے قاتلین عثمان کی باغی پارٹی کے ساتھ کیا معاملہ کیا؟سلسلہ نمبر-188 میں ہم نے پڑھا کہ کس طرح باغی راویوں نے جھوٹی روایتوں سے یہ مشہور کر دیا کہ حضرت امیرمعاویہ (رض) خود بھی حضرت علی (رض) پر سب وشتم کرتے اور اپنےگورنروں سے بھی کرواتے تھے، اور سلسلہ نمبر-194 میں ہم نے استلحاق کی حقیقت جانی،اور پھر سلسلہ نمبر-197 میں ہم نے پڑھا کہ باغی راویوں نے امیر معاویہ رض پر جو الزامات لگائے انکی کیا حقیقت تھی؟ جیسے کہ کیا حضرت امیر معاویہ (رض ) کے گورنر رعایا پر ظلم کرتے تھے؟اور کیا معاویہ (رض) نے عمار (رض) کا سر کٹوایا تھا؟اور یہ بھی پڑھا کہ کیا واقعی حضرت معاویہ رض نے حسن (رض) سمیت سیاسی مخالفین کو زہر دلوایا تھا؟اور پچھلے سلسلہ نمبر-201 میں ہم نے پڑھا کہ کیا حضرت امیر معاویہ رض نے اپنے بیٹے یزید کو ولی عہد نامزد کر کے خلافت کو ملوکیت میں تبدیل کر دیا تھا؟*اور کیا یزید کو مشورے کے بنا زبردستی ولی عہد مقرر کیا گیا؟اور کیا یزید بے نماز،شرابی اور ہم جنس پرست تھا؟ اور پھر پچھلے سلسلہ نمبر 205 میں ہم نے پڑھا  کہ کیا بنو ہاشم اور بنو امیہ ایک دوسرے کے دشمن تھے؟ اور حضرت علی(رض)کی بنو امیہ کے بارے کیا رائے تھی؟اور کیا معاویہ (رض) نے غزوہ بدر کا انتقام جنگ صفین کی صورت میں لیا؟اور کیا معاویہ(رض) نے بنو امیہ کا اقتدار مضبوط کرنے کے لیے زیادہ حکومتی عہدے اپنے لوگوں کو دیے؟اور یہ کہ معاویہ(رض) کا دور حکومت خلافت کا دور تھا یا ملوکیت کا؟اور یہ بھی پڑھا کہ کیا خلافت صرف حضرت علی(رض)  تک قائم رہی؟اور  سلسلہ نمبر-208 میں ہم نے معاویہ (رض ) کے فضائل و مناقب صحیح حدیث سے پڑھے، اور ناقدین کے اعتراضات کا جواب بھی دیا ،آپکے شاندار  کارنامے پڑھے اور آخر پر یہ بھی پڑھا کہ صحابہ کرام کی آپکے بارے کیا رائے تھی؟* اور پچھلے سلسلہ نمبر-211 میں ہم نے پڑھا کہ حضرت حسین رضی اللہ عنہ کے اقدام کی اصل نوعیت کیا تھی؟سانحہ کربلا کیسے وقوع پذیر ہوا؟ سانحہ کربلا کا ذمہ دار کون تھا؟سانحہ کربلا کے کیا نتائج امت مسلمہ کی تاریخ پر مرتب ہوئے؟دیگر صحابہ نے حضرت حسین رضی اللہ عنہ کے ساتھ شمولیت اختیار کیوں نہ کی؟یزید نے قاتلین حسین کو سزا کیوں نہ دی؟شہادت عثمان کی نسبت شہادت حسین پر زیادہ زور کیوں دیا گیا؟ اور سانحہ کربلا کے بارے میں بعد کی صدیوں میں کیا رواج پیدا ہوئے؟ اور سلسلہ نمبر-215 میں ہم نے پڑھا کہ سانحہ کربلا کے بعد  دوسرا بڑا سانحہ حرہ کیسے پیش آیا؟
کیا یزید کے حکم سے مدینہ میں خواتین کی عصمت دری کی گئی؟ کیا یزید نے مکہ پر حملہ کر کے بیت اللہ جلایا؟یزید کے بارے ہمارا مؤقف کیا ہونا چاہیے؟
اور آخر پر باغی تحریک نے کیا حکمت عملی اختیار کی؟؟ اور پچھلے سلسلہ نمبر 218 میں ہم نے حضرت عبداللہ بن زبیر(رض) کی خلافت کے بارے چند مختصر سوالات کے جواب پڑھے،*

*جمعہ کے دن جو تاریخ اسلام کا سلسلہ ہم نے شروع کیا تھا اس سلسلے کا آج یہ آخری حصہ ہے،*

آج کے سلسلے میں ہم ان سوالات کے جواب تلاش کریں گے جو ان تاریخی سلسلہ جات کو پڑھنے سے ہمارے ذہنوں میں پیدا ہوتے ہیں،

@عہد صحابہ میں اتنی جنگیں کیوں ہوئیں؟

@خلافت، ملوکیت میں کس طرح تبدیل ہوئی؟

@بنو امیہ کا باقی دور کیسا تھا؟

@ بعد میں باغی تحریک پر کیا گزری؟

@ناصبی کن لوگوں کو کہا جاتا ہے؟

اس سلسلہ کے اختتام پر ہم اس قابل ہوں گے کہ عہد صحابہ سے متعلق عمومی تاریخی سوالات کے جواب جان سکیں۔

 
*صحابہ کرام رضی اللہ عنہم کا سیاسی دور 73ھ/ع692 میں ختم ہوتا ہے۔ اس دور سے متعلق کچھ عمومی نوعیت کے سوالات ہیں جو تاریخ کے طلباء کے ذہن میں پیدا ہوتے ہیں۔ اس سلسلے میں ہم ان کا جائزہ لیں گے۔ ان شاءاللہ

*صحابہ کرام میں اتنی جنگیں کیوں ہوئیں؟*

عہد صحابہ میں اتنی جنگیں نہیں تھیں جتنا کہ تاریخ کو پڑھنے سے تاثر ملتا ہے۔  اصل میں صحافی اور مورخین حضرات کا یہ مزاج ہوتا ہے کہ وہ چن چن کر منفی واقعات کو رپورٹ کرتے ہیں اور مثبت واقعات ان کے نزدیک اتنے اہم نہیں ہوتے کہ ان کا اندراج تاریخ کی کتب میں کیا جائے۔ مثال مشہور ہے کہ کتا انسان کو کاٹ لے تو خبر نہیں بنتی بلکہ اس وقت بنتی ہے جب انسان کتے کو کاٹ لے۔

صحافت کی ایک اصطلاح ہے جسے "نیوز ویلیو" کہا جاتا ہے۔ جرنلزم کے ماہرین کے نزدیک نیوز ویلیو کا انحصار متعدد عوامل پر ہوتا ہے:

1۔ منفی پن:
منفی خبروں کو مثبت خبروں کی نسبت زیادہ کوریج ملتی ہے۔ ہمارے ملک میں روزانہ کروڑوں لوگ اللہ تعالی کے  حضور حاضر ہوتے ہیں،  لاکھوں لوگ غرباء اور مساکین کی مدد کرتے ہیں، کروڑوں لوگ ایک دوسرے سے محبت سے  ملتے ہیں لیکن ان سب کی کوئی نیوز ویلیو نہیں ہوتی ہے۔ اس کے برعکس کروڑوں میں سے چند لوگ اگر قتل، بدکاری، ریپ، لڑائی جھگڑا  یا اسی  نوعیت کا کوئی کام کر بیٹھیں تو تمام اخبارات اسے رپورٹ کرتے ہیں۔ ہزاروں جہاز، ٹرینیں، بسیں اور کاریں صحیح و سلامت اپنی منزل مقصود پر پہنچتی ہیں  لیکن اخبار میں اس کی خبر نہیں آتی اور نہ ہی کوئی نیوز چینل اسے رپورٹ کرتا ہے لیکن اگر ایک آدھ جہاز، ٹرین، بس یا کار کو حادثہ پیش آ جائے تو یہ خبر بن جاتی ہے۔

2۔ تصادم:
تصادم اور لڑائی جھگڑے پر مبنی خبروں کو زیادہ کوریج دی جاتی ہے۔

3۔ نمایاں شخصیات سے تعلق:
نمایاں شخصیات جیسے حکمران طبقے سے متعلق خبریں زیادہ نشر کی جاتی ہیں جبکہ عام آدمی  سے متعلق خبریں کم۔

4۔ توقع:
ایسی خبریں جن کی لوگوں کو توقع نہ ہو، کو زیادہ کوریج ملتی ہے کیونکہ اس سے لوگوں کو چونکایا جا سکتا ہے اور سنسنی پیدا کی جا سکتی ہے۔ یہاں کتے اور انسان والی مثال فٹ بیٹھتی ہے۔

5۔ تحقیقات:
اگر کسی خبر کے لیے بہت زیادہ تحقیق کی ضرورت ہو تو اس کی نسبت اس خبر کو زیادہ کوریج دی جاتی ہے جس کے لیے تحقیق کی ضرورت نہ ہو اور وہ آسانی سے دستیاب ہو سکے۔

یہ باتیں مزید تفصیل سے اس لنک پر آپ دیکھ سکتے ہیں
(https://en.wikipedia.org/wiki/News_values)

ان کے علاوہ دیگر عوامل جیسے خبر کی دستیابی، میڈیا میں پیش کیے جانے والے دیگر واقعات، میڈیا کا اپنا شیڈول وغیرہ بھی خبر کی کوریج کا تعین کرتے ہیں۔ چونکہ مورخین کے کام کا انحصار صحافیوں کے کام پر ہوتا ہے، اس وجہ سے یہی عوامل وہاں بھی اپنا اثر دکھا دیتے ہیں۔ صحافی، اخباری اور مورخ انہی باتوں کو اپنی کتب میں درج کرتے ہیں جن کی ان کے نزدیک کچھ نیوز ویلیو ہو ،
تاکہ ان کا اخبار یا کتاب بک سکے۔ جو چیزیں نارمل اور روٹین ہوتی ہیں، انہیں وہ نظر انداز کر دیتے ہیں۔

مثال کے طور پر ان دنوں میں مسلمانوں کی مذہبی، علمی، فکری، تہذیبی اور دعوتی تاریخ پر کام کر رہا ہوں لیکن دلچسپ امر یہ ہے کہ اس تاریخ کے بارے میں کتب تاریخ میں معلومات نہ ہونے کے برابر ہیں جس کی وجہ سے ہمیں کتب تاریخ سے ہٹ کر دیگر وسائل پر انحصار زیادہ کرنا پڑ رہا ہے کیونکہ مورخین اور اخباریوں کے نزدیک علمی، فکری اور دعوتی تاریخ کی اتنی نیوز ویلیو نہیں تھی کہ وہ اس سے متعلق زیادہ تفصیلات اپنی کتب میں درج کرتے۔

رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم اور صحابہ کرام رضی اللہ عنہم کے پورے سیاسی دور کا جائزہ لیا جائے تو اس میں امن کے وقفے ، جنگ کی نسبت کہیں زیادہ ہیں۔
اس کے لیے آپ اس ٹائم  لائن کو دیکھ سکتے ہیں۔ اس ٹائم لائن میں چھوٹے موٹے اور مقامی نوعیت کے واقعات کو ہم نے نظر انداز کر دیا ہے کیونکہ ان کا عام زندگی پر کوئی  اثر نہیں پڑتا ہے۔

1-2/622-623
امن کا دور۔۔۔ تقریباً ایک سال

2/624
غزوہ بدر ۔۔۔ ایک دن کی جنگ اور کاروائی میں چند دن لگے۔

2-3/624-625
امن کا وقفہ۔۔۔ تقریباً ایک سال

3/625
غزوہ احد ۔۔۔ ایک دن کی جنگ اور کاروائی میں چند دن لگے۔

3-5/625-627
امن کا وقفہ ۔۔۔ تقریباً دو سال

5/627
غزوہ خندق ۔۔۔ چند دن کا محاصرہ اور مکمل کاروائی میں بیس پچیس دن لگے۔

5-7/627-629
امن کا وقفہ ۔۔۔ دو سال

7/629
غزوہ خیبر ۔۔۔ چند دن کی جنگ اور مکمل کاروائی میں بیس پچیس دن لگے۔
جنگ موتہ ۔۔۔ چند دن کی جنگ اور مکمل کاروائی میں بیس پچیس دن لگے۔

7-8/629-630
امن کا وقفہ ۔۔۔ ایک سال

8/630
فتح مکہ، غزوہ حنین، غزوہ ہوازن اور چند چھوٹے موٹے غزوات۔  سب کو ملا کر چند ماہ کا وقت لگا۔

8-11/630-632
امن کا وقفہ ۔۔۔ تین سال۔ اس میں صرف ایک تبوک کی مہم ہے جس میں جنگ نہیں ہوئی۔

11/632
بعض عرب قبائل کا ارتداد اور ان سے جنگیں

12-35/632-655
مسلم دنیا میں امن کا وقفہ ۔۔۔ 23 برس۔ سرحدوں پر روم اور ایران سے جنگیں چلتی رہیں۔

35-40/655-660
شہادت عثمان اور حضرت علی رضی اللہ عنہما کا دور۔۔۔ اس میں بھی محض تین جنگیں ہوئیں اور ان کے درمیان امن رہا۔

41-60/660-680
مسلم دنیا میں امن کا وقفہ ۔۔۔  20 برس۔ سرحدوں پر اہل روم اور خراسان سے جنگ چلتی رہی۔

61-64/680-684
سیاسی بے چینی کا دور ۔۔۔ تین سال۔ اس میں بھی سوائے تین سانحوں کے بالعموم امن قائم رہا۔

64-67/684-687
خانہ جنگی کا دور

67-70/687-690
چھوٹی موٹی بغاوتوں  کے علاوہ عمومی امن کا وقفہ ۔۔۔ چار سال

71-73/690-692
خانہ جنگی کا دور ۔۔۔ دو سال

73-132/692-750
چھوٹی موٹی بغاوتوں کے علاوہ بحیثیت مجموعی امن کا دور ۔۔۔ 58 سال

ان تمام ادوار کو دیکھا جائے تو مسلم دنیا کی حد تک سوائےدس بارہ سالوں کے تقریباً سو برس کی بقیہ پوری تاریخ امن کے ادوار پر مشتمل ہے۔ صحیح معنوں میں سن61-67اور 71-73کو خانہ جنگی کا دور کہا جا سکتا ہے۔

  حضرت ابوبکر رضی اللہ عنہ کے دور میں بھی ایسا نہیں ہوا کہ تمام ہی قبائل نے بغاوت کر دی ہو۔ پورے عرب کے صرف چند قبائل نے بغاوت کی جسے متحد مسلمانوں نے چند ہی ماہ میں ختم کر دیا۔ حضرت علی رضی اللہ عنہ کے دور کو خانہ جنگی کا دور اس وجہ سے نہیں کہا جا سکتا ہے کہ اس کے پیچھے ایک باغی تحریک موجود تھی اور جو بھی جنگیں ہوئیں، ان میں یہی باغی تحریک شامل تھی۔  اس  طرح سے اندرونی انتشار کا دور صرف آٹھ دس سالوں پر محیط ہے۔ 
امن کا زمانہ تقریباً سو برس  پر محیط ہے جس میں ہر قسم کی معاشی، معاشرتی، دعوتی، تعلیمی، اخلاقی  اور ثقافتی ترقی ہمیں نظر آتی ہے۔
  جنگ کا تناسب محض 25% جبکہ امن کا تناسب 75% ہے۔  
یہ 25% بھی محض سالوں کا تناسب ہے۔ ان سالوں کے اندر بھی یہ کیفیت نہیں رہی ہو گی کہ ہر مہینے اور ہر دن جنگ ہو رہی ہو گی بلکہ محض چند ماہ ایسے ہوں گے جن میں جنگ ہوئی ہو گی۔ اخباری اور مورخین کے نزدیک چونکہ امن کے ان طویل وقفوں کی کوئی نیوز ویلیو نہیں ہوتی ہے، اس وجہ سے وہ انہیں ایسے نظر انداز کرتے ہیں جیسے ان میں کچھ ہوا ہی نہیں۔ اس کے برعکس وہ جنگ کی استثنائی صورت پر بہت زیادہ فوکس کر دیتے ہیں جس کی وجہ سے ایسا محسوس ہوتا ہے کہ گویا اس دور میں جنگ ایک نارمل کیفیت تھی اور امن کے وقفے محض استثنائی تھے۔
جہاں تک بیرونی خطرات کا تعلق ہے تو رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے زمانے میں کفار مکہ اور یہود سے جو جنگیں ہوئیں، ان کی وجہ یہ تھی کہ ان لوگوں نے اسلام کی دعوت کو مٹانے کے لیے اس پر حملوں کا آغاز کیا۔ اس کے بعد روم اور ایران کی سپر پاورز سے جنگوں کا آغاز بھی اسی وجہ سے ہوا کہ یہ قوتیں اپنے قریب ایک تیسری سیاسی طاقت کو برداشت نہ کر رہی تھیں۔  اس دور میں ابھی اقوام متحدہ وجود میں نہ آئی تھی اور ہر ریاست خود کو دوسری کے ساتھ جنگ پر مجبور پاتی تھی۔ اگر ایک ریاست دوسری پر حملہ نہ کرتی تو دوسری پہلی پر حملہ کر دیتی۔ یہ کیفیت 1945 تک رہی ہے جب اقوام عالم نے دوسری جنگ عظیم کے بعد ایک معاہدہ کیا کہ کوئی ریاست دوسری پر حملہ نہ کرے گی اور جارحیت کی صورت میں مسئلے کا حل اقوام متحدہ کے ادارے کے ذریعے تلاش کیا جائے گا۔ اس معاہدے کے باوجود بھی ہم دیکھتے ہیں کہ کچھ نہ کچھ جنگیں اب بھی چلتی  رہتی ہیں۔

*خلافت ملوکیت میں کیسے تبدیل ہوئی؟*

یہ حقیقت ہے کہ عبد الملک بن مروان سے صحیح معنوں میں بادشاہت کا آغاز ہوا۔ عبدالملک کے بعد ان کے چار بیٹے ولید، سلیمان، یزید اور ہشام خلیفہ یکے بعد دیگرے بنے۔  صرف درمیان میں دو سال کے لیے ان کے بھتیجے عمر بن عبدالعزیز بن مروان رحمہ اللہ کو خلافت ملی اور انہوں نے خلافت راشدہ کی یاد تازہ کر دی۔ بنو امیہ کے بعد یہ بادشاہت بنو عباس اور پھر عثمانی ترکوں کے ہاتھ میں رہی اور یہ ملوکیت ہی تھی۔ یہاں پر تاریخ کے ایک طالب علم کے ذہن میں سوال پیدا ہوتا ہے کہ سن 1ھ/ع622 میں قائم ہونے والی وہ حکومت الہیہ،  جس کے بانی رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم تھے، کیا یہ حکومت الہیہ اتنی کمزور تھی کہ محض 73 برس میں اس کا خاتمہ ہو گیا اور یہ ملوکیت میں تبدیل ہو گئی؟  پھر ان 73 برس میں بھی کم از کم یزید کا چار سالہ دور سانحات سے پر ہے۔ اس کا مطلب تو یہ ہے کہ اسلام، کم از کم سیاسی میدان میں بالکل ہی ناکام رہا۔

یہ سوال اصل میں اس وجہ سے پیدا ہوتا ہے کہ ہمارے ہاں لوگ اس ملوکیت کو آج کل کے زمانے کی فوجی آمریتوں پر قیاس کر لیتے ہیں جو عالم اسلام میں جا بجا مسلط ہیں۔ اس وجہ سے لازم ہے کہ قدیم دورکی ملوکیت  کا موازنہ ہم اپنے دور کی آمریتوں سے کر لیں تاکہ دونوں کا فرق واضح ہو سکے۔ حقیقت یہ ہے کہ اس ملوکیت کی تیرہ سو سالہ تاریخ میں اچھے اور برے ہر طرح کے بادشاہ گزرے ہیں تاہم مجموعی غلبہ خیر ہی کا رہا ہے۔

آئیے ایک جدول میں  ان تین ادوار کا موازنہ کرتے ہیں

1_خلافت راشدہ کا دور
2_اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کا دور،
3_جدید آمریتوں کا دور،

1۔ مملکت کا قانون
خلافت راشدہ کے دور میں قرآن و سنت قانون کی بنیاد تھا،

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں قرآن و سنت قانون کی بنیاد تھا،

جدید آمریتوں کے دور میں حکمران طبقے کی منشاء قانون کی بنیاد ہے،

2۔  حکمران کا انتخاب
خلافت راشدہ کے دور میں مسلمانوں کے حکمران باہمی مشورہ سے بنے،

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں حکمران موروثی اقتدار یا فوجی طاقت کے زور پر بنے

جدید آمریت کے دور میں موروثی اقتدار یا فوجی طاقت سے ہی حکمران بنتے ہیں،

3۔ علماء و صلحاء کا حکومت میں کردار

خلافت راشدہ میں علماء حکومت میں شریک تھے

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں علماء کافی حد تک شریک حکومت تھے اور اصلاح کرتے رہے

جدید آمریتوں کی حکومت میں علماء کم ہی شریک ہوئے

4۔ بیت المال پر حکمران کا ذاتی کنٹرول

خلافت راشدہ میں حکمران کا بیت المال پر کوئی کنٹرول نہیں بلکہ خلیفہ سے مکمل حساب لیا جاتا تھا

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں حکمرانوں کا بیت المال پر  ایک حد تک کنٹرول تھق مگر زیادہ فنڈ عوام کی فلاح پر خرچ ہوتے تھے

جدید آمریتوں کیلے دور میں حکمرانوں کا بیت المال پر مکمل کنٹرول ،

5۔ حکمرانوں کی اخلاقی حالت

خلافت راشدہ میں تمام حکمران  آئیڈیل تھے

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں زیادہ تر اچھے اور کبھی برے حکمران

جدید آمریتوں کے دور میں زیادہ تر برے حکمران

6۔ حکمرانوں کا ظلم و ستم

خلافت راشدہ میں بالکل نہیں

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں  زیادہ تر صرف اپنے سیاسی مخالفین کے لیے

جدید آمریتوں کے دور میں زیادہ تر صرف اپنے سیاسی مخالفین کے لیے

7۔ قانون سازی کی ذمہ داری

خلافت راشدہ  کے دور میں قرآن و سنت کی بنیاد پر اہل شوری کا اجتماعی اجتہاد

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں قرآن و سنت کی بنیاد پر اہل علم کا اجتماعی اجتہاد

جدید آمریتوں کے دور میں حکمران کی ذات یا اس کی ربڑ اسٹیمپ پارلیمنٹ

8۔ عوام کی فلاح و بہبود

خلافت راشدہ کے دور میں تمام تر فنڈز عوام کی فلاح اور قومی ضروریات پر خرچ ہوتا تھا

اموی، عباسی اور عثمانی سلاطین کے دور میں فنڈز کا اکثر حصہ عوام کی فلاح اور قومی ضروریات پر خرچ ہوتا تھا جبکہ کچھ حصہ حکمران طبقہ استعمال کرتا تھا

جدید آمریتوں کے دور میں فنڈز کا اکثر حصہ حکمران طبقے کی ذات پر خرچ ہوتا ہے جبکہ کچھ حصہ قومی ضروریات کے لیے باقی بچتا ہے

اس جدول کو دیکھیے تو معلوم ہوتا ہے کہ ملوکیت کے اس دور میں ایسا نہیں تھا کہ آوے کا آوا ہی بگڑ گیا ہو اور پوری کی پوری امت مسلمہ گمراہی کا شکار ہو گئی ہو۔ اس کے برعکس ہمیں نظر آتا ہے کہ حکمران طبقے میں کچھ خرابیاں تو پیدا ہوئیں مگر بڑی حد تک یہ امت صراط مستقیم پر قائم رہی۔ یہ درست ہے کہ مسلمانوں میں موروثی بادشاہت قائم ہو گئی جس کے نتیجے میں آپس میں خانہ جنگیاں اور اقتدار کی کشمکش ہوتی رہی تاہم مملکت کا قانون قرآن و سنت ہی رہا۔ مسلمانوں کی ان تمام مملکتوں میں عوام کی فلاح و بہبود کو بنیادی حیثیت حاصل رہی اور برے حکمرانوں کے دور میں بھی عام آدمی کو اس کا حق ملتا رہا۔اس کے برعکس غیر مسلم دنیا میں بالعموم یہ کیفیت نہ تھی اور یہی وجہ ہے کہ بہت سے غیر مسلم اپنے اپنے ملکوں کو چھوڑ کر مسلم علاقوں میں آ کر آباد ہوتے تھے اور یہاں کے فوائد سے اسی طرح انجوائے  کرتے تھے جیسے اب مسلمان مغربی دنیا میں جا کر  کرتے ہیں۔ 

 اگر پوری مسلم تاریخ کا جائزہ لیا جائے تو ہمیں تین طرح کے حکمران نظر آتے ہیں:

·نہایت ہی اعلی کردار کے حکمران۔
ان میں مثلاً عمر بن عبد العزیز، متوکل علی اللہ عباسی اور  صلاح الدین ایوبی  رحمہم اللہ نمایاں ہیں۔  ان کی تعداد نسبتاً کم ہے۔

·نہایت ہی برے کردار  کے حکمران۔
ان کی تعداد بھی بہت کم ہے۔

· درمیانی قسم کے حکمران جن میں اچھائیاں اور برائیاں پائی جاتی تھیں۔ زیادہ تر سلاطین اسی نوعیت کے ہیں۔

دنیا کی دیگر اقوام کی تاریخ سے اگر ہم اپنی تاریخ کا موازنہ کریں تو معلوم ہوتا ہے کہ مسلم تاریخ میں اگرچہ برائیاں موجود رہی ہیں تاہم خیر کا عنصر زیادہ غالب ہے۔ اس وجہ سے اس تاریخ پر ہمیں شرمندہ ہونے کی ضرورت نہیں ہے۔ 

*بنو امیہ کا بقیہ دور کیسا تھا؟*

بنو امیہ کا بقیہ دور ملا جلا ہے۔ اس میں اچھے اور برے دونوں طرح کے حکمران گزرے ہیں۔ زیادہ تر حکمران وہ ہیں جو حکومت کی اہلیت رکھتے تھے تاہم ان میں کچھ خرابیاں بھی موجود تھیں۔ ولید بن عبدالملک بن مروان کا زمانہ فتوحات کا زمانہ ہے۔ اس میں سندھ، اسپین اور وسطی ایشیا کے علاقے فتح ہوئے۔ سلیمان بن عبد الملک کے زمانے میں کچھ کمزوریاں موجود ہیں۔ اس کے بعد حضرت عمر بن عبد العزیز بن مروان رحمہ اللہ کا مختصر دور ہے  جس میں انہوں نے خلافت راشدہ کی یاد تازہ کر دی۔ ان کے بعد یزید اور ہشام بن عبد الملک کے ادوار ہیں جن میں اچھی بری دونوں خصوصیات پائی جاتی ہیں۔  ان کے ادوار میں حکومتی سطح پر کچھ خرابیاں پیدا ہو گئی تھیں  تاہم ایسا نہیں تھا کہ آوے کا آوا ہی بگڑ گیا ہو۔ ہشام کے بعد بنو عباس کی تحریک اٹھی جس نے بنو امیہ کے اقتدار کا خاتمہ کر دیا۔ عباسی خلفاء بھی امویوں کی طرح ہی تھے۔ ان میں بھی اچھے برے ہر طرح کے ادوار گزرے ہیں۔ ایک طرف ہمیں ہادی، ہارون الرشید اور متوکل جیسے دیندار خلفاء نظر آتے ہیں اور دوسری طرف برے حکمران بھی انہی کا حصہ  ہیں۔

*بعد میں باغی تحریک پر کیا گزری؟*

حضرت عثمان رضی اللہ عنہ کے زمانے میں جو باغی تحریک اٹھی تھی اور زیر زمین موجود رہی تھی، اس کے بارے میں ہم جانتے ہیں کہ اس کے دو حصے ہو گئے تھے: ایک حصہ خوارج تھے اور دوسرے عراق کے باغی۔ حضرت عبداللہ بن زبیر رضی اللہ عنہما نے اس تحریک کی ان دونوں شاخوں کو اچھی طرح کچل دیا تھا۔ اس کے بعد عبدالملک بن مروان کے زمانے میں خوارج نے پھر سر اٹھایا لیکن اموی گورنر مہلب بن ابی صفرہ نے ان کی قوت کو ایک بار پھر توڑ کر رکھ  دیا۔ اس کے بعد بھی انہوں نے  پھر  کئی مرتبہ سر اٹھانے کی کوشش کی لیکن مسلسل بغاوتوں کے نتیجے میں یہ کمزور ہو کر ختم ہو گئے۔ 
ابن زبیر رضی اللہ عنہما کے زمانے میں خوارج مختلف گروہوں میں تقسیم ہو گئے جن میں ازارقہ، صفاریہ اور اباضیہ کو شہرت ملی۔ ان کے یہ نام اپنے اپنے لیڈروں کے ناموں پر تھے۔ ان میں سے اباضیہ نسبتاً اعتدال پسند تھے۔ یہ  عام مسلمانوں کو کافر قرار نہیں دیتے تھے  اور نہ ہی بغاوت کو فرض سمجھتے تھے۔ اس کے برعکس خوارج کی دیگر پارٹیوں کا موقف یہ  تھا کہ ان کے علاوہ تمام مسلمان کافر ہیں اور ظالم حکمران کے خلاف بغاوت فرض ہے۔ یہ تمام گروہ پہلی اور دوسری صدی ہجری میں بار بار ’’خود کش بغاوتیں‘‘ کرتے رہے اور اس کے نتیجے میں مکمل طور پر ختم ہو گئے۔

اباضیہ اپنے اعتدال پسند موقف کے باعث باقی رہے اور اب تک موجود ہیں۔

  دوسری صدی کے نصف آخر میں انہیں شمالی افریقہ میں اقتدار بھی مل گیا جو کہ آل رستم (160-296/776-909) کی حکومت کہلاتی ہے۔ اس کے بعد اگرچہ انہیں زوال آیا لیکن اب بھی یہ لیبیا اور الجیریا میں اقلیت اور عمان میں اکثریت میں موجود ہیں۔

باغی پارٹی کے کوفی گروپ کے بارے میں ہم پڑھ چکے ہیں کہ اس کی بھی دو شاخیں ہو گئی تھیں۔ سلیمان بن صرد کی قیادت میں ایک شاخ نے "توابین" کے نام سے بغاوت کی جس میں ان کے اکثر لوگ مارے گئے۔ اس کے بعد یہ مختار ثقفی کی قیادت میں اکٹھے ہو گئے اور پھر ابن زبیر رضی اللہ عنہما کی افواج نے ان کا قلع قمع کر دیا۔ اس کے بعد یہ نہایت سکون سے رہے تاہم انہوں نے اپنی کاوشوں کا رخ پراپیگنڈا کی طرف موڑ دیا۔ انہوں نے جنگ صفین ، سانحہ کربلا اور دیگر واقعات سے متعلق تاریخی روایات وضع کر کے مسلمانوں میں پھیلانا  شروع کر دیں تاکہ عام مسلمانوں کو باغی تحریک کا حصہ بنایا جا سکے۔ انہیں بہت زیادہ کامیابی حاصل نہ ہوئی اور مین اسٹریم مسلمان حکومت وقت کے ساتھ وابستہ رہے۔  چونکہ یہ لوگ حضرت علی اور حسین رضی اللہ عنہما کا نام استعمال کرتے تھے، اس وجہ سے بعض لوگ ان سے متاثر ہو جاتے تھے۔ تاہم حضرت علی رضی اللہ عنہ کے خاندان کی قیادت اب حضرت زین العابدین رحمہ اللہ کے پاس تھی جنہوں نے پانچ یا چھ خلفاء کا زمانہ پایا مگر کبھی علم بغاوت بلند نہ کیا بلکہ 95/714 میں اپنی وفات تک امت کی تعلیم و تربیت میں مشغول رہے۔

دوسری صدی ہجری کے دوسرے عشرے میں باغی تحریک کچھ تقویت اس وقت ملی جب حضرت زین العابدین کے بیٹے زید رحمہما  اللہ کو انہوں نے بغاوت پر آمادہ کر لیا لیکن عین موقع پر انہیں دھوکہ دے کر ان سے الگ ہو گئے۔ یہ بالکل وہی معاملہ تھا جو اس سے پہلے وہ حضرت زید کے پڑدادا، حضرت علی اور دادا حضرت حسین رضی اللہ عنہما کے ساتھ کر چکے تھے۔

طبری نے122/740 کے باب ہشام کلبی اور ابو مخنف کے حوالے سے اس واقعے کو کچھ یوں بیان کیا ہے:
ذكر هشام عن أبي مخنف: 
جب زید کے ان طرف داروں کو، جنہوں نے ان کے ہاتھ پر بیعت کی تھی، معلوم ہوا کہ زید کے ارادہ کا علم یوسف بن عمر (اس زمانے کے گورنر عراق) کو ہو گیا ہے اور اس نے زید کے پاس اپنے جاسوس لگا دیے ہیں اور وہ ان کے حال کی تفتیش کررہا ہے تو ان کے لیڈروں کی ایک جماعت زید کے پاس آئی اور ان سے پوچھا: "ابوبکر اور عمر رضی اللہ عنہما کے بارے میں آپ کی رائے کیا ہے؟"
زید نے جواب دیا: "اللہ ان پر اپنا رحم کرے اور ان کی مغفرت فرمائے۔ میں نے اپنے کسی خاندان والے  کو ان سے برأت کا اعلان کرتے نہیں سنا ہے اور نہ ہی کوئی شخص ان کے متعلق کبھی برے الفاظ استعمال کرتا ہے۔"
ان لوگوں نے کہا: "آپ اہل بیت کے خون کا بدلہ لینے کے لیے اسی لیے اٹھے ہیں کہ یہ دونوں (ابوبکر و عمر) آپ کی حکومت کے درمیان میں  حائل ہو گئے تھے اور اسے آپ لوگوں (اہل بیت) کے ہاتھوں سے نکال دیا۔"
زید نے کہا: "اس معاملے میں سخت سے سخت بات جو میں کہہ سکتا ہوں، وہ صرف یہ ہے کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کے بعد خلافت کے زیادہ مستحق  ہم تھے مگر قوم (مسلمانوں) نے دوسروں کو ہم پر ترجیح دی اور ہمیں اس سے ہٹا دیا۔ مگر اس بنیاد پر وہ ہمارے نزدیک کفر کے درجہ تک نہیں پہنچے۔ یہ دونوں حضرات امیر المومنین ہوئے تو انہوں نے لوگوں میں انصاف کیا ، کتاب اللہ اور سنت رسول اللہ پر عمل پیرا رہے۔"
ان لوگوں نے کہا: "جب ان دونوں حضرات نے آپ کے ساتھ کوئی ظلم نہیں کیا تو پھر ان لوگوں (بنو امیہ) نے بھی نہیں کیا۔ پھر آپ ہمیں کیوں ان لوگوں سے لڑنے کا کہہ رہے ہیں جنہوں نے آپ پر ظلم نہیں کیا۔"
زید نے کہا: "یہ بات نہیں ہے۔ یہ لوگ ان جیسے نہیں ہیں ۔ یہ نہ صرف مجھ پر بلکہ آپ لوگوں بلکہ خود اپنے آپ پر بھی ظلم کرتے ہیں۔ میں آپ کو کتاب اللہ اور سنت رسول کی طرف بلاتا ہوں تاکہ احیاء سنت ہو اور بدعات مٹائی جائیں۔ اگر آپ لوگ میری دعوت کو قبول کر لیں تو خود آپ کو اس کا فائدہ پہنچے گا اور اگر انکار کر دیں تو میں آپ پر حکمران تو ہوں نہیں کہ آپ میری بات لازم طور پر مان لیں۔"
یہ سن کر یہ لوگ انہیں چھوڑ کر چلے آئے اور اپنی بیعت توڑ دی۔ کہنے لگے: "یہ امام سے بھی آگے بڑھ گئے ہیں۔" یہ لوگ اس بات کے مدعی تھے کہ زید کے بھائی محمد بن علی (الباقر) اصل میں امام تھے۔ ان کے بیٹے جعفر بن محمد (الصادق) ابھی زندہ تھے۔ ان لوگوں نے کہا: "جعفر اپنے والد کے بعد ہمارے امام ہیں اور وہی امامت کے مستحق ہیں۔ ہم زید بن علی کا ساتھ نہیں دیتے ہیں کیونکہ وہ امام نہیں ہیں۔" اس بنا  پر زید نے ان کا نام رافضہ (انکار کرنے والے) رکھا مگر اب (طبری کے زمانے میں) یہ لوگ مدعی ہیں کہ جب ہم نے مغیرہ کا ساتھ چھوڑا تو انہوں نے ہمارا یہ نام رکھا۔
(طبری 5/231)

اس کے بعد زید بن علی رحمہما اللہ نے بغاوت کر دی۔ ان کے ہاتھ پر ہزاروں لوگوں نے بیعت کی تھی لیکن محض 218 آدمی اکٹھے ہوئے اور اس جھڑپ میں زید شہید ہو گئے۔اس روایت سے یہ معلوم ہوتا ہے کہ یہ حضرات حضرت زین العابدین رحمہ اللہ کی اولاد کے بزرگوں کو امام قرار دے کر ان کے نام سے اپنی تحریک چلا رہے تھے۔

اس کے بعد  حضرت عبداللہ بن عباس رضی اللہ عنہما کی اولاد کے کچھ لوگوں نے بنو امیہ کے خلاف تحریک اٹھائی۔ اس تحریک میں اس باغی  تحریک نے بنو عباس کا ساتھ دیا اور یہ کامیاب رہی۔ بنو امیہ کا تختہ الٹ کر بنو عباس کی حکومت قائم ہوئی تو انہوں نے اس باغی تحریک کے لیڈروں کو حکومت میں شریک نہ کیا۔ اس پر یہ بہت تلملائے اور انہوں نے تاریخی روایتوں میں بنو عباس کے خلاف بھی جی کھول کر پراپیگنڈا کیا۔ یہ مشہور کر دیا کہ بنو عباس اتنے سفاک تھے  کہ انہوں نے بنو امیہ کے باقی ماندہ لوگوں کو کھانے کے لیے بلایا اور پھر انہیں قتل کروا کر ان کی تڑپتی ہوئی لاشوں پر دستر خوان بچھا کر اس پر کھانا تناول کیا۔  یہ روایت نہ تو طبری میں موجو دہے اور نہ کسی اور معتبر کتاب میں۔ اگر اس روایت میں ذرا سی بھی حقیقت ہوتی تو بنو امیہ کے زمانے میں اسپین میں لکھی جانے والی کتابوں میں اس واقعے کو بہت بڑھا چڑھا کر پیش کیا جاتا لیکن دلچسپ امر یہ ہے کہ بنو امیہ نے تو خود پر ہونے والے اس ظلم کا کوئی ذکر نہیں کیا ہے۔ بہرحال باغی تحریک کو بنو عباس کے دور عروج میں بھی کوئی کامیابی نصیب نہ ہوئی اور جس اقتدار کے لیے وہ کھڑے ہوئے تھے، وہ انہیں کم از کم تین سو برس تک نصیب نہ ہوا۔

*ناصبی کن لوگوں کو کہا جاتا ہے؟*

یہ کہا جاتا ہے کہ پہلی صدی میں ایک اور فرقہ بھی پیدا ہوا جنہیں ’’نواصب‘‘ کہا جاتا ہے۔ یہ لوگ خود کو ’’شیعان عثمان‘‘ یا ’’العثمانیون‘‘ کہا کرتے تھے اور بنو امیہ کے شدید حمایتی تھے۔  مشہور ادیب جاحظ (150-255/767-869)نے ان پر ایک کتاب’’العثمانیہ‘‘ کے نام سے لکھی ہے۔ ابن عساکر اور ابن کثیر نے بھی ان کا ذکر کیا ہے۔  اپنی ابتدا میں ان کا موقف صرف یہ تھا کہ حضرت عثمان رضی اللہ عنہ کی شہادت کا قصاص لیا جائے اور باغی تحریک کے سرغنوں کو کڑی سزا دی جائے۔ یہ لوگ حضرت علی رضی اللہ عنہ کا احترام کرتے تھے۔

ابن عساکر لکھتے ہیں:
یزید بن ہارون سے کہا گیا: ’’آپ حضرت عثمان کے فضائل تو بیان کرتے ہیں لیکن حضرت علی کے فضائل کیوں بیان نہیں کرتے؟‘‘ انہوں نے جواب دیا: ’’حضرت عثمان کے ساتھی تو حضرت علی کے بارے میں کوئی منفی بات نہیں کرتے لیکن جو لوگ خود کو اصحاب علی کہتے ہیں، وہ حضرت عثمان کے خلاف زبان درازی کرتے ہیں۔ 
(ابن عساکر،39/503)

بعد کے دورمیں ایسا لگتا ہے کہ یہ گروہ حضرت علی ، حسن اور حسین رضی اللہ عنہم کے خلاف زبان درازی کرنے لگا۔  بعض لوگوں کا خیال ہے کہ مروان بن حکم کی اولاد میں سے جو لوگ خلفاء ہوئے، انہوں نے جمعہ کے خطبوں میں حضرت علی کے خلاف سب و شتم کا آغاز کیا اور اس رسم بد کو حضرت عمر بن عبدالعزیز رحمہ اللہ نے ختم کیا۔ لیکن ہم یہ بیان کر چکے ہیں کہ ایسا کرنا، خود اپنے پاؤں پر کلہاڑی مارنا تھا۔ حضرت زین العابدین رحمہ اللہ کے سبھی خلفاء کے ساتھ بڑے اچھے تعلقات رہے کیونکہ انہوں نے واقعہ حرہ کے موقع پر مروان کے پورے خاندان کو بچایا تھا۔ کیا اس بات کا تصور کیا جا سکتا ہے کہ آپ اپنے والد اور دادا کو گالیاں دینے والوں  کے ساتھ اچھے تعلقات رکھیں گے؟ یہ بات البتہ ممکن ہے کہ بنو امیہ کے بعض حاشیہ برداروں ، خوشامد پسندوں اور شاہ سے بڑھ کر شاہ کے وفاداروں نے ایسی حرکت کی ہو۔ ہم نے بہت کوشش کی کہ ناصبی فرقہ کی تاریخ سے متعلق کچھ تفصیلات مل جائیں لیکن یہ نہیں مل سکی ہیں۔ 

 شہرستانی  (d. 578/1182)، جنہوں نے اپنے زمانے کے فرقوں کے تعارف اور تاریخ پر ایک عظیم کتاب ’’الملل والنهل‘‘ لکھی تھی، نے بھی اس کتاب میں ناصبیوں کا کوئی ذکر نہیں کیا ہے۔

اس سے معلوم ہوتا ہے کہ ناصبی کوئی منظم فرقہ نہیں رہا بلکہ یہ محض ایک رجحان تھا  جو بعض لوگوں میں جاری رہا۔ جب بنو عباس نے بنو امیہ کے اقتدار کا خاتمہ کیا تو ان کے  حامیوں کو بھی قتل کیا۔ اس میں ناصبی فرقہ بھی مٹ کر رہ گیا۔  بعد کی صدیوں میں ان میں ایسے لوگ پیدا ہوتے رہے تاہم یہ منظم نہیں ہو سکے۔ ابن کثیر نے اپنے زمانے (آٹھویں صدی ہجری) کے بعض لوگوں کا ذکر کیا  ہے جو سانحہ کربلا کی یاد میں دس محرم کو جشن منایا کرتے تھے۔ بہرحال امت میں ان لوگوں کو کبھی قبول عام حاصل نہیں ہوا اور انہیں نفرت کی نگاہ ہی سے دیکھا گیا ہے۔ اس وجہ سے یہ گروہ  کبھی کھل کر سامنے نہیں آ سکا ہے۔ زیادہ سے زیادہ یہ کہا جا سکتا ہے کہ یہ بعض لوگوں کا انفرادی رجحان ہے۔ موجودہ دور میں بھی بعض ایسے لوگ پائے جاتے ہیں مگر ان کی تعداد نہ ہونے کے برابر ہے۔
اہل تشیع کے نزدیک ’’ناصبیت‘‘ کی تعریف کچھ مختلف ہے۔ اگر مثلاً انٹرنیٹ پر ناصبی، نواصب، ناصبیت  قسم کے الفاظ عربی اور اردو میں سرچ کیے جائیں تو یہ واضح ہوتا ہے کہ ان کے نزدیک تمام اہل سنت ناصبی ہیں۔  ہر وہ شخص جو حضرت عثمان اور معاویہ رضی اللہ عنہما سے عقیدت رکھتا ہو، ان کے نزدیک ناصبی میں شمار ہوتا ہے۔ ممکن ہے کہ اہل تشیع کے معتدل لوگوں کا موقف اس سلسلے میں مختلف ہو تاہم ان کے متشدد لوگوں کا موقف یہی معلوم ہوتا ہے۔

((آج کے آخری تاریخی سلسلہ کا خلاصہ))

·  امت مسلمہ کی پہلی صدی کا زیادہ حصہ جنگوں میں نہیں، بلکہ حالت امن میں گزرا ہے۔یہ محض اخباریوں کا رجحان ہے کہ وہ جنگ کی خبروں کو زیادہ اہمیت دیتے ہیں۔

· خلافت اگرچہ ملوکیت میں تبدیل ہو گئی تاہم یہ ملوکیت، مطلق آمریت (Absolute Dictatorship) نہیں تھی۔ بنو امیہ، بنو عباس اور بنو عثمان کے اکثر حکمرانوں نے اپنے اپنے زمانوں میں بڑی حد تک خلافت راشدہ  کے کردار کو زندہ رکھا۔

·باغی تحریک کا خارجی گروپ جلد ہی ختم ہو گیا تاہم دوسرا گروپ باقی رہا اور بغاوتیں برپا کرتا رہا۔  اس مقصد کے لیے انہوں نے حضرت علی رضی اللہ عنہ کے خاندان کے نام کو دل کھول کر استعمال کیا۔

·ناصبی فرقہ، ایک رجحان کا نام ہے جو بعض لوگوں نے حضرت علی رضی اللہ عنہ کے بغض میں اختیار کر لیا تھا۔

_________&__$________

*صحابہ کرام رضوان اللہ علیہم اجمعین کی تاریخ پر اٹھائے جانے والے تمام اعتراضات کا جواب  ہم نے تسلی بخش دے دیا ہے الحمدللہ اسکے ساتھ ہی ہمارا یہ جمعہ کے دن کا تاریخی سلسلہ اختتام کو پہنچتا ہے،*

جلد ہی اس تاریخی سلسلے کو ہم ایک پی ڈی ایف کتاب کی شکل میں دوستوں ساتھ شئیر کریں گے،

نوٹ_
(واضح رہے ہمارے ان تاریخی سلسلوں کا زیادہ تر کریڈٹ استاد محترم مبشر نذیر صاحب کو جاتا ہے، اللہ پاک انکو سلامت رکھیں، آباد رکھیں، آمین ثم آمین )

 (واللہ تعالیٰ اعلم باالصواب )

اپنے موبائل پر خالص قران و حدیث کی روشنی میں مسائل حاصل کرنے کے لیے "ADD" لکھ کر نیچے دیئے گئے نمبر پر سینڈ کر دیں،
آپ اپنے سوالات نیچے دیئے گئے نمبر پر واٹس ایپ کر سکتے ہیں جنکا جواب آپ کو صرف قرآن و حدیث کی روشنی میں دیا جائیگا,
ان شاءاللہ۔۔!!
سلسلہ کے باقی سوال جواب پڑھنے کے لئے ہماری آفیشل ویب سائٹ وزٹ کریں یا ہمارا فیسبک پیج دیکھیں::

یا سلسلہ نمبر بتا کر ہم سے طلب کریں۔۔!!

*الفرقان اسلامک میسج سروس*
                      +923036501765

آفیشل ویب سائٹ
http://alfurqan.info/

آفیشل فیسبک پیج//
https://www.facebook.com/Alfurqan.sms.service2

Share:

Palestine: Allah Gaib se madad kyo nahi kar raha hai, Palestine par Yahud o nasara ka ittehad Musalamano ke Khilaf.

Yahud o Nasara ka ittehad Musalmano ke Khilaf. 

आज यहूद व नसारा मुसलमानो के खिलाफ एक है लेकिन मुसलमान हुकमराँ फिरंगियों के जूते चाटने मे लगे है। 

आज मुस्लिम हकमराँ फिलिस्तीन के मामले पर इतने बेबस कैसे हो गए? 

ऐ ईमान वालो तुम यहूदियों और नासराणियो को यार व मददगार न बनाओ, ये दोनो खुद ही एकदूसरे के यार ओ मदद गार है। और तुम मे से जो शख्स उनकी दोस्ती का दम भरेगा तो फिर वह उन्ही मे से होगा। यकिनन अल्लाह जालिम लोगो को हिदायत नही देता।

जब मुसलमानो ने कुरान व हदीस को भुला दिया तो  गैब् की मदद कैसे आयेगी? 

गैब् से मदद कब आयेगी?

नजाएज़ इस्राएल कैसे वज़ूद मे आया और मुस्लिम हूकमरा क्या कर रहे थे? 

फिलिस्तीन मे अरब कब से आबाद है? मस्ज़िद। ए अक्सा की तारीख। 

आज इस्राएल के लिए यहूद ओ नसारा मुसलमानो के खिलाफ एक है? 

अरबो के खज़ाने की चाबी फिरंगियों के पास है? 

गैबी मदद न स्पेन के वक़्त आई, न सलतनत ए उस्मानिया को बचाने आई, न इस्राएल के क़याम के वक्त रोकने आई, न बाबरी मस्ज़िद के वक्त आई, न इराक व शाम के वक़्त आयी, न म्यांमार के रोहिंगिया मुसलमानो के लिए आई, न गुजरात मे मुसलमानों के क़त्ल ए आम के वक्त आई।

मुहल्ले के मौलाना, इमाम को मजलुम मुसलमानो के लिए दुआ करने को कहा जाए तो सबसे पहले  वह तैयार नही होते हाथ उठाकर दुआ करने के लिए।

आज फिलिस्तीन मे क्या हो रहा है यह किसी को बताने की जरूरत नही लेकिन जुमे के दिन इमाम को कह दिया जाए गजा के लोगो के लिए दुआ करने को तो लगता है इन कठमुल्लो पर पहाड़ टूट पड़ा। इनको पता नही है के फिलिस्तीन मे क्या हो रहा है, क्या करना चाहिए वहां के लोगो के लिए, फिलिस्तीन मुसलमानो के लिए क्या अहमियत रखता है, मुसलमानो का क़ीबला ए अव्वल कहाँ है, मस्ज़िद ए अक्सा से मुसलमानो का क्या ताल्लुक है, मस्ज़िद ए अक्सा की अहमियत क्या है? वगैरह

क्या ये सब इन मुहल्ले के कठमुल्लो को मालूम नही है?
क्या फिलिस्तीन और इस्राएल (1948) का तारीख पता नही है?

सारी दुनिया मे आज फिलिस्तिनियो के लिए लोग सड़को पर उतरे है, लंदन मे ब्रिटिश PM के दफ्तर के सामने नमाज़े पढ़ी जा रही है, यूरोप मे लाखो की तादाद मे सब सड़को पर मुज़ाहिरा कर रहे है हुकूमत के खिलाफ लेकिन हिंदुस्तान के कठमुल्लो से दुआ करने की गुजारिश की  जा रही है तो इनके पसीने निकलना शुरू हो जाता है।

सारी दुनिया के हुकमराँ दहशत गर्द इस्राएल के साथ है और अवाम फिलिस्तीन के साथ।
क्या यहाँ के आलिमो, उलेमाओ, मौलवियो को पता नही फिलिस्तीन के बारे मे?
इनको खुतबा मे मस्ज़िद ए अक्सा पर बोलने से किसने रोका है?
मगर ये तो अपने मुहल्ले के इमाम है न तो दुनिया मे और जगह क्या हो रहा है उससे इनको क्या मतलब।
ये कठमुल्ले तो अपने मुहल्ले के मसाएल मे ही उलझे हुए है, लोगो की इसलाह इनसे कैसे होगी?

फिर भी मुसलमानों को मस्ज़िदों और घरों मे बैठ कर गैब् की मदद का इंतज़ार है।

गैबी मदद जंग ए बदर मे आई, जब 1000 के मुकाबले 313 मैदान ए जंग मे उतरे।
गैब् की मदद जंग ए खंदक मे आई अल्लाह के आखिरी नबी मुहम्मद सल्लाहु अलैहे वसल्लम पेट पर दो पत्थर बांधे खुद खंदक् खोदी और जंग मे उतरे।

घरों मे, चाय के होटलो मे, tv के सामने बैठ कर गैब् की मदद का इंतज़ार?
तागुत् के निजाम पर राज़ी, घरों मे फहाशि और फिर भी गैबी मदद का इंतज़ार?
अल्लाह के निज़ाम को नाफ़िज करने की जद्दोजेहद करने के बजाए नात् ख्वानी, कुरान ख्वानी, महफ़िल ए मिलाद, शराब् व जूए के अड्डे पर बैठ कर, गाने बजाने वाले या तस्बीह के दाने को दस बीस लाख मर्तबा घुमाकर गैबी मदद का इंतज़ार?

आफाकी दिन को चंद इबादत मे महसुर करके गैबी मदद का इंतज़ार?
मुसलमानों को दिन का दाई बनाने के बजाए मज़ारों पर सज़्ज़ादा नशी, तिकटोक का डांसर, रीलस मुज़रा करने वाला, tv के आगे फिल्म का हीरो बना देने के बाद गैबी मदद का इंतज़ार?
सबकुछ अल्लाह के जिम्मे लगाकर खुद अय्याशियो मे मसरूफ होकर दिन से किनारा कशी इख़्तियार करने पर गैबी मदद का इंतज़ार?
अपने हक के लिए खड़े होने से डरने वाले फरिश्तो की मदद का इंतज़ार?

ऐसी सूरत मे गैबी मदद नही सिर्फ अज़ाब ही आते है, हम गद्दार, बेईमान, नाकाबिल्, नालाएक, मुनाफ़िक़, फिरंगियों के निज़ाम पर फिरंगियों के इशारे पर काम करने वाला हुकमराँ, कुफ्फार् की अज़ारा दारी, इफ्लास, ज़ल्ज़ले, सैलाब, नजाएज़ मुनाफा खोरी, झूठ, वज़न मे कमी, मिलावट की शक्ल मे भुगत रहे है।

पहले अपने हक और दीन ए इस्लाम के लिए खड़े तो हो फिर देखे अल्लाह मदद करता है या नही.

Share:

Palestine: Arab Summit me Palestinian ke Liye laye Bill par Char Arab Mulko ne Vote nahi kiya.

Jaise Jaise Israel Palestinian par Bombari Speed kar raha hai waise waise Arab Condomention ki speed bhi badh rahi hai.

Aaj Tak OIC, Arab League jaise Orgnization ne Musalmano ki hifajat ke liye kya kiya hai?
Wah 4 Arab State jinhone Mir Zafar, Mir Sadiq ka Kirdar ada kiya hai?
अरबी सलेबी भाई भाई, यहूदि सऊदी भाई भाई
उस्मानिया समराज्य के खिलाफ अरबो ने कैसे गद्दारी की थी?
फिलिस्तीन और आज का मुसलमान, अरब हुकमराँ।

हमसब ने किताबो मे पढ़ा है, जब रोम जल रहा था तब उसके सहयोगियों ने बांसुरी बजाई थी।


आज आँखो से देखा।
फिलिस्तीन और ग़ज़ा के लोगो को खून मे नहलाया जा रहा था तब पड़ोसी सऊदी अरब मे मुजरे का मजा लिया जा रहा था, शकीरा के साथ ठुमके लगा रहे थे । इस्लाम अमल की बुनियाद पर किसी को नेक और बद कहता है नाकि नस्ल के बुनियाद पर। इस्लाम ने कुरान ओ सुन्नत पर चलने को कहा है नाकि अरबो की पैरवी और हिमायत करने का, जिससे कोई सच्चा मुसलमान हो जायेगा।

पढ़ता हूँ तो पूछती है यह खालिक की किताब

बे मिशल यहूदि, यह सऊदी भी अज़ाब, 

इस क़ौम के बारे मे क्या लिखू फराज़ 

काबे की कमाई से जो पीती है शराब्।

आज यह सच साबित होता नज़र आरहा है, बाकी अरब भक्त मुसलमान अरब हुक्मरानो के दरबारी शायर बने हुए है, की दरबारी इमाम स्क्रिप्टेड खुतबा दे रहा है, कोई उसकी तारीफ मे कसीदे पढ़ रहा है, कोई उसके नाच गाने और ठुमके लगाने को जाएज़ साबित करने मे लगा है, कोई तुर्किये से मुकाबला करके अरब को जस्टिफ़ाय कर रहा है वगैरह। 

अरब देशो का संगठन अरब लीग का बैठक सऊदी अरब के रियाद मे चल रहा है। इसके बाद सऊदी के दबदबा वाला संगठन OIC (Orgnization of Islamic Co Opration) का बैठक भी रियाद मे 11 नोवम्बर से होने वाला है। OIC को कुछ लोग orgnization ऑफ इस्राएल को ऑपरेशन भी कहते है। क्योंके यह सऊदी अरब के दबाओ वाला संगठन है जिसमे दुनिया भर के 57 मुस्लिम देश शामिल है। आजतक OIC ने मुसलमानो के लिए कुछ खास नही किया सिवाए निंदा के। OIC दुनिया भर के मुसलमानो पर हो रहे ज़ुल्म पर सिर्फ निंदा किया है, और उसके अहम देश सऊदी अरब और UAE ने उन देशो से गहरी दोस्ती की है जिन्होंने मुसलमानो पर सब से ज्यादा ज़ुल्म किया है, OIC ने जिसकी निंदा की है।

अरब लीग के बैठक मे तमाम अरब मुमालिक ने अपनी अपनी राय रखी, और 8 ओक्टोबर् से इस्राएल जो कुछ भी कर रहा है वह सबकी निंदा की है जो शुरुआती दिनों से ही करते आये है।
अरब देश दुनिया भर के मुसलमानो का नुमाइंदा होने का दावा करते है लेकिन 1948 से फिलिस्तीन के ज़मीन को कब्ज़ा करके इस्राएल बैठा हुआ है और फिलिस्तिनियो को मार कर भगा रहा है उसको आज़ाद नही करा सके, इसके उलट अरबो ने इस्राएल से दोस्ती कर ली और अमेरिका के कहने पर इस्राएल से बिजनेस शुरू कर दी। ये वह समझौते है इस्राएल के साथ जिसे जरिये इनकी दोस्ती बढ़ रही है, जैसे जैसे इनकी यहूदियों से दोस्ती बढ़ रही है वैसे वैसे इस्राएल का फिलिस्तीन पर बॉम्बारि भी बढ़ रहा है। अब तक 12500 से ज्यादा लोगो का क़त्ल कर चुका है।

अब्राहम एकार्ड्स
I2 U2  -  जिसका मतलब होता है (इंडिया इस्राएल - यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका,  युनिटेड अरब एमिरात)।
तीसरा समझौता है "इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप कॉरिडोर"
इन सब के जरिये अमेरिका अरबो पर इस्राएल को तसलिम करने का दबाओ बना रहा है, दूसरी तरह UAE और सऊदी अरब गरीब मुस्लिम देशों पर अमेरिका के हुक्म को मानते हुए धमका रहा है इस्राएल से दोस्ती बढ़ाने के लिए।

अरब लीग मे एक प्रस्ताव रखा गया जिसके तहत 5 शर्त रखा गया लागू करने के लिए। जिसके पक्ष मे 11 अरब देश वोट किया और 4 अरब देश खारिज कर दिया।

1. अरब देश अपना मिलिट्री बेस अमेरिका और उसके सहयोगियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाए। जिसके जरिये इस्राएल को हथियार और गोला बारूद भेजा जा रहा है।

2. अरब देश इस्राएल से राजनयिक, आर्थिक, सामरिक और सैन्य रिश्ते खतम करे।

3.तेल भेजना बंद करे और अपने सलाहियात् के मुताबिक जंग बंद करने का दबाओ डाले।

4. इस्राएल के नागरिक विमानो के लिए अरब देश वायुमार्ग बंद करे।

5. एक अरब मंत्रियों के समिति का गठन करे जो फ़ौरन न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन, जेनेवा, लंदन, पेरिस और ब्रुसेल्स जाए, और अरब समिट  वहाँ जंग बंद करने के लिए और ग़ज़ा का नरसंहार बंद करने के लिए दबाओ डाले।
इस प्रस्ताव का 11 देशो ने समर्थन किया जबकि 4 देश प्रस्ताव के खिलाफ थे। इन चार देशो का नाम ज़ाहिर नही किया गया है जबकि समर्थन करने वाले देशों का नाम बताया गया है।

इस प्रस्ताव पर 11 देशो ने वोट किया
फिलिस्तीन
सीरिया
अल्जीरिया
टूनिशिया
इराक
लेबनान
कुवैत
क़तर
ओमान
लीबिया
यमन

इससे यह साफ ज़ाहिर होता है के ये अरब लीग या OIC से कुछ नही होने वाला है मुसलमानो का, सिर्फ अपनी मनमानी के लिए अरबो ने यह संगठन बनाया है जिसे जरिये अपना प्रभाव का इस्तेमाल बाकी कमज़ोर देशों करे और उस अपना गुलाम बनाकर रखे।
इस के खिलाफ वोट करने वाले का नाम भले ही नही दिया गया हो लेकिन सियासत के महिरीन को मालूम है के वह कौन चार अरब देश है।
सऊदी इसमे जरूर शामिल होगा, UAE भी इसमे अपना कोर्दुग्लू का किरदार अदा कर रहा है, बाकी मिस्र और जोर्डन पर तो इस्राएल का बैठाया हुआ अपना मुखबिर हुकमराँ है ही।

सऊदी सिर्फ कमज़ोर मुस्लिम देशो पर अपना सिक्का चलाता है जबकि फिलिस्तीन के लिए आजतक कुछ कर नही सका सिर्फ निंदा के।
सऊदी पहले ही कह चुका है के वह तेल को हथियार के रूप मे इस्तेमाल नही करेगा। वह अपने यहाँ मस्ज़िद के इमाम को भी अपने हिसाब से चलाता है, ताकी अवाम बादशाह के खिलाफ आवाज़ न उठाय। खाना ए काबा के इमाम अल सदैश् कहते है "फिलिस्तीन का मसला एक फितना है, इसमे मुसलमानो को शामिल नही होना चाहिए"। वहाँ उलेमा को मस्ज़िद मे खुतबा देने से पहले का बोलना है वह लिख कर दिया जाता है, जिस तरह सारी दुनिया मे फिलिस्तीन के लिए दुवायें हो रही है और इमाम मेम्बर से लोगो को मस्जिद ए अकसा की अहमियत, फिलिस्तिनियो की आज़ादी, ग़ज़ा के लोगो के उपर हो रहे ज़ुल्म को बता रहे है वैसा वहाँ कुछ भी नही है। वहाँ के दरबारी इमाम स्क्रिप्टेड खुतबा देकर अवाम को अंधेरे मे रख रहे है ताकि अवाम हालात ए हाज़रा से रूबरू हो गयी तो हुकूमत के खिलाफ बगावत शुरू हो सकता है या बादशाह को अमेरिका और इस्राएल की मदद करना बंद करना होगा।
सऊदी अमेरिका का कठपुतली है जो इस्राएल को फिलिस्तिनियो के खिलाफ मदद कर रहा है।

UAE उन चार देश में शामिल जिसने 2020 मे इस्राएल को मान्यता दिया था। इसने ग़ज़ा के नरसंहार पर इस्राएल का साथ दिया और वाज़ेह कर दिया के हम इस्राएल से अपना बिजनेस खतम नही करेंगे, उससे संबंध नही तोड़ेंगे।

मिस्र के सदर अल सीसी का तो पता ही होगा के वह अमेरिका का कठपुतली है, जिसने लोगो की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करके उस फांसी की सज़ा देकर खुद तख्त पर काबिज है। फतह अल सीसी ये सब मोसाद और CIA की मदद से किया था।

जोर्डन का किंग इस्राएल का बैठाया हुआ अपना एजेंट है,। इस्राएल को अज़रबैजान तेल भेज रहा है, अमेरिका और दूसरे ईसाई देश हथियार भेज रहा है वह सब जोर्डन के बंदरगाह से होते हुए जा रहा है।
यमन, इराक,शाम और ईरान के खिलाफ रहने वाला सऊदी अरब अमेरिका के इशारे पर काम करता है, आज इन्ही मुल्को ने फिलिस्तीन के समर्थन के लिए अरब लीग मे वोट किया।

खबर आई है के अरब इस्लामिक समिट मे सऊदी अरब, UAE, मोरोक्को, बहरीन ने इस ड्राफ्ट के खिलाफ वोट किया, यानी वह तेल और ऐरस्पेस ये सब अमेरिका इस्राएल के इस्तेमाल के लिए जारी रखेगा सिर्फ जुबानी जंग करेगा, ये नही होना चाहिए, वह नही होना चाहिए, ऐसे करेंगे वैसे करेंगे वगैरह वगैरह। लेकिन अमली तौर पर इस्राएल के साथ खड़े रहेंगे। 

फिलिस्तीन के तरफ से एक शेर इन छुपे दुश्मनो के लिए

बेनकाब उन की ज़फाओ को किया है मैंने

वक़्त के हाथ मे आईना दिया है मैंने

फिल्हाल अरब मुल्को मे अभी कैसा माहौल है?
पाकिस्तान के सेनेटर मुस्ताक अहमद क़तर और मिस्र गए थे हमास के नेताओ से मिलने।

उन्होंने वहाँ क्या कुछ देखा वह बताते है।

"आलम ए अरब मे अवाम को अपने डेंटिस्ट के अलावा कही और मूंह खोलने की इजाज़त नही। अमेरिकी गुलाम बादशाहो ने अवाम को बदतरीन गुलाम बनाया हुआ है। मैंने मिस्र मे दो हफ्ते गुजारा है, काहिरा मे जुमे के दिन किसी भी मस्ज़िद मे फिलिस्तीन या मस्जिद ए अकसा का ज़िक्र नही हुआ, कही भी जलसे जुलूस नही हुए, किसी भी मस्ज़िद मे फिलिस्तिनियो के लिए दुवायें नही हुई, वहाँ उलेमा के तरफ से इसपर कोई बहस नही हो रहा है, न अवाम को कुछ बताया जा रहा है। वहाँ मस्जिद के इमाम को इसपर बोलने की इजाज़त नही, मुजाहिरा करने पर पाबंदी है। वहाँ हर जुमे के दिन बड़ी मस्जिदो मे नमाज से पहले पुलिस गड़ियां, जेल गाड़ियां, शेलिंग, लाठी चार्ज की जाती थी। पुलिस दस्तो की तैनाती हमेशा रहती थी। मिसरी सदर फतह अल सीसी ने हमास के रॉकेटो से बचने के लिए इजरायली प्रधान मंत्री और फिलिस्तिनियो का क़ातिल नेतन्याहु को दो जहाज़ भेज दिया हमास के रॉकेटो का आग बुझाने के लिए।"

UAE ने इस्राएल के लिए राहत समाग्रि का पांच जहाज़ भेजा, वही इस्राएल के मंत्री बोल रहा है के हमे फिलिस्तिनियो के जाने की की परवाह नही।
अमेरिकी सदर बोलते है के "इजरायली लोगो की जान फिलिस्तिनियो से ज्यादा अहम है"
यहूदि आलिम ने कहा के "इजरायली फौज (IDF) को इजरायली औरतों को छोड़कर बाकी सारे फिलिस्तिनि औरतों का रेप करना चाहिए"
अमेरिकी विदेश मंत्री (एंटोनी ब्लिंकेन्) इस्राएल जाकर कहता है "मै यहाँ अमेरिकी विदेश मंत्री की हैसियत से नही बल्कि एक यहूदि होने की हैसियत से आया हू"

इस्राएल ने हॉस्पिटल पर बॉम्बारि के 12500 से ज्यादा लोगो को मारा, कहाँ है वह जो मुसलमानो का नेता बनने को तैयार रहता है?
किधर है वह सुन्नी मुसलमानो का रहनुमा ?
किधर है वह OIC का हेड जो अपनी मन मर्ज़ी से दूसरे मुस्लिम मुमालिक को अलग थलग करने मे लगा रहता है।
कहाँ है वह 40 देश के आर्मी चीप  जो UN के कहने पर शांति सेना भेजता है?
कही ये OIC (Orgnization of Israel Co -Opration) तो नही .
किधर है वह अरब मुमालिक जो अमेरिका की चाकरी करने और मुखबिरी करने मे लगा रहता है, उसका दोस्त अमेरिका और ब्रिटेन किधर है? जिसने उस्मानिया सलतनत से आज़ादी के लिए अंग्रेजो का साथ दिया था?

Share:

Palestine: Masjid E Aqsaa Ki Aazadi,Musalmano ki Bedari aur Jihad ka waqt.

Maszid-E-Aqsa Ki Aazadi ke liye Musalmano ko kya karna chahiye?

Gza ki Pukar, Bedar Ummat aur Jihad Ka Faisla.
Musalmano ka Rehnuma kaun hai, Muslim Leadership kaha hai?
Palestine par Musalman Hukmran aur Aam Musalmano ka Rawaiyya.

پیامِ غزہ : بیدارئ اُمت اور جہـ.ـادِ اُمت کا فیصلہ کن موڑ ؛ حصہ اول

استاد اسامه محمود حفظہ اللّٰه

برصغیر اور پوری دنیا میں بستے میرے اہل ایمان بھائیو اور بہنو!

السلام علیکم ورحمتہ اللہ وبرکاتہ !

الحمدللہ الله کا فضل و احسان ہے، اس کا انتہائی کرم ہے کہ مسجد اقصیٰ کی بازیابی کا جہـ.ـا د ، جو بالاصل پوری امت کو اس کی عزت لوٹانے اور اس کو آزادی دلانے کا جہـ.ـا د ہے، آج ایک انتہائی اہم مرحلے میں داخل ہوا چاہتا ہے اور دنیا میں نمودار ہونے والے واقعات و حالات سب بتا رہے ہیں کہ امت مسلمہ کی تاریخ میں یہ مرحلہ اس کے لیے ایک بالکل نئے دور کا آغاز ان شاء اللہ ثابت ہو گا۔
اس مرحلے کی حالیہ نشانی، قلب و روح کو فرحت و سرور دینے والا عظیم واقعہ طوفانِ اقصیٰ ہے۔

وہ مبارک اور بے مثال طوفان کہ جو غزہ کے مجـ.ـا ہدینِ عظام اور پیکر صبر و ثبات عوام کے ، ذلت کی زندگی پر عزت اور دنیا کی عارضی متاع پر آخرت کی دائمی نعمتوں کو ترجیح دینے کے باعث ممکن ہوا، بلاشبہ اس نے امت سے ذلت ورسوائی کے وہ داغ دھو ڈالے جو خائنین امت کی قبیح خیانتوں اور غداریوں کے باعث امت کے اجلے دامن پر لگے تھے۔ یہ حقیقت ہے کہ اس کو دیکھ کر ہر صاحبِ ایمان کو دل کے اندر تک اسلام اور اہلِ اسلام کی عزت و عظمت کا ایک نیا احساس ہوا اور الحمدللہ نظر آ رہا ہے کہ طوفان الاقصیٰ اور اس کے بعد کے واقعات کے باعث آج پوری امت میں جہـ.ـا د اور استشھاد کے جذبے نے زور پکڑ لیا ہے۔ بچے، بوڑھے اور جوان، بلکہ خواتین تک بھی، سب میدان جہـ.ـا د میں اترنے کے راستے ڈھونڈ رہے ہیں اور فرط تشکر سے ہماری آنکھیں بھیگی ہیں کہ ہر طرف اقصیٰ کی خاطر جینے اور اہل اقصیٰ ہی کی خاطر مرنے اور شہید ہونے کی قسمیں اٹھائی جارہی ہیں۔

ہماری دعا ہے کہ یہ جذبات کبھی ٹھنڈے نہ ہوں، یہ عظیم مقاصد و عزائم کبھی پست نہ ہوں، یہ موقع اور یہ جنگ ہم سب کی زندگیوں میں ایک ایسی با معنی تبدیلی کا ذریعہ بن جائے کہ جس کا محور، مرکز اور بنیاد اللہ سبحانہ و تعالیٰ کی محبت و بندگی ہو ، ہماری زندگیوں میں وہ تبدیلی و انقلاب یہ لائے کہ جس کا راستہ جہـ.ـا د فی سبیل اللہ اور جس کی منزل اقصیٰ پہنچ کر فتح یاب ہونا یا دوسری صورت میں جہاد اقصی میں ہی قربان ہو کر جام شہادت پینا ہو... اللہ ہی سے دعا ہے اور وہ ذات ہی دعاؤں کو سننے اور قبول کرنے والی ہے کہ اللہ ! امتِ مسلمہ کے سب مجـ.ـا ہدین / اہل ایمان کو یہ توفیق دے کہ وہ سب اپنی اپنی جگہ مجـ.ـا ہدینِ قدس کے ہم رکاب بن جائیں سسکتی ماؤں، بہنوں اور ارض قدس میں قتل ہوتے ہمارے معصوم بچوں کے انتقام کی خاطر وہ صہیونی صلیبی اس منحوس اور ابلیسی اتحاد کے خلاف اٹھ کھڑے ہوں، ان ظالموں پر عذاب الہی کا کوڑا بن کر برسیں اور یوں امتِ مسلمہ شرق سے غرب اور شمال سے جنوب تک ان عظیم جہـ.ـا دی لشکروں کا منظر پیش کرے کہ جن کے دیکھنے کے لیے تاریخ کو ایک صدی سے زائد عرصے کا انتظار کرنا پڑا، وہ عظیم لشکر یہاں بن جائیں کہ جن کے اٹھنے اور آگے بڑھنے کے لیے دنیا بھر کے مظلومین چشم بہ راہ ، یہ دعا مانگ رہے ہیں کہ یا اللہ ! ہمیں اس زمین سے نکال کہ یہاں کے باسی بہت ظالم ہیں اور یا اللہ ! اپنی طرف سے ہمارا کوئی مدد گار اور نصرت کرنے والا بھیج !

پس آج اگر ان مظلومین کی پکار پر لبیک کہا گیا، جو فرض ہم پر عائد ہے اس کے ادا کرنے میں اگر لیت و لعل سے کام نہیں لیا گیا، مسجد اقصیٰ کی آزادی کے لیے ناگزیر اور مطلوب ایک جہـ.ـا دی تحریک اگر اٹھ کھڑی ہوئی، نوجوانانِ امت خراسان و برصغیر سے جزیرۂ عرب، ارض شام و افریقہ تک اس جہـ.ـا دی لشکر میں اگر شامل ہوئے اور لشکر ابلیس پر ضربیں لگانے کے لیے پورے عالم کو میدانِ جہـ.ـا د اگر بنا لیا گیا۔ اور اللہ کے اذن سے یہی کچھ اب ہو گا، اس لیے کہ اس کے علاوہ اقصیٰ کی آزادی کا کوئی اور راستہ نہیں۔ تو پھر فتح و نصرت ان شاء اللہ زیادہ دور نہیں، اللہ کے اذن سے پھر یہی وہ لشکر ہوں گے جن کے بالآخر کامیاب ہو جانے کی بشارت نبی الملاحم ﷺ آج سے چودہ سو سال پہلے دے چکے ہیں اور جو ایک فتح کے بعد دوسری اور ایک پڑاؤ کے بعد دوسرے پڑاؤ کی طرف پیش قدمی کریں گے ، پرچمِ جہـ.ـا د ایک ہاتھ کے کٹنے کے بعد دوسرا تھامے گا، شہادتیں اس سفر میں رکاوٹ نہیں بنیں گی، بلکہ اس کا خون امت کی عزت و عظمت کے اس سفر میں ایندھن بن کر عزیمتوں اور عظمتوں کے اس قافلے کو آگے سے آگے دھکیلے گا اور بالآخر وہ وقت پہنچ ہی جائے گا جب اللہ کی زمین پر اللہ ہی کا عدل و انصاف قائم ہو جائے گا اور ظلم و کفر پر کھڑے دجالی نظام کے لیے دنیا بھر میں کہیں کوئی جائے پناہ نہیں مل پائے گی ..... جاری ہے ان شاء الله

Share:

Palestine: Yahud O Nasara Ek Sath, Palestine ko Kaun de raha hai Madad?

Aaj Palestinian ke  Sath kaun hai?

एक रिवायत है के अल्लाह के नबी ने फरमाया के उस वक़्त तुम्हारी क्या कैफियत होगी जब तुम्हारे खिलाफ दुनिया की सारी क़ौमे एक दूसरे को ऐसे दावत देगी जैसे खाने के मेज पर दावत दी जाती है? सहाबा ने पूछा क्या उस वक़्त हमारी तादाद कम होने की बिना पर होगा? अल्लाह के नबी ने फरमाया नही बल्कि उस वक्त तुम्हारी तादाद बहुत ज्यादा होगी लेकिन तुम्हारे दिलो मे "वहम" डाल दिया जायेगा। सहाबा ने अर्ज़ किया अल्लाह के नबी "वहम" क्या चीज है? अल्लाह के नबी ने फरमाया "दुनिया से मुहब्बत और जिहाद से नफरत".

ऐ ईमान वालो तुम यहूदियों और नासराणियो को यार व मददगार न बनाओ, ये दोनो खुद ही एकदूसरे के यार ओ मदद गार है। और तुम मे से जो शख्स उनकी दोस्ती का दम भरेगा तो फिर वह उन्ही मे से होगा। यकिनन अल्लाह जालिम लोगो को हिदायत नही देता।
 

यहूद ओ नसारा एक साथ - फिलिस्तीन को किसका साथ?

मानवाधिकार पर उपदेश देने वाला अमेरिका इस्राएल के आतंक पर खामोश क्यो है?

फिलिस्तीन मे अरब कब से आबाद है?

मुसलमानो का रहबर अहले अरब फिलिस्तिनियो पर हो रहे ज़ुल्म पर खामोश क्यो?

मस्ज़िद ए अकसा से मुसलमानो का क्या ताल्लुक़ है?

फिलिस्तिनियो के लिए जो मुहब्बत और हिमायत यूरोप के ईसाई देशो मे देखने को मिल रहा है, और जिस तरह का समर्थन मिल रहा है वैसा समर्थन ख्वाजा के हिंदुस्तान, काएड ए आज़म के पाकिस्तान, नमनिहाद् खलिफ्तुल् मुस्लेमीन के तुर्किये मे नही मिला। अरबो का तो छोर ही दीजिये, उनके ख़ज़ाने की चाबी फिरंगियों के पास है लिहाज़ा वह अपाहिज हुकमराँ क्या कर सकते है? यूरोप के हुक्मरानो की मिलीभगत इस्राएल के साथ है, लेकिन अवाम फिलिस्तीन के साथ।

अमेरिका का बनाया हुआ UNO फिलिस्तिनियो का हक देने मे नाकाम रहा, अमेरिका से अरबो की दोस्ती फिलिस्तिनियो के खून बहाने पर टिका है।
आज वह 57 मुस्लिम मुमालिक किधर है?

शहादत है मत़लूब मक़सूद मोमिन 

ना माले ग़नीमत ना किश्वर कुशाई।

निहायत अहम सवाल।

फिलिस्तीन के मुसलमानो के साथ कौन खडा है?

जवाब आया... पहले खुद के मसाएल तो हल करें, हमारे आसपास  बहुत से मजलुम है पहले उसकी बात करे फिर फिलिस्तीन की सोचेंगे?

लेकिन इस्लाम कहता है। मोमिन एक जिस्म की मानिंद है जैसे जिस्म का कोई भी हिस्सा तकलीफ मे होता है तो पुरा जिस्म भी तकलीफ मे होता है। दीन ए इस्लाम मे सरहद की कोई अहमियत नही, मुसलमान दुनिया के किसी भी खितते मे हो वह एक जिस्म है।

फिर सवाल किया गया के मजलुम तो पूरी दुनिया मे है
फिर हम फिलिस्तीन को क्यो अहमियत दे?

बात यहाँ ज़ुल्म के साथ साथ क़ीबला ए अव्वल का है, उस मुकद्दस जगह की है जहाँ से हमारे आखिरी नबी को मेराज का सफर कराया गया।

सबसे पहले उनके दुखो को समझे जहाँ यहूदियों ने उसका पानी, बिजली, खाना, इंटनरेट सबकुछ बंद कर रखा है, दिन रात बॉम्बारी हो रही है, घरों, स्कूलों, अस्पातालो और कॉलेजों पर बॉम्ब गिरा कर तबाह कर दिया, फिलिसीटीनियो के कंधो पर शहीदो के मैय्यत है।

सारी दुनिया मे 5 वक़्त की नमाज होती है। फजर, ज़ोहर, अशर, मगरिब् और ईशा लेकिन ग़ज़ा के लोग इसके साथ साथ जनाज़े की भी नमाज पढ़ते है।

जहाँ एक जनाज़े को क़ब्रिस्तान तक पहुचाने मे कितने जनाज़े की जरूरत होती है।

वे हमारे जिस्म के टुकड़े है  जो अभी सबसे जयादा दुनिया मे ज़ुल्म सह रहे है.. वे हमारे बच्चे है जिनके माँ बाप शहीद हो चुके है और उनके मैय्यत पर भूखे प्यासे रोये जा रहे है.. उनको कोई दिलासा देने वाला नही, उनको आज चुप कराने वाला कोई नही, जो जिंदा है उनके पास खाने के लिए कुछ नही और जो शहीद हो गए उनको कंधा देने वाला कोई नही।

वह हमारी बा हया पर्दा दार बच्चिया है जिनकी इज़्ज़ते महफूज नही, यहूद ओ नसारा उनके जिस्मो से खेल रहे है। क्या आपको गैरत नही आती?

आने वाली नस्लें ये तारीख याद रखेगी एक वक़्त था जब मुसलमान इतने बेगैरत हो गए थे के मजलुम मुसलमान भाई बहन चींख रहे थे। मर्द शहीद हो रहे थे, बच्चो को बॉम्बारी करके नस्ल क्शी की जा रही थी, पर्दा दार औरतों को बे पर्दा किया जा रहा था, जवान लड़कियो की इज़्ज़त लूटी जा रही थी लेकिन 57 मुमालिक होते हुए कोई मदद के लिए नही आया।

जो शहीद हुए वह जन्नत मे जायेंगे, लेकिन तुम किस शकल को लेकर जन्नत मे जाओगे।

जज़्बाती और जल्दबाजी मे कोई कदम नही उठाये,आज के मुसलमानो से सब्र नही होती वे जज़्बात मे बहक जाते है तैयारी मुश्किल लगती है।

अल्लाह किसी शख्स को उसकी ताक़त से ज्यादा ज़िम्मेदारी नही सौंपता

हुकमरानो पर दबाओ डालें के वह कुछ करें, क्योंके हुकुमती सतह पर ही कारवाई किये जा सकते है

माली (आर्थिक) मदद करे लेकिन पहले तहकिक कर लें के वह एदारा फर्जी न हो, क्योंके पैसे के लालची, दयुस्, पुजारियो को एहसास नही होता के यह मजलुमो का पैसा है।

लोगो को आगाह करे, इसकी खबर दूसरे भाईयो तक पहुचाये, पैसे से मदद करने की सलाहियात् हर किसी की नही होती लिहाजा जबरदस्ती नही करे, और तरीके भी है मदद करने के।

सोशल मीडिया पर एक अंदाज़ से लोगो को आगाह करे, एहसास ए उम्मत पैदा करे। सिर्फ सोशल मीडिया ही नही, मस्ज़िदों मे इमाम से दुआ करने को कहे, मदरसो मे उलेमा को इसकी इत्तला करे ताकि वह लोग मजलुमो के लिए दुआ कर सके।

दोस्तो, रिश्तेदारों, फैमिली मे इस पर बहस करे, अगर आप की बातो पर कोई ध्यान नही दे रहा है तो सवाल करे बड़ों से के फिलिस्तीन के लिए हम क्या कर सकते है?
दुसरो से सवाल करे, उनको यह बुरी बात भी नही लगेगी और इस तरह ऐसे मौजू पर गुफ्तगु भी हो जाती है।
बच्चो से भी इस पर चर्चा करे, उनके जेहन मे डाले , उनको क़िस्से कहानियों की तरह तारीख बताये। ताकि  उनके जेहन मे अभी से दिलचस्पी बढे इसके बारे मे जानंने की।

यहूद व नसारा के बनाये हुए सामान् का बॉयकॉट करे, आज इस्राएल के साथ पुरा नसरानी खडा है, वह इसलिए के हम उम्मत ए मुहम्मदिया है। यहूदियों पर सबसे ज्यादा ज़ुल्म हुआ तो वह ईसाइयों ने किया यूरोप मे, लेकिन आज मुसलमानो के खिलाफ दोनो एक साथ है, स्पेन के 800 सालों की मुसलमानो की हुकूमत यहूदियों की वज़ह से ही खत्म हुई।

ट्विटेर का मालिक एलन मुस्क ने इस्राएल का साथ देते हुए वहां फ्री ऑफ कोस्ट सर्विस देने की बात कही है।

खाना पहुचाने वाली कंपनिया Mac Donald यहूदियों को फ्री मे खाना खिलाने का एलान किया है, जबकि इसकी जरूरत फिलिस्तीन के लोगो को थी लेकिन उसने यहूदियों का साथ दिया, आज गजा के लोग खाने खाने को मोहताज है।

युक्रेन के मामले मे ईसाई सोशल मीडिया ने एलान किया था के जो कोई भी रूस के खिलाफ जंग के लिए उक्सायेगा उसको फेसबुक बढ़ावा देगा, लेकिन आज इजरायली आतंकियो के हमले पर फिलिस्तिनियो के हक की आवाज़ उठाने वालो की id ब्लॉक कर रहा है, आपको रोका जा रहा है ग़ज़ा के लोगो के उपर यहूदियों के होते ज़ुल्मो को दुनिया के सामने रखने पर।

आपको ब्लॉक कर दिया जा रहा है फिलिस्तीन के दुआ करने पर।

जितनी भी कंपनिया Google, Facebook, Twitter, Instagram, YouTube, etc ये सब ईसाइयों की है और अमेरिकन कंपनी है, अमेरिका के साथ साथ पुरा ईसाई मुमालिक यहूदियों के साथ है मुसलमानो के क़त्ल ए आम मे शामिल। ये कंपनिया इंफोर्मेशन वार कर रही है, इस्राएल को ये कंपनिया और वेस्टर्न मीडिया मजलुम साबित करने मे लगी है।

ईसाइयों की मीडिया, ईसाइयों की यूनियन EU, ईसाइयों का बनाया हुआ ग्लोबल ऑर्डर (UN) आज सब इस्राएल की मुखबिरी कर रहा है। ये यहूदियों की प्रोपगैंडा न्यूज़ को फैला रहा है।

जज़्बाती नारे कभी न लगाए ।
इजरायली कंपनी का हमेशा के लिए बॉयकॉट करे, पहले उसके प्रोडक्ट की तहकिक कर ले।

सालों तक मुस्लिम विरोधी / इस्लाम मुखलिफ् आंदोलनों को सरकारी समर्थन देना अमेरिका, UK, Israel दूसरे यहूद व नसारा की ज़िंदगी का हिस्सा रहा है.

इस क़त्ल ए आम मे कौन इस्राएल का साथ दे रहा है?

जितना फिलिस्तिनियो के खून का ज़िम्मेदार आतंकी इस्राएल और ईसाई देश है उतना ही ज़िम्मेदार UAE जैसे अरब मुमालिक है, #Palestenian को मारने के लिए अमेरिका ने जो हथियार भेजे है वह UAE के बंदरगाह पर उतरा वहाँ से दहशतगर्द यहूदियों के यहाँ जायेगा। अहले अरब ने फिलिस्तीन के खून का सौदा अपनी हुकुमत और पैसे से कर लिया है।

इजरायली नरसंहार को ईसाई देशों का समर्थन हासिल है, अमेरिका के सेनाटर् इस क़तलेआम को "Holly war" बता रहा है, वह इसे इस्लाम और मुसलमानो के खिलाफ क्रुशेड कहता है लेकिन तथाकथित इंसानी हुकूक और लोकतन्त्र का रक्षक इसपर न सिर्फ खामोश है बल्कि इसका साथ भी दे रहा है। क्या कोई इसे यहूदि आतँकवाद या ईसाई आतँकवाद कह सकता है?

मुसलमानो के खिलाफ पहले इंग्लैंड अब अमेरिका और उसका बनाया हुआ UNO काम करता रहा है।

इस्राएल और ईसाइयों का प्रोपगैंडा वार।

इस्राएल फिलिस्तीन के खिलाफ प्रोपगैंडा फैलाने मे बहुत माहिर है, वो नरसंहार करने से पहले "प्रोपगैंडा वार" करता जिसका साथ यूरोप से लेकर एशिया तक के Columnist, Reporter, Anchor, Actor, Artist aur Leader, Speaker,Scholar देते है। इसलिए किसी भी वीडियो को देख कर अपनी राय न बनाये।

जब वेस्ट के मीडिया का झूठा प्रोपगैंडा पकडा गया तो ईसाई देश के नेता और राजनेता खुद इस्राएल का मुखपत्र बन कर एजेंडे के तहत तैयार किया गया अफवाह फैला रहा है, इसमे हिंदी मीडिया और नामनिहाद् सेकुलR, लिब्रल्स रिपोर्टर शामिल है।

आखिर अमेरिका को इतना डर किससे है के खुद झूठा प्रचार कर रहा है ।

प्रोपगैंडा न्यूज़ फैलाने मे यूरोप पुराना खिलाडी है
मुसलमानो के खिलाफ।

जिस तरह इस्राएल 1948 से मुसलमानों पर बॉम्बारी कर रहा है उस पर आजतक UNO ने चिंता ज़ाहिर नही किया, मनवाधिकार पर भाषण देने वाला, लोकतन्त्र की गुजार लगाने वाला ब्रिटेन अमेरिका फिलिस्तीन मे क़त्ल ए आम पर क्यो खामोश हो जाता है।

ये सलेबी मुल्को का उसूल की बुनियाद ही मुसलमानो के खून बहाने पर है।

अहले अरब ईसाई मुल्को के गोद मे जाकर बैठा है, अरब के बादशाह कोई खुदमुख्तार बादशाह नही है बल्कि वो अमेरिका का बैठाया हुआ गोवर्नोर है, जो अपने हुकमराँ के इशारे पर, हुकूमत के फरमान पर काम करता है।

57 मुस्लिम मुमालिक मे से अवाम फिलिस्तिनियो के साथ है, लेकिन मुस्लिम हुकमरां इजरायली एजेंटो के साथ है जो छुप छुप कर मुनाफीको के जैसा काम कर रहा है।

मुसलमान अपने हुकूमत से मुतालबा करे, सऊदी अरब, इराक, लीबिया, UAE तेल पैदा करने वाले कतर गैस निकालने वाले मुल्क है। लेकिन ये फिलिस्तिनियो के खून के भी प्यासे है। अरबो के पास अपना फौज नही है, वे ईसाइयों के फौज को अपना मुहाफ़िज़ बनाये हुए है। इस तरह से वे फिलिस्तिनियो की मदद करने के बजाए अमेरिका से अपनी हुकुमत के बदले फिलिस्तिनियो के खून का सौदा किये हुए है।

अगर वे चाहते तो आल्मी मार्केट मे तेल और गैस की सप्लाई को बन्द कर सकते थे, जिससे दुनिया जल्द से जल्द इस्राएल के आतंक को खत्म करने की कोशिश शुरू करती।
इस्राएल सिर्फ ग़ज़ा पर बॉम्बारी नही कर रहा है बल्कि वह ग़ज़ा और पूरे फिलिस्तीन को दुनिया के नक्शे से मिटाने की कोशिश कर रहा है।

अरबो ने अपनी सियासत का मरकज़ अमेरिका बना रखा है, जिसे दुनिया की दूसरी कुव्वते चीन व रूस इससे अलग है। जब भी फिलिस्तीन का मामला हुआ ईसाइयों ने आतंकी इस्राएल का साथ दिया। फिलिस्तिनियो पर बॉम्ब गिराने वाला IDF को आज तक अमेरिका ने  दहशत गर्द तस्लीम क्यों नही किया?

फिलिस्तिनियो का साथ कभी यूरोप ने नही दिया, जब जब अरबो ने इस्राएल से और अमेरिका से करीबी बढ़ाया अरबो को नुकसान ही हुआ है। अरबो को चाहिए के ईसाइयों और यहूदियों के मुल्क से रिश्ते खत्म कर लें।

आज अमेरिका का दोस्त सऊदी अरब, क़तर, तुर्किये, पाकिस्तान, UAE, बहरीन, जोर्डन, ओमान जैसे मुस्लिम देश है लेकिन ये ईसाई मुल्क इस्राएल के साथ खडा है। ये मुल्को को अमेरिका से हटकर चीन से रिश्ते बनाना चाहिए। जिस वक़्त इस्राएल ग़ज़ा के लोगो पे सफेद फॉस्फोरस गिरा रहा है जिसे UN ने पाबंदी लगाया हुआ है उस वक़्त अमेरिका मनवाधिकार और प्रेस की आज़ादी भूल कर इस्राएल को हथियार और पैसे दे रहा है फिलिसितनियो को खत्म करने के लिए।
यह अमेरिका का बनाया हुआ वर्ल्ड ऑर्डर आज तक फिलिस्तिनियो को उनका हक दिलाने मे नाकाम रहा क्योंके यह ग्लोबल ऑर्डर नही Zewish ऑर्डर है।

हमे तो अपनो ने लूटा गैरो मे कहाँ दम था
मेरी कश्ती थी वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।

ऐ अबाबिल् को भेज कर खाना ए काबा की हीफाजत करने वाले अल्लाह, फरिशतो को नंगी तलवार देकर बद्र के मैदान मे उतारने वाले रब, मूसा को फ़िरौन के यहाँ पालने वाले मालिक, युसुफ को कुवें से निकालने वाले खालिक, ईसा को जिंदा आसमान पर उठाने वाले करीम, इब्राहिम को आग से बचाने वाले रहमान, युनुस को मछली के पेट से निकालने वाले रहीम फिलिस्तीन के मजलुमो, मुज़हदिनो, माओं, बहनो, की मदद फरमा। या अल्लाह तेरे लश्कर बहुत सारे है अपने किसी लश्कर को भेज कर मस्ज़िद ए अक्सा की हीफाजत फरमा और दुश्मनो को नेसत् व नाबूद कर दे, उसे तबाह कर दे। आमीन

Share:

Palestine: Muslim Duniya ki Qayadat (Ledearship) Kaun karne ke layek hai? Musalmano ka Rahnuma kaun?

Musalmano Ka rehnuma aaj kaise log bane hue hai?

Qaum ke Rehnuma aaj Fajir o Fashiq log  bane baithe hai.

मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने के लायक कौन है तुर्की या सऊदी अरबिया?

मुसलमानों को कैसा रहनुमा की आज जरूरत है?
मुसलमानों का रहनुमा आज कैसे कैसे लोग बनने को तैयार है?
मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने के लायक कौन है तुर्की या सऊदी अरबिया?
मुस्लिम दुनिया की कयादत ( लीडरशिप) कौन कर सकता है तुर्की या सऊदी अरबिया?
Palestenian and Current Global Order, Western Countries. 
मस्जिद ए अक्सा से दुनिया भर के मुसलमानों का क्या ताल्लुक है?
मस्जिद ए अक्सा में नमाजियों पर इसराइली पुलिस ने गोलियां चलाई।


" तुम मेरा पानी ले लो, मेरे पेड़ो को जला दो, मेरे घरों को तबाह कर दो, नौकरियां छीन लो, मां बाप की हत्या कर दो, मेरे देश में धमाके करो, हमे भूखा रखो, अपमानित करो लेकिन  हमे इन सबके बदले एक रॉकेट दागने के लिए दोषी ठहराओ "

ये आवाज है फिलिस्तीन की, जहां एक बुजुर्ग ने यह बातें कही थी इससे  उनके दुःख ओ दर्द, परेशानी और मुसीबत का अंदाजा लगाया जा सकता है के किस कदर उन पर इसराइली सैनिकों द्वारा जुल्म ढाया जा रहा है.

Muslim World Leader

तकरीबन 100 साल पहले पहली जंग ए अजीम ( प्रथम विश्व युद्ध ) में उस्मानिया सल्तनत की हार हुई उसके बाद फिलिस्तीन पर अंग्रेजो ( इंग्लैंड ) का हुकूमत हुआ। दुनिया के बड़े देशों ने यह फैसला किया के फिलिस्तीन को यहूदियों का देश बना दिया जाए जिसका नतीजा यह हुआ के फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र बना दिया गया। उस वक्त फिलिस्तीनी नेता ने इस फैसले का विरोध भी किया मगर उनकी आवाजों को दबा दिया गया, अंग्रेज चले गए उसके बाद यहूदी नेताओ ने अपना राष्ट्र बना लिया जिसे आज इजरायल या इसराइल कहते है।

जब एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी से यहूदियों को भगाया था तब दुनिया के किसी देश ने इनलोगो को पनाह नहीं दिया था अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन .... वगैरह देशों ने यहूदी शरणार्थियों से भरे जहाजों को वापस लौटा दिया ये देश अपने यहां इन लोगो को शरण देने से इंकार कर दिया आखिर में ये लोग शरणार्थी बनकर पनाह लेने  फिलिस्तीन आए और अपने बड़े से जहाज पर बैनर लगाकर अपील की थी दरख्वास्त की थी के " The Germans Destroyed our Families and homes, dont you Destroyed our hopes "
जर्मनों ने हमारे घर और परिवार तबाह कर दिए , आप हमारी उम्मीदों को मत कुचलना।

जिस फिलिस्तीन ने इन यहूदियों को पनाह दी, अपने यहां इन लोगो को रहने के लिए जमीन दिए, नई जिंदगी दी, इंसानियत की खिदमत करते हुए उन्हें घर परिवार बसाने दिए, उनके उम्मीदो पर पानी नहीं फेरा बल्कि उसे अपने जैसा इंसान ही समझा और उसे स्वीकार किया आज वही यहूदी एहसान का बदला फिलिस्तीनियों को मारकर चुका रहा है। आज अपने ही मुल्क में फिलिस्तीनी पराए हो गए, आज खुद के घर में ही बेघर हो गए, मासूम फिलिस्तीनी जिन्होंने हिटलर के कत्लेआम से बचने के लिए यहूदियों को पनाह दी आज वही इसकी सजा भुगत रहे है, इन मासूम फिलिस्तीनियों को कहां पता था के हम जिसे अपना समझ कर यहां पनाह दे रहे है वही हमारा आस्तीन का सांप निकलेगा।

आज इन्ही फिलिस्तीनियों के रहने लिए घर नही, इजरायल जब चाहता है तब मिसाइल, रॉकेट और टैंकों से इन फिलिस्तीनियों पर हवाई हमले करता है और इनके पास अपनी हिफाजत करने के लिए कंकरो और पत्थरों के सिवा कुछ नहीं तब भी आज मीडिया इन्हे चरमपंथी, कट्टरपंथी और आतंकवादी कह रही है।
un (संयुक्त राष्ट्र) जो हर वक्त मानवाधिकार ( इंसानी हुकूक ) के उल्लघन का मुद्दा उठाता है और वक्त बे वक्त जब चाहे तब उसपे पाबंदी लगा दिया जाता है, जैसे ईरान पर कई सालो से अमेरिका ने पाबंदी आयेद किए हुआ है सिर्फ इसलिए के उसने अमेरिका की बात न मानी, गुस्ताख ए रसूल के मुआमला को मानवाधिकार का हनन बोलकर यूरोपीय संसद में पाकिस्तान के खिलाफ भारी बहुमत के साथ एक बिल पास कर दिया गया जबकि उसने एक सबूत भी पेश न कर सका के कहां पर इस कानून का गलत इस्तेमाल हुआ, मगर जब फिलिस्तीनियों का नरसंहार किया जा रहा है, उसपे ड्रोन, मिसाइल और रॉकेट दागे जा रहे है लाखो करोड़ों लोग बेघर हो गए मगर मानवाधिकार की बात करने वाला मानवाधिकार आयोग एक भी बयान नही दिया और न चिंता ही जाहिर की है।


मानवाधिकार की वकालत करने वाले , अपना धर्म इंसानियत बताने वाले, मानवता की सेवा करने वाले, लिबरल का चोला डाले हुए किधर चले गए जिनको कल तक मुसलमान आतंकवादी नजर  आ रहा था, चरमपंथी और कट्टरपंथी लग रहा था आज वही  फिलिस्तीनियों के कत्लेआम पर खामोश क्यों?

एक तरफ जहां इजरायल, जिसे अमेरिका यूरोप और संयुक्त  राष्ट्र का समर्थन हासिल, जिसके पास रॉकेट लांचर, मिसाइल और ड्रोन है तो दूसरी तरफ बेघर फिलिस्तीनी जिसके पास कंकर और पत्थर के सिवा कुछ नहीं तब भी लोगो को फिलिस्तीनी   आतंकवादी और चरमपंथी ही नजर आ रहा है।

जब अलविदा जुमे (07 मई 2021) की नमाज अदा करने फिलिस्तीनी अल अक्सा मस्जिद में गए तभी इसराइली पुलिस ने उन पर गोलियां चलाना शुरू कर दी।


क्या अब फिलिस्तीनी अपने मुल्क में इबादत भी नही कर सकते?
वही फिलिस्तीनी जिन्होंने यहूदियों को अपने यहां पनाह दी आज वही खुदा की इबादत करने पर मजबूर है।

उस्मानिया सल्तनत की हार और फिलिस्तीनियों का नरसंहार

प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत बिखर गया, सऊदी अरब उस्मानिया सल्तनत के साथ खड़ा न होकर ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया।


सऊदी अरब और उस्मानिया सल्तनत दोनो में पुरानी दुश्मनी थी इसलिए सऊदी अरब ब्रिटिश उपनिवेश का एक हिस्सा था जिससे इंग्लैंड को और ताकत मिल गया उस्मानिया सल्तनत को तबाह करने में। ब्रिटेन हमेशा उस्मानिया सल्तनत को अपना प्रतिद्वंदी ( हरिफ ) समझता था इसलिए वह नही चाहता था की इतना विशाल साम्राज्य हमारे लिए चुनौती बने जिसका नतीजा यह हुआ के अंग्रेजो ने यहां भी " डिवाइड एंड रूल " वाली पॉलिसी अपनाई और मुसलमानों को आपस में लड़ा दिया ताकि मुस्लिम मुमालिक कभी एक न रहे और उसकी जगह हमेशा के लिए इंग्लैंड को मिल जाए।
फिर क्या था उस्मानिया सल्तनत की हार हुई और फिलिस्तीन यहूदी राष्ट्र बन गया, अहले अरब खामोश तमाशा देखते रह गए।
क्या सऊदी अरब की इतनी बड़ी दुश्मनी थी उस्मानिया सल्तनत से, के यहूदियों को फिलिस्तीनियों के नरसंहार के लिए यहूदी राष्ट्र बनने दिया?
क्या यह कहना गलत होगा के सऊदी अरब अपनी खुदगर्जी के लिए फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र बना दिया?

मुख्तसर कहा जाए तो सऊदी अरब ने अपने निजी फायदे के लिए फिलिस्तीनियों को बली का बकरा बनाया जो आज तक बनाया जा रहा है।

जरा सोचे अगर उस्मानिया सल्तनत की हार न हुई होती तो फिलिस्तीन और फिलिस्तीनी कैसे होते?

अगर इंग्लैंड फिलिस्तीन को यहूदी राष्ट्र ना बनाकर मुस्लिम राष्ट्र बनाया होता तो कैसा होता?, क्युकी मुसलमान वहां बहुसंख्यक (अक्सरियत) थे और यहूदी अल्पसंख्यक (अकलियत).

सऊदी अरब तब भी अंग्रेजो ( ब्रिटेन ) से मदद लिया था और आज भी अमेरिका और यूरोप की तरफ ही हाथ फैलाता है अपनी हिफाजत के लिए, लेकिन उस्मानिया सल्तनत अपने दौड़ का सबसे ताकतवर और बड़ा सल्तनत था और आज भी उसका एक छोटा सा हिस्सा तुर्की जदीद असलहा से लैस।

अहले अरब को चाहिए के अमेरिका और यूरोप का मोहताज बनने के बजाए खुद के पैरो पर खड़ा होना सीखे, अपना इंटिलिजेंस एजेंसी, मिलिट्री पावर , डिफेंस सिस्टम और साइंटिस्ट बनाए। दीनी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम भी हासिल करे नही तो इसी कमजोरी का फायदा अहले यूरोप हमेशा उठाएगा।

अपनी गलतियों को सुधारें, दीन के मुआमले में भी अपनी दिलचस्पी रखे और इसके साथ सियासत में भी।
अपनी कमजोरी की सजा गरीब मुस्लिम देशों पर दबाव डालकर और अमेरिका से धमकी दिलवाकर ना दें, आज फिलिस्तीनियों पर इसराइली सैनिकों द्वारा रॉकेट हमले किए जा रहे है और अहले अरब हमेशा की तरह निंदा करके रस्म अदा कर रहे है।

ओ आई सी (O I C) वही करता है जो सऊदी अरबिया चाहता है, oic सउदी अरब के फायदे वाली तंजीम (संस्था) है ना के मुसलमानों के हुकूक की आवाज उठाने वाली तंजीम।
जब कश्मीर से 370 की धारा खतम की गई तो खुद को मुसलमानों का रहनुमा समझने वाले अहले अरब ने इसे अंदुरूनी मामला बोलकर खारिज कर दिया, कुछ सालो बाद यहां भी कश्मीरियों का वही अंजाम होगा जैसा फिलिस्तीन में हो रहा है, मगर वक्त रहते हुए अपनी जिम्मेदारी न समझने वाला नकारा, ना अहेल अहले अरब भला मुसलमानों का रहनुमा कैसे बन सकता है?

UAE (United Arab Emirates) , जॉर्डन वगैरह अरब देशों ने पिछले साल (2020) में इजरायल से राजनयिक संबंध भी कायम किया इससे यही जाहिर होता है के इन देशों ने इनडायरेक्ट तरीके से इजरायल को मदद पहुंचाना शुरू कर दिया।

बेगाना के शादी में अब्दुल्ला दीवाना


पिछले साल (2020) में जब अजरबैजान ने तुर्की की मदद से जबरदस्ती कब्जे किए इलाके ( नारागोना काराबाख ) को आर्मीनिया से छुड़ाने में कामयाब रहा तो कई यूरोपीय देशों से यह बर्दास्त ना हुआ। इसलिए यूपियन कंट्री ने तुर्की पे तरह तरह की पाबंदियां लगाई, तुर्की ने जब साइपर्स में तेल का भंडार खोज निकाला
तो ग्रीस ने साइप्रस पर अपना दावा किया जिसकी वजह ने इन दोनो देशों में तनाव बढ़ गया।
ग्रीस जो के ईसाई देश है इसके हिमायत में यूरोपीय देश खड़ा था तो दूसरी तरफ तुर्की खुद तन्हा मैदान में था।
अरब देशों  ( UAE ) ने ग्रीस को मदद के लिए कई हथियार भी भेजे ताकि तुर्की को सबक सिखाया जाए।
फिर ये अरब देश कैसे मुसलमानों के हक की बात कर सकता है जो अपनी निजी फायदे के लिए मुस्लिम देश ( तुर्की ) के खिलाफ ग्रीस को मदद पहुंचा रहा हो?
अगर वाकई ये मुसलमानों के नेतृत्व के काबिल होते तो आपसी गीले शिकवे को  भुला कर तुर्की की मदद के लिए जान की बाजी लगा दिए होते।
और आज जब फिलिस्तीनियों पर हवाई हमले किए जा रहे है तो अहले अरब खामोश क्यों?
इनको सिर्फ मुस्लिम देशों से ही दुश्मनी निभाने आती है बाकी तो सब इनके वफादार दोस्त है।
हमे रहजनों से गीला नही तेरी रहबरी का सवाल है।

कुछ ऐसा ही समझे, यह मामला दो देशों के बीच का है तुर्की और ग्रीस। ईसाई देशों ने ग्रीस का साथ दिया कूटनीतिज्ञ, पैसे और हथियार से तो दूसरी तरफ अहले अरब जो खुद को मुस्लिम दुनिया का कयादत ( नेतृत्व ) करना चाहता है इन्होंने ईसाइयों का साथ दिया अपने निजी स्वार्थ के लिए। अगर इन देशों को वाकई मुसलमानों की फिक्र होती तो तुर्की के साथ खड़े होते या ग्रीस के साथ?
जो मुसलमान अहले अरब को अपना रहनुमा और मददगार समझते है वह खुदको धोखे में डाल रहे उसी तरह जैसे फिलिस्तीनियों ने यहूदियों को अपने यहां पनाह दी और आज इसी का बदला इनसे चुकाया जा रहा है।
तकरीबन 60 लाख यहूदियों को मारकर एक तिहाई ( 1/3 ) आबादी खतम करने वाला एडोल्फ हिटलर ने कहा था के मै कुछ यहूदियों को जिंदा छोड़ रहा हूं ताकि दुनिया देखे मैंने उन्हें क्यों मारा? वाकई आज दुनिया देख रही है।
हिटलर ने यह भी कहा था के यहूदी पीठ में छुरा मारने वाली कौम है

अरब देश मुस्लिम दुनिया का कयादत करने के लायक नही है , क्योंकि वह ऐसे अपाहिज है जो लाठी और डंडे के सहारे चल रहे है या फिर दूसरों की टांगो के सहारे।
अब कोई बेवकूफ ही होगा जो अहले अरब को अपना रहनुमा समझेगा।


जो देश खुद दूसरों के मिलिट्री पावर पे टिका हो वह क्या खाक मुसलमानों के हक की बात करेगा?


जो देश अमेरिका के इशारे पे काम करता हो, मुस्लिम देशों के खिलाफ हथियार भेजकर उसे तबाह करने की चाहत रखता हो वह मुसलमानों का कभी हमदर्द नही हो सकता है?
अरब देश अमेरिका का कठपुतली है , वह जैसे चाहता है नचाता है।
मुस्लिम कंट्री के खिलाफ गैरो की मदद करने वाला कभी मुसलमानों का वफादार नही हो सकता।
जिस तरह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के इशारे पे चलता है उसी तरह oic ( Organization of Islamic Co-operation )  सउदी अरब के इशारे पर।

तुर्की अगर अत्याधुनिक हथियारों से लैस है तब भी वह मुसलमानों का रहनुमा बनने के लायक नही, क्योके वह दिन के मामले में बहुत ही पीछे है, गैरो के तहजीब को अपनाकर खुद को फूले नहीं समाते। बुराइयां आम है, फाजिर वा फाशिको की कमी नहीं, फहाशी आम है वहां, इस्लामिक तरीको से उसका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं।
बे गैरती की हद है वहां , तो ऐसे में वह हमारा कैसे कयादत कर सकता है?

मुसलमानों को कैसा रहनुमा चाहिए?

हमे ऐसा रहनुमा चाहिए जो दीन के साथ साथ दुनियावी मामले में भी हमारी रहनुमाई कर सके, जो हमे शरीयत के मुताबिक जीने की नसीहत करे।

चीन उइगर मुसलमानों को मार रहा है,
इंडिया में कश्मीरी मुसलमानों पर जुल्म ढाए जा रहे है,
म्यांमार में रोहिग्या मुसलमानों का कत्ल किया जा रहा है,
इजरायल फिलिस्तीनी मुसलमानों को मार रहा है तब भी दुनिया इसलाम को आतंकवाद का धर्म कहती है और मीडिया मुसलमानों को कट्टरपंथी और आतंकवादी कहती है।
हमे ऐसा कायेदिन चाहिए जो #इस्लामोफोबिया और #हिजाबोफोबिया से लड़ सके, दुनिया को इसका जवाब दे सके, मुसलमानों की आवाज उठा सके और मुसलमानों पर हो रहे जुल्म के लिए अगर जरूरत पड़े तो फौजी करवाई भी कर सके है।
वैसा रहनुमा चाहिए जो विगर मुसलमानों की आवाज को आलमी सतह पर उठाए, फिलिस्तीनी मुसलमानों के कत्लेआम पर सिर्फ निंदा करके ही खामोश न रहे बल्कि  फिलिस्तीनियों पे हो रहे हवाई हमले का बदला हवाई हमले से ही दे। अपनी निजी स्वार्थ के खातिर मुसलमानों को बली का बकरा बनाने वाला गद्दार हमारा कभी रहनुमा नही बन सकता है।

इंसानियत के सब दर्स हवा कर दिए तुमने
ये घर के घर बमों से तबाह कर दिए तुमने

यमन के जमीं कौमी जंगो के हवाले करके
क्या अपने अपने हक अदा कर दिए तुमने

अजदहो के मानिंद मुल्क ए शाम निगल कर
नन्हे मासूम बच्चे भी जबह कर दिए तुमने

बमों की बू अभी भी फैली है गलियारों में
ये गांव गांव , शहर शहर वबा कर दिए तुमने

यकीनन ये कश्तियां अब मझधार में डूबेंगी
समुंदरो के हवाले ना खुदा कर दिए तुमने।

Share:

Translate

youtube

Recent Posts

Labels

Please share these articles for Sadqa E Jaria
Jazak Allah Shukran

Most Readable

POPULAR POSTS